Sunday, 17 April 2011

सोलहवां अध्याय - शिव विवाह

।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे षष्टोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।



नारद शिव आयसु धरि शीशा । चले पवन मन वेग मुनीशा ।।

सवहि न्यूति कह शिव सन्देशा । फिर आये मुनि जहां महेशा ।।

आवन लगे देव सब जाती । निज गुण भेष वने बहु भांती ।।

सुरन समाज अपसरा नाचै । रिषि मुनि सभा वेद धुनि वांचै ।।

नारद वरहि बनाबन लागे । शिव सुभाउ सम भेष सुभागे ।।

सुनहु सकल ऋषि शंभु सिंगारू । ह्रदय हरष तन छुटै खवारू ।।

जटाजूट कर पाग वधाये । सरप गूदि सिर मौर वनाये ।।

दोहा - 1

क्रीट मुकुट अहि फणिक कर मणि से चष चमकाय ।

दुय दुय जी लौ लिहिन करणिकार फुहराय ।।

चन्द्र खौरि शिव पावक रोचन । अरुण तरुण सम पंकज लोचन ।।

खनखजूरेन कुण्डल काना । विछू चौकड़ा झंप समाना ।।

सब तन भूषन काल विराजै । चंदन सम विभूति उर छाजै ।।

रुद्र अक्ष उर नर सिर माला । वाघंवर दुकूल गज छाला ।।

कर वर डमरू पिनाक त्रिसूला । बाहन बृषभ कि शिव शांकूला ।।

कर कंकण मणि माणिक शेषा । असुभ अमंगल रूप महेशा ।।

सिर सुरसरि काली अरधंगा । विषधर कण्ठ प्रेत गण संगा ।।

वीरभद्र गोमुखा वजाये । सुनि सब जाति देव मुनि आये ।।

दोहा-2क

विधि आये रिषि मुनि लये ज्ञान विमान मराल ।

शिवदयाल तिहि सभा वहु वीणा वजै विशाल ।।

दोहा-2ख

केशव आये गरुन चढ़ि श्याम सरोरुह गात ।

शंख चक्र पंकज गदा पीताम्बर फहरात ।।

चतुरंगिनी सेन संग लाये । सकल चतुर्भुज रूप वनाये ।।

दूत पार्षद मंगल गावै । धन्टा शंख मृदंग वजावै ।।

चढ़ि ऐरावति वासव आये । देव सभा सब मंगल गाये ।।

सुमन विमान जक्षपति छाजै । श्याम करण है बरुण विराजै ।।

उचैश्रवा सजि सूरज आये । मृग रथ पै चढ़ि चन्द्र सिधाये ।।

सुत सेवक त्रिय यान समेता । सब सुर आये शिवहि निकेता ।।

करि प्रणाम अनुशासन पाई । चले सकल सुर शंख वजाई ।।

चारण वदिक सुर सब जाती । गायक पितर प्रेत वहु भांती ।।

दोहा -3

तिहि अवसर वैकुण्ठ सम सोहत गिरि कैलाश ।

बृष चढ़ि शिव आगे चले । बर बरात शंकाश ।।

चली वरात सगुन शुभ होई । सुख प्रभाव तुहि सकै न कोई ।।

दधि दुर्वा गोबर मणि मीना । निरत वरांगन गीत प्रवीना ।।

तिलक दये दुज वांचत वेदा । दल मंगल फल फूल विभेदा ।।

सम्मुख नीलकण्ठ मृग दाये । सारस वोलत विषधर वाये ।।

त्रय शिशु गोद धान धन आवै । मिलसि धेनु पथ बच्छ पिआवै ।।

मंगल भेष सगुण शिव नामा । तिनहि सगुन का पूरन कामा ।।

बहुत भांति शिव चली वराता । होय विविध मंगल मग जाता ।।

ढोल मृदंग झांझ झनकाई । भेरि नफीरी शंख शहनाई ।।

दोहा-4

वेणु वांसुरी वीण लगि दुंदुभि हुफू जुग चंग ।

तार ताल कच खाल सब छपन वाजने संग ।।

विहसि वचन हरि कहा सिधावौ । निज निज गोल विलग लै आवौ ।।

सुनि विरंचि मुनि सभा निकारी । तजि वरात लै गये अगारी ।।

ऋषि मुनि बृंद वेद धुनि गावै । वीणा वेणु मृदंग वजावै ।।

हरि समाज दाहिन दिशि राजै । अनहद घन्ट शंख धुनि वाजै ।।

इन्दादिक सुर वाम सिधाये । सेवक सहित समाज वनाये ।।

