।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद अष्टमोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
मैना सुनौ तत्व शिव एका । वोध भेद तौ वस्तु अनेका ।।
सारद शेष न जानहि भेदा । तत्व वस्तु शिव सम्मत वेदा ।।
भृम वश जथा खंभ जन रूपा । लखि पहिचानत खंभ अनूपा ।।
जेवरि भरम सरप शंकाशा । देखि सीप मैं रजत अभाशा ।।
प्रघटत ज्ञान जून कर जूना । सीप कि सीप छुटे भ्रम दूना ।।
जिमि नटनाटक भेष वनाई । छल छूटत एक रूप दिखाई ।।
चामी कर भूषण वहु भांती । पावक परसि होत एक जाती ।।
एक अंग अंवर विधि नाना । तिमि शिव के वहु रूप निधाना ।।
दोहा - 1
धन सुत दारागार मम बन्धन माया फंद ।
काम क्रोध मोह गत शिव पायेसि आनन्द ।।
मै और मोर तोर यह बन्धन । अहंकार गत शिव फिरि दुंदन ।।
यथा विराग राग दुय भांती । तथा प्रकृति संजोग सुजाती ।।
प्रकृति से परे ब्रह्म शिव सोई । सगुण रूप सबके हित होई ।।
चन्द्र मुकुट कैलास निवासी । जासु कृपा लगि सम गति काशी ।।
यहि प्रशंशि मम डोलत भाला । गिरी करण मणि गई पताला ।।
मणि कर्णिका विदित जग मांही । जेहि मजत कछु दुरलभ नाही ।।
हम सब सो शिव तत्व न जाने । तुम शिव से औगुण अनुमाने ।।
तजि अज्ञान सगुण शिव जानी । भामिनि अरपहु भवहि भवानी ।।
दोहा - 2
सजि आरति मंगल करण बर परछनि करि लेउ ।
भुवन चारि दस जस रहय उमा शंकरहि देउ ।।
मैना तुम शिव रूप न जाना । शिव कोमल कृपाल भगवाना ।।
मैना उर प्रवोध तव आबा । उठि ग्रह आंगन चौक पुराबा ।।
सकल मंगला चार कराये । पितर न्यूति ग्रह देव पुजाये ।।
समय सु जानि हिमंचल आये । सामिग्री वहू शिव पह लाये ।।
सफरि पीन पाठीन पुरानी । कामर कलश कहारन आनी ।।
हिमगिरि वर बरात क्रम धारे । पद पखारि आसन वैठारे ।।
करि मधुरस गंगोदक पाना । पौन प्रजहरु सकल समाना ।।
वहु व्यंजन पकवान मिठाई । सवहि सप्रेम परोसि जिमाई ।।
सोरठा - 3क
पाहुन प्रजा समेत वर वरात कौ छकित करि ।
नाम पौनछक देत शिवदयाल तब से विदित ।।
3-ख
पावन कुल गुरु पाहुने महिमा ते महिमान ।
वर के रात वरात सम परिजन प्रजा सुजान ।।
वर के रच्छ्क विसद वराती । सेवक सकल प्रजा वहु भांती ।।
हिमगिरि पाहुन प्रजा छकाये । तवहि पौन छक नाम कहाये ।।
गंगाजल सब कह अचवाये । विनै सुनाय वहुरि धर आये ।।
पठयसि शिव सौभाग चढ़ायो । वाजन वजन सुआगन आयो ।।
दहि गल युग दध्यंग लै आये । आतुर वरण वरिउना लाये ।।
चादरि सुभग चन्द्र विरमायेउ । भवन बशिष्ठ प्रतिष्टि पठायेउ ।।
तब सखि उमै उवटि अन्हवायेउ । सुभग सुमन श्रंगार करायेउ ।।
माथ मयूर सिखावलि सोहे । माग मालती मन्जुल गोहे ।।
दोहा - 4
सिर कपोल गुंदि वंदिआ सोभित हर श्रंगार ।
भाल तिलक सूरजमुखी मौरसिरी उर हार ।।
करण फूल करणारुण दंपा । कमल करणिका शोभित कुंपा ।।
करण केतकी माधवि माला । चन्द्रहार चांदनी विशाला ।।
सुभग नाग केशरि नक वे सरि । संधि सेवती को सिंगार करि ।।
वेली गुद वाजू बन्द बन्धन । चंपक चूड़ी कंज कर कंकन ।।
भुज मंदार हाथ हथ कंदर । कुमुद कन्ठ पाउरि पग सुन्दर ।।
मुरबा नूपुर नवल निवारी । चरण चमेली विरचि विचारी ।।
