Sunday, 17 April 2011

सत्ताइसबा अध्याय

।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे त्रतीयपाद द्वतीयोअ्ध्याय ।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


ऋषिन वहुरि पूंछा संवादा । शंभु कथा फिर व्यास प्रसादा ।।

शिव पूजन विधि सुरण सुनाई । सो मोहि सूत कहौ समुझाई ।।

सुनि विरंचि मुख देवन कीन्ही । पूजन सोय कहौ हित चीन्ही ।।

तव कह सूत सुनहु मुनि वृन्दा । शिव अरचा दायक आनन्दा ।।

सो संवाद कहौ निरधारा । युग सनकादि विरंचि कुमारा ।।

तिनहि व्यास पूंछी एक वारा । तिन सब कही सहित विस्तारा ।।

हम सो व्यास वदन सुनि पाई । कहई विचार यथा श्रुति गाई ।।

कह विरंचि सुनहु मुनि देवा । परम कठिन शिव शंकर सेवा ।।

दोहा - 1

भूसुर भूभुज वैश्य पुनि वरण सूद्र लौ चारि ।

तामहि चारौ वरण के धर्म कहौ विस्तारि ।।

प्रथमैं अति दुरलभ नर देहा । तामौ गृह सुत दार सनेहा ।।

तापर सब निज पच्छ सनेही । जग मैं ममता मोह न केही ।।

चारि वरण अरु त्रै दस जाती । सप्त वधिक द्वादस परधाती ।।

जौन जाति जग जनमै जाई । निज कुल धर्म करै समुदाई ।।

अति दुरलभ नर तन संसारा । दुरलभ उत्तम कुल अवतारा ।।

तापर दुरलभ दुज कुल धर्मा । अति दुरलभ विद्या सत कर्मा ।।

विवुध कहै धनि विप्र शरीरा । विद्या विनय विदुष सो धीरा ।।

दुज वर वंस जन्म जो धरई । संध्या तरपन हुय जप करई ।।

दोहा - 2 क

वेद पठन पाठन जजन जाजन प्रति गृह दान ।

व्राह्मण के षट कर्म शुभ छत्री के तीन प्रधान ।।

2ख

छत्री के हित कर्म त्रै जजन पठन श्रुति दान ।

वैश्य सूद्र दुय करि सकै जज्ञदान सनमान ।।

छत्री वंश जनम जो पावै । समर मरण तौ जग जस छावै ।।

वैश्य वंश पावै अवतारा । पशु पालनी बाणिज वैपारा ।।

सूद्र वंश जो जन अवतरई । छेत्र ववन दुज सेवन करई ।।

जिहि जिहि जाति जाय अवतरई । निज कुल धर्म लाग सब करई ।।

जाति धर्म जग जदपि अनेका । अन्तिम निज कुल धर्म विवेका ।।

निज कुल धर्म सदैव सहायक । पर कुल धर्म सदा भयदायक ।।

जब लग ह्रदय न प्रघटै ग्याना । तब लगि कर्म आचरण माना ।।

कर्म से सहस गुणी तप जागा । तपते सहस गुण जय अनुरागा ।।

फल जपते सहस्र गुण ध्याना । सदा प्रशंशत बिबुध निधाना ।।

दोहा - 3

ध्यान से विदित विचार उर तव प्रधटत विज्ञान ।

शिवद्याल भक्ति से विरति होय दोनौ मोक्ष प्रधान ।।

ब्रह्म विचार ध्यान रत अहई । तिनहि समीप सदा शिव रहई ।।

योग ध्यान जब निरषैं शंकर । होय ज्ञान साधन तेहि अन्तर ।।

पातक पुंज दहन मन ध्याना । सोइहि हम सर मन विज्ञाना ।।

विदित ब्रह्म विद्या वुध जोई । विद्या सकल विसुद्धित सोई ।।

यह अज्ञान विदित जग माही । सुख दुख क्रिया विचारत नाही ।।

ज्ञान विसुद्ध ह्रदय शिव अच्छर । परानंद कर लिंग दिगंवर ।।

निष्कल सर्वग योगिन उर वर । लिंग दुय विधि बाहर अरु अंतर ।।

सूझ्म अंतर बाहिर स्थूला । भेद जीव प्रतिमा अनुकूला ।।

दोहा - 4

स्थूल अंग जगमैं भृमै सपनै सूझ्म देह ।

कारण तन सुख सोवही तुरिय हंस गत नेह ।।

कर्म यग्य रत पूजिय स्थूला । सूझ्म ध्यान ग्यान की मूला ।।

अस तन केरि भावना हेता । सेवत बाहिर लिंग चित चेता ।।

जव अध्यातम ग्यान विकाशा । सो सूझ्म शिव लिंग प्रकाशा ।।

यथा थूल मृत काष्ट विकल्पा । अहो विचार वुद्धि अति अल्पा ।।

थूल मैं निहचै कृत जग माही । परम तत्व वादी ते नाही ।।

जव लगि ह्रदय न ज्ञान प्रकाशा । तब लग भजिय मूर्ति अनि आशा ।।

निष्कल सकल उदय जव ज्ञाना । शिव मय जग जग मय शिव जाना ।।

येहि विधि ग्यान सहित नर जोई । ताके उर दुख दोष न कोई ।।

दोहा 5

तजे कर्म जिन ज्ञान विन शिखि मूढता विवाद ।

शिवदयाल वांतासि ते अपरै करण विषाद ।।

तिनहि विधान न संग्रह त्यागा । जिनके ह्रदय ग्यान वैरागा ।।

गृह वस कर्म न वन्धन ज्ञानी । यथा कमल दल भिदै न पानी ।।

जलि अध्यातम ग्यान न साधै । तव लगि कर्म न शिव अवराधे ।।

नैन कमल जग पीत दिखाई । जिमि दिशि भ्रम परदिश चितजाई ।।

जिमि घन पटल छाह दिवि जावै । भ्रम वस रवि शशि झपे वतावै ।।

इमि भव रूप मायावस माही । भ्रम सबके उर छूटत नाही ।।

जिमि दर्पन प्रतिविम्व प्रकाशा । मलिन भये मलिनै आभासा ।।

तैसे माया मलिन सरीरा । शंभु शक्ति धेवैं ते धीरा ।।

दोहा -6 क

अंवर अंतर दर्शित चन्द्र दिवाकर एक ।

घट प्रति जल छाया विदित तृष्ना रूप अनेक ।।

6ख

