Sunday, 17 April 2011

बीसवां अध्याय

।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद दशयोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।

।।। त्रिपुरासुर प्रकरण ।।।


त्रिपुर दुखद सुनि गुणि मनधाता । कहा कि दनुजन योग न घाता ।।

पुन्यवंत कहुं मरहि न मारे । सुनहू जो सुगम विचार हमारे ।।

जाउ सकुचि तजि शंकर तीरा । वे तमरथ हरहै सब पीरा ।।

ब्रह्म गिरा सुनि सुर मुनि बृंदा । गये शंभु प्रति सहित अनंदा ।।

करि विनती दुःख दुसह सुनावा । सुनि शिव शंकर के मन भावा ।।

बहुरि कहा शिव सुरन वुझाई । दानवंत हत करो न जाई ।।

हैं त्रिपुरासुर अति पुन्याई । धर्म वृद्धि नहि सकहि नसाई ।।

जव लगि पुन्य होय अधिकारी । तबलगि सकै न सुरमुनि मारी ।।

दोहा - 1

जदपि सहायक होय प्रभु तौ यह करब उपाय ।

ई श्वर से विनती करौ देवन जतन वताय ।।

धर्म नसावन करौ उपाई । तौ नासय दानव समुदाई ।।

तदपि विष्णु से करहु निवेदन । रखिहै कृपा सिन्धु कछु भेद न ।।

शंभु गिरा सुनि सुर हिय हारे । त्राहि त्राहि हरि शरण पुकारे ।।

करुणानिधि करुणावस प्रघटे । दुसह दुःख देवन के निघटे ।।

विहंसि वचन वोले जग तारण । कहौ सकल सो निज दुख कारण ।।

करि विनती बोले सुर बृन्दा । द्रवहु कृपानिधि करुणाकन्दा ।।

देवन पच्छ हेत चित धरऊ । त्रिपुरासुर वध सूचित करऊ ।।

विष्णु कहा जंह धर्म सनातन । ताके होय न कैसेउ पातन ।।

दोहा- 2

धर्म भरोसो धर्म वल धर्महि सकल समाज ।

शिवदयाल आपने धर्म से सिद्ध होय सब काज ।।

धर्म निकट संकट नहि जाई । भानु उदय जिमि तमसि नसाई ।।

सुनि हरि वचन दुखित भये देवा । सूषे वदन निरासे खेवा ।।

कितै जांय कह करिय कृपाला । कौन जतन निवरै यहि काला ।।

किहि प्रकार त्रिपुरासुर नासै । यह कहि सुर भये दुखित निरासै ।।

अस मैं दुरगति सही न जाई । विनि औसर का करिय उपाई ।।

करि मन मौन चकित चित भयेउ । वहुरि विलखि अस्तुति निरमयेउ ।।

नाथ कृपा करि करब सहाई । दनुज वधन कै करव उपाई ।।

हुय अनाथ नारायण आगे । विनती करण प्रेमवस लागे ।।

जव जब दारुण दुख दहौ देव विप्र दुय जाति ।

शिवद्याल प्रभु अवतार धरि राषत है सव भांति ।।

नमोकृपालाय दिगंवराय अरूपरूपाय विरूपकाय ।

भस्मांगराय सुरेश्वराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


कैलाशवासाय गिरीश्वराय नीलशिखंडाय महेश्वराय ।

लोकेभृमंताय निशामुखाय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


विश्वादिरूपाय विश्वेश्वराय अर्धंगगौरी शशिशेषराय ।

कर्पूरगौराय जटाधराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


काशीनिवाशाय त्रियंवकाय कामंतुनाशाय वरप्रदाय ।

त्रिशूलहस्ताय त्रिलोचनाय श्री नीलकंठाय नमः शिवाय ।।


मृत्युंजये व्याल विभूषणाय कालीकलत्राय बृषध्वजाय ।

पिनाकहस्ताय परावराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


शिवायइदमस्तुतिनिर्मिताय शिवदयालसर्मायरतिप्रदाय ।

इदंश्रवणपाठनभक्तिदाय ध्यायेचिदानन्दअगम शिवाय ।।

गौ द्वज संतन सुरण हित धरि अनेक अवतार ।

शिवद्याल कृपानिधि कृपाकरि करत सदा निरधार ।।

देव विनय सुनि जगन्निबासी । चित चिंतित सुरकाज प्रकासी ।।

सुनहु देव नहि और उपाई । शंभु शरण सेवहु सुखदायी ।।