येहि विधि करि श्रंगार नवेली । चारु चौक लय गई सहेली ।।
तह विरंचि कुल रीति कराई । अरचन भेद विधान वताई ।।
छंद
प्रथम कलश गणेश वरुणौ गवरि शिव अरचाय के ।।
अरचि गवरि कुमारि कर सिंदूर मांग लगाय के ।।
रच्छ वन्धन चुनरि सिरधरि धूषन पट पहिराय के ।।
शिवदयाल खरजूर अंजलि गोद रतन भराय के ।।
दोहा- 5क
सनक सनंदन सनातन जेठे सनत कुमार ।
माया निरमित चूनरी सिरधरि चतुरंग सार ।।
सोरठा -5ख
त्रै गुण खौरि लगाय दुयज चन्द्र सिर तिलक दय ।
उमा हाथ पहिराय नवग्रह निरमित नवग्रही ।।
दुज वाजु बन्द वायस दाना । रूद्र अंस राजत निर्माना ।।
शेष रचित सुन्दर मणि माला । विधि गिरजै पहिराय विशाला ।।
मणु कलिपत दय चौदह चूरी । सात रिसिन सिर धरी खजूरी ।।
शंभु शक्ति दुय दल समुझाये । कंचन मणि चरू धौल मिलाये ।।
वागर थालो विधि कर बाई । पारबती परमेस मनाई ।।
विरचि कुवेर कणक पुटमोदा । सघन फूल फल धरि भरि गोदा ।।
पावक रिचत बसन पहिराये । फिरि शिव गण जनवासे आये ।।
जाबक दै सिर चूनरि साधे । युग पूरनि पट कंकन वाँधे ।।
दोहा-6
गिरिजा उठि मंदिर गई, करै वेद कुल रीति ।।
निमे देव देखत उमै, विधि से यह पर तीति ।।
कन्या के तन त्रय वसत चन्द्र अनल गंधर्व ।।
रजकी कर सिंदूर तद, माँग भरावत सर्व ।।
चंद्र मुखी त्रिय नाम कलापा । चूमत पुरूष देत शशि सापा ।।
वसि गंधर्व पयोधर सर्बा । मरदै मनुज सपै गंधरवा ।।
पावक वसत नारि भग अंगा । दहै देह पति करत प्रशंगा ।।
तद रजकी सिंदूर लगावै । तजैं देव तब त्रियजन भावे ।।
तदपि करै अति संग सुहावै । तौ ततकाल जुगल फल पावै ।।
शंभु हुहा बहु निरत प्रकासे । होय विविधि मंगल जनबासे ।।
तिहि औसर तह नारद आये । कुशल पूछि शिव निकट बुलाये ।।
सुनि मुनि के उर आनन्द छाये । शिवै प्रवोध करण मन लाये ।।
दो-7
हरण हेत मैना मन खेदा । दुलहा वनौ विवाह विभेदा ।।
तुनहु नाथ गौरव गुण गाता । धरहु रूप सुन्दर सुर त्राता ।।
कोमल गौर किशोर मनोहर । भक्त वत्स कर वर गंगाधर ।।
जगमोहन अति सुंदर रूपा । वनौ विशाल विशेष अनुपा ।।
गिरिजा मन विनयै तिहि काला । सुभग स्वरूप धरौ शशि माला ।।
शिव नारद की सुनि मृद बानी । अरू गिरजा मन की गति जानी ।।
का बरसा कृषि सालि सुखाने । काल बिहाय कहा पछिताने ।।
अस बिचारि हर भेष बनाये । सहस चन्द्र रवि रूप दिखाये ।।
दोहा-8
तब मैना पै जाय के, नारद कह समुझाय ।।
अब देखौ शिव रूप गुण, कोटि काम अधिकाय ।।
जटा मुकटफड़ि मौर विशाला । नयन तीन दूसर शशि भाला ।।
गौर फटिक मुख पावक रोचक । गोल कपोल मदन मद मोचन ।।
चिवुक चारु सुन्दर वर नासा । रदन पांति तारका प्रकाशा ।।
विम्वाधर वर कुन्डल कानन । पूरण चन्द्र प्रकाशत आनन ।
मुख प्रशन्न त्रिवली उर सोहा । नाभि गम्भीर निरखि मन मोहा ।।
रुद्र अचछि उर श्यामल माला । नाग विभूषन केहरि छाला ।।
कर त्रिशूल वर अंग विभूती । नील कण्ठ शुभ ठमरू संजूती ।।
बाहन बृषभ सुगन्ध लगाये । शिव सुन्दर वर भेष वनाये ।।
दोहा - 10
वर वरात साजत सकल शिवदयाल निज भाग ।
शंकर उमा विवाह सुनि मन उमगत अनुराग ।।
जानि सुअवसर समय सुहाये । शिवय हिमंचल वोलि पठाये ।।
सब सुर मुनि शिव संग सिधाये । सुन्दर सुभग रूप धरि आये ।।
