Sunday, 17 April 2011

सत्ताइसबा अध्याय

।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे त्रतीयपाद द्वतीयोअ्ध्याय ।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


ऋषिन वहुरि पूंछा संवादा । शंभु कथा फिर व्यास प्रसादा ।।

शिव पूजन विधि सुरण सुनाई । सो मोहि सूत कहौ समुझाई ।।

सुनि विरंचि मुख देवन कीन्ही । पूजन सोय कहौ हित चीन्ही ।।

तव कह सूत सुनहु मुनि वृन्दा । शिव अरचा दायक आनन्दा ।।

सो संवाद कहौ निरधारा । युग सनकादि विरंचि कुमारा ।।

तिनहि व्यास पूंछी एक वारा । तिन सब कही सहित विस्तारा ।।

हम सो व्यास वदन सुनि पाई । कहई विचार यथा श्रुति गाई ।।

कह विरंचि सुनहु मुनि देवा । परम कठिन शिव शंकर सेवा ।।

दोहा - 1

भूसुर भूभुज वैश्य पुनि वरण सूद्र लौ चारि ।

तामहि चारौ वरण के धर्म कहौ विस्तारि ।।

प्रथमैं अति दुरलभ नर देहा । तामौ गृह सुत दार सनेहा ।।

तापर सब निज पच्छ सनेही । जग मैं ममता मोह न केही ।।

चारि वरण अरु त्रै दस जाती । सप्त वधिक द्वादस परधाती ।।

जौन जाति जग जनमै जाई । निज कुल धर्म करै समुदाई ।।

अति दुरलभ नर तन संसारा । दुरलभ उत्तम कुल अवतारा ।।

तापर दुरलभ दुज कुल धर्मा । अति दुरलभ विद्या सत कर्मा ।।

विवुध कहै धनि विप्र शरीरा । विद्या विनय विदुष सो धीरा ।।

दुज वर वंस जन्म जो धरई । संध्या तरपन हुय जप करई ।।

दोहा - 2 क

वेद पठन पाठन जजन जाजन प्रति गृह दान ।

व्राह्मण के षट कर्म शुभ छत्री के तीन प्रधान ।।

2ख

छत्री के हित कर्म त्रै जजन पठन श्रुति दान ।

वैश्य सूद्र दुय करि सकै जज्ञदान सनमान ।।

छत्री वंश जनम जो पावै । समर मरण तौ जग जस छावै ।।

वैश्य वंश पावै अवतारा । पशु पालनी बाणिज वैपारा ।।

सूद्र वंश जो जन अवतरई । छेत्र ववन दुज सेवन करई ।।

जिहि जिहि जाति जाय अवतरई । निज कुल धर्म लाग सब करई ।।

जाति धर्म जग जदपि अनेका । अन्तिम निज कुल धर्म विवेका ।।

निज कुल धर्म सदैव सहायक । पर कुल धर्म सदा भयदायक ।।

जब लग ह्रदय न प्रघटै ग्याना । तब लगि कर्म आचरण माना ।।

कर्म से सहस गुणी तप जागा । तपते सहस गुण जय अनुरागा ।।

फल जपते सहस्र गुण ध्याना । सदा प्रशंशत बिबुध निधाना ।।

दोहा - 3

ध्यान से विदित विचार उर तव प्रधटत विज्ञान ।

शिवद्याल भक्ति से विरति होय दोनौ मोक्ष प्रधान ।।

ब्रह्म विचार ध्यान रत अहई । तिनहि समीप सदा शिव रहई ।।

योग ध्यान जब निरषैं शंकर । होय ज्ञान साधन तेहि अन्तर ।।

पातक पुंज दहन मन ध्याना । सोइहि हम सर मन विज्ञाना ।।

विदित ब्रह्म विद्या वुध जोई । विद्या सकल विसुद्धित सोई ।।

यह अज्ञान विदित जग माही । सुख दुख क्रिया विचारत नाही ।।

ज्ञान विसुद्ध ह्रदय शिव अच्छर । परानंद कर लिंग दिगंवर ।।

निष्कल सर्वग योगिन उर वर । लिंग दुय विधि बाहर अरु अंतर ।।

