।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्म द्वतीयपाद द्वतीयोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
नारद वचन सुने मुनि बृन्दा । मातु पितहि दुख उमहि अनन्दा ।।
मुनि के वचन सत्य द्रढ़ मानी । सहज साध्य शंकर तप जानी ।।
सखिन ते मातहिं पितहि पुछाई । शासन देय करब तप जाई ।।
सखिन जाय कहै गिरि राजा । सुता वचन मागहि तप काजा ।।
गिरिजा सफल जन्म तन रूपा । तब कुल सफल करै गिरि भूपा ।।
अवसि कहै तुम्हरे तप करहै । नारद वचन सांच शिर धरिहै ।।
हिमिगिरि कही सनौ सखि बृन्दा । उमा करै तप सवहि अनन्दा ।।
यदि अस होय हमैं अति नीका । सफल जन्म औसुख सबहीका ।।
दोहा - 1
पुलकि हमांचल प्रेम वस कहा नैनन भरि वारि ।
सुनौ सहेली सुता मम अबलगि अति सुकुमारि ।।
यश धन धाम धरणि पितु माता । करहि सफल सब कुल गुण गाता ।।
जे सब रुचत मोहि मृदु बयना । पूछहु जाय मातु जंह मैना ।।
सैल वचन सुनि सखी सयानी । जाइ कहसि मांतहि मृदुवानी ।।
मातु सुता तब जाचन आयी । आयसु देउ करहि तप जायी ।।
करण चहे तप शिव पति हेता । होय सुफल कुल रूप सचेता ।।
करै महातप तजि सुख भोगा । मिलहि शम्भु पति छुटै वियोगा ।।
सुनत मौन मैना मन मारी । सुता बुलाय गोद बैठारी ।।
मुख पटपोधि चूमि चित सोऊ । हित पै भरवत पयोधर दोऊ ।।
सोरठा -
प्रथमहिं तप संकेत किहि कारण अनमनि सुता ।
जननी का तप हेत निहिचै करि मम जठर घर ।।
दोहा - 2
सकल पदारथ भवन मैं वाबुल परवत राज ।
उचित न कन्या कठिन तप करौ सुलभ सुख साज ।।
कंहां तपन जैहौ गिरि कानन । तब पितु गृह सब तीरथ पावन ।।
मोरे भवन वसत सव देवा । अनपायनी सिद्धि निरमेवा ।।
कंहां कठिन साधन तन धरिहौ । कोमल अंग कठिन तप करहौ ।।
यह दुरलभ कछु तोर न काजा । करब सुलभ सुन्दर जो छाजा ।।
राधौ न दुराराध्य मद नारी । अस कहि मै ना सुता निवारी ।।
मातु पितहि करि प्रेम प्रणामा । चली तपन वन तजि सुख धामा ।।
लैयसखि संग उमा तप हेता । तजि सुख भूषन वसन समेता ।।
सोरठा
रुचिर इषी कटि वाधि धारण करि मृगछाल वर ।
असन अमी फल साधि शिवदयाल वलकल वसन ।।
दोहा 3
विरचे गौरि कुंड दुय शीतल गरम विशाल ।
कोमल गौरी फल वये असन हेत सब काल ।।
गौरी शिखिर नाम थल सुन्दर । तहां श्रंग तीरथ हूय कन्दर ।।
शुभ कोमल तरु लता विशाला । फूल मूल फल बहु सब काला ।।
तीन तुंग पर गवरि सुजाई । सुभग रुचिर वेदिका वनाई ।।
उर पावन करि तप आराधी । धेवै शिव दश द्रड़ करि बांधी ।।
मुनिन कठिन तप करे अरंभा । तन मन अचल यथा जड़ खंभा ।।
पंच अगिनि ग्रीषम तप धामा । चतुर मास पावक विसरामा ।।
वेद मास हिम शिशु रितु काला । कंठ मगन जल तपत विहाला ।।
सोरठा -4अ
आतप वरषा वात सहि दुख धेवै शम्भु पद ।
पाय अतिथि सुग्यात पूजहि आसन असन दै ।।
दोहा -4 ब
चोसठि संवत् तरु परण परे सुखाय सो खाय ।
वारि वतासा बहुत दिन शिवकी आस लगाय ।।
सुनत रिसिन सो विसमय माना । उमा दरस हित करे पयाना ।।
गये सकल अस करत विचारा । किमि गिरिजा तप करत अपारा ।।
देखी जाय हिमगिरि वन शोभा । गुंजत मधुकर खग मृग लोभा ।।
कुसमिन सफल सघन तरू नाना । तह निज गमन सफल करिमाना ।।।
देखि सुधर्म कठिन तप आगे । मुनिवर करण प्रशंसा लागे ।।
श्रवण सुना तस नैनन देखा । अपर कहा तप करै विशेषा ।।
राग आदि बहु दोष विभागा । जलपै विमुख सु आश्रम लागा ।।
कहहि परसपर मुनि गुनि बानी । महिमा गवरि न जाय बषानी ।।
दोहा-5
सफल सघन वन विटप जनु, मदन वितान सुबासु ।।
रिधि सिधि संपति सफल गिरि, श्रंग सहित कैलाश ।।
सोरठा-5
ब्रहा स्वरूप महेश, गवरि शक्ति भूधर सुता ।।
कारण जग उपदेश, भये अनूण ते सगुण शिव ।।
निरगुण ब्रह्म अखण्ड अनुपा । शिव नारायण सगुण सरूपा ।।
सो परमेश्वर विगुण विरेशा । त्रय गुण ब्रह्मा विष्णु महेशा ।।
कारण गुण अनेक अवतारा । कारज गुण सम देह विकारा ।।
मीन कमठ हरि सूकर पावन । नर नारायण नरि हरि बामन ।।
सब कारण गुण कारज भासा । ब्यास कुमार कपिल दुरवासा ।।
ऋृषभ दत्तपृथु दोनहु रामा । कृष्णबोध कलकिन जग कामा ।।
जे सब नरगुण प्रभु अवतंशा । अमित पराक्रम केशव अंशा ।।
जे हरि हर अवतार अनूपा । ना तौ सगुण न निरगुण रूपा ।।
दोहा-6 क
जासु अंश अरू शिष्य जे जो शिव सगुण सरूप ।।
तासु शक्ति सो उमा यह तप शिव लागि अनुप ।।
दोहा-6 ख
इद्र आदि सब देव मुनि नारदादि समुदाय ।
चले पशंसत गौरि तप शिवदयाल शिर नाय ।।
।।। इति श्री शिव चरि्त्र महत्मे द्वितीयोअध्याय ।।।
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