Sunday, 17 April 2011

नवम अध्याय

।।।अथ श्री शिव पुराण परिपाटी नवमोअध्याय ।।।

शौनक कहेसि सूत बड़ भागी । शंभु कथा कह मम हित लागी ।।

कहत त्रिपुर कै विजै विशाला । विदित रूप तप तेज प्रकाशा ।।

केतिक सन असुर सब जाती । त्रिपुर वधो शंकर केहि भांती ।।

सो सब कथा कहौ वुधिवंता । अहो सूत कोमल चित संता ।।

सूत कहत शौनक अनुरागी । साधु बचन पूछेसि मोहि लागी ।।

सो सब कहब सुनौ हित मानी । श्र वण सुने संसय भृम हानी ।।

तार पुत्र महा माया कारी । तारक माया मोहित सारी ।।

सकल देव जितवे के कारण । मधुवन जाय करो तप दारुण ।।

दोहा-1

गुरु आज्ञा पालक असुर गुरु अनुशासन पाय ।

करे कठिन तप वर्ष सत सूरज द्रष्टि लगाय ।।

धरि शत वर्ष धरणि पद एका । ऊर्ध बाहु सूरज दिसि पेखा ।

पद पंजा बल धरि शत वर्षा । शत अं गूठा वल पद आ कर्षा ।।

करे वर्ष शत उदक अहारा । रहो वर्ष शत पवन अधारा ।।

शत जल थल शत वर्ष सहे दुख । सतपावक शत रहो अधोमुख ।।

कर तल धरणि वर्ष शत भयेउ । तरु शाखा लटकत शत गयेउ ।।

पुनि शत वर्ष उलटि तरु शाखा । रहो अधोमुख वर अभिलाषा ।।

सुनतै दुख दसह तप तासू । भयो सिरसि तप तेज प्रकाशू ।।

तिहिके तेज दहत दिविलोका । इन्द्र आदि सुर सकल सशोका ।।

दोहा-2

विवुध व्रंद विसमै विवस वोलत विनय विचार ।

जदपि न देंय विरंचि वर नासहि सकल संसार ।।

विनि वर दये लोक सब नासै । वर पावै तद सबको त्रासै ।।

तिहितै विधि कौ विनय सुनावौ । देंय असुर कौ वर मन भावौ ।।

यदि वर देंय सुकालहि पाई । शंभु कृपा नासहि दुख दाई ।।

अस विचार विधिलोक सिधाये । नमस्कार कर विनय सुनाये ।।

विधि असुरै वर देवहु जाई । पूनि मारन को करौ उपाई ।।

सूर कारज साधक सुर त्राता । हंश जान चढि चले विधाता ।।

देवन मुनि मनोरथ जाना । गए देन असुरहि वरदाना ।।

कंक्षि कमण्डल उदक जगाये । मागौ वर विधि वचन सुनाये ।।

दोहा-3

करे कठिन तप तारक मागौ निज अनुमान ।

हमे न कछू अदेय जग देय सकल वरदान ।।

सुनि बिरंचि की गिरा अडोला । चरण वंदि तारक हंसि बोला ।।

यदि प्रसीद जगदीश कृपाला । देउ युगल वरदान विशाला ।।

तब निर्मित जेतिक जग लोका । सबसे अधिक होय बल मोरा ।।

दूसर वरन मरन केहु भांती । शंकर वीरज सुत मम धाती ।।

शम्भु शुक्रत संभव सुत होई । देवन दल सेनापति सोई ।।

निज कर आयुध करै प्रहारा । होय तासु कर मरण हमारा ।।

तथाअस्तु कहि वचन विधाता । अंतरध्यान भये सुर त्राता ।।

हर्ष शोक देवन मन माही । दाह सांति शंशय गति नाही ।।

दोहा-4

पायसु वर तारकासुर सो तप करे विराम ।

गमनो मन आनंद मगन श्रोणितपुर निज धाम।।

मिलो जाय निज कुल परिवारा । सब असुरन मिलि मंत्र उचारा ।।

तिहकौ दय सुराज अभिषेका । करै सकल आयसु अविवेका ।।

करि त्रैलोक विजय छन एका । जीते सुर नर असुर अनेका ।।

देव दनुज आयसु अभिलाषे । निशि दिन रहैं सकल रुख राखे ।।

सभै सकल मुख रहे निहारे । शासन मानहि विनहि विचारे ।।

एरापति सुरपति पर लयउ । मृत्यु पाश मुगदर यम दयउ ।।

क्षेत्र कणक दायक अरुपाशा । दये वरुण मन भये निराशा ।।

रथ अरु शक्ति प्रजापति दयऊ । उच्चै श्रवा सूरज सन लयेऊ ।।

दोहा-5

लये अनल से वसन वर अछै तूण धनुवाण ।

लैकर गदा कुवेर से सुन्दर सुमन विमान ।।

पारिजात सुर विटप मंगायऊ । रिषिन से कामधेनु धरि लायेऊ ।।

लयो कराल काल को दण्डा । चन्द्रहास असि इन्द्र अखण्डा ।।

रतनहार पयोनिधि शेषा । श्याम करण हय दयो जलेशा ।।

जो जेहि जतन रतन जहं पाये । करि उपाय सो सकल मंगाये ।।

नागन दये रतन मणिमाला । रतन दइदयो धर्म विशाला ।।

तर्प सदा सुख दायक भानू । शीतल तेज अधूम कृशानू ।।

उदय चन्द्र मेटत सब सूला । त्रिविध समीर सदा अनुकूला ।।

पितरण कव्य हव्य देवन को । लयेसि भाग सबके जेवन को ।।

दोहा-6

यच्छ पितर गंधरव गण सुर नर नाग अपार ।

मुनि किन्नर किंपुरष लगि पीड़ित सब संसार ।।

तीन भुवन सब आयसु कारी । सुर नर मुनि आज्ञा अनुसारी ।।

जाति अनेक सरासुर सर्वा । किन्नर गुह्य पितर गंधरवा ।।

सेवहि सब अनुशासन मानी । तासु राज्य को सकहि बखानी ।।

विपिन पुरी गिरि धाम सुहावनि । तीरथ क्षेत्र जंहा लगि पावन ।।

सुवस करे सब पातक मंडित । करि सुर मंदिर मूरति खण्डित ।।

जज्ञ दान कृत जप तप धरमा । बर्जित करे सकल शुभ करमा ।।

वरण संत सुर आश्रम चारी । विकल सकल दुरदशा निहारी ।।

राज करे अस वरस अनेका । छिपे कंदरण मुनि सविवेका ।।

दोहा-7

सब सुर पीड़ित सोचवस गये विधाता तीर ।

जोरि पानि विनती करैं शिवदयाल तजि धीर ।।

।।। इति श्री शिव पुराण परिपाटी नवमोअध्याय ।।।

।।। शिव चरित्र महात्म ।।।

।।। स्थाणोर्चरितृम ।।।

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