।।। श्री गणेशाय नमः ।।।
।।। श्री गिरिजापति चरण कमलेभ्यो नमः ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।।। अथ श्री स्थाणोर्चरित्रम् द्वतीय पाद ।।।
।। अथ श्री प्रथमोध्याय ।।
पुनि बोले रिषि सहस अठासी । सूत सुभग शिव कथा प्रकाशी ।।
बहुरि कहौ कस भा तेहि अवन्तर । सूत बिहसि बोले शौणक पर ।।
शिव धीरज धरि ह्रदय विचारा । किहि कारण मन विचल हमारा ।।
शिव दस दिशा बिलोकत महरषी । वाम काम धनु सर आकरषी ।।
तब शिव तीसर नैन उघारा । क्षण मै मदन भयो जरि छारा ।।
तब आतुर कह बिनै सुरेशा । छमहु सवन के दोष महेशा ।।
काम दहन सुनि देव दुखारी । सो शुभ ठौर तजेसि त्रिपुरारी ।।
शिवहि पूजि गिरजा गृह आई । सखिन सहित मात उर लाई ।।
दो0-1
इहा असुर सुर मूनि भये सकल सचेत ।
जह तह विलषै सोचवस बहु तक भये अचेत ।।
रति पति दहन देखि दुख भारी । विलषि विकल तन दशा विशारी ।।
मुरछित परी मृतक अनुमाना । कान्त मरण दुःख छणक न जाना ।।
भय सम्हार उर अति संतापा । पतिगति लषि रति करति विलापा ।।
वह बिलषाति बदन कुम्हिलाने । सुन्दर तन उरोज मुरझाने ।।
रति बिलाप खग मृग चुप कैसे । भये मूक मुनि गण वन जैसे ।।
भरमत खग मृग नाचत मोरा । मधुप गुंजरत चकित चकोरा ।।
जनु तरू चलत हरत सब धरणी । पवन बंदि गति जतिन वरणी ।।
चकित भये खग मृग वनवासी । पलटि चले षेचर तजि राशी ।।
दोहा -2
रति रोदति विलसति बदित कहा करौ कित जाउ ।
पतिकौ गति मति सुरति करि सोंचत दैविक दाउ ।।
कर पद पटकत केश उपारति । सिर धुनि धुनि पति सोक सम्वारति ।।
कान्त कान्त हा कान्त पुकारी । अहो प्राण पति रति बलिहारी ।।
शोक सिन्धु डुवति को राषा । त्रिय अरधंग वेद अस भाषा ।।
रह अब शेष मोर तन आधा । अब पति प्रघटौ हारक बाधा ।।
पुनि कह रति देवन दुख देषी । सुनौ सकल मम बात विशेषी ।।
कोउ न काहुन दुख सुख दाता । फल सब लहै सुकृत संजाता ।।
बृथा करहु सुर सोंच विचारा । भोगे फल करमन अनुसारा ।।
तन खेती मन भयेसि किसाना । करम बीज वय लुनै प्रधाना ।।
दोहा -3
काहुय दोष न देव मुनि परा ल वधि फल भोग ।
लोक सुजस पर हेत लगि सुख दुख निज संयोग ।।
निमिस समुझाय सवै तिहि काला । आप भई विलषाय बिहाला ।।
तासु विलाप विलोकिअ षेवां । शिव पै गये सहित सब देवा ।।
करि वहु विनय कहत बृंदारक । हम सब शरण शम्भु हितकारक ।।
शम्भु न करो काम कछु स्वारथ । जो कछु करै देव परमारथ ।।
खलत तारक पीड़ित सब लोका । शिव सो आतुर करब अशोका ।।
रात विलाप करि भई विहाला । दुखित अकेलि अनाथिनि वाला ।।
कै शिव करहु तासु निरधारा । नहि देवन कर करब संघारा ।।
देखि देव दुख औ रति रोदन । करहु कृपाल शोक अपनोदन ।।
दोहा-4
नमस्कार करि देव सब विनय कहत सिर नाय ।
शिवदयाल शिव दयानिधि सब पर होय सहाय ।।
तब प्रशीद हुय बोले शंकर । सुनौ देव मुनि गिरा अनन्तर ।।
अबते प्रघटै काम अ नंगा । मृषा न मोर बचन नहि भंगा ।।
सप्तम बैबश्वत मनु गंता । अष्टा विसये द्वापर अंता ।।
कालनेमि जनमैं तन कंशा । षाठस कला कृष्ण अवतंशा ।।
मधुपुर जनि गोकुलै पधारिहैं । बाल विनोद चरित सब करिहैं ।।
मथुरा जायकै कंश पछरिहै । अपर अनेक असुर संधरिहै ।।
