।।।अथ श्री शिव पुराण परिपाटी नवमोअध्याय ।।।
शौनक कहेसि सूत बड़ भागी । शंभु कथा कह मम हित लागी ।।
कहत त्रिपुर कै विजै विशाला । विदित रूप तप तेज प्रकाशा ।।
केतिक सन असुर सब जाती । त्रिपुर वधो शंकर केहि भांती ।।
सो सब कथा कहौ वुधिवंता । अहो सूत कोमल चित संता ।।
सूत कहत शौनक अनुरागी । साधु बचन पूछेसि मोहि लागी ।।
सो सब कहब सुनौ हित मानी । श्र वण सुने संसय भृम हानी ।।
तार पुत्र महा माया कारी । तारक माया मोहित सारी ।।
सकल देव जितवे के कारण । मधुवन जाय करो तप दारुण ।।
दोहा-1
गुरु आज्ञा पालक असुर गुरु अनुशासन पाय ।
करे कठिन तप वर्ष सत सूरज द्रष्टि लगाय ।।
धरि शत वर्ष धरणि पद एका । ऊर्ध बाहु सूरज दिसि पेखा ।
पद पंजा बल धरि शत वर्षा । शत अं गूठा वल पद आ कर्षा ।।
करे वर्ष शत उदक अहारा । रहो वर्ष शत पवन अधारा ।।
शत जल थल शत वर्ष सहे दुख । सतपावक शत रहो अधोमुख ।।
कर तल धरणि वर्ष शत भयेउ । तरु शाखा लटकत शत गयेउ ।।
पुनि शत वर्ष उलटि तरु शाखा । रहो अधोमुख वर अभिलाषा ।।
सुनतै दुख दसह तप तासू । भयो सिरसि तप तेज प्रकाशू ।।
तिहिके तेज दहत दिविलोका । इन्द्र आदि सुर सकल सशोका ।।
दोहा-2
विवुध व्रंद विसमै विवस वोलत विनय विचार ।
जदपि न देंय विरंचि वर नासहि सकल संसार ।।
विनि वर दये लोक सब नासै । वर पावै तद सबको त्रासै ।।
तिहितै विधि कौ विनय सुनावौ । देंय असुर कौ वर मन भावौ ।।
यदि वर देंय सुकालहि पाई । शंभु कृपा नासहि दुख दाई ।।
अस विचार विधिलोक सिधाये । नमस्कार कर विनय सुनाये ।।
विधि असुरै वर देवहु जाई । पूनि मारन को करौ उपाई ।।
सूर कारज साधक सुर त्राता । हंश जान चढि चले विधाता ।।
देवन मुनि मनोरथ जाना । गए देन असुरहि वरदाना ।।
कंक्षि कमण्डल उदक जगाये । मागौ वर विधि वचन सुनाये ।।
दोहा-3
करे कठिन तप तारक मागौ निज अनुमान ।
हमे न कछू अदेय जग देय सकल वरदान ।।
सुनि बिरंचि की गिरा अडोला । चरण वंदि तारक हंसि बोला ।।
यदि प्रसीद जगदीश कृपाला । देउ युगल वरदान विशाला ।।
तब निर्मित जेतिक जग लोका । सबसे अधिक होय बल मोरा ।।
दूसर वरन मरन केहु भांती । शंकर वीरज सुत मम धाती ।।
शम्भु शुक्रत संभव सुत होई । देवन दल सेनापति सोई ।।
निज कर आयुध करै प्रहारा । होय तासु कर मरण हमारा ।।
तथाअस्तु कहि वचन विधाता । अंतरध्यान भये सुर त्राता ।।
हर्ष शोक देवन मन माही । दाह सांति शंशय गति नाही ।।
दोहा-4
पायसु वर तारकासुर सो तप करे विराम ।
गमनो मन आनंद मगन श्रोणितपुर निज धाम।।
मिलो जाय निज कुल परिवारा । सब असुरन मिलि मंत्र उचारा ।।
तिहकौ दय सुराज अभिषेका । करै सकल आयसु अविवेका ।।
करि त्रैलोक विजय छन एका । जीते सुर नर असुर अनेका ।।
देव दनुज आयसु अभिलाषे । निशि दिन रहैं सकल रुख राखे ।।
सभै सकल मुख रहे निहारे । शासन मानहि विनहि विचारे ।।
एरापति सुरपति पर लयउ । मृत्यु पाश मुगदर यम दयउ ।।
क्षेत्र कणक दायक अरुपाशा । दये वरुण मन भये निराशा ।।
रथ अरु शक्ति प्रजापति दयऊ । उच्चै श्रवा सूरज सन लयेऊ ।।
दोहा-5
लये अनल से वसन वर अछै तूण धनुवाण ।
लैकर गदा कुवेर से सुन्दर सुमन विमान ।।
पारिजात सुर विटप मंगायऊ । रिषिन से कामधेनु धरि लायेऊ ।।
लयो कराल काल को दण्डा । चन्द्रहास असि इन्द्र अखण्डा ।।
रतनहार पयोनिधि शेषा । श्याम करण हय दयो जलेशा ।।
जो जेहि जतन रतन जहं पाये । करि उपाय सो सकल मंगाये ।।
नागन दये रतन मणिमाला । रतन दइदयो धर्म विशाला ।।
तर्प सदा सुख दायक भानू । शीतल तेज अधूम कृशानू ।।
उदय चन्द्र मेटत सब सूला । त्रिविध समीर सदा अनुकूला ।।
पितरण कव्य हव्य देवन को । लयेसि भाग सबके जेवन को ।।
दोहा-6
यच्छ पितर गंधरव गण सुर नर नाग अपार ।
मुनि किन्नर किंपुरष लगि पीड़ित सब संसार ।।
तीन भुवन सब आयसु कारी । सुर नर मुनि आज्ञा अनुसारी ।।
जाति अनेक सरासुर सर्वा । किन्नर गुह्य पितर गंधरवा ।।
सेवहि सब अनुशासन मानी । तासु राज्य को सकहि बखानी ।।
विपिन पुरी गिरि धाम सुहावनि । तीरथ क्षेत्र जंहा लगि पावन ।।
सुवस करे सब पातक मंडित । करि सुर मंदिर मूरति खण्डित ।।
जज्ञ दान कृत जप तप धरमा । बर्जित करे सकल शुभ करमा ।।
वरण संत सुर आश्रम चारी । विकल सकल दुरदशा निहारी ।।
राज करे अस वरस अनेका । छिपे कंदरण मुनि सविवेका ।।
दोहा-7
सब सुर पीड़ित सोचवस गये विधाता तीर ।
जोरि पानि विनती करैं शिवदयाल तजि धीर ।।
।।। इति श्री शिव पुराण परिपाटी नवमोअध्याय ।।।
।।। शिव चरित्र महात्म ।।।
।।। स्थाणोर्चरितृम ।।।
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