अथ श्री शिव पुराण परिपाटी दसयोअध्याय
शिव चरित्र महात्म
स्थाणोर्चरितृम
तब कह सूत सुनौ मुनि गाथा । सुर नर मुनि सब भये अनाथा ।।
श्री हत सभै सकल हिय हारे । त्राहि त्राहि विधि शरण पुकारे ।।
नमित शीश वहु विनै वषानी । करहु कृपा सुठि सेवक जानी ।।
सोभा रहित सुसंकित गाता । देवन वेमन देखि विधाता ।।
कही कि सुनौ देव मुनि धारण । वेगि वदौ निज संकट कारण ।।
विपदा हम सब हरै तुम्हारी । जदपि असाध्य होय अधिकारी ।।
बोले सुर मुनि विनय प्रणामी । तुम सब जानत अंतरजामी ।।
तारक त्रसित अखिल दुख पाये । सब मुनि देव शरण तब आये ।।
दोहा-1
गिरि वन विचरै देव मुनि छिपे कंदरन जाय ।
हरौ सकल दुख विधि करौ तारक वघन उपाय ।।
विहंसि वचन बोले चतुरानन । सुनौ देव मुनि जाउ न कानन ।।
तजउ सुसंसय सोच विषादा । रखिहै शिव सबकै मरजादा ।।
विधि नास कौ मैं असुरन भूपा । सुर मुनि सुनौ उपाय अनूपा ।।
शिव के वीरज लगि सुत होई । निज कर असुर संघारे सोई ।।
सो दुरलभ मन देखि अपारा । तासु उपाय करहु अनुसारा ।।
हिमगिरि शिखर शुभग रमनीका । तहनु तपत नित शिव शशि टीका ।।
तुद्र भद्र शुभ शिखर कहावै । तुंग नाथ तह शिव अनुभावै ।।
तासु दरस पूजन करि आवै । विनु भृम सुजन मनोरथ पावै ।।
दोहा-2
पितु अनुशासन मानिके नारद के उपदेश ।
सखिन्ह सहित गिरिजा तंह पूजत नित्य महेश ।।
शिव गिरिजा कर होय बिबाहू । तीन भुवन भरि रहे उछाहू ।।
शिव सुत होय गवरि संयोगा । तारक वध तब तजौ वियोगा ।।
करहु वेगि मकरध्वज सेवा । यह उपाय साधउ सब देवा ।।
सुनि सुर विधि को करे प्रनामा । चले सकल मन सुमिरत कामा ।।
कहैं परस्पर कीजिये सोई । शिव की रुचि गिरिजा रत होई ।।
करै सकल मुनि देव निवेदा । करव इन्द्र विधि गिरा न षेदा ।।
अस कहि दच्छ मनुज मुनि देवा । सब निज धाम गये लखि भेवा ।।
इन्द्रि मार सुमिरन मन लायेउ । ताछन मदन सहित रति आयेयेउ ।।
छंद-
करजोरि काम प्रणाम करि दिबिधाम सुरपति प्रति कहेउ ।।
कह काज सुरपति राज सहित समाज मम सुमिरण करेउ ।।
मन सोधि सुपथ प्रवोधि इन्द्रहि मौन मनमथ हुय रहेउ ।।
तब शक्र हंसि कन्दर्प सो कह उचित परहित कहेउ ।।
दोहा-3
परम साधु मकरध्वज तुम सब काज प्रवीन ।
प्रथमै तुम अरु वज्र दुय शस्त्र माहि विधि दीन्ह ।।
प्रथम विरंचि मोहि करि नायक । काम कुलिस दुय दये सहायक ।।
जब हय विषु रूपहि संसारा । तद हत्या विधि करि निरधारा ।।
सुत वधत्वष्ट भ्रात करि क्रोधा । मोहि मारण प्रयोग अवरोधा ।।
बृत्रासुर प्रघटे तेहि कारण । मोहि अनेक दये दुख दारुण ।।
हम विधि कौ वहु विनय सुनायो । यह उपाय विधि मोहि वतायो ।।
एकबार भृगु मुनि प्रिय नारी । भर्ता सन कहा विनय विचारी ।।
पुत्र हीन पति हम अरुमाता । देव दया करि सुत पुनि भ्राता ।।
