।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे त्रतीयपाद द्वतीयोअ्ध्याय ।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
ऋषिन वहुरि पूंछा संवादा । शंभु कथा फिर व्यास प्रसादा ।।
शिव पूजन विधि सुरण सुनाई । सो मोहि सूत कहौ समुझाई ।।
सुनि विरंचि मुख देवन कीन्ही । पूजन सोय कहौ हित चीन्ही ।।
तव कह सूत सुनहु मुनि वृन्दा । शिव अरचा दायक आनन्दा ।।
सो संवाद कहौ निरधारा । युग सनकादि विरंचि कुमारा ।।
तिनहि व्यास पूंछी एक वारा । तिन सब कही सहित विस्तारा ।।
हम सो व्यास वदन सुनि पाई । कहई विचार यथा श्रुति गाई ।।
कह विरंचि सुनहु मुनि देवा । परम कठिन शिव शंकर सेवा ।।
दोहा - 1
भूसुर भूभुज वैश्य पुनि वरण सूद्र लौ चारि ।
तामहि चारौ वरण के धर्म कहौ विस्तारि ।।
प्रथमैं अति दुरलभ नर देहा । तामौ गृह सुत दार सनेहा ।।
तापर सब निज पच्छ सनेही । जग मैं ममता मोह न केही ।।
चारि वरण अरु त्रै दस जाती । सप्त वधिक द्वादस परधाती ।।
जौन जाति जग जनमै जाई । निज कुल धर्म करै समुदाई ।।
अति दुरलभ नर तन संसारा । दुरलभ उत्तम कुल अवतारा ।।
तापर दुरलभ दुज कुल धर्मा । अति दुरलभ विद्या सत कर्मा ।।
विवुध कहै धनि विप्र शरीरा । विद्या विनय विदुष सो धीरा ।।
दुज वर वंस जन्म जो धरई । संध्या तरपन हुय जप करई ।।
दोहा - 2 क
वेद पठन पाठन जजन जाजन प्रति गृह दान ।
व्राह्मण के षट कर्म शुभ छत्री के तीन प्रधान ।।
2ख
छत्री के हित कर्म त्रै जजन पठन श्रुति दान ।
वैश्य सूद्र दुय करि सकै जज्ञदान सनमान ।।
छत्री वंश जनम जो पावै । समर मरण तौ जग जस छावै ।।
वैश्य वंश पावै अवतारा । पशु पालनी बाणिज वैपारा ।।
सूद्र वंश जो जन अवतरई । छेत्र ववन दुज सेवन करई ।।
जिहि जिहि जाति जाय अवतरई । निज कुल धर्म लाग सब करई ।।
जाति धर्म जग जदपि अनेका । अन्तिम निज कुल धर्म विवेका ।।
निज कुल धर्म सदैव सहायक । पर कुल धर्म सदा भयदायक ।।
जब लग ह्रदय न प्रघटै ग्याना । तब लगि कर्म आचरण माना ।।
कर्म से सहस गुणी तप जागा । तपते सहस गुण जय अनुरागा ।।
फल जपते सहस्र गुण ध्याना । सदा प्रशंशत बिबुध निधाना ।।
दोहा - 3
ध्यान से विदित विचार उर तव प्रधटत विज्ञान ।
शिवद्याल भक्ति से विरति होय दोनौ मोक्ष प्रधान ।।
ब्रह्म विचार ध्यान रत अहई । तिनहि समीप सदा शिव रहई ।।
योग ध्यान जब निरषैं शंकर । होय ज्ञान साधन तेहि अन्तर ।।
पातक पुंज दहन मन ध्याना । सोइहि हम सर मन विज्ञाना ।।
विदित ब्रह्म विद्या वुध जोई । विद्या सकल विसुद्धित सोई ।।
यह अज्ञान विदित जग माही । सुख दुख क्रिया विचारत नाही ।।
ज्ञान विसुद्ध ह्रदय शिव अच्छर । परानंद कर लिंग दिगंवर ।।
निष्कल सर्वग योगिन उर वर । लिंग दुय विधि बाहर अरु अंतर ।।
