।।।अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीय पाद एकादशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
अस विचारि जगदीश विरेजा । पुरुष एक निरमेउ निज तेजा ।।
मय मायामय विदित सुरूपा । दानव धर्म विघन अनरूपा ।।
मुंडी मलिन वसन छिष पात्रा । कर मार्जनीकारि पद यात्रा ।।
कर अंवर धरि निज मुख झांपी । हरि सनमुख करजोरि कलापी ।।
करि विनती कह करौ प्रकाशन । हमकौ नाथ कहा अनुशासन ।।
तव बोले प्रभु कृपानिधाना । सुनहु कि जिहि कारण निरमाना ।।
काज हमार करौ मम अंशा । पूजनीय निसि दिवस असंसा ।।
मायन माया मय पढ़ि विद्या । कर्म विवादक वेद कि निंदा ।।
दोहा - 1
विरचि ग्रन्थ सोरह सहस अरिहन मंत्र प्रधान ।
दै हरि पारष नाम धरि पुनि कह सुनौ सुजान ।।
सोरह सहस ग्रंथ तुम धारौ । हम समर्थि दयेसि यह कारौ ।।
विविध भांति माया निरमानौ । वस्य अवस्य करी शुभ जानौ ।।
वाद विरोध रोध सब ठाई । इष्ट अनिष्ट दिखाय सुनाई ।।
उपासना कलपना अनेका । चित्र विचित्र विषद अविवेका ।।
यह प्रकार हरि ताहि बुझावा । मय मायामय शास्त्र पढ़ावा ।।
षोडस सहस शास्त्र उपदेशा । नेम नाथ पारष निरदेशा ।।
मोहनीय तुम सवहि रिझावौ । धर्म जपन मत दैत्य पढ़ावौ ।।
जपन धर्म जव होय प्रकाशा अपर धर्म श्रुति मारग नाशा ।।
दोह- 2
सब जीवन पर दया धरि अपर धर्म करि नाश ।
जग्य योग तरपन क्रिया जप तप नेम निराश ।।
तीनौ असुर विनासन हेता । जाय पढ़ाय दनुज चित चेता ।।
त्रिपुर नास करि धर्म प्रकाशौ । वहुरि मरुस्थल देश निवासौ ।।
द्वापर सूद्र जग्य तप करिहैं । ते हम जैन वौध हुय हरिहैं ।।
तव होवै अति बृद्धि तुम्हारी । शिष्य ते शिष्य प्रशिष्य अधिकारी ।।
कलिगत जपन अधिक विस्तारा । तव श्रीरंग मोर अवतारा ।।
जदपि जगत श्रुति सेतु नसैहौ । हमरी कृपा मुक्ति गति पैहौ ।।
मम अनुशासन यह आचरिहौ । अति धनवंत अंत भव तरिहौ ।।
सुनि सो मुंडी ह्रदय अनन्दे । चलत समय श्रीपति पद वंदे ।।
दोहा - 3
शिष्य चार मुंडी करे हरि आग्या अनुसार ।
तिनहि मुड़ाय पड़ाय निज शास्त्र सहित विस्तार ।।
गुरु संगति सोभित जुग चेला । प्रभुहि प्रणाम कीन तिन मेला ।।
आशिष दै हरि कह तुम पांचा । जस गुरु कोमल सिषि तस रांचा ।।
शिष्यन सहित सुमुंडित मुंडा । कल्पित करहु धर्म पाखन्डा ।।
पात्र सहित अंवर कर धारण । मृदु अल्पक भाषण हित कारण ।।
धर्म लाभ ते परे तत्व वद । कर पुंजिका कारि धरौ पद ।।
अंवर खंड सकल मुख बांधे । मलिन वसन उर हरि अवराधे ।।
हर्षि कृपानिधि विरचे उ नामा । आदि रूप ऋषि यती निरामा ।।
उ पाध्याय आचार जे राचा । भये प्रसिद्ध नाम युत पाचा ।।
दोहा 4
लोक सुखद कारण रचो माया मय निरमाय ।
प्रेम सहित अरिहन जपौ जपत चले शिरनाय ।।
प्रवसि नगर रिषि माया कारी । वहुरि ग्राम ते वन पगु धारी ।।
जगत मोहिनी मायन माया । मिलहि ते शिष्य होंय लखि दाया ।।
जे देखैं ते होय परायण । करैं वेगि सो मत धारायण ।।
हरि प्रेरित नारद तह आये । दनुज गेह हुय शिष्य सिधाये ।।
उठि असुराधिप चरण पखारे । अरध देय आसन वैठारे ।।
शीय नाय पूंछी कुशलाता । नारद कही कुशल बिख्याता ।।
यती धर्म एक येहि वन मांही । लखे बहुत अस दूसर नांही ।।
हमहूं तिनकै लीन्हेसि दीक्झा । तुम गुरु करहु होय जो ई च्छा ।।
दोहा - 5
दानव नारद वचन सुनि देखन जपन समाज ।
शिवदयाल सो चलसि मग कह अब पूरण काज ।।
नारद मुनि दीझालय जिनकी । शिक्षा सुभग लेव हम तिनकी ।।
यह कह दनुज नाथ गयो तंहवा । मुनिवर सहित जती वन जंहवा ।।
देखि ताप भा मोहित माया । कीन्ह प्रणाम वचन निरमाया ।।
दीक्षा देहु हंमय अमलाशय । धर्म सहित उर तेज प्रकाशय ।।
दनुज गिरा सुनि कह ऋषि ज्ञानी । राजन सफल जो जाचत वानी ।।
देउ वचन मम गिरा न टारौ । मृखा न करौ वचन यह हारौ ।।
दनुज महा मोहित वस माया । दये वचन ऋषि तजौ न दाया ।।
ऋषिसत्तम मुख अम्वर खोले । अरिहन मंत्र कान लगि बोले ।।
दोहा - 6
दनुजाधिप शिषि होत ही सकल असुर नर नारि ।
शिवदयाल सवन दीक्षा लई त्रिपुर निवासी झारि ।।
।।।इति श्री शिव चरित्र महत्मे एकादशोध्याय ।।।
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