देव विविध वाजने वजावै । अपसर नाचै गंधरव गावै ।।

भूत प्रेत गण पिछरि पराये । निज निज सैन सबै विलगाये ।।

तद वोले मुशक्याय महेशा । तजत न तुम तरकना रमेशा ।।

दोहा-5

अस कहि देखि वरात सब श्रंगी नाद वजाय ।

भृंगी आदि सकल गण टेरे हर हरषाय ।।

छंद

डिम डिमकि डमरू शिव कि वाज वैताल ताल वजावही ।।

नचहि योगिन तरल गति पर ताल सुरण सुनावही ।।

मन के तरंगी प्रेतगण संगीत सुर धरि गावही ।।

खर स्वान सुअर विडाल जम्वुक गणन रूप सुहावहीं ।।

कोउ विना कर पद विपुल काहू हीन मुख कोउ मुख घने ।।

वहु भांति कौतुक होत मग वर जोग पाहुन गण वने ।।

हरषै सकल सुर सुमन वरषैं देखि कौतुक सुख सने ।।

शिवद्याल जह शिव धाम दूलह तहन के जस किन गने ।।

दोहा -6

वोले विहसि विरंच तव भल वर योग्य वरात ।

कौतुक देखहु देवगण निरत गीत कुल गात ।।

एहि विधि शिव को चलो वराता । सुन्दर सगुन होंय मग जाता ।।

अपर चरित सुनौ मुनि आगे । हिमगिरि साज सुधारन लागे ।।

प्रथमै सब कह निउति पढाये । जंगम तन धरिके सब आये ।।

सर सरिता तीरथ वन बागा । क्षेत्र धाम गिरि पुरी विभागा ।।

तीन कोटि अरु लाख पचासा । तीरथ आय हिमांचल वासा ।।

गुप्त रूप धरि आयसि काशी । देखन हित बिबाह अविनाशी ।।

रितु वसंत फागुण चलि आये । लगे फूल फल विटप सुहाये ।।

चणक माख तंदुल गोधूमा । सब सम्पति नवीन गिरि भूमा ।।

दोहा-7

नगर हिमांचल गेह प्रति वन्दन वार वधाय ।।

हेम कलश द्वारण धरे निरमल नीर भराय ।।

कदली खम्भ फूल फल नाना । गलिन चांदनी चौक विताना ।।

सवही नीर सुगंध सिंचाये । चोहट हाट बनार लगाये ।।

सरिता सर तीरथ गिरि कानन । आये संकुल धरि मानव तन ।।

धुज पताक विरचे सुविशाला । अति रमनीक विचित्र विशाला ।।

हरित वेणु मन्डफ विरचायेउ । कोमिल पान उशीर से छायेउ ।।

लता विटप फल फूल सिंचाई । सुभग रुचिर वेदिका बनाई ।।

तिहि औसर नारद तह आये । भृंगी ऐपन वारि लियाये ।।

तिनहि जिमाय फेरि गिरिराजा । चले अगमानी सहित समाजा ।।

दोहा-8

गयसि गन्द मादन गिरिहि लय अगमान मिलाय ।

हर्षि हिमाचल सकल सुर निज पुर चले वुलाय ।।

छंद

तिहि औसर शंकर सिद्ध जुता । आयसि गण संग महा प्रभुता ।।

सब देखि बरात अनन्द भये । शिव देखत संभ्रम चित्त छये ।।

लखि देवन बाल विनोद करैं । शिवकौ लखि भवनै भाजि परैं ।।

पितु मातन बाल विहाल कहैं । वर वाउर प्रेत बरात अहैं ।।

सुनि लोग अचानक चौंकि रहे । गुनि ज्ञानिन मौंन अनन्द लहे ।।

दोउ ओर के देव समूह मिले । जनु संगम सिंधु समुद्र हिले ।।

सब देव हिमंचल संग लये । गिरि सुन्दर श्रंग समीप भये ।।

जेहि जोग जथा जनवास दये । सब पाय सुपास अनन्द भये ।।

दोहा-9क

बहुरि देव निज साज करि सकल समाज वनाय ।

चले हिमंचल पमरि द्वार करण समुदाय ।।

दोहा-9ख

नारद मैना संग करि चन्द्रसाल पर जाय ।

लगे दिखावन देवगण बर बरात समुदाय ।।

प्रथमै रिषि मुनि ब्रंद बताये । लखि मैना मन आनन्द छाये ।।

बहुरि कहा शिव रूप दिखाबौ । परमानन्द मंगल दरशाबौ ।।

तब नारद गंधरब दिखाये । उदित रूप गुण ग्राम सुहाये ।।

मैना पूछत जे शिव शंकर । नारद कही जे न बहु अन्तर ।।