जो जल मलिन तौ मलिन नर विछाह तरंगन भंग ।

तेहि विधि जीव सुनित्य यह भरमत माया संग ।।

जे जग सुने औ दर्शित जेते । प्रघटे सकल शिवात्मक तेते ।।

एक ईश बहु भांति दिखाई । जिमि जग भेद जगत अधिकाई ।।

सब संसार सकल तन धारी । परम ईश भाषै श्रुति चारी ।।

अस विज्ञान विदित उरजाके । प्रतिमादिक पुजित नहि ताके ।।

जे जन जग विज्ञान विहीना । ते प्रतिमा पूजहि हुय दीना ।।

चहत उच पदवी आरूढ़ा । विन आलंवन लहै न मूढ़ा ।।

सगुण उपासक प्रतिमा सेवहि । ते निर्गुण पावहि निर्भेवहि ।।

चन्दन पुष्प धूप अरु दीपा । विन मूरति केहि दैय समीपा ।।

दोहा 7

प्रथम सुकरम पूजि शिव तजिय कामना काम ।

शिवद्याल शिवार्षन करिय सब पुन्य पाप बिर राम ।।

जव लगि नहि प्रघटै विज्ञाना । तब लगि कीजिय मूर्ति विधाना ।।

ज्ञान अभाव न पूजहि जोई । पातन होय अधोगति होई ।।

यहि कारण सुर नर मुनि बृंदा । करिय सुजाति कर्म गत निंदा ।।

जब जह होय भक्त गति जैसी ।शिव पूजा कीजिय तंह तैसी ।।

व्रह्म विचारण शिव सब मांही । सर्व एक रस दुकिआ नाही ।।

तारक मूल सुभाव सुसंगा । पाय सुसंग कथा रस रंगा ।।

श्रवण से मनन मनन से ध्याना । ध्यान से अधिआसन अधिग्याना ।।

भक्ति से विरति विवेक विरागा । तव सूझै शिव पद अनुरागा ।।

दोहा -8

भक्ति सेहोय विराग उर जोग से प्रघटत ज्ञान ।

शिवदयाल शिव कथा रति दायक पद निर्वान ।।

पुन्य पाप जब उभौ नसावै । तव निवास शिव उर पुर पावै ।।

मूल कथा जे सब तरु शाखा । फल विज्ञान फूल अभिलाषा ।।

ताकर पत्र विगत सब संगा । फल रस जीवन मुक्ति विहंगा ।।

विनि शिव पूजन विन जप दाना । छुटहि न दुख विधि माना ।।

जब लगि देह सुपांतक भ्राजा । तब लगि लहै न सिद्धि समाजा ।।

विगत पाप संपूरण कामा । सफल जन्म सुमिरत शिव नामा ।।

यथा मलिन षट चढ़ै न रंगा । धुये वसन सव रंग प्रसंगा ।।

तथा कुसंगति मल संदेहा । दाहन दोष शम्भु पद नेहा ।।

दोहा - 9

कर्म मूल देवन कै पूजा । पूजन मूल गुरू नहि दूजा ।।

गुरु व्रह्मा गुरु हरि हर देवा । विद्या मुक्ति देनि गुरु सेवा ।।

सब कर मूल एक सतसंगा । जासे होत कथा रस रंगा ।।

सत संगत महिमा अधिकाई । सुलभ मुक्ति रति भक्ति उपाई ।।

काकी मति न कुसंगति नासी । अन्त दहिन उर जग उपहासी ।।

पाय कुसंगन से चतुराई । तथा सुसंग सकल सुखदाई ।।

सप्त स्वर्ग अपवर्ग विशेषा । तुलहि न सुख सतसंग अलेषा ।।

सत संगति प्रभाव गुरु लाभा । गुरु ते मिलहि मंत्र विधि आभा ।।

दोहा -10-

गुरु संतोषी चाहिये शील सुभाय सनेह ।

उत्तिम कुल गुण ज्ञान युत भक्ति विराग विदेह ।।

गुरु गुण पावन पर्म कृपालू । वेद विधायक सवहि दयालू ।।

मंत्र से लाभ देव पूजा व्रत । व्रत अरचन से होत भक्ति रत ।।

भक्ति से प्रघट विरति कै ग्याना । विरति ज्ञान दायक विज्ञाना ।।

सो विज्ञान निवारण भेदा । हरण सकल भ्रम संसय खेदा ।।

हम तुम पूत्र मान अपमाना । जीत हारि सुख दुख सम जाना ।।

दुंद रहित पावहि शिव शंकर । उभय बीच दुख दाह भयंकर ।।

जव दर्शे शिव समन कलेशा । रहै न दुख दरिद्र लवलेशा ।।

गृह आश्रम अस विरला कोई । पावहि मुक्ति पदारथ सोई ।।

दोहा - 11

परमहंस शिव तत्व मय जग मैं विरला कोय ।

शिवद्याल तासु दर्शन करे मुक्ति पदारथ होय ।।

यदि जग मैं अस होवै सोई । तेहि दरसे अध मोचन होई ।।

तीरथ सकल दरसै के आशा । करहि सदा तह चहै निवासा ।।

ते जन नहि सब तीर्थन माही । देव शिला तिन पट तर नाही ।।

देखउ खोजि सकल जग मांही । मुनि सप्तम नहि वहु विज्ञानी ।।

विन मन्जत पुनीत सर सरिता । चलत चरण वन तीर्थ पुनीता ।।

जनि लगि रहै अस्थिर गृह मांही । पूजिय शिव गिरिजा भ्रम नाही ।।

मधुसूदन पूजिय विधि नाना । सूर्ज वायु गणपति सविधाना ।।

पूजिय एक शम्भु श्रुति भाषा । सीचत मूल तृपित लरु शाखा ।।

दोहा - 12 क

तृपित सवै पूजन करै देवन मूल महेश ।

यथा मूल सींचत विटप शाषा सीचि नवेश ।।

12ख

शिव शंकर जग शंकर पूजि त्रियंवक देव ।

सर्व भूत हित रत सदा शिवदयाल नित सेव ।।


।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयोअ्ध्याय ।।

छब्बीसबां अध्याय त्रतीयपाद

।। श्री गणंशाय नमः ।।

।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।

।। अथ श्री त्रतीय पाद ।।

।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे प्रथमोअध्याय ।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