सूझ्म अंतर बाहिर स्थूला । भेद जीव प्रतिमा अनुकूला ।।

दोहा - 4

स्थूल अंग जगमैं भृमै सपनै सूझ्म देह ।

कारण तन सुख सोवही तुरिय हंस गत नेह ।।

कर्म यग्य रत पूजिय स्थूला । सूझ्म ध्यान ग्यान की मूला ।।

अस तन केरि भावना हेता । सेवत बाहिर लिंग चित चेता ।।

जव अध्यातम ग्यान विकाशा । सो सूझ्म शिव लिंग प्रकाशा ।।

यथा थूल मृत काष्ट विकल्पा । अहो विचार वुद्धि अति अल्पा ।।

थूल मैं निहचै कृत जग माही । परम तत्व वादी ते नाही ।।

जव लगि ह्रदय न ज्ञान प्रकाशा । तब लग भजिय मूर्ति अनि आशा ।।

निष्कल सकल उदय जव ज्ञाना । शिव मय जग जग मय शिव जाना ।।

येहि विधि ग्यान सहित नर जोई । ताके उर दुख दोष न कोई ।।

दोहा 5

तजे कर्म जिन ज्ञान विन शिखि मूढता विवाद ।

शिवदयाल वांतासि ते अपरै करण विषाद ।।

तिनहि विधान न संग्रह त्यागा । जिनके ह्रदय ग्यान वैरागा ।।

गृह वस कर्म न वन्धन ज्ञानी । यथा कमल दल भिदै न पानी ।।

जलि अध्यातम ग्यान न साधै । तव लगि कर्म न शिव अवराधे ।।

नैन कमल जग पीत दिखाई । जिमि दिशि भ्रम परदिश चितजाई ।।

जिमि घन पटल छाह दिवि जावै । भ्रम वस रवि शशि झपे वतावै ।।

इमि भव रूप मायावस माही । भ्रम सबके उर छूटत नाही ।।

जिमि दर्पन प्रतिविम्व प्रकाशा । मलिन भये मलिनै आभासा ।।

तैसे माया मलिन सरीरा । शंभु शक्ति धेवैं ते धीरा ।।

दोहा -6 क

अंवर अंतर दर्शित चन्द्र दिवाकर एक ।

घट प्रति जल छाया विदित तृष्ना रूप अनेक ।।

6ख

जो जल मलिन तौ मलिन नर विछाह तरंगन भंग ।

तेहि विधि जीव सुनित्य यह भरमत माया संग ।।

जे जग सुने औ दर्शित जेते । प्रघटे सकल शिवात्मक तेते ।।

एक ईश बहु भांति दिखाई । जिमि जग भेद जगत अधिकाई ।।

सब संसार सकल तन धारी । परम ईश भाषै श्रुति चारी ।।

अस विज्ञान विदित उरजाके । प्रतिमादिक पुजित नहि ताके ।।

जे जन जग विज्ञान विहीना । ते प्रतिमा पूजहि हुय दीना ।।

चहत उच पदवी आरूढ़ा । विन आलंवन लहै न मूढ़ा ।।

सगुण उपासक प्रतिमा सेवहि । ते निर्गुण पावहि निर्भेवहि ।।

चन्दन पुष्प धूप अरु दीपा । विन मूरति केहि दैय समीपा ।।

दोहा 7

प्रथम सुकरम पूजि शिव तजिय कामना काम ।

शिवद्याल शिवार्षन करिय सब पुन्य पाप बिर राम ।।

जव लगि नहि प्रघटै विज्ञाना । तब लगि कीजिय मूर्ति विधाना ।।

ज्ञान अभाव न पूजहि जोई । पातन होय अधोगति होई ।।

यहि कारण सुर नर मुनि बृंदा । करिय सुजाति कर्म गत निंदा ।।

जब जह होय भक्त गति जैसी ।शिव पूजा कीजिय तंह तैसी ।।

व्रह्म विचारण शिव सब मांही । सर्व एक रस दुकिआ नाही ।।

तारक मूल सुभाव सुसंगा । पाय सुसंग कथा रस रंगा ।।

श्रवण से मनन मनन से ध्याना । ध्यान से अधिआसन अधिग्याना ।।

भक्ति से विरति विवेक विरागा । तव सूझै शिव पद अनुरागा ।।

दोहा -8