तव मुनि दुय चरु पात्र चढ़ाये । कहि विभेद असनान सिधाये ।।
सोरठा-4क
मातहि भेद वताय भाग विप्र छत्री प्रजन ।
लयो बदलि के खाय पात सुपाय सपुंसवन ।।
दोहा-4ख
भेद जान मुनि कहा त्रियै हरि इच्छा वलवान ।
तब सुत घोर कुठार धर भ्रता रिषिन प्रधान ।।
विश्वामित्र मातु सुत नामा । गाधि सुनु सो ऋषि गुण धामा ।।
विनवै नारि धरण धरि माथा । पुत्र न प्रवल होय मुनि नाथा ।।
तब मुनि कही प्रिया धरु धीरा । रिषि वर पुत्र पौत्र अति वीरा ।।
रिषि जम दगिन भये सुत जासू । परशुराम सुत प्रधटे तासू ।।
सो हरि चार कला अवतारा । शिव गुरु करे वेद अनुसारा ।।
करी सु परषुराम अति सेवा । भये प्रशीद हरषि शिव देवा ।।
दये धनुष दुय निज निरमाये । धनुर्वेद सब मंत्र पढ़ाये ।।
तव ही सहसवाहु वन आये । नारि मंत्र जम दगिनि टिकाये ।।
दोहा-5 क
सहसवाहु कहा मुनि सुनौ हय संग सैन अपार ।
तुम तपसी वन मै वसौ किमि दीहौ जिव नारि ।।
दोहा-5 ख
कामधेनु से जम दगिनि कह मखशाला जाय ।
इच्छा भोजन दल सहित राजहि देहु जिमाय ।।
नारि नेह बस मनुज स्वभावै । सो कबहू न सदन सुख पावै ।।
त्रिया सिखावन वस नर जोई । कै लरि मरै कि निरधन होई ।।
होत प्रभात सकल उठि जागे । गमनत करण प्रशंशा लागे ।।
जस भोजन मुनि कालि जिमाये । तस राजा गृह कबहुं न पाये ।।
सहसवाहु सुनि मुनि से कहेउ । कामधेनु जो तब गृह रहेउ ।।
हयहि सुदेउ प्रजादल पाले । तुम कह करौ तासु नित कालै ।।
तब मुनि मौन रहे मन मांही । नृपहि दयेउ कछु उत्तर नाही ।।
सहसबाहु सेवकन बुलाई । चले भवन लै धेनु छुराई ।।
दोहा-6
मारग धेनु विचारि करि कर ते दाम तुराय ।
धाय ठाड़ मुनि तर भई पूछति वात वनाय ।।
तात मोहि कह आयसु तोरी । राजै दयसि कि लै वर जोरी ।।
ऋषि कहा कामधेनु हमए का । सहसवाहु संग अनी अनेका ।।
हम कह करै कछू बल नाही । सुनि धेनु कोपी मन मांही ।।
आयसु करौ सेन प्रधटावैं । भूपति दल सब मारि गिरावैं ।।
रिषि कह कोप यहै मन भाये । कामधेनु तब तन फुहराये ।।
प्रघटे उर बिन अरबी जाती । अच्छ के मल मलेच्छ पसु धाती ।।
रोमन रोम शाम निरमाना । यम करि यमन ताल जंघाना ।।
खुरन से खुरासान प्रधटाये । सृगन सृंगजान उपजाये ।।
दोहा-7
शिखा से प्रगटे शेख सब सैअद सेद प्रजान ।
मुहै मुगिल आगा अगर पीठी प्रघट पठान ।।
बाल जुउ खरे पूंछ के वल कबु खारव खान ।
इड्डरिणा से इरान भा टुड़िके तुरिक तुरान ।।
रक्त नयन सुख लुलि चिलि हाना । वसन विलोम भयानक वाना ।।
लैकर हास पटह असिवंका । सहसवाहु दल धसे असंका ।।
धरु-धरु मारु-मारु करि घोरा । खड्ग प्रहारे कठिन कठोरा ।।
करहि कठिन संग्राम अपारा । सहसवाहु दल सब संहारा ।।
तब है है अधिपति करि कोपा । धनुष पचशत वान अरोपा ।।