कह मधुसुदन सुर मुनि धाता । सेवन सुनहु विस्व विख्याता ।।

शिव पूजा जगभव भय हरणी । दुःख शोक अघ ओघ विदरणी ।।

जन्म भये सुधरै जग करनी । मुक्ति हेत भव सागर तरणी ।।

तजि के तुम्है देव देवेशा । सुन्दर मूरति लिंग महेशा ।।

तारक तनय निहत सहवंशा । माया मय प्रेरित मय अंशा ।।

निहचै सो माया करि दूरी । शंभु रहित नासै सब भूरी ।।

येहि विधि शंभु रहित जो होई । कुल समेत नासै नर सोई ।।

शंकर बिमुख यदपि धनमाना । सपनेउ लहहि न सुख सनमाना ।।

दोहा-1

धन्य मातु पितु जाति कुल, शिव सेवक सुत जासु ।।

शिवदयाल खल मात पितु, सुत शिव द्रोही तासु ।।

धनि पितु मातु धन्य सुत सोई । जाके उर शिव पद रति होई ।।

धृग संतति सो धृग पितु माता । शिव द्रोही निन्दक अज्ञाता ।।

शिव पूजत वांछित फल पावै । अमर होय कि शिव पुर जावै ।।

पूजयनीय शिव लिंग मूतिंधर । सुख अभिलाष तो सेवहु शिवहर ।।

सुर पुंगव कृपाल शिवदेवा । सर्व देवमय सदा अभेवा ।।

सकल देव पूजहि जग माही । तदपि शभु पूजन सम नाही ।।

यथा लता तरू सींचत मूला । सुलभ सघन पल्लव फल फूला ।।

प्रथम सु हम पूजे कल्पादी । लिंग मूर्ति शिव देव अनादी ।।

दोहा-2

सहस कमल हम अर्पहि सादर । प्रेम सहित पूजहि निसि वासर ।।

सूचित प्रेम परीक्षा कीन्हा । कमल एक कमला हरि लीन्हा ।।

अरपत मंत्र सुमन एक हीना । तब हम उर विचार अस कीन्हा ।।

अधपूजे तजिये नहि शंकर । यदपि होय दु़ःख रोग भंयकर ।।

शिव पूजन खंडित जो त्यागै । विप्र धेनु वध पातक लागै ।।

हम यह निज मन मंत्र बिचारा । पंकज नयन कहत संसारा ।।

शिवहि समरयो नयन निकारी । अति प्रसन्न प्रधटे त्रिपुरारी ।।

नयन प्रथम समपूरण कीन्हा । तब शिव चक्र सुदर्शन दीन्हा ।।

दोहा-3

सोई शिव सर्वज्ञ प्रभु सब सेवत सब काल ।।

मनोकामना ते लहत, धेवत नित शिवद्याल ।।

सोई सिव सुमिरै सब काला । विद्याधर प्रति जन्म विशाला ।।

शिव-शिव कहि जे जन जमुहाई । तिन समीप जम काल न जाई ।।

जे जन शिव सुमिरण करि सोवै । तिनहि दुःख सपने नहि होवै ।।

शिव शिव समिरि प्रात नित जागै । तिनके उर अघ ओघ न लागै ।।

भूतन पति मसान के वासी । सुमिरत शिवहि प्रेत भय नासी ।।

पाप दाप मैं शिव शिव कहई । तिनको अध संकट ना लहई ।।

शिव सुमिरै देय कछु दाना । पुन्य अमोघ कल्प अवसाना ।।

दोहा 4

शिव सेवत कुष्टी तरै अरु कृपणी वस काम ।

शिवदयाल हर भक्ति विन तन धन धाम निकाम ।।

शिव कहि जग्य करै औ करावै । अजर अमोघ अतुल फल पावै ।।

शिव शिव सुमिर करै जो काजा । पूरण होय सकल सुख साजा ।।

शिव कहि सूर चढ़ै संग्रामा । समर विजै अंतहु शिव धामा ।।

शिव सुमिरै जे मरती वारा । ते नहि आवहि फिर संसारा ।।

लिंग रूप मय शिव सब देवा । लिंग प्रकासित देव अभेवा ।।

लिंगहि पूजि असुर सुर मानव । किन्नर जच्छ सिद्ध अहि दानव ।।

पावहि मुक्ति करैं कुल पावन । आठौ सिद्धि लहै मन भावन ।।

छण भरि लौ त्यागै शिव नामा । वृथा होय सो काल विरामा ।।

दोहा 5

पल भर लौ जे शिव जपै ते निवसै कैलाश ।

तजे रहै जे सदा शिव अमित वर्ष दुख ग्रास ।।

हम अरु विधि प्रजेश महिपाला । विश्व विरद लोकप दिगपाला ।।

