Sunday, 17 April 2011

उन्नीसबां अध्याय - त्रिपुरासुर शिव संग्राम

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।

।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद नवमोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

श्रवण सुनो शिव गौरि बिबाहा । सवै ऋषिन मन परम उछाहा ।।

अहो सूत परहित अनुरागी । शिव चरित्र गायक वड़ भागी ।।

कस विवहार भये तिहि वारा । तारक वधन कहौ निरधारा ।।

तब कह सूत सुनौ मुनि बृंदा । शंभु कथा अस हत यम फंदा ।।

यह चरित्र सुनि शंशय नाशा । सो तारक वध करत प्रकाशा ।।

शिव गिरिजा निवसत कैलाशा । नित नव मंगल मोद सुपाशा ।।

शोभा तासु कवन वुध वरणै । कोटि रमा रति लजै अपरणै ।।

शंकर चिदानंद भगवाना । उमा समेत रमै रंग नाना ।।

दोहा -1

यह विधि वीते काल वहु होत न शिव संतानि ।

शिव दयाल तारक त्रसै लोक प्रजा विकलानि ।।

तारक त्रसित देव अकुलाई । भये सकल भयवस इक ठाई ।।

सकल विचार करैं मन मांही । किहि कारण भा शिव सुत नाही ।।

वहु दिन भये सहित जगदम्बा । कवन हेत शिव करत बिलम्बा ।।

यह गुनि देव गये शिव पाहीं । खेद खिन्न मन धीरज नाहीं ।।

यजुर्वेद विधि विनय सु गावै । शिव अस्तुति करि घोर सुनावै ।।

देव परस्पर करै विचारा । शिव समीप सुर को पगु धारा ।।

मन मुस्काय देव समुदाई । कहा अनल पर मंत्र वुझाई ।।

मख मै प्रथम भाग तुम पावौ । परमारथ लगि शिव पह जावौ ।।

दोहा - 2

परमारथ लगि सत पुरुष तन धन सर्वस देत ।

लोक सुजस भय विगत सब भक्ति मुक्ति निज हेत ।।

पावक धरि कपोत सम रूपा । परम विशाल अखण्ड अनूपा ।।

प्रथम गये गिरि शिखर विहंगा । पुनि प्रविसे जंह शिव रस रंगा ।।

कपट कपोत अनल संदीपा । रंति भवन गये शम्भु समीपा ।।

उमा रमणि कह ताहि निहारी । को तुम कपट कंबु तन धारी ।।

करु संग्रह मम शुक्र सम्हारी । अस कहि वीज मेलि मद नारी ।।

अगिन चुंच पुट सो गहि लीन्हा । उड़े गमन देवन पहि कीन्हा ।।

महावीर्य सहि सके न धारी । दुख पीड़ित गंगा मैं डारी ।।

शिव अनंग सहि सकी न गंगा । करि वाहरि जल मेलि तरंगा ।।

दोहा -3

शिव मनोज को सहि सकै महावीर्य वहु भार ।

शिवदयाल दानव दहन अछै अखण्ड अपार ।।

छिपत सुलभ राम शर माही । प्रघटो वालक तन तिहि पाही ।।

कोमल सुलभ दाम सम सुन्दर । राजत रजत प्रकाश फटिकवर ।।

ताही समय करन अस्नाना । राज सुता गई षट परमाना ।।

मंजि नहाय चली जब घरकौ । गंगा तटि लखि वालक सरकौ ।।

कहै सकल तब राजकुमारी । मम पय पिऔ पयोधर धारी ।।

पुलकि परस्पर धरै न धीरा । कै कि प्रथम पिऔ मम छीरा ।।

देखि प्रीत षट भये वदन वर । यक संग षट पिये पयोधर ।।

तब से षट मुख नाम कहाये । कृतिका तनय कार्तिक भाये ।।

दोहा -4

षटमातुर यह विधि विषद स्वामी कार्तिक नाम ।

शिव दयाल गुहि नाम पुनि सिखि वाहन सुख धाम ।।

कार्तिक सित छठि औ शशिवारा । स्वामि कार्तिक जन्म अधारा ।।

प्रथम नाम भयो गिरिजा नन्दन । अपर कुमार नाम जग वन्दन ।।

