।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद दशयोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
।।। त्रिपुरासुर प्रकरण ।।।
त्रिपुर दुखद सुनि गुणि मनधाता । कहा कि दनुजन योग न घाता ।।
पुन्यवंत कहुं मरहि न मारे । सुनहू जो सुगम विचार हमारे ।।
जाउ सकुचि तजि शंकर तीरा । वे तमरथ हरहै सब पीरा ।।
ब्रह्म गिरा सुनि सुर मुनि बृंदा । गये शंभु प्रति सहित अनंदा ।।
करि विनती दुःख दुसह सुनावा । सुनि शिव शंकर के मन भावा ।।
बहुरि कहा शिव सुरन वुझाई । दानवंत हत करो न जाई ।।
हैं त्रिपुरासुर अति पुन्याई । धर्म वृद्धि नहि सकहि नसाई ।।
जव लगि पुन्य होय अधिकारी । तबलगि सकै न सुरमुनि मारी ।।
दोहा - 1
जदपि सहायक होय प्रभु तौ यह करब उपाय ।
ई श्वर से विनती करौ देवन जतन वताय ।।
धर्म नसावन करौ उपाई । तौ नासय दानव समुदाई ।।
तदपि विष्णु से करहु निवेदन । रखिहै कृपा सिन्धु कछु भेद न ।।
शंभु गिरा सुनि सुर हिय हारे । त्राहि त्राहि हरि शरण पुकारे ।।
करुणानिधि करुणावस प्रघटे । दुसह दुःख देवन के निघटे ।।
विहंसि वचन वोले जग तारण । कहौ सकल सो निज दुख कारण ।।
करि विनती बोले सुर बृन्दा । द्रवहु कृपानिधि करुणाकन्दा ।।
देवन पच्छ हेत चित धरऊ । त्रिपुरासुर वध सूचित करऊ ।।
विष्णु कहा जंह धर्म सनातन । ताके होय न कैसेउ पातन ।।
दोहा- 2
धर्म भरोसो धर्म वल धर्महि सकल समाज ।
शिवदयाल आपने धर्म से सिद्ध होय सब काज ।।
धर्म निकट संकट नहि जाई । भानु उदय जिमि तमसि नसाई ।।
सुनि हरि वचन दुखित भये देवा । सूषे वदन निरासे खेवा ।।
कितै जांय कह करिय कृपाला । कौन जतन निवरै यहि काला ।।
किहि प्रकार त्रिपुरासुर नासै । यह कहि सुर भये दुखित निरासै ।।
अस मैं दुरगति सही न जाई । विनि औसर का करिय उपाई ।।
करि मन मौन चकित चित भयेउ । वहुरि विलखि अस्तुति निरमयेउ ।।
नाथ कृपा करि करब सहाई । दनुज वधन कै करव उपाई ।।
हुय अनाथ नारायण आगे । विनती करण प्रेमवस लागे ।।
जव जब दारुण दुख दहौ देव विप्र दुय जाति ।
शिवद्याल प्रभु अवतार धरि राषत है सव भांति ।।
नमोकृपालाय दिगंवराय अरूपरूपाय विरूपकाय ।
भस्मांगराय सुरेश्वराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
कैलाशवासाय गिरीश्वराय नीलशिखंडाय महेश्वराय ।
लोकेभृमंताय निशामुखाय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
विश्वादिरूपाय विश्वेश्वराय अर्धंगगौरी शशिशेषराय ।
कर्पूरगौराय जटाधराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
काशीनिवाशाय त्रियंवकाय कामंतुनाशाय वरप्रदाय ।
त्रिशूलहस्ताय त्रिलोचनाय श्री नीलकंठाय नमः शिवाय ।।
मृत्युंजये व्याल विभूषणाय कालीकलत्राय बृषध्वजाय ।
पिनाकहस्ताय परावराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
शिवायइदमस्तुतिनिर्मिताय शिवदयालसर्मायरतिप्रदाय ।
इदंश्रवणपाठनभक्तिदाय ध्यायेचिदानन्दअगम शिवाय ।।
गौ द्वज संतन सुरण हित धरि अनेक अवतार ।
शिवद्याल कृपानिधि कृपाकरि करत सदा निरधार ।।
देव विनय सुनि जगन्निबासी । चित चिंतित सुरकाज प्रकासी ।।
सुनहु देव नहि और उपाई । शंभु शरण सेवहु सुखदायी ।।
शिव पूजन पूरण जब होई । तब जौ जांचौ मिलिहै सोई ।।
