Sunday, 17 April 2011

इक्कीसबां अध्याय

।।।अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीय पाद एकादशोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


अस विचारि जगदीश विरेजा । पुरुष एक निरमेउ निज तेजा ।।

मय मायामय विदित सुरूपा । दानव धर्म विघन अनरूपा ।।

मुंडी मलिन वसन छिष पात्रा । कर मार्जनीकारि पद यात्रा ।।

कर अंवर धरि निज मुख झांपी । हरि सनमुख करजोरि कलापी ।।

करि विनती कह करौ प्रकाशन । हमकौ नाथ कहा अनुशासन ।।

तव बोले प्रभु कृपानिधाना । सुनहु कि जिहि कारण निरमाना ।।

काज हमार करौ मम अंशा । पूजनीय निसि दिवस असंसा ।।

मायन माया मय पढ़ि विद्या । कर्म विवादक वेद कि निंदा ।।

दोहा - 1

विरचि ग्रन्थ सोरह सहस अरिहन मंत्र प्रधान ।

दै हरि पारष नाम धरि पुनि कह सुनौ सुजान ।।

सोरह सहस ग्रंथ तुम धारौ । हम समर्थि दयेसि यह कारौ ।।

विविध भांति माया निरमानौ । वस्य अवस्य करी शुभ जानौ ।।

वाद विरोध रोध सब ठाई । इष्ट अनिष्ट दिखाय सुनाई ।।

उपासना कलपना अनेका । चित्र विचित्र विषद अविवेका ।।

यह प्रकार हरि ताहि बुझावा । मय मायामय शास्त्र पढ़ावा ।।

षोडस सहस शास्त्र उपदेशा । नेम नाथ पारष निरदेशा ।।

मोहनीय तुम सवहि रिझावौ । धर्म जपन मत दैत्य पढ़ावौ ।।

जपन धर्म जव होय प्रकाशा अपर धर्म श्रुति मारग नाशा ।।

दोह- 2

सब जीवन पर दया धरि अपर धर्म करि नाश ।

जग्य योग तरपन क्रिया जप तप नेम निराश ।।

तीनौ असुर विनासन हेता । जाय पढ़ाय दनुज चित चेता ।।

त्रिपुर नास करि धर्म प्रकाशौ । वहुरि मरुस्थल देश निवासौ ।।

द्वापर सूद्र जग्य तप करिहैं । ते हम जैन वौध हुय हरिहैं ।।

तव होवै अति बृद्धि तुम्हारी । शिष्य ते शिष्य प्रशिष्य अधिकारी ।।

कलिगत जपन अधिक विस्तारा । तव श्रीरंग मोर अवतारा ।।

जदपि जगत श्रुति सेतु नसैहौ । हमरी कृपा मुक्ति गति पैहौ ।।

मम अनुशासन यह आचरिहौ । अति धनवंत अंत भव तरिहौ ।।

सुनि सो मुंडी ह्रदय अनन्दे । चलत समय श्रीपति पद वंदे ।।

दोहा - 3

शिष्य चार मुंडी करे हरि आग्या अनुसार ।

तिनहि मुड़ाय पड़ाय निज शास्त्र सहित विस्तार ।।

गुरु संगति सोभित जुग चेला । प्रभुहि प्रणाम कीन तिन मेला ।।

आशिष दै हरि कह तुम पांचा । जस गुरु कोमल सिषि तस रांचा ।।

शिष्यन सहित सुमुंडित मुंडा । कल्पित करहु धर्म पाखन्डा ।।

पात्र सहित अंवर कर धारण । मृदु अल्पक भाषण हित कारण ।।

धर्म लाभ ते परे तत्व वद । कर पुंजिका कारि धरौ पद ।।

अंवर खंड सकल मुख बांधे । मलिन वसन उर हरि अवराधे ।।

हर्षि कृपानिधि विरचे उ नामा । आदि रूप ऋषि यती निरामा ।।

उ पाध्याय आचार जे राचा । भये प्रसिद्ध नाम युत पाचा ।।

दोहा 4

लोक सुखद कारण रचो माया मय निरमाय ।

प्रेम सहित अरिहन जपौ जपत चले शिरनाय ।।

प्रवसि नगर रिषि माया कारी । वहुरि ग्राम ते वन पगु धारी ।।

जगत मोहिनी मायन माया । मिलहि ते शिष्य होंय लखि दाया ।।

जे देखैं ते होय परायण । करैं वेगि सो मत धारायण ।।

हरि प्रेरित नारद तह आये । दनुज गेह हुय शिष्य सिधाये ।।

उठि असुराधिप चरण पखारे । अरध देय आसन वैठारे ।।

शीय नाय पूंछी कुशलाता । नारद कही कुशल बिख्याता ।।

यती धर्म एक येहि वन मांही । लखे बहुत अस दूसर नांही ।।

हमहूं तिनकै लीन्हेसि दीक्झा । तुम गुरु करहु होय जो ई च्छा ।।

दोहा - 5

दानव नारद वचन सुनि देखन जपन समाज ।

शिवदयाल सो चलसि मग कह अब पूरण काज ।।

नारद मुनि दीझालय जिनकी । शिक्षा सुभग लेव हम तिनकी ।।

यह कह दनुज नाथ गयो तंहवा । मुनिवर सहित जती वन जंहवा ।।

देखि ताप भा मोहित माया । कीन्ह प्रणाम वचन निरमाया ।।

दीक्षा देहु हंमय अमलाशय । धर्म सहित उर तेज प्रकाशय ।।

दनुज गिरा सुनि कह ऋषि ज्ञानी । राजन सफल जो जाचत वानी ।।

देउ वचन मम गिरा न टारौ । मृखा न करौ वचन यह हारौ ।।

दनुज महा मोहित वस माया । दये वचन ऋषि तजौ न दाया ।।

ऋषिसत्तम मुख अम्वर खोले । अरिहन मंत्र कान लगि बोले ।।

दोहा - 6

दनुजाधिप शिषि होत ही सकल असुर नर नारि ।

शिवदयाल सवन दीक्षा लई त्रिपुर निवासी झारि ।।



।।।इति श्री शिव चरित्र महत्मे एकादशोध्याय ।।।

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