पुनि अस कंद अगिनिभू नामा । गंग पुत्र शर जन्म निरामा ।।

पारवती सुत परम शक्तिधर । शंभु तनय निर्झरण तापहर ।।

नाम अनेक जाय नहि जाने । हर्षिराज कन्यन सुत माने ।।

तब नारद कैलाश सिधाये । सकल चरित शंकरै सुनाये ।।

सुनि शंकर सब देव बुलाये । नारद प्रेरित सुर गण आये ।।

शिव सेनापति करि अस कन्दा । दल चतुरंग संग मुनि बृन्दा ।।

दोहा - 5

भूत प्रेत गण शिव लये आन देव सब जाति ।

आगे करि अस कन्द कह सेना पति वहुभांति ।।

श्रोनित पुरै चले समुदाई । देव सैन वाजन धुनि छाई ।।

ठोल मृदंग शंख सहनाई । महुअरि भेरि नफीरि सुहाई ।।

डफरि झांझ झनर सिंहा सू वाजे । सोभित सूर समर गलगाजे ।।

नाना वाहन सुर सव जाती । नाना आयुध कर अरि धाती ।।

इन्द्र कुवेर वरुण यम काला । अगिनि वायु लोकप दिगपाला ।।

सूर्यादिक ग्रह शिव गण संगा । शिव आसै भुजवल रण रंगा ।।

नन्दि भृंगि कीरति मणि ग्रीवा । वीरभद्र षड़मुख वल सीवा ।।

भैरव धुनि पूरित चंहुं ओरा । गरजत यथा प्रलय घनघोरा ।।

दोहा - 6

वजै दुंदुभी घोर धुनि ध्वज पताक फहराय ।

महा भयानक संग दल शोभा वरणि न जाय ।।

दल पति आगे चले षडानन । शक्ति लये कर कुक्कुट वाहन ।।

अपर देव गण प्रेत पिछारी । अगिनित आयुध जान सवारी ।।

श्रोनित पुर समीप सब आये । शंख सुरन गण श्रंग वजाये ।।

घेरि दशौ दिसि गुह वल माने । प्रलै काल जनु घन घहराने ।।

सो सुनि घोर दनुज दल धाये । मारु मारु धरु सवद सुनाये ।।

गजरथ अश्व ऊंट खर जाना । जे कामग मय रचित विमाना ।।

चढ़ि अनेक वाहन वहु भांती । सूर समूह असुर सब जाती ।।

गरज तरज भै घोर सुनावै । दानव सैन दसौ दिस धावै ।।

दोहा -7

दनु के सुत सब दानवा दिति के दैत्य अनेक ।

सुरसा के राच्छस सबै असुरै कपट विवेक ।।

बृका मेष अज महिष सवारी । गव गैडा मृग भालु गजारी ।।

शश वानर कुक्कुट कृक लाशा । गिरध कंक वक सेन सुभासा ।।

सरभ गीध लोमड़ी श्रंगाला । स्वान वराह बृषा सु विडाला ।।

पल्ली मकर नक्र झष ब्याला । ऊलूक सारस वरहि मराला ।।

चित्रक वांघ नकुल वल रासी । चक्क कोक नभ जल थल वासी ।।

चड़ि चड़ि जान सुरा सुर धावै । कोटिन अस्त्र शस्त्र गहि आवै ।।

हेम दण्ड कर सेवक साथा । कटि तुनीर सर सारंग हाथा ।।

समर सूर दानव समुदाई । कछुक नाम कहि देउ गिनाई ।।

छंद

नमचि शंवर वाणरय मुख विप्र चेती इल्बला ।।

कालि नाभि दुमुर्द्ध हेति प्रहेति शकुनी उतकला ।।

भूत संतायन अरिष्टक वज्र दंत विरोचना ।।

अस्व ग्रीव अरिष्टक नेमी कपिल धूमर लोचना ।। 1 ।।

मेघ दुंदुभि शंकुशिर मयचक्र द्दक मुर कालया ।।

पौलोम शुभ निशुंभ जृभ निवात कवचक आदया ।।

भिंडिपाल भुसुंडि परसि खुयष्टि पटि असि तोमरा ।।

गदा शक्ति निस्त्रि सपरिधि त्रिशूल चक्र सुमुद गरा ।। 2 ।।

दोहा - 8

अस्त्र शस्त्र वहु विधि लये लरै भिरै वहुभांति ।

वरणी से वरणी जुटैं देव दनुज सब जाति ।।

सिंह नाद करि अनी अरूझै । धूरि पूरि नभ दिशा न सूझै ।।