शिव दर्शन हित नित प्रति जावै । पूजति लिंग सिद्ध सब पावै ।।

ते कर वर मार्जहि शिव धामा । ते मुख सफल जपै हरि नामा ।।

सो सिर सफल जो शिवहि नवावै । चरण सफल शिव क्षेत्र मझावै ।।

दर्शहि लिंग सफल सो लोचन । श्रवण सफल सिव कथा सुरोचन ।।

शंभु कथा सुनि पुलकित अंगा । सो तन सफल सदा अघ भंगा ।।

सफल मातु पुतु सुत बढ़ भागी । जो शिव चरण कमल अनुरागी ।।

नहि तौ वांझ किमि तनय प्रसूती । जिन हरि कथा न वंदि विभूती ।।

दोहा- 6

धेनु धाम धन धरणि मणि रथ तुरंग गजराज ।

भूषन वासन वसन लगि विनि शोक समाज ।।

शंभु कथा रस करहि न पाना । श्रवण तासु अहि भवन समाना ।।

जिन शिव लिंग न दर्शन जाना । ते लोचन खद्योत समाना ।।

शिव सन्मुख जे नवहि न माथा । मुकुट भार सम शीश अकाथा ।।

शिव शिव जपहि न जिनकी जिहा । ते दादुर सम वचन अलोहा ।।

शंभु क्षेत्र जे पग नहि जांही । जीवत सब सम तेज गमांही ।।

जिन शिव पूजन करहि न जाना । ते कर क्रूर कठोर समाना ।।

जे शिव कथा न सुनि हरषाई । कुलिष कठिन छाती निठुराई ।।

शिव पूजन हित प्रेम न जाना । सो नर स्वान श्रृगाल समाना ।।

दोहा - 7

स्वान स्वामि उपकार करि पथ परषै खल संत ।

निसि गति सगुण ऋगाल मुख मृतक वानि गुण अंत ।।

मानुस सकल सरीर अकाजा । पशुपल अस्थि चर्म पर काजा ।।

पर स्वारथ पशुतन सब जीवा । नर निकाम दुखन कै पीवा ।।

भोजन निद्रा मैथुन साजा । सकल जीव कै नित कै काजा ।।

मनुज हेतु शिव सेवन पावन । दान पुन्य रत भक्ति सुहावन ।।

नेम घर्म व्रत संयम त्यागा । हरि हर सेवन छमा विरागा ।।

जो अस होय तो मानुष नीका । ना तरु पशु उत्तम नर फीका ।।

जड़ चेतन तन धर सव नीके । चल परहित तरु फलै अमीके ।।

पसु तृन चरै करै पय ईंधन । मनुज भोग वियंजन मल गंधन ।।

दोहा -8

अहंकार मद काम छल तृश्ना मोह विकार ।

लोभ क्रोध मत्सर सकल मानुष तन आधार ।।

तरु देय छाह पत्र फल फूला । मनुज सबल रंकै प्रतिकूला ।।

तापर यह शरीर छण भंगा । कृमि विट भस्म कर्म गति अंगा ।।

ग्रह सम्पति सब तोय तरंगा । दामिन गति जीवन तन भंगा ।।

ताते तजि नर तन अभिमाना । निस दिन सुमिरौ शंभु सुजाना ।।

सर्पादिक विषधर हर भूषन । शिव सुमिरत करि सकै न दूषन ।।

सेवहि पुरुष लिंग त्रिय गिरजा । लिंग विभेद गवरि गुण सिरजा ।।

सुनहु देव ऋषि मन अनुमानी । देव लिंग अब कहौ वषानी ।।

निज अनुरूप मूर्ति निरमाई । पूजहु लिंग धातु मणि लाई ।।

दोहा - 9क

श्रीपति कहि सब शिव चरित प्रेम सहित हित पाय ।

मृण मय मणि मय धातु मय मूरत भेद सुनाय ।।

सोरठा -

विहसे सुर समुदाय विष्णु वचन सुनि ह्रदय गुनि ।

हर्ष न ह्रदय समाय तन पुलकित गद गद गिरा ।।

सुनि मूरति पूजन शिव धामा । देव ऋषिन किये हरिहि प्रणामा ।।

सुनि विरंचि मधुसूदन वचना । कही विश्व कर मैं करु रचना ।।

गुण विरंचि वाणी विसुकर्मा । अमित लिंग देवन हित निरमा ।।

प्रथक प्रथक मूरति निरमाई । सुर अनुरूप अनूप सुहाई ।

सो मुनि तुम सन कहौ वखानी । सुनहु वेद वितचित हित मानी ।।

शिव पूजन ते भव भय नासा । विद्या अरु तप तेज प्रकाशा ।।