सूझ्म अंतर बाहिर स्थूला । भेद जीव प्रतिमा अनुकूला ।।
दोहा - 4
स्थूल अंग जगमैं भृमै सपनै सूझ्म देह ।
कारण तन सुख सोवही तुरिय हंस गत नेह ।।
कर्म यग्य रत पूजिय स्थूला । सूझ्म ध्यान ग्यान की मूला ।।
अस तन केरि भावना हेता । सेवत बाहिर लिंग चित चेता ।।
जव अध्यातम ग्यान विकाशा । सो सूझ्म शिव लिंग प्रकाशा ।।
यथा थूल मृत काष्ट विकल्पा । अहो विचार वुद्धि अति अल्पा ।।
थूल मैं निहचै कृत जग माही । परम तत्व वादी ते नाही ।।
जव लगि ह्रदय न ज्ञान प्रकाशा । तब लग भजिय मूर्ति अनि आशा ।।
निष्कल सकल उदय जव ज्ञाना । शिव मय जग जग मय शिव जाना ।।
येहि विधि ग्यान सहित नर जोई । ताके उर दुख दोष न कोई ।।
दोहा 5
तजे कर्म जिन ज्ञान विन शिखि मूढता विवाद ।
शिवदयाल वांतासि ते अपरै करण विषाद ।।
तिनहि विधान न संग्रह त्यागा । जिनके ह्रदय ग्यान वैरागा ।।
गृह वस कर्म न वन्धन ज्ञानी । यथा कमल दल भिदै न पानी ।।
जलि अध्यातम ग्यान न साधै । तव लगि कर्म न शिव अवराधे ।।
नैन कमल जग पीत दिखाई । जिमि दिशि भ्रम परदिश चितजाई ।।
जिमि घन पटल छाह दिवि जावै । भ्रम वस रवि शशि झपे वतावै ।।
इमि भव रूप मायावस माही । भ्रम सबके उर छूटत नाही ।।
जिमि दर्पन प्रतिविम्व प्रकाशा । मलिन भये मलिनै आभासा ।।
तैसे माया मलिन सरीरा । शंभु शक्ति धेवैं ते धीरा ।।
दोहा -6 क
अंवर अंतर दर्शित चन्द्र दिवाकर एक ।
घट प्रति जल छाया विदित तृष्ना रूप अनेक ।।
6ख
जो जल मलिन तौ मलिन नर विछाह तरंगन भंग ।
तेहि विधि जीव सुनित्य यह भरमत माया संग ।।
जे जग सुने औ दर्शित जेते । प्रघटे सकल शिवात्मक तेते ।।
एक ईश बहु भांति दिखाई । जिमि जग भेद जगत अधिकाई ।।
सब संसार सकल तन धारी । परम ईश भाषै श्रुति चारी ।।
अस विज्ञान विदित उरजाके । प्रतिमादिक पुजित नहि ताके ।।
जे जन जग विज्ञान विहीना । ते प्रतिमा पूजहि हुय दीना ।।
चहत उच पदवी आरूढ़ा । विन आलंवन लहै न मूढ़ा ।।
सगुण उपासक प्रतिमा सेवहि । ते निर्गुण पावहि निर्भेवहि ।।
चन्दन पुष्प धूप अरु दीपा । विन मूरति केहि दैय समीपा ।।
दोहा 7
प्रथम सुकरम पूजि शिव तजिय कामना काम ।
शिवद्याल शिवार्षन करिय सब पुन्य पाप बिर राम ।।
जव लगि नहि प्रघटै विज्ञाना । तब लगि कीजिय मूर्ति विधाना ।।
ज्ञान अभाव न पूजहि जोई । पातन होय अधोगति होई ।।
यहि कारण सुर नर मुनि बृंदा । करिय सुजाति कर्म गत निंदा ।।
जब जह होय भक्त गति जैसी ।शिव पूजा कीजिय तंह तैसी ।।
व्रह्म विचारण शिव सब मांही । सर्व एक रस दुकिआ नाही ।।
तारक मूल सुभाव सुसंगा । पाय सुसंग कथा रस रंगा ।।
श्रवण से मनन मनन से ध्याना । ध्यान से अधिआसन अधिग्याना ।।
भक्ति से विरति विवेक विरागा । तव सूझै शिव पद अनुरागा ।।
दोहा -8
भक्ति सेहोय विराग उर जोग से प्रघटत ज्ञान ।