इंद बिरोचन वरुण सेहेती । कालनाभ यम मित्र प्रहेती ।।

वलि सुत सत जेठो वाणासुर । ते सूरज के संग समरजुर ।।

विसुकरमा से मय राहु से सोमा । संवर तुष्टा पवन पुलोमा ।।

भद्र कालि सन शंभु निशुंभा । अपराजित से नमुच अरंभा ।।

बृष पर्वी अश्विनी कुमारा । उत्कल वीरभद्र रण धारा ।।

भृगु इक्वल कुंभज वातापी । नन्दी समर भूत संतापी ।।

महिष विभावसु जंभ बृषाकपि । शुक्र बृहस्पति नारक शनिरिप ।।

दोहा -9

रण सविता सुर भानु सन चन्द्र केतु संग्राम ।

शिवदयाल जे सुरासुर समर जुरे जै काम ।।

कालनेमि युधिविश्वे देवा । कालकेय वसु आठ युधेवा ।।

मरुत निवात कवच रय चरषण । रुद्र क्रोध वस हरि दुय मरखण ।।

हय ग्रीव हय शिर संग्रामा । वज्रदन्त पावक जै कामा ।।

भ्रंगि सकुनि बृक शंकर जूझा । मेघ दुंदुभी भैरव वूझा ।।

समर स्वामि कार्तिक अरु तारक । सेनापती उभै बल धारक ।।

मुकुट क्रीट पुष्पक मणि चन्द्रक । मोरि मंडि शिखि कवच अखंडक ।।

शोभित शीश मुकुट मणि झलकै । कानन कुण्डल आनन अलकै ।।

दामर छत्र विजन धुज नाना । राजत वीर विराजत जाना ।।

दोहा - 10-

उछरि मुर्ग असकन्द कौ द्वै पद पंज प्रहार ।

नाक नैन लगि मुख श्रवण लै डारे वदन विदार ।।

मुगदर शूल सेल्ह गहि धावै । तोमर भाल कृपान चलावै ।।

सायर कर सारंग सर छूटै । वेधहि चर्म वर्म तन फूटै ।।

दंति दंति रथ सन रथ जूथा । तुरंग तुरंग पद प्यादेन गूथा ।।

गज अंवारिन सांगि चमकै । जनु मेघन दामिनी दमकै ।।

रथ चढ़ि धनु गहि वान चलावै । अहि कराल गिरि से जनु धावै ।।

अस्व वाह कर झेलै भाला । वीर विराजत भेष कराला ।।

पत्य पत्य प्रति खड्ग प्रहारै । कटहि शीश भुज लरहि न हारै ।।

वज्र शरीर शस्त्र वहु टूटैं । सूर समर चढ़ि करनी लूटैं ।।

सोरठा 11क

सर वरषहि संग्राम अस्त्र शस्त्र वहु विधि झरै ।

ते पावहि दिवि धाम समर मरण जे हठि लहै ।।

दोहा -11ख

कटहि शीश भुज ह्रदु कर पद उर कटि अधर धर ।

बहुत होय सत खण्ड पुनि कवंध उठि समर कर ।।

11 ग

रक्त नदी उमगी मही देव असुर दुइ पार ।

कूर्म चर्म कर मीन उर मकर केश सौवार ।।

अंतावरी गीधलै धावै । जनु वालक कर गुडी उड़ावै ।।

जंबुक मास खाइ कट कांही । जोगिन रुधिर पिये रन माही ।।

भैरव नचैहि योगिनी गावै । भूत प्रेत गण ताल वजावै ।।

उठै कवंध वीर रस पागी । रुणड प्रचण्ड लरहि अनुरागी ।।

बीरमाल सुर कन्या डारै । भिरे समर चड़ि सूर न हारै ।।

भाजैहि असुर देव दल दावहि । दलहि मलहि गुय परै गिरावैहि ।।

धावै एक-एक सन जूझै । गिरै मुकुट सिर पाग अरूझै ।।

शम्भु भुजा वल सुर लपिटाने । दैत्य दनुज तजि अनी पराने ।।

दोहा-12

भये विमन दानव सकल । भाजे तजि संग्रम ।।

मिलै न मारग दसौ दिशि । भूलि गये पुर धाम ।।

तात मात सुत स्वजन पुकारे । सुहद सनेही असुर निहारैं ।।

घायल परे अनेक बिचारै । समर मरै शिव लोक सिधारैं ।।

भजे सभय ते समर न आये । घेरि के तारक फेरि बुलाये ।।