सुख सम्पति जेतक जग मांही । पूजत शिव दुर्लभ कछु नांही ।।

जो कछु होय कामना जाके । सेवहि पद शंकर गिरिजा के ।।

दोहा - 10

विसुकर्मा शिव लिंग रचि देव ऋषिन वहु भांति ।

दयेउ सवै गुण भेद करि शंकर प्रतिमा पांति ।।

सोई शिव लिंग सुभग विसुकरमा । दये सुरन साधक शिव धर्मा ।।

विलग विलग मूरति वहु भांती । दयी सुरन सो वरणौ जाती ।।

इन्द्र नील मणि मय रचि लिंगा । हरि पूजन हित दये अभंगा ।।

कनक लिंग विधि पूजन हेता । सुवरन लिंग कुवेर प्रचेता ।।

रवि कौ दीन ताम्र मय लिंगा । इंद्रय पद्म राग मय पिंगा ।।

घर मैं दय प्रतिमा मणि पीता । शिवा लई मूरति नवनीता ।।

जछन दय दधि लिंग निरंतर । वरुणै श्यामल मणि मय अंतर ।।

रजत लिंग दय विश्वै देवै । आठौ वसुन रजत निरभेवै ।।

दोहा -11

द्रोण लिंग गोमय धरा गोवर गवरि वनाय ।

नन्द यशोदा गोप भये कृष्ण भये सुत आय ।।

रांगे मूरति वायु अधारा । पार्थिव कै अस्विनी कुमारा ।।

व्राह्मण अर व्राह्मणन की नारी । मृदा लिंग तिन हेत विचारी ।।

आठ अनन्तादिक अहिराजा । दय प्रवाल मूरति तिन काजा ।।

वज्र विभावसु कमलै फंटिका । सोम राज कौ मोतिन घंटिका ।।

लौह लिंग लै भूत पिसाचा । दैत्य राछसन गोमय राचा ।।

रतन जड़ित मूरति बृह्मानी । प्रष्ट लिंग छाया हितआनी ।।

लिंग ज्योति मय पावक लयेउ । मृण मय लिंग ऋषिन कौ दयेउ ।।

सारद मूरति लई धनन्तर । अमित पन्थ पय पिवहि निरंतर ।।

दोहा - 12

विधि हरि हर सुर असुर नर नाग जछ् महिपाल ।

लय लय मूरति विरति युत पूजन हित सब काल।।

लिंग मूर्ति दय सवहि सुहाई । पूजा विधि हरि वहुरि वताई ।।

भये कृपानिधि अन्तरध्याना । गये धाम निज विधि सुर आना ।।

पाय लिंग सुर नर मुनि बृन्दा । विधि प्रति पूछत सहित अनन्दा ।।

नाथ कृपा करि अति हित पाई । शंकर पूजन देउ वताई ।।

हर्षि महर्षि वचन सुनि धाता । शिव पूजा विधि कहि विख्याता ।।

सो विधि सुनि मुनि देव अनन्दे गम नित गृह विरंचि पद वन्दे ।।

निज ग्रह जाय सकल सुर जाती । पूजे लिंग सुने जेहि भांती ।।

भये सकल सुर पूरण कामा । युवतिन सहित लहे विश्रामा ।।

दोहा - 13

शिव पूजे रावण असुर लहेउ लंक निज राज ।

मृत्यु पाय हरि कर गयो शिव पुर सहित समाज ।।

शिव कौ पूजि चक्र हरि पायेउ । चतुरानन विधि नाम कहायेउ ।।

सेवत दिति दुय सुत जाये । महावली वैकुण्ठ डिगाये ।।

विश्वामित्र करेउ शिव सेवन । भये बृह्म ऋिषि जीति मुनि देवन ।।

अत्रि वशिष्ठ लागि मुनि देवा । लहे मनोरथ करि शिव सेवा ।।

ते अधिकार अधिक सरसाये मन वांछित अमोघ फल पाये ।।

सो शिव पूजा जग सुख दायक । दोष हरणि भव सिंधु सहायक ।।

सकल विभव दायनि दुख हरणी । भव भेषज जन रोग विदरणी ।।

जो विधि करि फल पावहि लोका । सिद्धि लहै छूटय दुख शोका ।।

दोहा-14

सदा पूज्य शिव सवन के फल दायक तत् काल ।

पूजन के वहु सुख लहत सो पूजति शिवद्याल ।।



।। इति श्री शिव चरित्र प्रथमोअध्याय ।।

पच्चीसबां अध्याय

।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्तीयपाद पंचदशोध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