छण मैं अखिल जमन संहारे । बचे बारुणि देश पधारे ।।
सहसवाहु मुनि संग विरोधा । वहु कटुबचन कहे करि क्रोधा ।।
मुनिवर साधु कही कछु नाही । त्रिया सीख यह गति जग मांही ।।
दोहा-8क
क्रोधमुखी कलही कुटिल कपटि निकुट प्रतिवाद ।
विभिचारिणि भाखिनि भृषा नित शिवद्याल विषाद ।।
दोहा-8 ख
सहसवाहु भट त्रास दै भग करै मख संग ।
दुख मै रिषि सुमिरो तनय परस राम तिहि अंग ।।
आतुर परस राम तंह आये । लखि पितु दशा कोप उर छाये ।
फरस उठाय धाय नृप धामा । वहुरि भये दारुण संग्रामा ।।
परस राम शिव चाप चढ़ाये । सहसवाहु शिर काटि गिराये ।।
आतुर पलट पिता पह आये । करि प्रणाम सो चरित सुनाये ।।
मुनि आशिष दय कर शिरधारा । वहुरि कहा सुत सुनौ विचारा ।।
राजहि वधेसि पाप अस लागा । धेनु विप्र सम सहस विभागा ।।
करव जाय त्रै मख तजि रोषा । तब छूटै सुत यह नृप दोषा ।।
धनुषहि पाप दाप सर संगा । मुचहि राम कर गहे सुभंगा ।।
दोहा-9 क
पुनि त्रिय जम दगिन कह प्रिया लयावौ नीर ।
अभिषेकै मार्जन करैं पावन होय शरीर ।।
दोहा-9ख
कर उठाय घट रेनुका गयी सरोवर तीर ।
तह गंधरबन विषय लखि मन अभिचार अधीर ।।
मन विभिचार निवारि निदाना । लै जल पति पह करे पयाना ।।
तद वोले जमदगिनि रिषाई । प्रिया कहां तुम देर लगाई ।।
नारि भाव तेहि बृथा वषाना । हम प्रिय करत रही असनाना ।।
तब जमदगिनि ध्यान धरि देखा । बृथा वचन विभिचार विशेषा ।।
कोपि कहा सुत हति अब जाही । विभिचारिणी वध पातक नाही ।।
परसुराम पितु आयसु मानी । मारेसि मातु सकल जग जानी ।।
पितु कहा सुत मांगो वर पावौ । परसुराम कहा मातु जिआवौ ।।
जिहते छूटह मोर अपराधा । दै जिआय रिषि करि निरबाधा ।।
दोहा-10 क
मातु शत्रु विभिचारिणी पितु अराति रिणकार ।
वैरी कुपठ कुपुत्र सुत पतनी रूप अधार ।।
सहसवाहु सुत सत अरु एका । समय पाय पितु वैर विवेका ।।
छत्रिन वैरसु विसरत नाही । जव लगि सुधि सब साखिन माही ।।
प्रविसे आय विपिन मखसाला । काटि जमदगिनि सिर तिहि काला ।।
बिलिपित रेनुका विकल बिहाला । रोदति बिलख अनाथिन बाला ।।
कर उर मारि उपारति केशा । कहति आय सुत हरौ कलेशा ।।
सुनत मातु की आरति बानी । आये परसुराम धनु पानी ।।
करेसि मातु कै प्रथम प्रबोधा । धनुष चढ़ाये ह्रदय अति क्रोधा ।।
करेसि प्रतिज्ञा अस मन माहि । क्षत्रि बंश महि रखिहय नाही ।।
छंद-
सहस भुज के निहित सबसुत अखिल सैन संहारि कै ।।
तजि गरभ शिशु बालक एक क्षण सवै भूपन मारि कै ।।
करि निरबशु धरिणि इकयस वार जलधि निवारि कै ।।
शिव दयाल त्रै मख करि शिभतंक क्षेत्र पाप उघारि कै ।।
दोहा-11
धनुष जनक पुर धारि के । बहुरि तासु तजि आस ।।
रिषि दधिचि कह विशिष दय । गमने गिरि कैलाश ।।
सो सर विजया रस अनुमाना । दधि अग भंग संग करि याना ।।