असुरन रची वार बहु माया । देवन खन्डि समर निर्माया ।।

पुनि तारक निजमाया राची । बिन हरि हर सुर मानहि सांची ।।

वरषहि रज तृन पवन प्रचंडा । प्रलै मेघ धुनि बृष्टि अखन्डा ।।

अस्थि चर्म नख पल श्रग धारा । केश पांसु आयुध परिवारा ।।

चन्दु बात दश दिसि रब घोरा । पतन होय महि उपल कठोरा ।।

दोहा-13

दामिनि दमकै प्रवल गति, गरजै घोर कठोर ।।

शिव दयाल उमगो जलधि, रक्षक शम्भु किशोर ।।

विचलो सैन देव अकुलाने । समर विहाई त्रिसित विलगाने ।।

जहां जाय भजि देव समूहा । देखहि तहां निसाचर जूहा ।।

देवन विकल देखि शिवनन्दन । करे शक्ति लै असुर निकंदन ।।

छिनमौ काटि आसुरी माया । निरभय करे देव समुदाया ।।

देखि पच्छ सुर यूथय धाये । दानव दल अनेक विचलाये ।।

असुरन तन बृन रक्त उतिरना । जनु कज्जल गिर गैरव झिरना ।।

श्रवित रूधिर सुर सोहत कैसे । मधु माधव किंसुक तरू जैसे ।।

विचली कटक ब्यूह सब फूटे । स्वजन बन्धु सुत सुंदर छूटे ।।

दोहा-14

महाबली दानव सकल, अजै अचल संग्रम ।।

समय पाय विचले सभै, काल विवस विधि वाम ।।

भजै दनुज नहि चमू सम्हारै । सेनापति बल बोलि पुकारै ।।

तन छनभग लगै किहि कामै । समर मरन पावौ सुर धामै ।।

अमर न यह छयभंग शरीरा । क्रिम बिटभसम अंत गति वीरा ।।

तिहि ते बहुरि समर मह आवौ । मरे मुक्ति जीते जस पावौ ।।

अजस होय जिनको जगमाही । तन राखत जीवन सुख नाही ।।

सो सुनि असुर सूर फिरि आये । मारू मारू धरू सोर मचाये ।।

अस्त्र शस्त्र कर नख पद घाता । दन्त मुष्टि तल तरू गिरि पाता ।।

यहि विधि भयेसि घोर संग्रामा । अभिरै लरहि अखिल जै कामा ।।

दोहा-15

दानव दल सो खल प्रवल, धल बल करै अनेक ।।

बहुरि विवुध व्याकुल भये, विचले विगत विवेक ।।

भजे देव समर सुठि हारे । त्राहि त्राहि शिव सरण पूकारे ।।

आरत गिरा सुरन जब टेरी । तब षट वदन देव देशि हेरी ।।

कर धरि सांगि सैन संग आगे । चलत चले सुर दानव भागे ।।

अति बिषाद लखि तारक धावा । षट मुख सन मुख सूल चलावा ।।

शिव सुत काटि कीन्ह दुइ खन्डा । पुनि तिहि छाड़ी शक्ति प्रचंडा ।।

सोउ काटि करसे गुह डारी । साधु साधु सुर मुनिन प्रकारी ।।

तद कर तारक फरस उठावा । सोपि षडानन काटि गिराबा ।।

असि ले सो कृतांत समधायेउ । मारू मारू करि टेरति आयेउ ।।

दोहा-16

कोपि षडानन तारकहि, मारिसु शक्ति प्रचन्ड ।।

परा धरणि शिव शिव सुमिरि निसरी जोति अखन्ड ।।

सो शिव के उर गयेसि समाई । शेष असुर पुर चले पराई ।।

भयो समर श्रोनित पुर घीरा । देवन जीति सुतह करि जोरा ।।

गये दनुज शिव शरण कलेशे । विनय सकल पाताल प्रवेशे ।।

तारक बधन जाति सब देवा । बर्षहि सुमन करै गुरू सेवा ।।

चढि़ विमान दुंदुभी वजावैं । यथा उचित शिव के गुण गावैं ।।

गये देव मुनि षटमुख साथा । शिवहि सौपि सुत नायेसि माथा ।।

इद्रादि सुर विनवन लागे । शीश धरणि धरि शंकर आंगे ।।

करत पक्ष सब काल महेशा । सुनौ मोर यह विनय परेशा ।।

छन्द दुधा- ( शिव स्तुति )