शौनक सुनहु चरित हित कामा । जवहि विरंचि गये निज धामा ।।

मुनिन वुलाय कही विधि वानी । सुनहु देव ऋिषि हित अनुमानी ।।

जो सुख इच्छा सदा तुम्हारे । चलहु संग लगि वचन हमारे ।।

विधि अस कहि मुनि सुरण समेता । गमने छीर पयोनिधि केता ।।

तंहा सकल मिलि करहि विचारा । अस्तुति कीजिय कौन प्रकारा ।।

नमत मुदित मुनि देव विधाता । शेष सेज सायन सुरत्राता ।।

जगन्नाथ जय भक्त अभय प्रद । कमला कांत नौमि मंगल सद ।।

अच्युत अखिलेश्वर अविनासी । अलख अगोचर अग जग वासी ।।

छंद

वंदौ श्रीवत्स श्रिया सहितं सुमिरे भव सागर निर्वहितं ।

धनश्याम पीत पटावरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

तन चारु चतुर्भुजते अमलं कर शंख औ चक्र गदा कमलं ।

मणि कुन्डल क्रीट अलंकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

पुरुषोत्तम जय श्री वत्स विभुं रवि कोटिन भास प्रयास प्रभुं ।

नव नीरज नयन शुभं अरुणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

कंदर्प करोर लखे अरुचै माया दासी सम दूर नचै ।

निधि रिद्धि सुसिद्धि उपाकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

वहु भूषन भूषिन अंग अलं सुख मुक्ति विमुक्ति प्रदं अचलं ।

सर्व शरष्य मही धरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

सोरठा 1

उर वैजयंती माल मेघ श्याम अभिराम तन ।

पद वंदन शिवद्याल विश्व भरण भव भय हरण ।।

दोहा -1

तुलसी कुमुद सरोरुह पारिजात गंधार ।

शिवद्याल पंचमि निर्मित वन माला विस्तार ।।


तन वन माला धरे सुरत्राता । नौमि कृपानिधि पद जलजाता ।।

ज्ञानांजन प्रभु भव भय भंजन । निश्चर गंजन जन मन रंजन ।।

सेवत हरि दुर्लभ गत पावै । मिटै दोष कलि कलषु नसावै ।।

जिहि दुख को लखि परै न पारा । ताहू को नाथ करत निरधारा ।।

करहु कृपा करि हरि दुख दूरी । जय घन श्याम रही धुनि पूरी ।।

यद्धपि कृपानिधि संकट हारी । प्रभु प्रसीद देवेश मुरारी ।।

पुरुषोत्तम कृपाल करुणाकर । जगन्नाथ जगपति जै जगधर ।।

दरष देउ अव ओघ विदारी । सुर रंजन गंजन तमचारी ।।

दोहा-2

नौमि अनादि अनंत प्रभु अनभव अगम अपार ।

शिवदयाल विधि विनय करि देव ऋषिन अधिकार ।।

यह अस्तुति विधि कृत अति पावनि । कोमल सुन्दर सुगम सुहावनि ।।

तब प्रघटे वैकुण्ड विहारी । जै जै धुनि सुर मुनिन उचारी ।।

बोले मधुसूदन गोविन्दा । किहि कारण आये सुरबृंदा ।।

सब मिलि स्वारथ करौ विचारी । दरश हमार सकल दुख हारी ।।

तब वोले मुनि देव विधाता । संसय हरण उभय सुरत्राता ।।

भजन तुम्हार सदा हितकारी । तदपि सु कहौ विधान विचारी ।।

नित पूजन कीजिय कहौ काको । सेवन सुभग बतावहु ताको ।।

कवन काल अरिचै केहि भांती । जो शिव ईश्वर अमल अजाती ।।

दोहा -3

पूजन रुचिर वतावौ श्रीपति करुणा ऐन ।

शिवदयाल कृपाल दयाल हुय हरि वोले मृदु वैन ।।


।।। इति श्री शिव तरित्र महत्मे पंचदशोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।। द्वतीयपाद समाप्त ।।
।।।--- स्थाणोर्चरित्रम ---।।। राम ।।।

चौवीसबां अध्याय

।।। अथ श्री शिव पुराण परिपाटी द्वतीयपाद चतुर्दशोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