वाहन विसद अनेक प्रकारा । सकल रूप धरि चले अपारा ।।
शिव गण लये अनेक पताका । वहु विधि करैं देव सब साका ।।
गज तुरंग रथ पादप नाना । वाहन अखिल अनेक विमाना ।।
ढोल दुंदभी भेरि उपंगा । उफरा वीणा बेणु म्रदंगा ।।
शहनाई बांसुरी सुर साला । झांझ पखावज औ करताला ।।
धेनुमुखा सहरगि सैतारा । अनहद घन्ट शंख ध्वनि धारा ।।
सोरठा- 11क
करहि अप्सरा गान विविध भांति बाजा बजहिं ।
विरदा वली विमान देव सुमन वरषा करहि ।।
11ख
होत अनेक विधान कौतुक हिमगिरि द्वार मय ।
बरनै कवि को आन सारद शेष न कहि सकै ।।
दोहा 11ग
सागर उद बेलास रिस शिव की देख वरात ।
अगम जानि मैना मगन हर्ष न ह्रदय समात ।।
उमग तरंग अंग मै बाढ़ी । चित्र लिखे सम रहि गई ठाड़ी ।।
पुनि मैना मृदु वचन उचारे । सुता जनम धनि भाग हमारे ।।
धन्य उमा धनि परवत राजा । कहि लजान लखि शम्भु समाजा ।।
अगिले सोच सकुचि मन मांही । लगि कालिमा कहत कछु नाही ।।
तब लगि शिव आये गिरि द्वारे । मयना मंगल थार सम्हारे ।।
विधि हरि हरै पूजि गुण जाने । आरति कर सुर मुनि सनमाने ।।
सो सुधि पाय नगर नर नारी । आये सब गृह काज विसारी ।।
बहुत नारि सुत सुता समेता । चली दरस हित शम्भु निकेता ।।
दोहा -13
वाल विरध सुर मुनि मनुज चारि वरण सब जाति ।
शिव दरसन आये सकल धन धन सो शिव राति ।।
जै शिव कहत देव मुनि वृन्दा । रहो भवन भरपूरि अनन्दा ।।
फागुन मास असित शशिवारा । शिव चौदस निसीत अवतारा ।।
शिव को रिषिन जन्म दिन जाना । मंगल कारज वरजित माना ।।
पुनि रवि संग चन्द्र छय देखा । वर्जित करे विवाह विशेषा ।।
देव दिवस षट मास प्रमाना । उत्तरायण सूरज सम जाना ।।
तितनिय देव निशा परकाशा । दक्छिणायण सूरज षट मासा ।।
वीते दिवस देव निसि आई । कर्क सिंह रवि रासि विहाई ।।
पितरण पच्छ पितर दिन मानी । पूजि विसर्जि पितर निसि जानी ।।
दोहा - 14
आश्विन महिना पच्छ सित शिव सेवा मनलाय ।
परिवा ते आरम्भ करि आठ दिवस निसि पाय ।।
सूर्य चन्द्र शिव संग वराती । भयो मास षट दिन सोई राती ।।
गवरि विवाह द्वार शिव आये । देखन पुर नर नारि सिधाये ।।
अपर स्वामि सेवा तजि धाई । पति संगति अनेक तजि आई ।।
कोउ विपरीत विभूषन चीरा । बालक तजे पिअत अध छीरा ।।
वहुतक सखी संग लै धाई । कोउ रसना वन्धन युत आई ।।
कोउ आई तजि गृह परिपाका । कोउ अंजन कर गहे सलाका ।।
कर आदर्श लये वहु धाई । कोउ गो दोहन तजि विलगाई ।।
चली सकल तजि कारज नाना । शिव लखि मोही जग पति जाना ।।
सोरठा- 15क
तन की दशा विसारि जढ़वत भई अचेत सब ।
भाग सराहे नारि शिवहि देख आनन्द मन
दोहा 15 ख
मौन रही सब एक छण पुनि बोली हरषाय ।
धनि गिरिजा वड़ भागिनी शिव देखे जिहि पाय ।।
कहैं परस्पर सब सुख माही । पुन्य पुन्ज हम सम कोउ नाही ।।
यथा नाम शिव तस गुण रूपा । गुण सरूप सम नाम अनूपा ।।
सुने श्रवण तस आंखिन देखे । सफल जन्म हम आजु अलेखे ।।
बानि अचच्छु नयन विन जीहा । शिव दरसन को कहे समीहा ।।
हिमगिरि पुरवासी सब आये । भाव जोग शिव दरसन पाये ।।
यथा योग करि विनय प्रणामा । कहै सकल परिपूरन कामा ।।
धनि गिरिजा शंकर वर पाये । अजर अमर सब भांति सुहाये ।।