नमामि मीश मीश्वरं । प्रपूजिंतं महीसुरं ।।

कपूर गौर निर्मलं । गले तले हलाहलं ।।

विधिं हरिम् निसेवितं । अदेव देव सेवितं ।।

शरणय शरणात्वा महं । स्वसेवकं मलापहं ।।

अभैप्रदं भुरे स्वरं । नमामि ते सुरेश्वरं ।।

द्वजेंद्र वन्स मंडनं । त्रिताप पाप खण्डनं ।।

सुरारि बृन्द गंजनम् । दुरूक्ति, दुःख भंजनं ।।

निर्वाण रूप निर्भयं । ददाति मुक्ति मक्षयं ।।

दोहा -17

भव संभव अनभव अभव चिदानंद सुर वीर ।

शिव दयाल विनवत सकल जै पिनाक धर धीर ।।

( शिव स्तुति )

शिव सर्वग्य सर्व उर वासी । कपर्दिने बृष ध्वज कैलासी ।।

तीन नयन त्रियंबक त्रिशूलधर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।

जटा मुकुट सिर चन्द्र विशाला । तन विभूति उर नर सिर माला ।।

वेद मंत्र सावर धर शंकर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।

गिरिजा पति गिरिपति गिरि वासी । तेज पुंज बलनिधि वलरासी ।।

मदन दहन रति लहन सुभगवर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।

चिता भषम भूषण तन व्याला । काली पति कर कलित कपाला ।।

नवसौ शिवदयाल उर शंकर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।

दोहा - 18क

लै अनुशासन विनय करि देव गये निज धाम ।

शिदयाल पद पांच पठ़ि सफल होय सव काम ।।

सोरठा-18ख

कर जोरे मुनि बृन्द तिहि औसर अस्तुति करै ।

दायक परमान्द जै महेश दुख दोष हरै ।।

छंद ( शिव स्तुति )

