।।। स्थाणोर्चरित्रम ।।।
जिला फर्रखावाद वर्तमान जिला कन्नौज उत्तरप्रदेश भारत
।।। शिवदयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।।अथ श्री स्थाणोर्चरितृम पंचमोअध्याय ।।।
पुनि बोले शौनक गुण माना । महा भाग तुम सूत सुजाना ।।
लिंग की उतपति कथा सुनाई । छुटो मर्म उर सुख अधिकाई ।।
जासु प्रभाव सकल दुख नासा । संशय विगत विचार प्रकाशा ।।
शम्भु महातम सृष्टि प्रकारा । कहौ विशेष अखिल विस्तारा ।।
तब कह सूत ह्रदय हरषाई । मुनि गण हमकौ देत बड़ाई ।।
जो द्वयपायन मुख सुनि पाई । सो संछेप कहब समुझाई ।।
जव अन्तर हित भये महेशा । रहे तहां विधि हरि भुवनेशा ।।
हंस वराह रूप तिन त्यागे । शिव अनुशासन मन अनुरागे ।।
दोहा-1
शौनकादि कह सूत पुनि , संशय हरौ अथाह ।
विधि हरि किहि कारन भये , रूप हंस वाराह ।।
पुनि कह सूत सुनौ चतुराई । हंस गगन गति वेदि उड़ाई ।।
तासु विवेक एक गुण घोरा । करै विभाग नीर औ छीरा ।।
यथा ग्यान विज्ञान विवेका । हंस विशद गुण सुन्दर एका ।।
सृष्टि काज हित चहियत ज्ञाना । तिहि ते विधि भये हंस प्रधाना ।।
शौनक सुनौ वराह को कारण । कल्प हेत कल्पित जग तारण ।।
तिहि विशेष गुण नीर निवाहा । अधर गमन गति वेग वाराहा ।।
अब प्रति वर्ष विशेष विरामा । श्वेत वराह कल्प अस नामा ।।
निज इच्छा हरि काज विचारी । तब तस रूप धरै हितकारी ।।
दोहा-2
निर्गुन ब्रह्म अनंत शिव , सगुण रूप चित संत ।
तिहि वर दै हरि सन कहा , सुनौ विष्णु भगवंत ।।
त्रिगुण मॉहि उत्तम गुण धारी । गगन मध्य मुखिया अधिकारी ।।
विदित सतो गुण आदिक येते । तुम लगि सवै विमोहित तेते ।।
तिहि ते तुम लगाय सब लोका । हुयिहौ पूजन मानन योगा ।।
विधि विरचित जग जेतिक लोका । यदि कवहु पावै दुख शोका ।।
तव तुम सो दुख नासन काजा । धरौ विविध अवतार विराजा ।।
होय सुयस कीरति विस्तारा । तारण हेत सकल संसारा ।।
हम गुण रूप रुद्र तन धारी । करि अनेक जपु जग हितकारी ।।
करौ मोर तुम सेवन ध्याना । तुमकौ धेवै हम गुण माना ।।
दोहा-3
हम तुम एक सरूप सम , अणु भर अंतर नांहि ।
वस्तु एक गुण रूप धरि , चरित करन जग मांहि ।।
यदि मम भक्त करै तब निन्दा । तासु पुन्य दहि लहै जम फंदा।।
तुम सन मानहि वैर कि दोषा । हम तिहि डारहि नर्क सरोषा ।।
सेवै मनुज उभै सम देखी । भक्ति मुक्ति हम दई विशेषी ।।
येहि विधि नारद करि उपदेशा । कर परसा हरि माथ महेशा ।।
पुनि मोरे सिर शिव धरि हांथा । कहसि कि सुनौ विष्णु जगनाथा ।।
बहुरि होब उत्तम गुणधारी । सकल काम साधक अधिकारी ।।
मम आज्ञा लगि सब जग पाही । प्रविसौ प्राण रूप सब माही ।।
जो तुम आसय सो मम आसय । अन्तर जानय नरक निवासय ।।
दोहा-4
तब लगि हरि विधि रूप की , रच्छा करौ निदान ।
जब लग वीतै वर्ष शत , विधि की आयु प्रमान ।।
सहस चर्तुयुग विधि दिन एका । इतनी विधि की निशा विशेषा ।।
तब लग पुरुषोत्तम गुणधारी । सृष्टि काज तुम करहु विचारी ।।
सुनत गिरा अस विष्णु उदारा । शिव आसन करि अंगीकारा ।।