तासु अस्थि जाचहु तुम दाना । बज्र बिरचि ब्रत्त वध जाना ।।
काम सुनौ तुम हम हरषाई । रिषि दधिचि कह जाचो जाइ ।।
देहु देह रिषि लगि परमारथ । रिषि कह देव सवै प्रिय स्वारथ ।।
सुर मुनि मानव हेत विरागी । करहि प्रीत सब स्वरथ लागी ।।
पर संकट न जानि जगमांहीं । यदि जानहि तन जाचहि नांही ।।
पुनि देवन कह विनय विचारी । रिषि दधीच तुम पर उपकारी ।।
प्रथमै देव असुर संग्रामा । तुम दै सिर भाहै सिर नामा ।।
दोहा-12
कह दधीच सुर मुनि सुनौ को जानै पर पीर ।
कै जानै शिवदयाल शिव कै दुख सहत सरीर ।।
तदपि देय हरि नाचक जानी । सव करि जतन लेउ हित मांनी ।।
मन यह रही एक अभिलाषा । सो तीरथ मंजन मन राषा ।।
सुनि तै हरि विरंचि शिव आये । सुभग दधीच कुन्ड निरमाये ।।
बालि सकल तीरथ निवसाये । विरचे पंच प्रभागन आये ।।
लोक वेद विधि समय समाना । करे सकल तीरथ असनाना ।।
शिवै सुमिरि के हरि धर ध्याना । मन आकरषि योग पथ आना ।।
तजे स्व तन करि प्राणायामा । परमानन्द गये हरि धामा ।।
रिषि दधीच मिसि पूर सो भावै । तिहि ते मिषिरिषि नाम कहावै ।।
दोहा-13
करे उपाय अनेक विधि माधुर वस्तु लगाय ।
मांस चटायसि धेनु पर केवल अस्थि वचाय ।।
तह दुज दोष धेनु कह लागा । दान करत पातक पर भागा ।।
तह वरचित गोदान विधाना । विप्रन देय अपर सब दाना ।।
विनवै सुरभी अध उपदेशा । धेनु विप्र गुरु सदा महेशा ।।
विधि हरि संभू त्रै योजन पर । विरचो हत्या हरण सरोवर ।।
तहां धेनु अस्नान कराये । सुरभी तन केम पाप छुटाये ।।
तंहां करै जो जन असनाना । छटहि बिप्र गोवध अधनाना ।।
पिनि कर गौ मांगौ वरदाना । धेनु कहेसि त्रै कृपानिधाना ।।
देउ अमर गति जग दरसावै । नाम न मिटय मुक्ति हुय जावै ।।
दोहा-14
सप्त कुण्ड वहु विधि रचो ब्रह्मअगिन गुण पाय ।
गौरि कुण्ड शिव ने थपो मंजन उमै करै ।।
केशव कह अमर तन लाई । रहो सदा सरित गति पाई ।।
जो जन मंजहि दरसन पावै । लहै लोक सुख शिवपुर जावै ।।
भई सो गाय नदी अनुभावै । धेनुमती सो नाम कहावै ।।
विसुकरमा विधि शासन पायेउ । असुथि दधीच कै कुलिस वनायेउ ।।
करणि हरिगिरि हीरा करणी । ह्य रोकह व्रत्त तत्पर धरणी ।।
कण परि परण देश कहावै । अमि तमोल रग मरणि उप पावै ।।
मिसि रिषि नैमिसार जग मांही । पुन्य पुंज सम दूसर नाही ।।
वज्र विरंचि हमै तब दयउ । तिहि ते व्रत्तासुर वध भयउ ।।
दोहा-15
कुलि शत जेउ हम चिमनि पर थमे संग भुज दोउ ।
तुमकौ मार अपार गति निश्फल कवहु न होय ।।
अहो मित्र तुम सम जग मांही । दुख हारक समरथ कोउ नाही ।।
आपद काल परखियै चारी । मित्रधरम धी रज अरुणारी ।।
परखिय सुर परे संग्रामा । निर्धन भये परखिये कामा ।।
विनय कुलीन सनेह पिछारे । सत्य परखियै संकट भारे ।।
सुर मुनि काजन केवल मोरा । सब कर हते सुजस जग तोरा ।।