नमोकृपालाय दिगंवराय अरूपरूपाय विरूपकाय ।

भस्मांगराय सुरेश्वराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


कैलाशवासाय गिरीश्वराय नीलशिखंडाय महेश्वराय ।

लोकेभृमंताय निशामुखाय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


विश्वादिरूपाय विश्वेश्वराय अर्धंगगौरी शशिशेषराय ।

कर्पूरगौराय जटाधराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


काशीनिवाशाय त्रियंवकाय कामंतुनाशाय वरप्रदाय ।

त्रिशूलहस्ताय त्रिलोचनाय श्री नीलकंठाय नमः शिवाय ।।


मृत्युंजये व्याल विभूषणाय कालीकलत्राय बृषध्वजाय ।

पिनाकहस्ताय परावराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।


शिवायइदमस्तुतिनिर्मिताय शिवदयालसर्मायरतिप्रदाय ।

इदंश्रवणपाठनभक्तिदाय ध्यायेचिदानन्दअगम शिवाय ।।

दोहा - 19

यह अष्टव शिवको रचित वुध शर्मण शिवधाल ।

प्रेम सहित नित नेम करि पढ़ै सफल सव काल ।।

पुनि विनये शिव सिद्धि नवेशा । अछय अनादि अनन्त महेशा ।।

अस्तुति विध्याधरण प्रकाशी । नौमि कृपानिधि शिव कैलाशी ।।

तुम सर्वग्य सर्वमय स्वामी । सर्व भूत हित अन्तरजामी ।।

सगुण शंम्भु जग माया मोहित । भूतन अन्तर नील विलोहित ।।

आतम जीव अखिल जग मांही । विन शिव शक्ति आन कोउ नांही ।।

देवन मैं तुम इन्द्र सुरेशा । असुरन मैं प्रहलाद कुलेशा ।।

सिद्धन कपिल सुजच्छ कुवेरू । वन मैं चन्दन गिरिन सुमेरू ।।

ऋषिन वसिष्ठ मुनिन मैं नारद । जग मैं विष्णु शक्ति मैं सारद ।।

दोहा - 20-

पितरन मैं तुम अर्जमा नागन मैं शिव शेष ।

गंधर्वन मह चित्ररथ विधाधरण गणेश ।।

शिव अच्छरण मूल ओंकारा । वेदन जजुर्वेद निरधारा ।।

तारन चन्द्र ग्रहण मैं भानू । वरण विप्र तेजसा कृशानू ।।

पच्छिन गरुण सर्प कुल काली । धातु हेमरज तम गुण पाली ।।

वट थारुन मैं तरु मैं पीपर । शिव तुम गंगा सर्व नदी वर ।।

नदन सिंधु ह्रद नारायण सर । तीर्थन प्रयाग झेत्र मैं पुष्कर ।।

वन मैं गवरि अंश वृन्दावन । पुरिन मैं काशी इन्द्रिन मैं मन ।।

आश्रम लगि तुम शिव सन्यासी । योगिन विरक्ति यतिन उदासी ।।

परम हंस अति आतम भाषी । तुरिआतीत अगम अविनासी ।।

दोहा - 21

सिंह वलिन मैं गोप श्रुन मनुज मध्य भूपाल ।

पुरुष रूप अन्तरह्रदै वहिर वितावन काल ।।

तब महेश जे सकल विभूती । अपर अखिल संसार प्रसूती ।।

कोटिन सहस कोटि शत रूपा । अखिल अनन्त अखन्ड अनूपा ।।

गनै भूमि सिकता घन धारा । जलधि उर्मि नभमन्डल तारा ।।

शिव गुण रूप गिने नहि जाई । करहि कोटि विधि कोटि उपाई ।।

विनय देव ऋषि दये षडानन । हुय प्रशन्न वोले शिव शासन ।।

जब जब दुखित होय मुनि देवा । तब हम संकट हरैं अमेवा ।।

जाहु भवन शिव अस आदेशे । सब निज निज अधिकार प्रवेशे ।।

कथा व्यास मुनि मुख सुन राखी । सो हम शौनक तुम सन भाषी ।।

दोहा - 22

सुनौ अपर आख्यान मुनि पर्म ललित संवाद ।

रहे तीन तारक तनय तप करि धर्म विषाद ।।

अब तद सुनौ मधुर संवादा । तिहि अवसर भा धर्म विषादा ।।

तारक वध सुनि दनुज दुखारी । तिहि के त्रय सुत अति वल धारी ।।

ते तप करन गये गिरि कानन । नेम सहित करि संजम साधन ।।

ठाड़े अचल वर्ष शत बीते । सहि दुख छुदा पिपासा जीते ।।

बहुरि एक पद लिये उठाई । रहे भानु दिसि द्रष्टि लगाई ।।

सहस वर्ष भरि पवन अधारा । ऊर्ध बाहु शत वर्ष अपारा ।।

वर्ष सहस मस्तक धरि धरणी । उर्ध पाद तप दारुण करणी ।।

जग तापक तप देखि अपारा । देवन सत्य लोक पगु धारा ।।

दोहा -23

करि विनती विधि सो कहा नाथ वेगि वर देहु ।

प्रजा जरत रच्छा करहु जानि हमार सनेहु ।।

