।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद सप्तमोअध्याय ।।।
।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
मरछा गत सम्हार उर आई । क्रोध तरंग अंग अधिकाई ।।
विकसे कंज नयन अरुणारे । कंटक जो कटु वचन उचारे ।।
मैना कहति सुनौ मुनि ज्ञानी । प्रथम कही तुम्हहू छलसानी ।।
गिरिजै कंत मिले शिव शंकर । हेम तुंग तप करे निरंतर ।।
सो सुनि उमा कठिन तप साधे । करे नेम जप शिव अबराधे ।।
दये तासु फल विधि भयदायक । शिव पाये पति प्रेत सहायक ।।
कौन उपाय करब येहि राती । यह दुख निवरै मुनि केहि भांती ।।
जरय मातु अरु सुता दुलारी । जद अजोग वर लहै कुमारी ।।
दोहा -1
खल जड़ मूरख छोट बड़ वृत्ति हीन तन छीन ।
सुता न ये तिन बरयगुण रूप शील कुल हीन ।।
तजि रोगिल मद अंध अदीपा । ना अति दूर न अधिक समीपा ।।
वर सुंदर पुर देश बड़ाई । शीलवंत पर सभा सुहाई ।।
गुण से सुख संपति निरलोभा । विदित दशौ दिशि कुल की शोभा ।।
नारद कपट नारि उर दोषा । अन्तर पर घर गमन सरोखा ।।
पग तरजनी से अगूठा हीना । थूल केश वड़ मान मलीना ।।
जे विधवा गुण गान कलेशा । योग दरिद्र सकल तन केशा ।।
वड़े श्रवन रद नाद गंभीरा । वहु भच्छिन सुभाव निरधीरा ।।
कटुवादिन यह मिति आदेशा । सो त्रिय दायक सवहि कलेशा ।।
दोहा -3
रिषिय तने हमकौ छलो कपट चातुरी जोय ।
कांच संग्रही कनक तजि धीरज का विधि होय ।।
तजि सूरज खद्धोत उदोपी । चंदन छांड़ि कदमा थोपी ।।
कन भक्छे तजि तंदुल पायस । तजे हंस गहि पिंजर वायस ।।
सुरसरि तजि कूपोदक पाना । तजि धृत अंड तैल भ्रग साना ।।
सिंह विहाय के सेव श्रंगाला । तजि पीतांवर लै मृगछाला ।।
तजि विभूति ग्रह मख रुचि संगा । मर्दन चिता भसम सब अंगा ।।
उमा तपी सुर तजि शिव हेता । घिग वे रिषि धिग वुद्धि विचेता ।।
धिग कुलक्रिया दाच्छि तपतुच्छा । धिग तनधन ग्रहधिग ममकुच्छा ।।
हिमगिरि ओर न मुख दरशावौ । सप्त रिषिन का वदन दिखावौ ।।
दोहा- 4
अब कह नारद सांच तुम सबके पिता महेश ।
तिनहि बिबाहौं का कुंअरि यह अयोग उपदेश ।।
कह नारद सुनु देवि अजीता । वचन कहे तुम सो विपरीता ।।
जगत पिता शिव सब सामरथा । वाल न विरध न जुवान न विरथा ।।
तव मैना कह सुनु मुनि गारी । शिवहि बिबाहन कही कुमारी ।।
रहि न वांझ मैं तन कनजाता । गरभ न गिरा न भा अपघाता ।।
वाध सिंह वन गये न खाई । असुरण का सन कौ न विहाई ।।
डसी न सरपन हती न काला । यह सुख देखन हेत हिमाला ।।
डसी न सरपन हती न काला । यह सुख देख न हेतहि माला ।।
गिरि ते गिरौ करौ तन छारा । कै सिर छेदि उभैअ सिधारा ।।
मै कह करव सुता कह जाई । कहि हा दैव गिरेसि मुरछाई ।।
दोहा - 5
मैना वचन विषाद सुनि खेद सकल संसार ।