पुनि हरि कहा कि सुनौ महेशा । हम सब करिहै तब आदेशा ।।
शिव सब भांति सकल सामर्था । मोरि सदा सुधि राखन अर्था ।।
हम तुम कह धेवैं भरि पूरी । पल भर ह्रदय से होव न दूरी ।।
छण भर हम ध्यावैं तुम आवौ । कबहुक मन से दूर न जावौ ।।
यदि मम भक्त करै शिव निंदा । नरक निवास परै जम फंदा ।।
दोहा-5
जो शिव सेवक नित्य सो , मम प्रिय भक्तन मांहि ।
यह विधि जदि जानत रहैं , मुक्ति न दुरलभ ताहि ।।
शिवहि लागि महिमा अति मोरी । वरधै अपर अनुग्रह तोरी ।।
कबहू अगुन होय मम लागी । छमहु सदा शिव दोषन त्यागी ।।
सुन शिव हरि के वचन विचारी । छमहुं सदा हरि चूक तुम्हारी ।।
अस कहि अन्तर ध्यान निरंतर । सव मंगल कारक शिव शंकर ।।
शिव गमने पर विधि नारायण । बचन ते समाधान पारायण ।।
शिव हरि कौ विरेचि सिर नावा । ज्ञान पाय परमानन्द पावा ।।
मुनि हम सृष्टि करन मन आना । तुरत भये हरि अन्तर ध्याना ।।
हरि हर कौ विधि विनै प्रणामा । पूरव दिशि पदमासन धामा ।।
दोहा-6
विधि गायत्री प्रणव पढ़ि , ईश्वर ध्यान लगाय ।
ब्रह्म विशद जल अन्जली , आतुर दई चढ़ाय ।।
प्रधटो सद विराट ब्रह्माण्डा । चोविस तत्व रचित जढ़ अण्डा ।।
लखि संशय बस भये विधाता । गगन गिरा भई पौरुष वाता ।।
सोलह एक बीस मिल अंका । सेवन करौ छुटय भ्रम शंका ।।
सुनि विधि तपे जपे नारायण । बारह वर्ष विष्णु पारायण ।।
तिहि अन्तर प्रधटे भगवाना । कहेसि कि सुनौ विरंचि सुजाना ।।
हम प्रसीद मांगहु मनमाना । मोहि न कछु अदेय वरदाना ।।
हर्षि विरंचि कहेसि तिहि काला । सुनहु विष्णु भगवंत कृपाला ।।
तुमहि योग यह दया निधाना । शिव शासन लगि प्राण समाना ।।
दोहा-7
देखि परत जढ़ अण्ड जह , निर्मित अंश महेश ।
प्राण रूप हुय हरि तुम , तिहि मह करब प्रवेश ।।
विष्णु कहा अज सुरन समेता । अंसन प्रविसहु अण्ड सचेता ।।
अस कहि अन्तर हित भगवाना । सब सुर प्रविसे अण्ड प्रधाना ।।
ह्रदय विरंचि सारदा रसना । वरुण तालु प्रविसे जम दसना ।।
उदर मन्द नभि कमल कृशानू । इन्द्र वाहु लोचन कुज भानू ।।
मित्रा बरुण ब्रषण हर लिंगा । जिहि से प्रधटे सब जग अंगा ।।
पमन स्वास भृगु मदन प्रवेशा । सात धातु ऋषि जलधर केशा ।।
नाशिक पुटन अस्वनी कुमारा । बुध बुधि मैं गुरु उरसि अधारा ।।
मित्र पायु वायुर नभ काना । वच्छसि विस्वे त्वष्ट जंघाना ।।
छंद-
सिंधु कर सुत सोम दुजवर अत्रि अंगज चन्द्रमा ।।
जासु अंस स्वचन्द्र भगवन नित अनादि अनंतमा ।।
अदित के सुत विदित आदित सौपि सूरज अंसमा ।।
वैराट बेशक अभव संम्भव सवै देव अनादि मा ।।
दोहा-8क
इन्द्रिन विशद अनेक सुर प्रविसे रुद्र ललाट ।
मन हुय प्रविसो चन्द्र सो तदपि न उठो विराट ।।
सोरठा-8ख
प्राण प्रभाव स्वराट पंच भूत परमात्मा ।।
आतुर उठो विराट शिवधाल प्रवेसे विष्णु के ।।
दोहा-8ग
सहस्त्र शीरषा पुरुषा सहसत्राक्क्षा सहस्त्रपात ।
सभूमिं सर्वता स्पष्टत व्यापित सब स्वरि तात ।।
।।। इति श्री शिव चरित महात्मे पंचमोअध्याय ।।।
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