विनि शिव पूजे सब जग मांही । देव असुर नर का सत नांही ।।
जो चाहौ त्रिपुरासुर दूषन । सेवहु शिव त्रैलोक विभूषन ।।
पूजि शिवहि निश्चर समुदाई । जीतै सुर दुज धर्म नसाई ।।
विना शम्भु पूजे धर्मिष्टा । कौनेउ जतन होय नहि नष्टा ।।
शिव पूजा विनि दशौ प्रयोगा । सिद्धि करण को वैन न योगा ।।
दोहा - 5
थंभन मोहन अकर्षण लूक अगनि वैताल ।
वधन उचाटन वसकरण शिव अधीन शिवद्याल ।।
शिवहि से वैदिक शावर मंत्रा । शिव पूजत शिधि जंत्र औ तंत्रा ।।
जप तप नेम धर्म विधि नाना । शिवहि सै सिद्धि जग्य ब्रतदाना ।।
निहचै चाहौ त्रिपुर विनाशन । करौ सत्य करि शम्भु उपासन ।।
विष्णु वचन सुनि मुनि बृन्दारक । शिंहनाद करि उर हर धारक ।।
मनस चिंति भगवान सुरेशा । पुनि दवन प्रति कह देवेशा ।।
मारि न पापी सकहि अपापी । चाहौ कोटि भांति तत तापै ।।
अजित अवध्य देव अनपापा । ददुजहु सदा नसत बस पापा ।।
देव अनागस अति बल दापा । जीतय दनुज ते रुद्र प्रतापा ।।
दोहा -
तपी विप्र धर्मिष्ट नृप इनहि न लगै प्रयोग ।
एक ते इकइस वार लगि कबहुक सिद्धि संजोग ।।
का विरंचि का हम ऋषि देवा । सत्रुन जीतै विनि शिव सेवा ।।
सर्व काल सबही सब मांही । लीला वर्जित काज कराहीं ।।
पूजके एक अंश ईशाना । देव भये देवत्व समाना ।।
जिनकौ पूजि ब्रह्म पद ब्रह्मा । हम भये विष्णु सेय शिव धर्मा ।।
शिव सेवन विनि तिहि पुर मांही । काहू पुरुष पाई सिद्धि नाही ।।
शिव दीझालय जितिहौ दानव । करि हर इष्टा जग्य सुजानव ।।
एक लच्छ पार्थिव करि पूजा । लिंगार्चन सम पुन्य न दूजा ।।
सुनि हरि गिरा देव मुनि ब्रन्दा । पूजन शिवहि लगे आनन्दा ।।
दोहा - 7
लच्छ लिंग निर्माय के मृण मय तंदुल साथ ।
जल पय दधि मधु धृत रस धारा अर्पी शिव माथ ।।
अछत गंध वेलदल दीपा । पुष्प धूप दय शंम्भु समीपा ।।
सुरण सहित हरि पूजे शंकर प्रघटे शिव कृपाल तिहि अन्तर ।।
काल अगिनि संकास महेशा । काल रुद्र जनु काल दिनेशा ।।
सूल शक्ति कर धनुष अभंगा । भूत सहस्र नल सत सुसंगा ।।
शिव दर्शन करि हरि अनुरागे । करि प्रणाम बोले हरि आगे ।।
त्रिपुरासुर पुर दाहन करहू । दुख मुनिन देवन कर हरऊ ।।
रुद्र परसि कर हरहि प्रणामा । एवमस्तु कहि गये निज धामा ।।
देव मुनिन तब ह्रदय विचारा । विष्णु भक्त वत्सल भगवाना ।।
दोहा -8
शिव प्रसाद सुर काज हित करिहै त्रिपुर विनास ।
विनै कहा प्रभु धर्म वल धटै न मनकी त्रास ।।
दनुज धर्म पथ त्रिपुर निवासी तिनहि नसैहौ किमि अविनासी ।।
तब कह विष्णु सुनौ मुनि देवा । यद्धयपिअ वध त्रिपुरासुर भेवा ।।
पूजै शिव अध छूटै धोरा । यथा कंज दल नीर न वोरा ।।
अवसि पूजि शिव संपति भोगा । लहत असुर नर सुख संयोगा ।।
धर्म विघन हित देव समाजा । त्रिपुर वघन कै विरचै काजा ।।
पुरुषोत्तम प्रभु करहि विचारा । कहि विधि दनुज होय संघारा ।।
जव लगि वेद धर्म शिव सेवा । श्रुचि तब लग नहि नसै अदेवा ।।
हरि देवन कौ आग्या दीन्हा । विघन होय सो चाहिय कीन्हा ।।
दोहा - 9
निहचै श्री हरि सुरण हित विघन हेतु मन भास ।
शिवदयाल संवाद यह सुनत कहत अध नास ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे दशमोअध्याय ।।।
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