सुनत नारि नर नगर के आये हिमगिरि द्वार ।।
तब सो सुनि विरंचि तंह आये । आंगन मंगल पितर पुजाये ।।
सात ऋषभ तिलवाय सुलाये । सात सुभागिन उमहि चढ़ाये ।।
हरसित मंगल गावहि नारी । देय मधुर सुर सुन्दर गारी ।।
सुनि गिरिनाथ मोद मन धाये । पूजि पहुनई करि लोटाये ।।
पलटि रिषय मैना पह जाई । करत हिमालय सहस वड़ाई ।।
नारद मैनहि वोधि उठायउ । कहि मृदुवानि रिषिन समुझायेउ ।।
शिव पर तोहि वहुत अज्ञाना । रूप जथावत नहि पहिचाना ।।
कह मैना अब रिषि फिर आये । करि दुर्वोध ह्रदय मद छाये।।
दोहा - 6
देखत महा विकार विघि कह मैना सुन वैन ।
देवन कारज तोर हित सुख देखौ भरि नैन ।।
शिव करता पालन संहरता । किमि सुख लहौ न जानौ धरता ।।
सुनि विधि गिरा कही पुनि मैना । बृथा कहो किमि कारज वैना ।।
जदपि महा सुन्दर शिव रूपा । तदपि न लायक उमा अनूपा ।।
तिहि अवसर आये सब देवा । इन्द्रादिकन कहेउ निज भेवा ।।
शिव सर्वेश सकल जग धारक । हम सब शिव के आज्ञाकारक ।।
देवन अखिल सुखद शिव शंकर । सकल सुफल तब सुता निरंतर ।।
हम सब धनि पावन गिरि धरणी । धनि हिमगिरि धनि तोरि सुकरणी ।।
धनि तब सुता सवै अध परसनि । उठि के करव द्वार वर परछनि ।।
दोहा -7
मैना देवन वचन सुनि कह सवहि कर मेष ।
देव न उमा कुरूप शिव जले अमंगल रूप ।।
सप्त रिषिन तब कहा वुझाई । जगदम्विका गवरि तुम जाई ।।
उमा विवाहन जौ शिव आये । तुम प्रताप हम दरशन पाये ।।
हठ तजिके अरचौ शशि भाला । करहु विशाद न मंगल काला ।।
उठि अरचहु शिव शाला आये । परम लाभ शिव दर्शन पाये ।।
दानपात्र शिव हिमगिरि दाता । देउ संग मिलि सुजस बराता ।।
अहो भाग शिव आयेसि द्वारे । करौ सगुन शुभ मंगल भारे ।।
मैना वचन सकोप उचारे । आब अशिव अब द्वार हमारे ।।
नारद वचन तजौ मरजादा । शिवय न देव गवरि करिवादा ।।
छंद
गिरि कही विकल विलोकि वनिता प्रिया सोक जु परिहौ ।।
को कहन ते आये पमरि यह समुझि मन धीरज धरौ ।।
फूल फल दल विरचि आरति सगुण शिव अरचन करौ ।।
शिवदयाल उमा बिबाह मंगल सकल भामिन अनुसरौ ।।
दोहा- 8
हम जानत सरवज्ञ शिव सवै अनुग्रह देत ।
तजि विशाद शंकर भजौ उमा बिबाहन हेत ।।
सुनि मैना कह बचन विचारी । नाथ गवरि मुहि प्राण पिआरी ।।
उमा करे तप शिव अवराधी । गिरते गिरौ कंठ मंह बांधी ।।
मंगल ग्रहण कि पावक जारौं । बरौं न गवरि गरल दै मारौं ।।
सुजस नसाय अजस मैं लीहौं । जीवत सुता न शिव कौ दीनौ ।।
जदि तुम देव छुटै पति नेहा । तौ विष खाय तजब निज देहा ।।
सो सुनि पुर नर नारि सिधारे । आय बरात भीर भय द्वारे ।।
सुनत हिमंचल आतुर धाये । कर आरति फल फूल सुहाये ।।
मैना कर जब सुमन छुआये । विप्र बधुन शिव शीश चढ़ाये ।।
दोहा - 9