तिहि औसर जिन शंभु न देखे । भानु उदय जनु उलूकलेखे ।।
दोहा - 16
गिरिजा दारुण तप करे पाये अचल सुहाग ।
अहो भाग हम सवन के शिव देखे जिहि भाग ।।
विनि सुभाग पति मिलै न सुन्दर । पापा ते लाभ कुटिल खल किंकर ।।
भाग विना सुभ मिलै न दुलही । दोष ते होत नारि खल कलही ।।
विना भागसे मिलै न अस वर । यथा रमै हरि गिरिजै शंकर ।।
अस कहि सब दल दुर्वा लाये । शिवै अरचि फल फूल चढ़ाये ।।
धन्य धन्य शिव जयति पकारैं । चन्दन अछत फूल सिर छारैं ।।
सात कुम्भ घट कलश धराये । झालर वन्दन वारि बन्धाये ।।
कुंकुम दूर्व अछत कुश धारे । अरचो शिवय हिमंचल द्वारे ।।
अन्तर पमर शम्भु तब आये । मैना कंचन थार सजाये ।।
दोहा -17 क
मणि माणिक आरति रची सुरभी धृत आघाय ।
वरती विशद कपूर की चौमुख दीप जगाय ।।
17ख
मैना भूषन वसन धरि करि सोरह श्रंगार ।
सखिन संग लै शंभु पह गै वर परछन द्वार ।।
देवन गरल कंठ शिव लेखे । कहै कि काहुन अवहि न देखे ।।
लखि मैना विरचै भय मानी । नीलकंठ लग चादर तानी ।।
तवसे अन्तर पट न दिखाबै । कमल रोचना सकल कराबै ।।
देखि रूप सुन्दर मद नारी । तव मैना आरती उतारी ।।
करि रोचना हास करि हरषी । गहि बाधिवर कर आकरषी ।।
फणि फुफुकार शंभु कर व्याला । भाजि गिरी गिरिनारि विहाला ।।
लोटि हसै सुर मुनि लगि थोभा । हंसय नारि मैना मन छोभा ।।
दसन जीह नारद विधि चांपी । सुर मुनि मौन उमा तन कांपी ।।
दोहा-18
प्रथम हिमंचल वेदिका, राखी रूचिर बनाय ।।
हरित बामस मणडप रचे, पान उसीरण छाय ।।
बमदन वारि कदलि युग खम्भा । माँझ सविधि वेदिका अरंभा ।।
सीप जनित यदि तिर्जग होती । तिनसे चतुर कहै गजमोती ।।
झुंपक झालरि शोभन दायक । बर्तुल बेसरि कुंडल भायक ।।
गज मुक्ता गज केशर होई । धात्री फल सम दुर्लभ सोई ।।
गजसिर मुक्ता ब्रणव है नीरा । सिहहि सुलभ सुगंध समीरा ।।
मान सरोवर मुक्त मगाये । तंदुल सम सितलंव सुहाये ।।
तिन गज मोतिन चौक पुराये । तब मंडप समीप शिव आये ।।
गजमुक्ता तंदुल अनुभावै । तेहि जब तंदुल चौक पुरावै ।।
दोहा-19
तब हिमिगिरि मैना सहित. करि मज्जन अस्नान ।।
आये मंडप निकट सद, ग्रथं जोरि कर गान ।।
हिमगिरि शिवै अरचि बैठारे । पुनि विष्टर दै चरण पखारे ।।
तद विरंचि बरणे मुनि चारी । रिगु, यजु, साम, अथर्वणधारी ।।
चारिउ श्रुति शरीर धरि आये । वेद ऋचा निज निज मुख गाये ।।
शिव सनमुख बैठे गिरिभूपा । मयना दाहिन अंग अनुपा ।।
अरध देय पुनि विषटर छाये । शिव कौ हिमि आचमन कराये ।।
तब हिमि गिरि मधुपर्क मगायेउ । वर कर दै तिन मंथि मिलायेउ ।।
अनामिका अंगूठा शिवजोरी । दधि अर्पण चंदमै करोरो ।।
उभै पच्छ अघ दोष नसावन । मिले होत मधु पर्क सुपावन ।।
दोहा-20
त्रिपल धेनु दधि सर्करा, दुय पल धृत पल एक ।।
शिवदयाल मधुपर्क तद, पावन मंत्र विवेक ।।
शिव सो दयेसि हिमाचल हाथा । लै मधुपर्क नाय पदमाथा ।।
सो शिव कौ मधुपर्क दिमाये । सादर दुय दुकूल पहिरकये ।।
अंग न्यास तब शिवहि कराये । वाक प्राण दृग बल उपजाये ।।
गौर मंत्र महि खड़ग दयोरी । पाप ताप सब त्रिन सम तोरी ।।
युगुल बसन ते उमै धराये । चंद्र मुखिन मृदु मंगल दाये ।।
