Sunday, 17 April 2011

वारहवां अध्याय

।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्म द्वतीयपाद द्वतीयोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


नारद वचन सुने मुनि बृन्दा । मातु पितहि दुख उमहि अनन्दा ।।

मुनि के वचन सत्य द्रढ़ मानी । सहज साध्य शंकर तप जानी ।।

सखिन ते मातहिं पितहि पुछाई । शासन देय करब तप जाई ।।

सखिन जाय कहै गिरि राजा । सुता वचन मागहि तप काजा ।।

गिरिजा सफल जन्म तन रूपा । तब कुल सफल करै गिरि भूपा ।।

अवसि कहै तुम्हरे तप करहै । नारद वचन सांच शिर धरिहै ।।

हिमिगिरि कही सनौ सखि बृन्दा । उमा करै तप सवहि अनन्दा ।।

यदि अस होय हमैं अति नीका । सफल जन्म औसुख सबहीका ।।

दोहा - 1

पुलकि हमांचल प्रेम वस कहा नैनन भरि वारि ।

सुनौ सहेली सुता मम अबलगि अति सुकुमारि ।।

यश धन धाम धरणि पितु माता । करहि सफल सब कुल गुण गाता ।।

जे सब रुचत मोहि मृदु बयना । पूछहु जाय मातु जंह मैना ।।

सैल वचन सुनि सखी सयानी । जाइ कहसि मांतहि मृदुवानी ।।

मातु सुता तब जाचन आयी । आयसु देउ करहि तप जायी ।।

करण चहे तप शिव पति हेता । होय सुफल कुल रूप सचेता ।।

करै महातप तजि सुख भोगा । मिलहि शम्भु पति छुटै वियोगा ।।

सुनत मौन मैना मन मारी । सुता बुलाय गोद बैठारी ।।

मुख पटपोधि चूमि चित सोऊ । हित पै भरवत पयोधर दोऊ ।।

सोरठा -

प्रथमहिं तप संकेत किहि कारण अनमनि सुता ।

जननी का तप हेत निहिचै करि मम जठर घर ।।

दोहा - 2

सकल पदारथ भवन मैं वाबुल परवत राज ।

उचित न कन्या कठिन तप करौ सुलभ सुख साज ।।

कंहां तपन जैहौ गिरि कानन । तब पितु गृह सब तीरथ पावन ।।

मोरे भवन वसत सव देवा । अनपायनी सिद्धि निरमेवा ।।

कंहां कठिन साधन तन धरिहौ । कोमल अंग कठिन तप करहौ ।।

यह दुरलभ कछु तोर न काजा । करब सुलभ सुन्दर जो छाजा ।।

राधौ न दुराराध्य मद नारी । अस कहि मै ना सुता निवारी ।।

मातु पितहि करि प्रेम प्रणामा । चली तपन वन तजि सुख धामा ।।

लैयसखि संग उमा तप हेता । तजि सुख भूषन वसन समेता ।।

सोरठा

रुचिर इषी कटि वाधि धारण करि मृगछाल वर ।

असन अमी फल साधि शिवदयाल वलकल वसन ।।

दोहा 3

विरचे गौरि कुंड दुय शीतल गरम विशाल ।

कोमल गौरी फल वये असन हेत सब काल ।।

गौरी शिखिर नाम थल सुन्दर । तहां श्रंग तीरथ हूय कन्दर ।।

शुभ कोमल तरु लता विशाला । फूल मूल फल बहु सब काला ।।

तीन तुंग पर गवरि सुजाई । सुभग रुचिर वेदिका वनाई ।।

उर पावन करि तप आराधी । धेवै शिव दश द्रड़ करि बांधी ।।

मुनिन कठिन तप करे अरंभा । तन मन अचल यथा जड़ खंभा ।।

पंच अगिनि ग्रीषम तप धामा । चतुर मास पावक विसरामा ।।

वेद मास हिम शिशु रितु काला । कंठ मगन जल तपत विहाला ।।

सोरठा -4अ

आतप वरषा वात सहि दुख धेवै शम्भु पद ।

पाय अतिथि सुग्यात पूजहि आसन असन दै ।।

दोहा -4 ब

चोसठि संवत् तरु परण परे सुखाय सो खाय ।

वारि वतासा बहुत दिन शिवकी आस लगाय ।।

सुनत रिसिन सो विसमय माना । उमा दरस हित करे पयाना ।।

गये सकल अस करत विचारा । किमि गिरिजा तप करत अपारा ।।

देखी जाय हिमगिरि वन शोभा । गुंजत मधुकर खग मृग लोभा ।।

कुसमिन सफल सघन तरू नाना । तह निज गमन सफल करिमाना ।।।

देखि सुधर्म कठिन तप आगे । मुनिवर करण प्रशंसा लागे ।।

श्रवण सुना तस नैनन देखा । अपर कहा तप करै विशेषा ।।

राग आदि बहु दोष विभागा । जलपै विमुख सु आश्रम लागा ।।

कहहि परसपर मुनि गुनि बानी । महिमा गवरि न जाय बषानी ।।

दोहा-5

सफल सघन वन विटप जनु, मदन वितान सुबासु ।।

रिधि सिधि संपति सफल गिरि, श्रंग सहित कैलाश ।।

सोरठा-5

ब्रहा स्वरूप महेश, गवरि शक्ति भूधर सुता ।।

कारण जग उपदेश, भये अनूण ते सगुण शिव ।।

निरगुण ब्रह्म अखण्ड अनुपा । शिव नारायण सगुण सरूपा ।।

सो परमेश्वर विगुण विरेशा । त्रय गुण ब्रह्मा विष्णु महेशा ।।

कारण गुण अनेक अवतारा । कारज गुण सम देह विकारा ।।

मीन कमठ हरि सूकर पावन । नर नारायण नरि हरि बामन ।।

सब कारण गुण कारज भासा । ब्यास कुमार कपिल दुरवासा ।।

ऋृषभ दत्तपृथु दोनहु रामा । कृष्णबोध कलकिन जग कामा ।।

जे सब नरगुण प्रभु अवतंशा । अमित पराक्रम केशव अंशा ।।

जे हरि हर अवतार अनूपा । ना तौ सगुण न निरगुण रूपा ।।

दोहा-6 क

जासु अंश अरू शिष्य जे जो शिव सगुण सरूप ।।

तासु शक्ति सो उमा यह तप शिव लागि अनुप ।।

दोहा-6 ख

इद्र आदि सब देव मुनि नारदादि समुदाय ।

चले पशंसत गौरि तप शिवदयाल शिर नाय ।।


।।। इति श्री शिव चरि्त्र महत्मे द्वितीयोअध्याय ।।।

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