तब लग आये द्वार शिव हिमगिरि चरण प्रछालि ।
अरचि तिलक मणि भेट दै वेद रीति कुल चालि ।।
प्रथम उमा जब फूल चढ़ाये । शीश नाय मन विनय सुनाये ।।
कह कि धरौ हर भेष अनूपा । मातु विषाद छुटय लखि रूपा ।।
नेग निवेरि पवेरि तमासे । पलटि महेश गये जनवासे ।।
यहां गवरि जननी पहि जाई । करति प्रवोध मात चितलाई ।।
मात सुनौ मम हेत सुहावन । रूप किशोर सदा शिव पावन ।।
मातु न करिअ विधि विपरीती । तजि निज धर्म सूद्र कुल नीती ।।
जथा करौ तुम अस आचारा । हंसहि नारि नर सब संसारा ।।
मैना शिव सन करिसि विरोधा । तस मै कुमति अकारण क्रोधा।।
दोहा - 10
तब मैना कह कोप करि हमहि सुता संताप ।
हंसहि कहा सब नारि नर लेय मोर यह साप ।।
सुनिके द्वार बरात विभेवा । सुता बिबाह मातु उर खेदा ।।
अवते करै सकल यह रीती । विदित विषाद न होय प्रतीती ।।
वहुरि उमा कह प्रेम समेता । आय मातु सुन वचन बिचेता ।।
भाग समान मिलै भर तारा । करम लेख को मेटन हारा ।।
यथा करम अंकुर फल पाये । हरष शोक मन भेद रमाये ।।
आयु करम विधा धन मरणा । पूरब जन्म बस पांच अकरणा ।।
लिखे ललाट शंभु पति पाये । अब जननी का खेद बढ़ाये ।।
आय परम योगी शिव शंकर । सरवे श्वर शम्भु पिनाक धर ।।
दोहा- 11
वालक विरध न युवा शिव सदा अनंत विशाल ।
जन्म न मृत्यु न जरा तन ना महेश वश काल ।।
अछै अनादि अजित विकराला । शिव सब मैं समान सब काला ।।
यहि अवसर आये सव देवा । किंकर भाव करन शिव सेवा ।।
कौन अधिक शिव से जग मांही । जीवन सफल करौ कस नाही ।।
शिव कह दान देव हरषाई । करौ भवन पावन मन लाई ।।
तजि विषाद आनन्द उर आनौ । करौ बिबाह सज्जन शिव मानौ ।।
यदि न करौ वर और न कोई । यस अरु अजस काल वस होई ।।
सिंह भाग किमि हरय श्रंगाला । मन वच कर्म वसे शशि भाला ।।
हर वर हित हम गायेसि गाता । जेहि मन भरै करसि तै माता ।।
दोहा - 12
सुनत वचन मैना मरषि गवरि कलेबर धारि ।
दन्त घात खरपर धरषि तलहति मुष्टि प्रहारि ।।
मारत लखि मुनि दया बिचारी । उमहि दूर लय गयसि निवारी ।।
तिहि विधि से मातहि कर दूरी । परुष वचन मैना मुख पूरी ।।
मम ग्रह उपजी उमा अभागी । जनमत मरी न पावक लागी ।।
कै विष देउ कि पावक जारौ । करहु उपाय अनेगन मारौ ।।
डारहु कूप कि सिर अस भेदी । छेपहु उदधि आयुधन छेदी ।।
सुता संघारि तजहुं निज देहा । यह वर लागि करे अस नेहा ।।
मात न पिता कुटुम कुल भ्राता । नहि चातुर नाही जय गाता ।।
ना धन धाम न सुन्दर वाहन । वस्त्र न भूषन संग न पाहन ।।
दोहा - 13
नहि ज्ञान नहि पवित्र तन ना गुण गण लव लेश ।
येहि तन गिरिजै कस वरै महा अघोर महेश ।।
तेज प्रकाश न सुन्दर भेषा । शिव तर नहि एकउ गुण देखा ।।
तब लग हरि मैना पहि आये । मधुर मनोहर वैन सुनाये ।।