सुनत सुरेश वचन ह्य मारा । दीन वचन किमि इन्द्र उचारा ।।
जदपि असंभव करहि उपाई । वदौ विहाइ कपट चतुराई ।।
यदपि विमुक्त मुक्त जगमांही । पावन करौ छणक मैं ताही ।।
दोहा-16
जो जग दारुण तप करै तब इन्द्रासन हेत ।
वेगि विदारण करै तप तासु न कछु संकेत ।।
मुनि अरु मनुज जती सन्यासी । देव दनुज गण जती उदासी ।।
जे सब पातहु रिषिन समेता । निज वस करौ सकल जड़ चेता ।।
कवन काज तब मित्र वतावौ । प्रण कर कहौ करौ अनभावौ ।।
आतुर आयसु करौ सुरेशा । का सुर मुनि मन हरौ महेशा ।।
सुनत सुरेश कहा बल तोरा । कहेसि पिछार सो कारज मोरा ।।
सुनौ मदन मम काज विचारी । मम सुमिरे अस आस निहारी ।।
तारक असुरै विधि वर दयउ । वहि त्रैलोक प्रभुता हरि लयउ ।।
पीड़ित लोक नष्ट सब धरमा । सुर संकेत नसे सुभ करमा ।।
दोहा-17
नाना आयुध सुरन्ह के निर्फल भये जग मांहि ।
शिव के वीरज प्रधट सुत सो मारहि ताहि ।।
सुरण काज अरु संमत मोरा । शिव समाधि गिरिजा तप धोरा ।।
तपसि उमा संकर वर लागी । जनक जननि अग्या अनुरागी ।।
जाउ काम अग ठास अधिकाई । शिव गिरिजा रुचि देउ वढ़ाई ।।
डिगहि दिगम्वर होय विवाहू । भरि लोचन देखियै उछाहू ।।
मुख प्रफुल्ल पंकज मृदुवानी । सक्र सप्रेम काम सनमानी ।।
इन्द्र वचन करि अंगीकारा । चलत मार मन करे विचारा ।।
शम्भु विरोध जदपि भल नांही । परिहित मरे स्वयश जगमांही ।।
मदन सहाय समेत सिधारा । शिव गिरि जाय वसंत पसारा ।।
छंद-
तिहि औसर कौतुक काम किये वन वागन छाय वसंत दिये ।।
सवही तरु पल्लव फूलि रहे तह गुंजन भृंगन जात कहे ।।
मधु अंवुक जंबु कदंब घने जनु सोहत काम वितान वने ।।
जुहि चंपक नाग पुनाग विली वकु पाटल माधवि फूल खिली ।।
अति शोभित फूलि पलास रहे सवही जत पावक पुंज दहे ।।
वन वासिन प्यासि वयारि लगै जन जन पर जंगम काम जगै ।।
जन योगी जती विरही तपसी सवके उर संगम आस वसी ।।
सुक सारिक कोकिल औ पपिहा मधुरी धुनिवाद कै अलिहा ।।
दोहा-18
काम कठिन कौतुक कियो रह्यो सकल जग छाय ।
शिवदयाल दशा तिहि समशिय की कहे वनाय ।।
छंद-
बस काम अकेत सचेत भये तरु मध्य लता लिपटाय गये ।।
पुनि ताल तलायन जाय मिले सरिता मिलि सिन्धु उमगि चले ।।
सबरे जग जीव उमंग भरै कवि को वरणो जो सचेत करै ।।
जग जीव चराचर जौन जहां वस काम उमंग चले सो तहां ।।
दिस मानव को अवला निरखैं अवलान के मान नरा करखैं ।।
दोहा-19
मनसिज सवके मन हरे काहू धरे ना धीर ।
भये काम वस सकल जग सर्वग यथा समीर ।।
पशु पंछी जल थल नभ चारी । काम विवस ऋतु काल विसारी ।।
दनुज देव किन्नर नर नागा । गंधर्व यछ् पिसाच विभागा ।।
भूत प्रेत वैताल घनेरे । एं सब सदा काम के चेरे ।।
योगी सिद्ध तपी वैरागी । मदन सल्प सवके उर लागी ।।