भक्ति सेहोय विराग उर जोग से प्रघटत ज्ञान ।

शिवदयाल शिव कथा रति दायक पद निर्वान ।।

पुन्य पाप जब उभौ नसावै । तव निवास शिव उर पुर पावै ।।

मूल कथा जे सब तरु शाखा । फल विज्ञान फूल अभिलाषा ।।

ताकर पत्र विगत सब संगा । फल रस जीवन मुक्ति विहंगा ।।

विनि शिव पूजन विन जप दाना । छुटहि न दुख विधि माना ।।

जब लगि देह सुपांतक भ्राजा । तब लगि लहै न सिद्धि समाजा ।।

विगत पाप संपूरण कामा । सफल जन्म सुमिरत शिव नामा ।।

यथा मलिन षट चढ़ै न रंगा । धुये वसन सव रंग प्रसंगा ।।

तथा कुसंगति मल संदेहा । दाहन दोष शम्भु पद नेहा ।।

दोहा - 9

कर्म मूल देवन कै पूजा । पूजन मूल गुरू नहि दूजा ।।

गुरु व्रह्मा गुरु हरि हर देवा । विद्या मुक्ति देनि गुरु सेवा ।।

सब कर मूल एक सतसंगा । जासे होत कथा रस रंगा ।।

सत संगत महिमा अधिकाई । सुलभ मुक्ति रति भक्ति उपाई ।।

काकी मति न कुसंगति नासी । अन्त दहिन उर जग उपहासी ।।

पाय कुसंगन से चतुराई । तथा सुसंग सकल सुखदाई ।।

सप्त स्वर्ग अपवर्ग विशेषा । तुलहि न सुख सतसंग अलेषा ।।

सत संगति प्रभाव गुरु लाभा । गुरु ते मिलहि मंत्र विधि आभा ।।

दोहा -10-

गुरु संतोषी चाहिये शील सुभाय सनेह ।

उत्तिम कुल गुण ज्ञान युत भक्ति विराग विदेह ।।

गुरु गुण पावन पर्म कृपालू । वेद विधायक सवहि दयालू ।।

मंत्र से लाभ देव पूजा व्रत । व्रत अरचन से होत भक्ति रत ।।

भक्ति से प्रघट विरति कै ग्याना । विरति ज्ञान दायक विज्ञाना ।।

सो विज्ञान निवारण भेदा । हरण सकल भ्रम संसय खेदा ।।

हम तुम पूत्र मान अपमाना । जीत हारि सुख दुख सम जाना ।।

दुंद रहित पावहि शिव शंकर । उभय बीच दुख दाह भयंकर ।।

जव दर्शे शिव समन कलेशा । रहै न दुख दरिद्र लवलेशा ।।

गृह आश्रम अस विरला कोई । पावहि मुक्ति पदारथ सोई ।।

दोहा - 11

परमहंस शिव तत्व मय जग मैं विरला कोय ।

शिवद्याल तासु दर्शन करे मुक्ति पदारथ होय ।।

यदि जग मैं अस होवै सोई । तेहि दरसे अध मोचन होई ।।

तीरथ सकल दरसै के आशा । करहि सदा तह चहै निवासा ।।

ते जन नहि सब तीर्थन माही । देव शिला तिन पट तर नाही ।।

देखउ खोजि सकल जग मांही । मुनि सप्तम नहि वहु विज्ञानी ।।

विन मन्जत पुनीत सर सरिता । चलत चरण वन तीर्थ पुनीता ।।

जनि लगि रहै अस्थिर गृह मांही । पूजिय शिव गिरिजा भ्रम नाही ।।

मधुसूदन पूजिय विधि नाना । सूर्ज वायु गणपति सविधाना ।।

पूजिय एक शम्भु श्रुति भाषा । सीचत मूल तृपित लरु शाखा ।।

दोहा - 12 क

तृपित सवै पूजन करै देवन मूल महेश ।

यथा मूल सींचत विटप शाषा सीचि नवेश ।।

12ख

शिव शंकर जग शंकर पूजि त्रियंवक देव ।

सर्व भूत हित रत सदा शिवदयाल नित सेव ।।


।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयोअ्ध्याय ।।

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