सुनहु ऋषी सो रथ परमाना । सकल देवमय जस निरमाना ।।

शिव हित रथ विरचे विसुकरमा । सर्व लोक मय रचिसुवरणमा ।।

रथ को अंग दाहिनो भानू । द्वादश रवि आरा गज मानू ।।

शोभित वाम चक्र चन्द्रमा । षोठस कला सो आरा निरमा ।।

किरणी समनझ रथ वांये । योग लगन भूषित अंगदाये ।।

षट ऋितु सोच क्रनकै पूठी । द्वादश मास उभय दिशि जूठी ।।

निसि अरु दिवस फरै ढुय लागी । पटली सात वार कै सांगी ।।

पुष्कर अंतरिक्झ दिसि वाँये । नीड़ मेरु मंदर अंग दायें ।।

दोहा - 1

भूषन गंगादिक नदी सिन्धु तुला ये चारि ।

वंधन जंत अनंत अहि पच्छ पैजनीकारि ।।

उदय अस्त गिरि कूवर सोऊ । वत्सर वेग अयन धुर दोउ ।।

तुरग वेद सारथी विधाता । मंत्री भये वियुन सुर त्राता ।।

प्रणत ब्रह्म लघु उभय पताका । सात दीप सो जटित सलाका ।।

महाछत्र जो गगन अखन्डा । मंदर सूल सुभग सोय दन्डा ।।

हिमगिरि धनु गुण शेष भुजंगा । सरसुत घंटा शव्द अभंगा ।।

विष्णु तेज सर पावक गासी । माया जाल मनोरथ ठासी ।।

ये गुरु शेष सकल ब्रह्मण्डा । ते सब जोरि लगे रथ खन्डा ।।

तापर आय चड़े शिव शंकर । जो कालहु के काल भयंकर ।।

दोहा 2

व्रसम रूप धरि भूमिधर सो रथ दियो उठाय ।

चलो पमन मन वेग सम गति नहि वरणि सिराय ।।

रथा रूढ़ शिव देव न देखे । जै जै करहि विजय के लेखे ।।

तिहि अवसर शिव रूप प्रकाशा । मनहु भानु कोटिन संकाशा ।।

शिवा सहित सोभित अधिकाई । वरस सहस नहि वर्णि सिराई ।।

सैन संग चतुरंग सुहाई । विधिही मुनि गण सुर समुदाई ।।

रवि शनि वरुण कुवेरहु ता सन । वायु इन्द्र यम काल षडानन ।।

वीर भद्र नंदी गण भृंगी । समर जुझार महारण रंगी ।।

कुंद दंत हिम करवर झंपन । चंड प्रचंड प्रकंड प्रकंपन ।।

सोरठा - 3क

दूषित त्रिसिखि झंखार सहस पंच सत नयन मुख ।

अजा बदन जंतार कट पूतन सत सिंह ककट ।।

दोहा 3-ख

अधै बक्र हय गज वदन सेनापति जे सर्व ।।

जारि सकै सब लोक पुर चले संग शिव खर्व ।।

हल मुगधर मूसल गिरि साला । तोमर फरष त्रिसूल कराला ।।

खडग भुसुंडि भालु धनु भाथा । चक्र परिधि शक्ती गद हाथा ।।

नाना अस्त्र शस्त्र करधारी । चले सकल कहि जै मदनारी ।।

जटा जूट कर दंड सिधारण । वर्षहि सुमन सिद्ध मुनि चारण ।।

नचै अपसरा गंधर्व गावै । वाजन विविध प्रकार बजाई ।।

सेन संग लै चले महेशा । भूमि भार सहि सके न शेषा ।।

डोली धरणि महीधर कांपै । दिग्गज चिंधारहि पद चांपै ।।

नवे शेष सिर उर सकुचाने । विचली धेनु कमठ अकुलाने ।।

दोहा 4क

इहां पंच मुंडन मिलि जपन धर्म निर्माय ।

त्रिपुराधिप एकत्र करि निज कर इष्ट पुजाय ।।

सोरठा 4ख

देव सुअवसर पाय त्रिपुरासुर इक ठाँह लषि ।

कही शंभु प्रति जाय वेगि नसावहु दनुज पुर ।।

विधि हरि कह सो अवसर पाई । शंभु असुर नासहु दुखदाई ।।

ताहि समय सुर नर मुनि बृंदा । कहैं परस्पर सहित अनंदा ।।

शिव समरथ अचरज कछु नाही । त्रिपुर लोक दहै छण मांही ।।

सो मुनि शिव कार्युक विस्तारा । अगनित कोश प्रमाण अपारा ।।

कीन्ह रुद्र गण धनु टंकारा । वघिर भये सव रब सुनि घोरा ।।

वहुरि काल सम सर संधाना । विकसित पावक प्रलय समाना ।।

शिव त्रिपुरासुर ओर निहारी । कर पिणाक विष विशिष प्रहारी ।।

प्रघट शिखा जनु दामिनि लागी । फुकरत घोर झरत जनु आगी ।।

दोहा - 5

वान विकाशै अखिल जग तेज प्रकाश अपार ।

यथा प्रलय पावक दहय तेज सकल संसार ।।

छण मैं जारि करे पुर छारा । त्रिपुरासुर सिर शिव संघारा ।।

अपर दहे दानव सत कोटी । भई निशाचर दल गति खोटी ।।

सर संकाश भुवन भय हारी । चकित चौंकि सब रहे निहारी ।।

रहेउ शव्द सो भरि त्रैलोका । भये देव मुनि मनुज अशोका ।।

जो शिव रुद्र भयंकर काला ।भुवनांतक भुवनेश कराला ।।

लोक प्रलय शिव नैन उघारत । भृकुटी भंग सवै जग जारत ।।

तिहि शिव कै सोय रूप निहारी । भय वस भये देव मुनि झारी ।।

स भै सकल शिव ओर निहारे । रहे मौन कछु काल विचारे ।।

सोरठा -6क

भय वस कंपित गात उमौ भयंकर रूप लखि ।

ह्रदय बिकल विलखात शंभु समीप न जात कोउ ।।


दोहा - 6 ख

देव दनुज ऋषि मुनि मनुज शिवहि निरखि सकुचात ।