तद विरंचि सब कृत्य कराई । गवरि बुलाय चौक पर आई ।।
उमा संमजन शिवदिसि देखी । पहिरायेसि जयमाल विशेषी ।।
सखिन सैन करि उमा हंकारि । शिव सनमुख बुलाय बैठारी ।।
दोहा-21
प्रथम ऋषीसन साखि उचारी । शिव हरि विधि शिव सुत भ्रमकारी ।।
उमा पक्ष पुनि मुनि धुनि धारी । मरिचिय कश्यप हेम कुमारी ।।
तद भूधर दक्षिण दिसि आये । उत्तर मुख मैंना दिसि दायें ।।
शिव गिरजा के चरण पखारे । भाल तिलक सिरमाल सुधारे ।।
पीत पाणि पुनि गवरि कराई । पंच रतन फलकर धरवाई ।।
हिमि गिरी गहि कुस कन्या पानी । शिवहि समर्पी उमा भवानी ।।
मैना हिमगिर भवन सिधाये । नारिन मंगलचार सुनाये ।।
गिरजा शिव दाहिन दिसि आई । ग्रथ वांधि विधि कृत्य कराई ।।
दोहा - 22
पंचाहुत करि उमा शिव पूजे गवरि गणेश ।
आदि देव आविचल सदा हारक हानि कलेश ।।
सो सुनि जनि कोउ करै अंदेशा । अगम अनादि अनन्त गणेशा ।।
संजुषि अनल अवाहन कारी । विधि वेश्वानल पघट प्रजारी ।।
पथमै करि परिकरमा एका । त्रिविध होम सुर साखि अनेका ।।
प्रति लाजाहुति गवरि अगारे । त्रय परिकरमा उमा शिव कारे ।।
गिरिजा कर कंकण मणि शीशा । थकित चरण लखि छाह गिरीशा ।।
वंदी करण वंदना लागे । चकित देव आये शिव आगे ।।
येहि विधि भये परिक्रमा चारी । पचई भामरि शिव पगु धारी ।।
उमा भई तिहि समत पिछारे । मंडप सहित परिक्रमा कारे ।।
दोहा - 23
पुनि आसन पै उमा शिव वैठि यथावत आय ।
उमा मुदित आनन्द शिव हर्ष न ह्रदय समाय ।।
शिव कालहु का काल महेशा । निस दिन डरपहि काल कलेशा ।।
अंतर पट शिव उमै कराये । डरपि काल छिपि आहुत पाये ।।
सात पुरी पद पुरण वसाये । उमा चरण पुनि सिला छुआये ।।
पद अंगूठा लखि विधि के भर्मा । भये मदन वस विसरे धर्मा ।।
पतन काम पद चापि अधारा । मथत कनिक ते भये कुमारा ।।
वटुक असंख्या ब्रह्म सूत्र वर । कच्छादुद दश सहस जटाधर ।।
विधि कौ नमस्कार करि हर्षे । तिनहि देखि विधि पै शिव मर्षे ।।
शिवहि सकोप देखि मुनि देवा । सहित विरंचि करै सब सेवा ।।
दोहा -24
विधि सुरसरि शंकरै मिली हरष सो आय ।
शिवदयाले शिव उमा भै राखी जटन छिपाय ।।
ते वटुका सूरज व्रत धारी । वेद पार गंता तप कारी ।।
रथ आगे पाछे वहु धावै । रवि कौ अस्तुति विनय सुनावै ।।
वहुरि विरंचि करे असनाना । पठत वेद शिव गिरा प्रमाना ।।
विधि विवाह विधि शेष करायेउ । रवि ध्रुव अवधि करी दर्शायेउ ।।
दाहिनि गवरि बाम त्रिपुरारी । कह शंकर सुनु शैल कुमारी ।।
भयेउ विवाह वाम दिसि आवौ । पावन तप श्रम शोक नसावौ ।।
कहेसि उमा शिव लखि सांकूला । नाथ आज विसरे सब सूला ।।
अब लग रही सु तात कुमारी । भइ अब शिव सेवकी तिहारी ।।
दोहा-25
जुग पावन मधुपर्क ते, मख पूरण विधि कारि ।
चले न पति के बामत्रिय, तब लगि पिता कुमारि ।।
दासी जानि दया नित कीजै । सात वचन शिव मांगे दीजै ।।
प्रथम बचन दाहिन बैठारी । करहु दान मख शषि मुरारी ।।
दुसरे व्रत चंद्रायान शीजै । शशि रवि शाखि संग मिलि कीजै ।।
तिसरे विधि हरि हर हर दै साखी । दीनहु पन पालव समराषी ।।
चतुर्थ साखि वेद दय चारी । मम कर धन संचय विवहारी ।।
पचये साखि लोक पति राचा । हमहि मत्रि पालौ पशु पाचा ।।