जे गन्धरब राज दल आछे । सवके पति शिव सबके पाछे ।।

तब नारद सुर सभा दिखाई । प्रभुता सहित देव समुदाई ।।

क्रीट मुकुट कुण्डल पारावर । सब तन भूषित भूषन सुन्दर ।।

मैना पूछेसि यह शिव साजा । कह नारद यह देव समाजा ।।

दोहा- 10

पुनि दरसाये अप्सरस विस्वावसु तिन मांहि ।

मैना पूछति शंभु यह नारद कहत कि नांहि ।।

तुरन्त सिद्ध विद्याधर आये । भूषण वसन विमान सुहाये ।।

अमित रंग सब ध्वजा पताका । गज तुरंग रथ गर्जत चाका ।।

मैना कह इनमै कोउ शंकर । मुनि कह सुर गायक विद्याधर ।।

करन तरक मैना मन लागी । सवके पति शिव उमा सुभागी ।।

मणि ग्रिवादि जक्ष तिहि काला । आये सुभग सुरूप विशाला ।।

तिनके पति कुवेर लखि आगे । मैना कह जे शिव अनुरागे ।।

नारद कहसु कुबेर धनेसा । तब लग आये वरुण जलेसा ।।

शोभा दुगुण देखि कह मैना । जे अति सुन्दर शिव सुख ऐना ।।

दोहा-11

कह नारद जे वरुण हैं जल के नाथ विशाल ।

धरमराज आये तवहि जो जम राज कराल ।।

कह मैना जे शिव इन मांही । नारद कह जे यम शिव नाही ।।

तिहि औसर वासव तह आये । सुर समाज सुभ संग वनाये ।।

गिरि त्रिय पूछत जे कि महेशा । कह नारद जे देव सुरेशा ।।

तब लगि सुर्य चन्द्र तह आये । तेज पुंज गुण दुगुण सुहाये ।।

तब मैना उर विसमय मांनी । सुता गवरि कुल भूषन जानी ।।

तासु भाग वरनय केहि भांती । वर्ष कोटि सत कहत सिरांती ।।

तिहि अवसर विरंचि तह आये । मुनि समाज सुत संग लगाये ।।

दोहा-12

हिम त्रिय पूछत शंभु ये नारद कह ये नाहि ।

ये विरंचि करतार जग शिव स्वामी सब माहि ।।

तब लगि तहां रमापति आये । इंदीवर तन श्याम सुहाये ।।

कमल पाणि युग वाहु विशाला । क्रीट मुकुट सुन्दर बन माला ।।

शंख चक्र अरु गदा पदम कर । कमल चरण तन पीताम्वर धर ।।

तरुण अरुण पंकज सम नैना । बिम्ब अधर सुन्दर मृदु वैना ।।

मकराकृत कुण्डल दुय कानन । कोटि काम दुति राजत आनन ।।

भाल विशाल तिलक रुचि पाये । शुक चुंचुकि नासिका लजाये ।।

चारु चिणुक शुभ गोल कपोला । मृदु मुसक्यानि लेतु जनु मोला ।।

खग पति वाहन रमा निवाशा । सहस भानु सम तेज प्रकाशा ।।

दोहा-13

मुख प्रशन्न उर भृगुलात शीतल सम दुज राज ।

शिवदयाल शिव कान लगि आवहि सहित समाज ।।

अक्षय रूप हरि कोमल अंगा । अमित चतुर्भुज सेवक संगा ।।

हरि कौ देखि चकित भय मैना । जय शंकर पूछति मृदु वैना ।।

कह नारद जे हरि शिव नाही । हरि ते अधिक रूप हर माही ।।

हरि श्यामल हरि सुन्दर गोरे । सबके गुरू सजन शिव तोरे ।।

तव मैना लगि करण प्रशंशा । हम धनि भाग उमा अवतंशा ।।

गिरिजा जन्म जगत जश छाये । शिव से सजन हितू हम पाये ।।

पारबती मुनि मत मन लाये । करे कठिन तप सो फल पाये ।।

पाये पति महेश गुण आगर । करो मात पित वंश उजागर ।।

दोहा-14

ह्रदय हर्ष मैना मगन केशव ओर निहारि ।

नारद सन वोली विहसि मीठे वचन उचारि ।।

सुनि मुनीस अस को जग माही । कमल नैन लखि मोहित नाही ।।

तब आयसु अमोध मरजादा । शिव सम्बन्ध तुम्हार प्रसादा ।।

तब मुनि कहा सुनु गिरिनारी । जे शिवराधक अति हितकारी ।।

हरि समान शिव सेवक नाही । कमल नयन अरपे छण माही ।।