बृह्म देव गिरा सुनि धाये । दारूण तप ते दैत्य जगाये ।।

हम प्रशन्न मांगौ वरदाना । कहै दनुज वल दर्प समाना ।।

यदि प्रशन्न देवेश कृपाला । यह वर देवौ केतु मराला ।।

सब जग रहै अविधा पूरी । तव विधि कहा दानवन भूरी ।।

सर्ववसी वर तुमहि न देही करहि अविधा वस कस केही ।।

जाचु अपर वर जो रुचि होई । कहऊ विचार देउं वर सोई ।।

कहैं परस्पर दनुज विचारी । सुनहु जगत पति विनय हमारी ।।

वर देवौ विकसित सब वर्गा । तीन नगर वर भू भुव सर्गा ।।

दोहा -24

वर्ष सहस प्रति परस्पर मिलन चहै तब दोय ।

प्रभु समरथ सो वध करै जब त्रै इक मिलि होय ।।

एकहि वान एक ही वारा । स्वामिन सहित त्रिपुर संघारा ।।

एवमस्तु वर वोलि विधाता । निज दिविधाम गये सुरत्राता ।।

मय वुलाय विधि आज्ञा दीनी । रचहु नगर शुभ सुन्दर तीन्ही ।।

कांचन रजत लोह त्रै जाती । स्वर्ग से क्रम निरमौ येहि भांती ।।

यह कह विधि भये अन्तरध्याना । तप वल मय कृत पुर निर्माना ।।

दिवि कांचनपुर अध विच राजत । आयसुपुर धरनी पर छाजत ।।

तारकाच्छ कांचनपुर वासी । कंजलाच्छ पुर रजत निवासी ।।

आयसुपुर महि विधुनभाली । अति विकराल महा वलसाली ।।

दोहा -25

दैत्य दानवन पूजित मय दानव गुणवान ।

ताहि वसायो तिन पुरन हित कामना समान ।।

तीनौ निज निज पुरण प्रवेसे । कल्प वृक्झ गज वाजि निवेसे ।।

त्रिविधि दुर्ग अति विकट कपाटा । बीथिन वाटन चौहट हाटा ।।

एक एक योजन विस्तारा । सुन्दर सुभग विचित्र प्रकारा ।।

रवि मन्डल विमान वर भासै । पदम राग सम चन्द्र प्रकासै ।।

नाना हर्मि प्रसाद समाजा । गज मुक्ता मणि जाल विराजा ।।

गोपुर द्वार भवन पुर नाना । शिव मंदिर कैलाश समाना ।।

चारण सिद्ध विप्र गंधर्वा । गाय वजाय नचै मिलि सर्वा ।।

ठौर ठौर मंदिर वन वागा । शोभित वापी कूप तड़ागा ।।

दोहा- 26

सोरह साला नगर प्रति पंच भवन आगार ।

दज तुरंग धेनु धन पूरति पुरण अपार ।।

नेम धर्म संजम व्रत नाना । प्रज्ञा दान जंह तंह सनमाना ।।

वेदाध्यायन अगिनित साला । पुन्य लता द्रुम कुटी विशाला ।।

नर धरमग्य पतिवृत नारी । सपनेहु जंहां न कोउ विभिचारी ।।

विलग विलग क्रीड़ा अस्थाना । मंगल कलश द्वार प्रति नाना ।।

तंहा वसैं सब परउपकारी । ऋषि मुनि संत धर्म वृत धारी ।।

सह द्विज महाप्राज्ञ दैत्येशा । करहि अनुगसुत दार निदेशा ।।

सिविका गज तुरंग रथ नाना । फेरहि चढ़ि निज सुन्दर जाना ।।

नील कमल दल कुंचित केशा । अगिनित दैत्य शुभाशुभ वेशा ।।

दोहा - 27

चारहु द्वारण पुरण प्रति चतुरंगिनी अपार ।

निज कारज लवलीन मन को वरनै विस्तार ।।

गये रचित नगर चौपासा । भांति भांति के चरित प्रकाशा ।।

कोई कुपित कोउ कुब्जक वामन । कोउ प्रशांत सज्जन अति पावन ।।

कहुं कहुं मल्ल युद्ध अधिकारी । कोई अस्त्र सीखै कर धारी ।।

धर्म शास्त्र कहुं कथा पुराना । विविध करै प्रति द्वार विधाना ।।

घर घर होम यग्य वहु भांती । दुज जिमाय जेमहि सव जाती ।।

धर्म सनातन जो महि रहई । सो सब विस्तारो तिन तहई ।।

तिनके तेज दहन लगि लोका । इन्द्रदिक सुर सकल सशोका ।।

त्राहि त्राहि विधि शरण पुकारी । नाथ वेगि भय हरौ हमारी ।।

सोरठा 28 क

कह विरंचि मुनि देव कहौ वेगि निज खेद मन ।

सवन कह निज भेव करौ कृपा करुणा भवन ।।

दोहा 28 ख

करि विनती गद गद सुर लोकप दिगपाल ।

करहि निवेदन वेदना किमि वरणै शिवधाल ।।


।।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद नवमोअध्याय ।।।

।।। त्रिपुरासुर प्रकरण ।।।

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