Sunday, 17 April 2011

वाइसवां अध्याय

।।।अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद द्वादशोध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


वहुरि सूत कहय मुनि बृन्दा । रहा जपन मत पूरि अनन्दा ।।

प्रघट अधर्म धर्म सब नाशे । जंहां तहां पाखंड प्रकाशे ।।

नारि धर्म वरणाश्रम धर्मा । शिव हरि पूजन जज्ञ सुकर्मा ।।

अस्नान दान तीरथ व्रत पर्वा । वेद धर्म आदिक पथ सर्वा ।।

इनहि आदि दै जे शुभ काजा । दूरि करै मग वेद समाजा ।।

सकल विश्व वस जा माया के । सदा रहहि विधि हरि वस जाके ।।

जा लक्ष्मी कौ तपि निर्भेवा । अमर भये विधि हरि हर देवा ।।

सो लक्ष्मी त्रयपुर सरसाई । तप करि विधि से असुरन पाई ।।

दोहा -1

जो प्रभुता धन धाम लखि मोहत सब संसार ।

सो प्रभुता पूरण त्रिपुर जैनी धन अधिकार ।।

जो धन भुवन चारि दश माही । देवन रत्न त्रिपुर वस पाही ।।

सो तजि नगर वहिर सब आये । प्रभु माया वस मोह जनाये ।।

विष्णु माय निर्मित जो माया । ता वस बुधि मोहै समुदाया ।।

गहि सो पंथ तजे श्रुति धर्मा । शिव तजि गहि पाखंड अकर्मा ।।

यह विधि जव नासे श्रुति सेतू । तजि गये लिंगार्चन बृषकेतू ।।

नारि धर्म नासे अनिआशा । दुराचार मन भये दुरासा ।।

भये कृतार्थ देवन युतहरि । समुरन लगे उमापति सिरधरि ।।

पार्थिव लिंग पूजि परिपोषे । विनती करि हरि शिव संतोषे ।।

दोहा -2

बह्म रूप परमात्मा नारायण शिव रूप ।

रुद्र महे श्वर नौमि हर शिवदयाल अनरूप ।।

इमि विनवत करि दंड प्रणामा । जपत मंत्र सत्रुन्जय नामा ।।

लक्ष् पचास कोटि भय लिंगा । धरि जल मध्य पूजि पंचागा ।।

तेहि अवसर तब तह मुनि अरु देवा । लगे करन विनती कर सेवा ।।

नौमि सर्व आत्मा शिव शंकर । रुद्र प्रचेत विरूप अर्तिहर ।।

जै सुरारि सूदनचित संता । वंदौं आदि अनादि अनन्ता ।।

प्रकृति पुरुष तुमही जगभरता । सिरजन प्रतिपालन संधर्ता ।।

प्रकृति शक्तिमय जगमय धाता । सुर मुनि बदत बरद विख्याता ।।

शिव तुम श्रुतिन मध्य श्रुति सारा । वेद श्रुतिन के जानन हारा ।।

दोहा 3

शिव अमूर्ति वहु मूरति रूप अरूप विरूप ।

जक्ष् पितर किन्नर उरग सुर नर सबके भूप ।।

सिद्धि साध्य मुनिगण गंधरवा । स्थावर आदिक तुम सबसर्वा ।।

भृकुटी वंक प्रलय छिन कारत । तिनहि कवन श्रम असुर संहारत ।।

पाहि शंभु सब शरण तुम्हारे । हरहु नाथ दुख दोष हमारे ।।

मन बच कर्म सेवक सुखदायक । योगिन योग वित्त सुर नायक ।।

तुमही तत्व बदै अस वेदा । तेज राशि जग मैं निरभेदा ।।

परमात्मा जगधर विश्वम्भर । विश्वरूप विश्वै श्वर विषधर ।।

लखे सो सुने सुने तस देखे । जगत गुरू जग विभू विषेखे ।।

गुरु सुमेर मन्दर ब्रह्मंडा । लधुन मध्य परमानु प्रचन्डा ।।

दोहा - 4

सर्वपाणिपादान्त लगि नयन शिरोमुख मेव ।

अनाबृत सर्वज्ञ तुम अनिर्देश महदेव ।।

कोटि भाष्कर सम संकासक । शिव षट रविसति तत्व प्रकाशक ।।

तुम्है छाणि गति दूसर नाही । मोहित सब तब माया मांही ।।

देव विनय सुनि ळखि हरि जापा । नंदी युत हर प्रघट प्रतापा ।।

प्रणवत हरि शिर शिव कर परसा । देव ऋषिन उर आनद सरसा ।।

घन गंभीर गिरा शिव भाषा । सुनहु देव हरि भरि अभिलाषा ।।

नारद वोध विष्णु माया वल । सहित अधर्म भये दानव दल ।।

त्रिपुर विनास करन हम जावै । इन्द्र उपेन्द्र देव मुनि आवै ।।

शंभु वचन सुनि मुनि हरि देवा । कीन्ह प्रणाम वहुरि कह भेवा ।।

दोहा - 5

शंभु विनय यह प्रात नित पठ़ै सुनै मन लाय ।

शिवदयाल विजय संग्राम चढ़ि निहचै शत्रु नसाय ।।



।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वादशोध्याय ।।

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