शिवदयाल शिव कथा रति दायक पद निर्वान ।।
पुन्य पाप जब उभौ नसावै । तव निवास शिव उर पुर पावै ।।
मूल कथा जे सब तरु शाखा । फल विज्ञान फूल अभिलाषा ।।
ताकर पत्र विगत सब संगा । फल रस जीवन मुक्ति विहंगा ।।
विनि शिव पूजन विन जप दाना । छुटहि न दुख विधि माना ।।
जब लगि देह सुपांतक भ्राजा । तब लगि लहै न सिद्धि समाजा ।।
विगत पाप संपूरण कामा । सफल जन्म सुमिरत शिव नामा ।।
यथा मलिन षट चढ़ै न रंगा । धुये वसन सव रंग प्रसंगा ।।
तथा कुसंगति मल संदेहा । दाहन दोष शम्भु पद नेहा ।।
दोहा - 9
कर्म मूल देवन कै पूजा । पूजन मूल गुरू नहि दूजा ।।
गुरु व्रह्मा गुरु हरि हर देवा । विद्या मुक्ति देनि गुरु सेवा ।।
सब कर मूल एक सतसंगा । जासे होत कथा रस रंगा ।।
सत संगत महिमा अधिकाई । सुलभ मुक्ति रति भक्ति उपाई ।।
काकी मति न कुसंगति नासी । अन्त दहिन उर जग उपहासी ।।
पाय कुसंगन से चतुराई । तथा सुसंग सकल सुखदाई ।।
सप्त स्वर्ग अपवर्ग विशेषा । तुलहि न सुख सतसंग अलेषा ।।
सत संगति प्रभाव गुरु लाभा । गुरु ते मिलहि मंत्र विधि आभा ।।
दोहा -10-
गुरु संतोषी चाहिये शील सुभाय सनेह ।
उत्तिम कुल गुण ज्ञान युत भक्ति विराग विदेह ।।
गुरु गुण पावन पर्म कृपालू । वेद विधायक सवहि दयालू ।।
मंत्र से लाभ देव पूजा व्रत । व्रत अरचन से होत भक्ति रत ।।
भक्ति से प्रघट विरति कै ग्याना । विरति ज्ञान दायक विज्ञाना ।।
सो विज्ञान निवारण भेदा । हरण सकल भ्रम संसय खेदा ।।
हम तुम पूत्र मान अपमाना । जीत हारि सुख दुख सम जाना ।।
दुंद रहित पावहि शिव शंकर । उभय बीच दुख दाह भयंकर ।।
जव दर्शे शिव समन कलेशा । रहै न दुख दरिद्र लवलेशा ।।
गृह आश्रम अस विरला कोई । पावहि मुक्ति पदारथ सोई ।।
दोहा - 11
परमहंस शिव तत्व मय जग मैं विरला कोय ।
शिवद्याल तासु दर्शन करे मुक्ति पदारथ होय ।।
यदि जग मैं अस होवै सोई । तेहि दरसे अध मोचन होई ।।
तीरथ सकल दरसै के आशा । करहि सदा तह चहै निवासा ।।
ते जन नहि सब तीर्थन माही । देव शिला तिन पट तर नाही ।।
देखउ खोजि सकल जग मांही । मुनि सप्तम नहि वहु विज्ञानी ।।
विन मन्जत पुनीत सर सरिता । चलत चरण वन तीर्थ पुनीता ।।
जनि लगि रहै अस्थिर गृह मांही । पूजिय शिव गिरिजा भ्रम नाही ।।
मधुसूदन पूजिय विधि नाना । सूर्ज वायु गणपति सविधाना ।।
पूजिय एक शम्भु श्रुति भाषा । सीचत मूल तृपित लरु शाखा ।।
दोहा - 12 क
तृपित सवै पूजन करै देवन मूल महेश ।
यथा मूल सींचत विटप शाषा सीचि नवेश ।।
12ख
शिव शंकर जग शंकर पूजि त्रियंवक देव ।
सर्व भूत हित रत सदा शिवदयाल नित सेव ।।
।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयोअ्ध्याय ।।
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