दय षट शास्त्र साखि मद नारी । असन वसन दीजौ रितूकारी ।।
सतये सात रिषिन करि साखी । छमौ दोष सखि अनमधि माखी ।।
दोहा-26
वचन दये शिव उमा उठि, शिव तद कहा सुभाउ ।।
पाच वचन अव हमहि दय, वाम अंग तव जाउ ।।
सात वचन करि अंगीकारा । उमै कहा शिव धर्म विचारा ।।
पर भरता पर गेह विहाई । तरणो विपिन अकेलि न जाई ।।
पुनि दुपहर निशीथ सो एका । वहिर न जाय विहाय विवेका ।।
उमा कहति पदि लगै जु आगी । प्राण वचावहि अकि तन त्यागी ।।
शिव कह जाय सु प्राण बचजाई । विपति काल मर जाद न जाई ।।
दूसरि चारि भाति मद त्यागी । सो शुभ लच्छणि पर्म सुभागी ।।
धन गज मद मदिरा तरूणाई । सनमुख षमय सखिन संग जाई ।।
तीसर वचन त्रियै तुखदाई । बिनु बोले पितु गेह न जाई ।।
दोहा-27
यदि बिन बोले पिता ग्रह, जाय प्रेमहित मानि ।।
रहै न आदर मान सुख, जस कीरति कुल कानि ।।
जदपि स्वतंत्र नारि अनुभाववै । हठ करि जाय सती गति पावै ।।
होय भ्रात सुत पति जगमाहीं । पट भूषण लय जाय कि नाहीं ।।
शिव कह लोभ लागि यदि जावै । तद न मान अपमान कहावै ।।
निज पति मूरख पंडित आना । त्रिय पति कीरति करै बखाना ।।
उमा कहा शिव शुभ कि खुटाई । व्यास गदी सब करत बड़ाई ।।
शिव कह व्यास वेद मम अंशा । धरम कथा सुनि करे प्रशंशा ।।
भरतु कुरूप कुचैल मलीना । पर पति भूषन बसन प्रवीना ।।
नारि धर्म पर प्रति अघ अंशा । दुलहा कहय करहि प्रशंशा ।।
दोहा-28
दुलहा कहे ते दोष अति, वर बोले सम जार ।।
समुझि नारि साधन करै, सदा धर्म उपचार ।।
त्रिय कौ पति व्रत धर्म सहाई । पति सेवा नित सहस बड़ाई ।।
तब गिरजा कह सुनौ महेशा । बहुरि कहौ यह शुभ उपदेशा ।।
तब बरकत यदि व्याहन आवै । पुर नर नारि पुकारत धावै ।।
सखि सुन्दर वर व्याहन आयो । अपर परसपर कहै बनायो ।।
कोउ कहै दुलहा अति नीका । सो शिव उचित कि बानि विलीका ।।
शिव कह उमा ग्राम बर आवै । दुलहा कहि के सब त्रिय धावै ।।
पति व्रत लखै न कहै न आवै । मध्यम निजसम योग जनावै ।।
सुत सम लघु समान सो भ्राता । दीरघ पितु समान गुण गाता ।।
दोहा-29
माथे मुकुट विवाह को, तब लौ अंश हमार ।।
दोष न दुलहा वर कहे, नारि लोक विवहार ।।
सवैय्याः-
यह उत्तिम नारि के चित्त वसय । मम कांत विहाय न दूसर कोई ।।
तस मध्यम देखि विचार करय । सुत बन्धु पिता सम दोष न होई ।।
कुलकानि कौ मानि बचै सो निकिष्ट । अधमा विनि औसर भै वसजोई ।।
शिव दयाल कहै शशिभाल हिमाल पै । सेवहि गौरि पती व्रत सोई ।।
दोहा -30
शम्भु गिरा सुनि प्रेम बस हर्ष न ह्रदय समाय ।
उमा सुअवसर पाय के वैठि वाम पिसि जाय ।।
उमा सुमंगल करि शिव पूजै । शिवहु मांग सेंदुर भरि कूजे ।।
विनि शिव उमा विवाह न होई । मूरति जुगल कि सिंदुरि सोई ।।
करि अभिषेक तिलक विधि हरषे । पठि धुनि वेद सुमन सुर सुर वरषे ।।
मुनि समूह बृन्दारक बृन्दा । आसिष देय सहित आनन्दा ।।
विनवै सकल जाति सुर सेई । नगर नारि नर आसिष देई ।।
वोले सुर मुनि विष्नु विधाता । जगत पिता शिव गिरिजा माता ।।
त्रिय उमंग मन मंगल गाये । नेगिन नेग निछावरि पाये ।।
शिव गिरिजा गिरि गेह सिधाये । मैना निज कुल देव पुजाये ।।
दोहा- 31
मैना मंगल रूप लखि दधि शर्करा मगाय ।
