।।। अथ श्री शिव पुराण परिपाटी द्वतीयपाद चतुर्दशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
सुनहु ऋषी सो रथ परमाना । सकल देवमय जस निरमाना ।।
शिव हित रथ विरचे विसुकरमा । सर्व लोक मय रचिसुवरणमा ।।
रथ को अंग दाहिनो भानू । द्वादश रवि आरा गज मानू ।।
शोभित वाम चक्र चन्द्रमा । षोठस कला सो आरा निरमा ।।
किरणी समनझ रथ वांये । योग लगन भूषित अंगदाये ।।
षट ऋितु सोच क्रनकै पूठी । द्वादश मास उभय दिशि जूठी ।।
निसि अरु दिवस फरै ढुय लागी । पटली सात वार कै सांगी ।।
पुष्कर अंतरिक्झ दिसि वाँये । नीड़ मेरु मंदर अंग दायें ।।
दोहा - 1
भूषन गंगादिक नदी सिन्धु तुला ये चारि ।
वंधन जंत अनंत अहि पच्छ पैजनीकारि ।।
उदय अस्त गिरि कूवर सोऊ । वत्सर वेग अयन धुर दोउ ।।
तुरग वेद सारथी विधाता । मंत्री भये वियुन सुर त्राता ।।
प्रणत ब्रह्म लघु उभय पताका । सात दीप सो जटित सलाका ।।
महाछत्र जो गगन अखन्डा । मंदर सूल सुभग सोय दन्डा ।।
हिमगिरि धनु गुण शेष भुजंगा । सरसुत घंटा शव्द अभंगा ।।
विष्णु तेज सर पावक गासी । माया जाल मनोरथ ठासी ।।
ये गुरु शेष सकल ब्रह्मण्डा । ते सब जोरि लगे रथ खन्डा ।।
तापर आय चड़े शिव शंकर । जो कालहु के काल भयंकर ।।
दोहा 2
व्रसम रूप धरि भूमिधर सो रथ दियो उठाय ।
चलो पमन मन वेग सम गति नहि वरणि सिराय ।।
रथा रूढ़ शिव देव न देखे । जै जै करहि विजय के लेखे ।।
तिहि अवसर शिव रूप प्रकाशा । मनहु भानु कोटिन संकाशा ।।
शिवा सहित सोभित अधिकाई । वरस सहस नहि वर्णि सिराई ।।
सैन संग चतुरंग सुहाई । विधिही मुनि गण सुर समुदाई ।।
रवि शनि वरुण कुवेरहु ता सन । वायु इन्द्र यम काल षडानन ।।
वीर भद्र नंदी गण भृंगी । समर जुझार महारण रंगी ।।
कुंद दंत हिम करवर झंपन । चंड प्रचंड प्रकंड प्रकंपन ।।
सोरठा - 3क
दूषित त्रिसिखि झंखार सहस पंच सत नयन मुख ।
अजा बदन जंतार कट पूतन सत सिंह ककट ।।
दोहा 3-ख
अधै बक्र हय गज वदन सेनापति जे सर्व ।।
जारि सकै सब लोक पुर चले संग शिव खर्व ।।
हल मुगधर मूसल गिरि साला । तोमर फरष त्रिसूल कराला ।।
खडग भुसुंडि भालु धनु भाथा । चक्र परिधि शक्ती गद हाथा ।।
नाना अस्त्र शस्त्र करधारी । चले सकल कहि जै मदनारी ।।
जटा जूट कर दंड सिधारण । वर्षहि सुमन सिद्ध मुनि चारण ।।
नचै अपसरा गंधर्व गावै । वाजन विविध प्रकार बजाई ।।
सेन संग लै चले महेशा । भूमि भार सहि सके न शेषा ।।
डोली धरणि महीधर कांपै । दिग्गज चिंधारहि पद चांपै ।।
नवे शेष सिर उर सकुचाने । विचली धेनु कमठ अकुलाने ।।
दोहा 4क
इहां पंच मुंडन मिलि जपन धर्म निर्माय ।
त्रिपुराधिप एकत्र करि निज कर इष्ट पुजाय ।।
सोरठा 4ख
देव सुअवसर पाय त्रिपुरासुर इक ठाँह लषि ।