शिव पूजन पूरण जब होई । तब जौ जांचौ मिलिहै सोई ।।

विनि शिव पूजे सब जग मांही । देव असुर नर का सत नांही ।।

जो चाहौ त्रिपुरासुर दूषन । सेवहु शिव त्रैलोक विभूषन ।।

पूजि शिवहि निश्चर समुदाई । जीतै सुर दुज धर्म नसाई ।।

विना शम्भु पूजे धर्मिष्टा । कौनेउ जतन होय नहि नष्टा ।।

शिव पूजा विनि दशौ प्रयोगा । सिद्धि करण को वैन न योगा ।।

दोहा - 5

थंभन मोहन अकर्षण लूक अगनि वैताल ।

वधन उचाटन वसकरण शिव अधीन शिवद्याल ।।

शिवहि से वैदिक शावर मंत्रा । शिव पूजत शिधि जंत्र औ तंत्रा ।।

जप तप नेम धर्म विधि नाना । शिवहि सै सिद्धि जग्य ब्रतदाना ।।

निहचै चाहौ त्रिपुर विनाशन । करौ सत्य करि शम्भु उपासन ।।

विष्णु वचन सुनि मुनि बृन्दारक । शिंहनाद करि उर हर धारक ।।

मनस चिंति भगवान सुरेशा । पुनि दवन प्रति कह देवेशा ।।

मारि न पापी सकहि अपापी । चाहौ कोटि भांति तत तापै ।।

अजित अवध्य देव अनपापा । ददुजहु सदा नसत बस पापा ।।

देव अनागस अति बल दापा । जीतय दनुज ते रुद्र प्रतापा ।।

दोहा -

तपी विप्र धर्मिष्ट नृप इनहि न लगै प्रयोग ।

एक ते इकइस वार लगि कबहुक सिद्धि संजोग ।।

का विरंचि का हम ऋषि देवा । सत्रुन जीतै विनि शिव सेवा ।।

सर्व काल सबही सब मांही । लीला वर्जित काज कराहीं ।।

पूजके एक अंश ईशाना । देव भये देवत्व समाना ।।

जिनकौ पूजि ब्रह्म पद ब्रह्मा । हम भये विष्णु सेय शिव धर्मा ।।

शिव सेवन विनि तिहि पुर मांही । काहू पुरुष पाई सिद्धि नाही ।।

शिव दीझालय जितिहौ दानव । करि हर इष्टा जग्य सुजानव ।।

एक लच्छ पार्थिव करि पूजा । लिंगार्चन सम पुन्य न दूजा ।।

सुनि हरि गिरा देव मुनि ब्रन्दा । पूजन शिवहि लगे आनन्दा ।।

दोहा - 7

लच्छ लिंग निर्माय के मृण मय तंदुल साथ ।

जल पय दधि मधु धृत रस धारा अर्पी शिव माथ ।।

अछत गंध वेलदल दीपा । पुष्प धूप दय शंम्भु समीपा ।।

सुरण सहित हरि पूजे शंकर प्रघटे शिव कृपाल तिहि अन्तर ।।

काल अगिनि संकास महेशा । काल रुद्र जनु काल दिनेशा ।।

सूल शक्ति कर धनुष अभंगा । भूत सहस्र नल सत सुसंगा ।।

शिव दर्शन करि हरि अनुरागे । करि प्रणाम बोले हरि आगे ।।

त्रिपुरासुर पुर दाहन करहू । दुख मुनिन देवन कर हरऊ ।।

रुद्र परसि कर हरहि प्रणामा । एवमस्तु कहि गये निज धामा ।।

देव मुनिन तब ह्रदय विचारा । विष्णु भक्त वत्सल भगवाना ।।

दोहा -8

शिव प्रसाद सुर काज हित करिहै त्रिपुर विनास ।

विनै कहा प्रभु धर्म वल धटै न मनकी त्रास ।।

दनुज धर्म पथ त्रिपुर निवासी तिनहि नसैहौ किमि अविनासी ।।

तब कह विष्णु सुनौ मुनि देवा । यद्धयपिअ वध त्रिपुरासुर भेवा ।।

पूजै शिव अध छूटै धोरा । यथा कंज दल नीर न वोरा ।।

अवसि पूजि शिव संपति भोगा । लहत असुर नर सुख संयोगा ।।

धर्म विघन हित देव समाजा । त्रिपुर वघन कै विरचै काजा ।।

पुरुषोत्तम प्रभु करहि विचारा । कहि विधि दनुज होय संघारा ।।

जव लगि वेद धर्म शिव सेवा । श्रुचि तब लग नहि नसै अदेवा ।।

हरि देवन कौ आग्या दीन्हा । विघन होय सो चाहिय कीन्हा ।।

दोहा - 9

निहचै श्री हरि सुरण हित विघन हेतु मन भास ।

शिवदयाल संवाद यह सुनत कहत अध नास ।।

।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे दशमोअध्याय ।।।

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