शिव गिरि जै लह कौर दय जेवत गारी गाय ।।
दीपक वरती शिव सुमिलाई । वहुरि विहसि मैना वलि जाई ।।
धेनु धरणि धन मणि गण चीरा । गज तुरंग रथ हाटक हीरा ।।
दय वहु दान विप्रवर तोषे । गायक जाचक सब परिपोषे ।।
तब शिव फिरि जनवासे आये । वोलि अपसरण नृत्य कराये ।।
वहुरि हिमंचल वोलि पठाये । सह बरात जिम नारहि आये ।।
शिव विरंचि हरि सब मुनि देवा । चरण धोय हिमिगिरि करि सेवा ।।
भोजन कह आंगन बैठारे । तीरथ परसै पाक सम्हारे ।।
बहु रस देय सरोवर झारी । सब सरिता मिलि गावहि गारी ।।
छंद
गारी मधुर सुर वधू गावै व्यंग बचन सुनावही ।।
होत कौतुक विविध मन्डप सुमन सुर वरषावही ।।
छप्पन भोग छतीस व्यंजन छरस अभृत जिमावही ।।
शिवधाल हिमिगिरि गेह धनि जह भोग देव लगावही ।।
येहि भांति नित पकवान मेवा सुरन प्रति सरसावही ।।
पांच अमृत परसि हिमगिरि सवहि मांथ नवावहीं ।।
अलक नन्दा उदक निरमल सवहि लै अचवावहीं ।।
शिवदयाल शिव जिमनार गावहि सुनै शिव पद पावहीं ।।
चौथे दिवस चतुर्थी करमा । शिव आये मखशाल सुधरमा ।।
विधि समधा फल फूल मंगाये । शिव समूह कुश बेदि बनाये ।।
गिरिजै सखिन मंजि अन्हवाई । करि सिंगार शुभ चौकय लाई ।।
धृत पायस विधि होम कराये । शेष पाक सह भोज सधाये ।।
सादर गिरिजा परसि जिमाये । पंच ग्रास शिव भोग लगाये ।।
पुनि जुठार शिव उमै गहाये । प्रेम प्रसाद गवरि हंसि खाये ।।
शिव गिरिजा कर कंकण खोले । कठिन सूत्र पट गांठि कठोले ।।
शिव कर नाग लपेटी उरझै । कंकण पारवती पै नहि सुरझै ।।
दोहा - 32 क
जूप कर्म करि उमा शिव फल विरंचि भरि गोद ।
शिव उठि जनवासे गये गृह गई उमा समोद ।।
32 ख
विदा चहै सकुचाय सब प्रेम प्रीत सरसाय ।
हिमिगिरि आये शंभु प्रति हर्ष न ह्रदय समाय ।।
उभै पच्छ सब नित अकुताहीं । मांगहि विदा धीर उर नाहीं ।।
हिमिगिरि विनै कहा कर जोरी । सफल करौ शिव सदन वहोरी ।।
अर्ध देय कर शिव सिर गंगा । का भूषण मणि बलय भुजंगा ।।
कहा तिलक शशि शीश प्रकाशा । देव सु कह आसन कैलाशा ।।
अनुचर धनद भेंट का दीजै । कवन भांति परिचरचा कीजै ।।
कहा देउ कैलास निवासी । उमा दई करि राखौ दासी ।।
देवन हिमिगिरि देखि अधीना । कहा कि गिरि तुम सर्वसु दीना ।।
शिव गिरिजा पद पूजि सुकाजा । आयु ते भयसि गिरिन के राजा ।।
दोहा - 33
जग कीरत कुल की विरधि कन्या रतन जगाद ।
तीन रतन शिव कौ मिले हिमिगिरि तोर प्रसाद ।।
तव कर जोरि कहा गिरि राया । विनती सुनहु देव समुदाया ।।
सेवक समुझि दया अव कीजै । होव प्रसीद अचल वर दीजै ।।
हरि महेश तीरथ सब देवा । अंसन इहनि बसौ निरभेवा ।।
निवसे तह सब तीरथ सुरगन । तपोभूमि हिमिगिरि बदरीवन ।।
केशव अंश बदरि नारायण । आश्रम देखि सकल तारायण ।।
भये केदार नाथ शिव अंशा । तेहि परसे पावन जन वंशा ।।
उत्तर काशिक तीर्थ विभागा । विष्णु प्राग लगि देव प्रयागा ।।
सहित विरंचि देव मुनि बृंदा । बसे हिमालय सहित अनंदा ।।
दोहा - 34
विधि सुरेश लगि देव मुनि सर सरिता समुदाय ।
शिवदयाल तीरथ सकल हिमिगिरि निवसे आय ।।
शंभु गये तब हिमिगिरि गेहा । मैना गहि पद सहित सनेहा ।।
शिव से कहि तन दशा विसारी । पारवती मोहि अधिक पिआरी ।।