कही शंभु प्रति जाय वेगि नसावहु दनुज पुर ।।
विधि हरि कह सो अवसर पाई । शंभु असुर नासहु दुखदाई ।।
ताहि समय सुर नर मुनि बृंदा । कहैं परस्पर सहित अनंदा ।।
शिव समरथ अचरज कछु नाही । त्रिपुर लोक दहै छण मांही ।।
सो मुनि शिव कार्युक विस्तारा । अगनित कोश प्रमाण अपारा ।।
कीन्ह रुद्र गण धनु टंकारा । वघिर भये सव रब सुनि घोरा ।।
वहुरि काल सम सर संधाना । विकसित पावक प्रलय समाना ।।
शिव त्रिपुरासुर ओर निहारी । कर पिणाक विष विशिष प्रहारी ।।
प्रघट शिखा जनु दामिनि लागी । फुकरत घोर झरत जनु आगी ।।
दोहा - 5
वान विकाशै अखिल जग तेज प्रकाश अपार ।
यथा प्रलय पावक दहय तेज सकल संसार ।।
छण मैं जारि करे पुर छारा । त्रिपुरासुर सिर शिव संघारा ।।
अपर दहे दानव सत कोटी । भई निशाचर दल गति खोटी ।।
सर संकाश भुवन भय हारी । चकित चौंकि सब रहे निहारी ।।
रहेउ शव्द सो भरि त्रैलोका । भये देव मुनि मनुज अशोका ।।
जो शिव रुद्र भयंकर काला ।भुवनांतक भुवनेश कराला ।।
लोक प्रलय शिव नैन उघारत । भृकुटी भंग सवै जग जारत ।।
तिहि शिव कै सोय रूप निहारी । भय वस भये देव मुनि झारी ।।
स भै सकल शिव ओर निहारे । रहे मौन कछु काल विचारे ।।
सोरठा -6क
भय वस कंपित गात उमौ भयंकर रूप लखि ।
ह्रदय बिकल विलखात शंभु समीप न जात कोउ ।।
दोहा - 6 ख
देव दनुज ऋषि मुनि मनुज शिवहि निरखि सकुचात ।
शिवदयाल दसा सोय निरखि हरि वदन मोरि मुस्क्यात ।।
सभै हेरि हरि शैल कुमारी । देव दनुज ऋषि मुनि जन झारी ।।
अति कृपाल सो अवसर जानी । हरि विरंचि वोले मृदु वानी ।।
सदा सवन के भव भय हारी । अव ते नाम भयो त्रिपुरारी ।।
नर निश्चर शिव सेवन करिहै । रुद्र गणन पति हुय अवतरिहै ।।
तेहि अवसर विधि विनय प्रकाशी । जै शंकर महेश कैलाशी ।।
जै हर गंगाधर गिरि वासी । जै शिव चिदानन्द सुख रासी ।।
जै पिणाकधर शिव अविनासी । गिरिपति गिरिजापति गुणरासी ।।
जै शशिधर नित निवसत काशी । शिवदयाल उर सद मन वासी ।।
दोहा - 7
वहुर कहा विधि विनय करि मो प्रण सुनहु महेश ।
सदा सारथी हम रहय तुम रथ पर देवेश ।।
सेवहि नाक नागपुर वासी । विधि हरि अविचल विनय प्रकाशी ।।
तेहि अवसरहि हरि जगदीशा । कर संपुट विनवत नमि शीशा ।।
जै महेश बृषधुज गौरीशा । निर्गुण ब्रह्म सगुण अधि ईशा ।।
जय गंगाधर हर नन्दीशा । प्रकृति पुरुष रूपक जगदीशा ।।
जै डमरूधर शंभु गिरीशा । रूद्र विश्व ई श्वर काशीशा ।।
जै भक्तन प्रिय शांत महीशा । नील कण्ठ करवर अवनीशा ।।
वार वार विनवौ कालीशा । शिवदयाल उर वसौ दिगाशा ।।
तेहि अवसर मुनि देव समूहा । अस्तुति करण लगे मिलि जूहा ।।
छंद
-----–----------- शिव स्तुति -----------------------