काम कीन्ह अस चरित अनेका । डिगे न शंकर सहित विवेका ।।
देखि शिवहि मन मदन डिराना । परिहत करन मरन पन ठाना ।।
शाखा सुभग देखि तरु आमा । तापर बैठि कोपि कर कामा ।।
सूत सुमन सरचाप सम्हारा । शिव के वाम पाश्व तकि मारा ।।
काम कमान सुमन सर लागे । छुटी समाधि शंभु तब जागे ।।
मन आनंद शिव लखि चहुं पासा । तंह रति काम वसंत प्रकाशा ।।
विन ऋतु लखि वसंत गति नाना । अति आश्चर्य शम्भु मन माना ।।
रति गति देख काम समुदाया । को नहि मोहत को जग जाया ।।
तेहि अवसर गिरजा तह आई । सोहत सखिन्ह संग अधिकाई ।।
तिहि सिंघार भानु आभूषण । करे पुष्प आमरण निर्दूषण ।।
जो सौंदर्य लोक त्रै माही । सो समूह सब गिरजा पाही ।।
रूप राशि अधि उमा अपारा । वर्णि वर्ष सत लहै न पारा ।।
पारवती कर पुष्प अनेका । पूजति शंकर सहित विवेका ।।
करि प्रनाम शिव ओर निहारी । नमित शीश लज्जा अधिकारी ।।
तव शंकर गिरिजा दिशि देखा । तन सुन्दर मन लाज विशेषा ।।
काम विवश शिव कींह प्रसंशा । कोटि रमा रति रूप बतंशा ।।
सरद चंद मुख पंकज नैना । भृकुटी धनुष काम सर मैना ।।
गोल कपोल रुचिर वर नासा । विंवाधर शुभ रदन प्रकाशा ।।
दोहा-20
युग कर कोमल कमला सम सोहै सुमन सुबास ।
चारु चरण अति ललित गति को गुण वरणो तासु ।।
जो गिरिजा सब जग कर माता । उतपति पालन प्रलै प्रजाता ।।
तासु रूप गुण तप यश वेशा । निज मुख वरणौ लाग महेशा ।।
को बरणै गति वि विरति अनूपा । को कर सुमन वसन गुण रूपा ।।
सो सब जग मैं सुन्दरताई । हुय एकत्र गवरि पह आई ।।
रूप राशि गुण तेज अपारा । जासु अंश त्रिय सबै उदारा ।।
येहि विधि वरणि रूप गुण वेशा । तप विराम निज करै महेशा ।।
वसन गहन कर शम्भु पसारा । तब लग उमा दूर पग धारा ।।
पुनि गिरिजा शिव ओर निहारी । मुख मुस्क्यानि लाज अधिकारी ।।
दोहा-21
मन्द मुसकि विहसति हंसति आगिल प्रीति विचारि ।
चलत मन्द मारुत तवहि फुहरत वसन सुधारि ।।
नारि सुभाव गवरि मुख मोरी । देखी शम्भु दशा बहोरी ।।
मुरि मुसक्यानि कछुक मुख कम्पित । हरलसि लाजति जिमि नव दम्पति ।।
येहि विधि देखि उमहि शिव शंकर । मदन मोह वस भयसि निरंतर ।।
कहेसि कि जो नर मे यह लागी । तद सुख मिलै कहा अनुरागी ।।
कै पर शक्ति यह पर माया । जासु मोह वस अस भृम पाया ।।
तेहि क्षण मैं शिव ज्ञान विचारा । मोहि भयेउ कस मोह विकारा ।।
हम ई श्वर किमि ज्ञान गवाये । पर प्रसंग हित चिन्त चलाये ।।
हम समरथ हुय जो अस करते । अपर सकल मरजाद विगरते ।।
दोहा-22
शिव अस ह्रदय विचार करि मन दिढ़ बन्धन बांधि ।
शिवदयाल कहस कि शिव कस मम चली समाधि ।।
इति श्री शिव पुराण परिपाटी दसयोअध्याय
शिव चरित्र महात्म
स्थाणोर्चरितृम
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