छमा योग चित दोष न धरिऔ । दासी जानि दया नित करिऔ ।।
यह कहि मंडप गूंथि खुलाई । मृदु पंचामृत दयेसि जिमाई ।।
शंकर सास ससुर परितोषे । चले विदा हुई शिव सुख लेखे ।।
सारद मैना वोलि कुमारी । ममता सहित गोद वैठारी ।।
नारि धर्म सुचि लगी सिखावन । पतिव्रत कर्म अछै सो पावन ।।
तासु शतांश सती कर धर्मा । तहि दशांश उत्तम कुल कर्मा ।।
दोहा -35
पतिव्रत धर्म अगाध गुण सुखदायक सब काल ।
विनु श्रम भव सागर तरै पति सेवत शिवदयाल ।।
उमा करेउ नित पति पद पूजा । तिहि समान फल त्रियहि न दूजा ।।
गवरि भई तुम परम सुभागी । कहि अंचल मुख पोछन लागी ।।
भरे सनेह नयन युग नीरा । करै विलाप सु धरै न धीरा ।।
जननि सप्रेम सनेह निहारी । कहै परसपर सब पुर नारी ।।
किहि कारण विरची विधि वामा । पराधीन पर वस विसरामा ।।
अस कहि मात सुता पुर नारी । पुलकि प्रेम भरि नैनन वारी ।।
सगुण समै रहै पलकन अंका । यथा कृपन धन पारस रंका ।।
दोहा - 36
आशिष दै सब सुर बधू सादर शीश नवाय ।
नारि बृन्द सब नीति कहि गिरिजै धर्म सिखाय ।।
बहु विधि कहि मरजादा सेतू । विदा करे गिरिजा बृष केतू ।।
चले बृषभ चढ़ि शंकर आछे । गवरि लजाति चली पद पाछे ।।
उमा पयादेहि लखि हिमराजा । वाहन सिंह दये करि साजा ।।
चली गवरि चढ़ि शंकर साथा । सकल सुरन तव नाये माथा ।।
करि विनती सुर वारहि वारा । चहत तारकासुर निरधारा ।।
शिव आयसु लै देव समूहा । चले भवन संग सेवक जूहा ।।
करत प्रशंशा सब मन मांही । शंम्भु उमा पटतरि कोउ नांही ।।
खेद सकल देवन मन माहीं । तारक वध विनवै शिव पाहीं ।।
दोहा - 37
गये गन्ध मादन लग सकल पठावन हेत ।
शिव गमने कैलाश गिरि लै गण गौरि समेत ।।
छंद
तेहि काल हिमंचल हेरि रहे । यदि मोह विछोह न जात सहे ।।
सिगरे मिलि वाजन शव्द करैं । अन मंगल जो न सुनाय परै ।।
दय आशिष शंभु प्रणाम किये । करि नेह सवहि पलटाय दिये ।।
दय दायज शैल प्रनाम करे । जग जन्म कृतारथ मानि फिरे ।।
सत आशिष देय चले धर कौ । फिर हेरि रहे गिरिजा हर कौ ।।
गमने गृह शैल समाज लये । शिव पारवती कैलाश गये ।।
हर गौरि विवाह जो गावै सुनै । दुख दोष नसै अधओध धुनै ।।
यह रोगी सुनै सब रोग नसैं । मन योगिन के जगदीश वसैं ।।
दोहा -38
सुमिरै जो करि कामना गवरि महेश विवाह ।
शिवदयाल पावै सवै नित नव अंग उछाह ।।
छंद
यदि रंक सुनै धन धाम लहै । बंध्या सुत लाभ जो नेम गहै ।।
व्रत बन्धु विवाह कहै कि सुने । कछु होय न खेद विनोद घने ।।
मख मंगल आदि सुनै कि कहै । सब काज मनोरथ पूर लहै ।।
रण युद्ध विवाद मैं जीत सरै । शिव दयाल कहै शिव सत्य करै ।।
गिरि दावानल यदि जाय परै । घेरत वन बाध पढ़े उवरै ।।
तरणी परि भौर जहाज भ्रमै । भ्रम सोच मिटै जु कथा चिरमै।।
विपदा दुख संकट शोक परै । सुनि गाय कथा सवसे निवरै ।।
करि नेम कथा पर चित्त धरै । नर मुक्ति लहै भव सिन्धु तरै ।।
दोहा - 39
गिरिजा शंभु विवाह गुण सुनै कहै धरि ध्यान ।।
शिवदयाल सब कामना पुरवै शंभु सुजान ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद अष्टमोअध्याय ।।।
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