नौंमि वृषध्वज चन्द्र शेषर नीलकण्ठ जटा धरं ।।
शीश गंग भुजंग कंकण भस्म अंग करय वरं ।।
लाल कंज विशाल लोचन मुण्डमाल विश्वे श्वरं ।।
व्याघ्र छाल हिमाल आसन फटिक गौर महेश्वरं ।।
मदन दाहन ब्रषभ वाहन डमरु कर धर सुन्दरं ।।
शीश नाग पिणाक पाणी चरण पंकज फणिपुरं ।।
जयति शिव हर कंठ विषधर रुद्र शंभु दिगंवरं ।।
शिवद्यालगिरिजासहित शंकर वसौममउरअनंतरं ।।
सोरठा 8-क
वोले शिव सुखधाम विनय प्रेम वस मगन मन ।
विधि हरि सुर हित काम मागहु वर मन भावनो ।।
दोहा - 8ख
यदि प्रशन्न भगवान शिव जो चाहत वर देन ।
जंहां विकट संकट परै पघटौ दुख हरि लेन ।।
तथा अस्तु वर वोलि महेशा । अपर वचन अब सुनौ सुरेशा ।।
यह असतुति जो सुनै कि गावै । मन वांछित अमोघ फल पावै ।।
तेहि अन्तर मुंडी ते आये । करि प्रणाम मृदु वचन सुनाये ।।
कवहु कृपा निधि तजव न नेहू । अव का मोहि अनुशासन देहू ।।
तिनके वचन सुनत विधि हरि हर । वोले वचन अखिल मंगलकर ।।
सदा सकल रैहौ धनवंता । दयावान कोमल चित संता ।।
तव लगि वसहु मरुस्थल देशा । जव लगि कलयुग करहि प्रवेशा ।।
वन्श तुम्हार रहै जग छाई । पूर्व सिंधु सीमा समिताई ।।
दोहा - 9
तब कुल शिष्य सराउगी वैश्य होय सुभ जाति ।
पूजहि पारस दिउ हरे नेम नाथ वहु भांति ।।
गया से अगिनि कोण त्रय कोसा । तव कुलधर कीटक होयजोसा ।।
तासु तनय हरि वौध्य वतारा । सूद्रन कृत हति हरि महि भारा ।।
श्रद्धा श्राद्ध पितर निरधारा । वोधगया तेहि कहै संसारा ।।
इन्द्र नील मख करी सुरेशा । तंह जगदीश आन भुवनेशा ।।
सो मम अंश वौध समकारा । तेहि कहै जगन्नाथ संसारा ।।
जिनहि दरस पद लहै निर्वाना । पग प्रतिफल गोदान समाना ।।
तब ते अति कुल बढ़ै तुम्हारा । निर्फल होय न वचन हमारा ।।
वहुरि वर्ष सोरह सै वाते । अमर सिंह से उरा प्रतीते ।।
दोहा - 10
अमर सवेरा करि सकै दर्श ते पूरण मास ।
दश गिसि वारह कोस मैं पूरण चन्द्र प्रकाश ।।
प्रलय दिखाय पयोनिधि वारी । शंकर अमरै छल करि मारी ।।
वद्रीवन थपि नर नारायण । रामाश्रय तजि विजय परायण ।।
सो जीते सुर नर मुनि झारी । धर्म जपन मत अति विस्तारी ।।
तब हम सव धरिहै अवतारा । शेष अंश रामाश्रम धारा ।।
ब्रह्म सर्म विधि अरु हम मंडन । शिव शंकराचार्य मत खण्डन ।।
गणपति वक्रतुन्ड मम जेतू । सब करहै मरजादा सेतू ।।
यह सुनि मुडिन कीन्ह प्रणामा । निवसे माड़वाड़ करि धामा ।।
विधि हरि हर भये अन्तरध्याना । गये देव सव निज अस्थाना ।।
दोहा - 11
शिवद्याल सुभग संवाद यह श्रवण करै धरि ध्यान ।
तिनके सकल मनोरथ पुरवै शंभु सुजान ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयोपाद चतुर्दशोअध्याय ।।।
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