पुनि माधव द्वारिका निवासी । भीषम सुता वरै सुखरासी ।।
रुकमनि अंगज कृष्ण किशोरा । प्रदुमनि नाम पृघट पति तोरा ।।
दोहा 5
जनम तहीं संवरासुर नारद को मत पाय ।
हरहि सूति कागार घुसि डारहि सागर जाय ।।
सफरी तहां असन करि जैहैं । मीन मारि धीमर धर लैहैं ।।
लै मछली जब उदर विदारी । तब रति पैहौ पति झंखमारी ।।
तब लगि तोर शम्भु पुर वासा । जब लग मिलै मदन अनआसा ।।
जाउ देव सब निज निज गेहा । अब तुम्हरि छूटय सन्देहा ।।
शम्भु गिरा सुनि मुनि सुर सादर । करि विश्वास मानि उर आदर ।।
सानद सकल गये निज धामा । रति गमनो तब संकर ग्रामा ।।
शिव आदेश मदन अनुरागी । रति पति आस निहारण लागी ।।
देव दुखित सोचहि दिन राती । तारक नाश होय केहि भांती ।।
दोहा- 6
पारवती शिव अरचि के जब आंयीं निज गेह ।
मिली मातु अति प्रेम से फेरि धरी जनु देह ।।
शिवै सुमिर गिरिजा मन भारी । निज रूपहि निदरैं धिक्कारी ।।
बैठत उठत चलत अरु सोवत । विरह विषाद रुप शिव जोहत ।।
मन मुसक्याति सुमिर शिव रूपा । भरमित वृथा मनुज तमकूपा ।।
सखिन माह्य धिर वैठत नांही । धृग मम रूप कहे मन मांही ।।
पुनि सकुचानि सहेलिन देखी । पिवति रूप शिव सुमिरि विशेषी ।।
ह्रदय दुखिन शिव रूप सम्हारी । छण सुख लहै न शैल कुमारी ।।
सोच विवस शिव शिव अनुसारा । विरह जलधि करिहै शिव पारा ।।
अनमन आनन लेति उसासा । होति निरास बहुरि शिव आसा ।।
दोहा -7
ह्वै उदास मन आस तजि भरति वहोरि उसास ।
करि शिव आस निराश मन वैठत उठत उदास ।।
तिहि अवसर नारद तह आये । मैना गिरि गिरिजा शिर नाये ।।
अर्धासन दय चरण पषारे । बढ़े भाग मुनिवर पगु धारे ।।
पुनि गिरि सुता चरण पैठारी । कहो करम गति हांथ निहारी ।।
कह नारद तब सुता सुभागी । पूजहि शिव अतिसै अनुरागी ।।
सकल सुलक्छणि गुण आभरणा । गवरि उमा अंविका अपरणा ।।
नाम अनेक सकल गुण श्रेनी । असुर संघारिणि जग सुख देनी ।।
शील सुभाय भुवन उपकारिणि । अजर अमर वर जग दाधारिणि ।।
होय अचल अहि वात सुकरमा । नेम प्रेम करि पतिब्रत धरमा ।।
छंद – त्रभंगी
नारद मुनि ज्ञानी विहंसि सुबानी गुण बषानि गिरि नारी ।।
तब सुता भवानी सब गुण खानी सुनौ जु औगुण दुय चारी ।।
जननी पितु हीना संसय छीना उदासीन गिरि वन चारी ।।
पति अगुण अमाना वास मसाना शिवदयाल सो अवि चारी ।।
दोहा - 8
नगिन अमंगल भेष नित योगी जटिल अकाम ।
अस पति गिरिजा कौ मिलै जासु न सुख धन धाम ।।
जे सब गुण दिखत शिव पाहीं । यदि वर मिलै तौ संसय नाही ।।
तब ग्रह जनमी सती भवानी । जगदम्विका सकल गुण खानी ।।
तेहिते करै परम तप जाई । यथा मिलै वर शिव सुख दाई ।।
दुर्लभ शिव आराधन मांनौ । हरि विरंचि शंकर सम जानौ ।।
विना कठिन तप मिलै न एकौ । जदपि सु करौ उपाय अनेकौ ।।
तिनमौं हरगुण सीघ्र प्रशादा । तप साधक शिव समन विशादा ।।
अस कह गिरिजै आशिष दीन्हा । मुनिवर चले वजावत वीना ।।
ब्रह्म सुर भूषित गुण गायन । भगवत प्रिय सुमिरत नारायन ।।
दोहा - 9
शिव गुण गावत ऋषि गमने विधि के धाम ।
शिवदयाल गावत सुनत शिव पुरवै सब काम ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे प्रथमोअध्याय ।।।
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