शिव से चक्र सुदर्शन पाये । तिहिते विश्व विजय जश छाये ।।

जब जह विपति होय संसारा । तब हरि हरैं धरैं अवतारा ।।

तिनके स्वामी शिव त्रिलोकवर । सर्व पूज्य सर्वेश महेश्वर ।।

ब्रह्म रूप मय निराकार हर । कवि कोविद को गुण कह ताकर ।।

दोहा-15

शारद शेष न कहि सकै गुण गण रूप विलाश ।

शरद चन्द्र मुख कमल तन राजत फटिक प्रकाश ।।

कह मैना मुनि शिवहि वतावौ । सबके गुरु शिव रूप दिखावौ ।।

तब लग ब्रंद रिषिन के आये । सनकादिक भृगु आदि सुहाये ।।

गंग सहित सब तीरथ संगा । कामधेनु सुरविटप अभंगा ।।

संग शिष्यगण संजुत शाषा । जिनहि देखि उमगत अभिलाषा ।।

तिन अन्तर समरथ बागीसा । येहि विधि सोहत ब्रंद महीसा ।।

कह मैना शिव मुनि कह नाही । सबके गुरु सुन्दर सब माही ।।

कह मैना धनि भाग हमारे । सबके गुरु शिव आवत द्वारे ।।

सदा त्रिलोक सार शिव शंकर । मिले सो मोहि जामात निरंतर ।।

दोहा-16

तब मैना अनुमान करि कह नारदै वुझाय ।

शिवहि दिखावौ वेगि मुनि को गुण रूप सुहाय ।।

तब लग द्वार सिधाये शंकर । संग सभा गण बृंद भयंकर ।।

अहंकार मैना मन जागा । शिव कुरूप भये जरा समाना ।।

कर उठाय आतुर कह नारद । मैना जे शिव सनमुख सारद ।।

तब मैना शिव सभा निहारी । देखति भूत प्रेत गण भारी ।।

नाना वाहन गण वहु रूपा । नाना भेष अनेक अनूपा ।।

बहुरि बरात बीच बर हेरे । भूत पिशाच प्रेत गण धेरे ।।

वक्रतुण्ड कोउ नयन बिरूपा । अपर दीन तन छीन कुरूपा ।।

पुनि महेश मुख ओर निहारी । विरध विरूप विरंग विकारी ।।

दोहा-17

जटा मुकुट केहरि बसन भूषण उरग कपाल ।

नगिन अंग बाहन ब्रषभ कर त्रिसूल विकराल ।।

देखहि शिवहि बर ब्याकुल मैना । सिथिल गात मुख आब न वैना ।।

शोक समीर कुपित सब गाता । विलषि वदन कहै कुटिल विधाता ।।

जिन गिरिजय सुन्दरता दीन्हा । तिहि विधि कस वर बावर कीन्हा ।।

तन प्रसेद तब दूलह देखा । निर्गुण शिव गुण रूप न रेखा ।।

पंच वदन दश वाहु त्रिलोचन । भूति विभूषन पावक रोचन ।।

पाणि पिनाक बसन बाघंवर । ब्रषभ कूल गज चर्म दिगम्बर ।।

श्रंगी वर कर डमरु विराजा । तीसर चष वैसुन्दर भ्राजा ।।

नींद विवस कंपित सब गाता । माल कपाल कपरदिन त्राता ।।

दोहा-18

जरारूप जर वर ह्रदो बार बार जमुहात ।

नैन मूदि झुकि झुकि परत पराधीन अलसाय ।।

नारद कह मैना शिव देखे । जगतपिता पति सबके लेखे ।।

पारबती पति जे शिव शंकर । सुनि बोली मैना सकोपि डर ।।

बरय तोर बर सुता हमारी । नतु रहती भरि जन्म कुमारी ।।

अस कहि मान भंग भय मैना । अहंकार गत मुख निरवैना ।।

संकि सहमि तन कंपित सारा । मारुत वेग विटप जनु डारा ।।

कहै कि सुता जनम धृग जाना । धृग मम कोखि न जने पाषाना ।।

विलखि गिरी धरणी तल मैना । मुरछा तन कछु कहै सुनै ना ।।

शोक सरोबर मगन अगाधा । विसरी देहन सुरति समाधा ।।

दोहा-19

शिवै देखि मुनिगिरा सुनि भा दारुण दुख दाह ।

शिवदयाल मैना मगन शोक सिंधु अब गाह ।।



।।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे षष्टोध्याय ।।।

।। राम ।।

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