तुम पितरण की मानस कन्या । गिरि पतनी गुण रूप लवन्या ।।
बाह्मण कुल उत्तिम पद पाये । शील सुभाय जगत यश छाये ।।
तब अवतार लोक हित कैसे । पर्म धर्म विद् सुर गुरु जैसे ।।
अपर कहा लग करहु बड़ाई । तुम सम को पुनीत अधिकाई ।।
जिनकर सुता उमा जगदम्बा । जासु अंश जग सब अवलम्बा ।।
अगम अनादि अनन्त भवानी । शक्ति स्वरूप तेज गुण खानी ।।
दोहा -14
मैना तब तन्या गवरि तासु तनय त्रैलोक ।
नाम रुप बहु जन्म बहु हरण हेत भै शोक ।।
अचल तासु कारण मरजादा । हरण मोहमद क्रोध विषादा ।।
मैना सुनहु सुभग इतिहासा । होय प्रबोध मान भ्रम नाशा ।।
सहित विरोध कहौ कछु खेदा । छमहु देवि यदि जानहु भेदा ।।
हम अरु देव मुनीश विधाता । का तुम्हरिउ समान नहि ज्ञाता ।।
ते सब शिव गुण तत्व न जाने । निर्गुण ब्रह्म सगुण शिव माने ।।
इच्छा तासु प्रकृति निरमाना । निज इच्छा भव पुरुष प्रधाना ।।
प्रकृति से उमा रमा ब्रह्मानी । सो तव सुता गवरि गुण खानी ।।
पुरुष रूप सो शिव सर्वेशा । तासु त्रिगुण विधि विष्णु महेशा ।।
दोहा- 15
रज गुण ब्रह्मा सतो हम तामस गुरू महेश ।
शिवदयाल विरचै भरै हरी करैं उपदेश ।।
सिव से विदित वेद संसारा । थावर जंगम सुर निरधारा ।।
होत हुय गये होय जो आगे । सो सब विश्व होत शिव लागे ।।
प्रथमै विधि हम साहस वर्षा । भर्मत पारन लहे न हर्षा ।।
सत्य ज्ञान मय व्यापक व्यापी । गये समीप अछै लग कांपी ।।
अजर अमर सुर मुनि मैं आने । नित सेवै अरु आयसु मानै ।।
हम अरु ब्रह्म रुद्र मुनि देवा । सूर्य चन्द्र ग्रह अधिपति जेवा ।।
सरिता सर तरु गिरि वन वागा । जीव चराचर धरणि विभागा ।।
ओषधि सकल देव सब जाती । अखिल भुवन योनी बहु भांती ।।
दोहा-16
लव निमेष ते कल्प लगि विधि ते लगि परमानु ।
शंम्भु शक्ति मय सकल जग निहचै भायिनि जानु ।।
शिव अरूप निज रूप अनूपा । यथा विटप फल फूल विरूपा ।।
एक मूल तरु पर्न अनेका । तथा सकल जग शंकर एका ।।
आदि मध्य शिव अन्त अनन्तर । शिवमय सर्व सर्वमय शंकर ।।
यथा सूत्र मय सूची कारण । तथा कार्ज कारण शिव धारण ।।
शिव सो हम हमसो शिव जानौ । अपनौ कौ शिवही कर मानौ ।।
निसि दिन गुण तिथि वार रासि मत । योग करण गुण लगन मुहूरत ।।
संवत अयन पच्छ रितु मासा । युग मनु अन्तर कल्प बिनाशा ।।
यह सब काल रूप अवतंसा । सब शिवमय सब मैं शिव अंशा ।।
दोहा - 17क
कारज कारण परस्पर दोनौ एकहि भाव ।
कारण शिव कारज सकल एकै एक सुहाव ।।
17ख
शिवदयाल अज्ञान मत कारण कारज भेद ।
सकल विश्व शिवमय लखै ज्ञानी करैं न खेद ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद सप्तमोअध्याय ।।।
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