शिवदयाल दसा सोय निरखि हरि वदन मोरि मुस्क्यात ।।

सभै हेरि हरि शैल कुमारी । देव दनुज ऋषि मुनि जन झारी ।।

अति कृपाल सो अवसर जानी । हरि विरंचि वोले मृदु वानी ।।

सदा सवन के भव भय हारी । अव ते नाम भयो त्रिपुरारी ।।

नर निश्चर शिव सेवन करिहै । रुद्र गणन पति हुय अवतरिहै ।।

तेहि अवसर विधि विनय प्रकाशी । जै शंकर महेश कैलाशी ।।

जै हर गंगाधर गिरि वासी । जै शिव चिदानन्द सुख रासी ।।

जै पिणाकधर शिव अविनासी । गिरिपति गिरिजापति गुणरासी ।।

जै शशिधर नित निवसत काशी । शिवदयाल उर सद मन वासी ।।

दोहा - 7

वहुर कहा विधि विनय करि मो प्रण सुनहु महेश ।

सदा सारथी हम रहय तुम रथ पर देवेश ।।

सेवहि नाक नागपुर वासी । विधि हरि अविचल विनय प्रकाशी ।।

तेहि अवसरहि हरि जगदीशा । कर संपुट विनवत नमि शीशा ।।

जै महेश बृषधुज गौरीशा । निर्गुण ब्रह्म सगुण अधि ईशा ।।

जय गंगाधर हर नन्दीशा । प्रकृति पुरुष रूपक जगदीशा ।।

जै डमरूधर शंभु गिरीशा । रूद्र विश्व ई श्वर काशीशा ।।

जै भक्तन प्रिय शांत महीशा । नील कण्ठ करवर अवनीशा ।।

वार वार विनवौ कालीशा । शिवदयाल उर वसौ दिगाशा ।।

तेहि अवसर मुनि देव समूहा । अस्तुति करण लगे मिलि जूहा ।।

छंद
-----–----------- शिव स्तुति -----------------------

नौंमि वृषध्वज चन्द्र शेषर नीलकण्ठ जटा धरं ।।

शीश गंग भुजंग कंकण भस्म अंग करय वरं ।।

लाल कंज विशाल लोचन मुण्डमाल विश्वे श्वरं ।।

व्याघ्र छाल हिमाल आसन फटिक गौर महेश्वरं ।।

मदन दाहन ब्रषभ वाहन डमरु कर धर सुन्दरं ।।

शीश नाग पिणाक पाणी चरण पंकज फणिपुरं ।।

जयति शिव हर कंठ विषधर रुद्र शंभु दिगंवरं ।।

शिवद्यालगिरिजासहित शंकर वसौममउरअनंतरं ।।

सोरठा 8-क

वोले शिव सुखधाम विनय प्रेम वस मगन मन ।

विधि हरि सुर हित काम मागहु वर मन भावनो ।।

दोहा - 8ख

यदि प्रशन्न भगवान शिव जो चाहत वर देन ।

जंहां विकट संकट परै पघटौ दुख हरि लेन ।।

तथा अस्तु वर वोलि महेशा । अपर वचन अब सुनौ सुरेशा ।।

यह असतुति जो सुनै कि गावै । मन वांछित अमोघ फल पावै ।।

तेहि अन्तर मुंडी ते आये । करि प्रणाम मृदु वचन सुनाये ।।

कवहु कृपा निधि तजव न नेहू । अव का मोहि अनुशासन देहू ।।

तिनके वचन सुनत विधि हरि हर । वोले वचन अखिल मंगलकर ।।

सदा सकल रैहौ धनवंता । दयावान कोमल चित संता ।।

तव लगि वसहु मरुस्थल देशा । जव लगि कलयुग करहि प्रवेशा ।।

वन्श तुम्हार रहै जग छाई । पूर्व सिंधु सीमा समिताई ।।

दोहा - 9

तब कुल शिष्य सराउगी वैश्य होय सुभ जाति ।

पूजहि पारस दिउ हरे नेम नाथ वहु भांति ।।

गया से अगिनि कोण त्रय कोसा । तव कुलधर कीटक होयजोसा ।।

तासु तनय हरि वौध्य वतारा । सूद्रन कृत हति हरि महि भारा ।।

श्रद्धा श्राद्ध पितर निरधारा । वोधगया तेहि कहै संसारा ।।

इन्द्र नील मख करी सुरेशा । तंह जगदीश आन भुवनेशा ।।

सो मम अंश वौध समकारा । तेहि कहै जगन्नाथ संसारा ।।

जिनहि दरस पद लहै निर्वाना । पग प्रतिफल गोदान समाना ।।

तब ते अति कुल बढ़ै तुम्हारा । निर्फल होय न वचन हमारा ।।

वहुरि वर्ष सोरह सै वाते । अमर सिंह से उरा प्रतीते ।।

दोहा - 10

अमर सवेरा करि सकै दर्श ते पूरण मास ।

दश गिसि वारह कोस मैं पूरण चन्द्र प्रकाश ।।

प्रलय दिखाय पयोनिधि वारी । शंकर अमरै छल करि मारी ।।

वद्रीवन थपि नर नारायण । रामाश्रय तजि विजय परायण ।।

सो जीते सुर नर मुनि झारी । धर्म जपन मत अति विस्तारी ।।

तब हम सव धरिहै अवतारा । शेष अंश रामाश्रम धारा ।।

ब्रह्म सर्म विधि अरु हम मंडन । शिव शंकराचार्य मत खण्डन ।।

गणपति वक्रतुन्ड मम जेतू । सब करहै मरजादा सेतू ।।

यह सुनि मुडिन कीन्ह प्रणामा । निवसे माड़वाड़ करि धामा ।।

विधि हरि हर भये अन्तरध्याना । गये देव सव निज अस्थाना ।।

दोहा - 11

शिवद्याल सुभग संवाद यह श्रवण करै धरि ध्यान ।

तिनके सकल मनोरथ पुरवै शंभु सुजान ।।



।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयोपाद चतुर्दशोअध्याय ।।।

तेइसबां अध्याय

।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे त्रयोदशोध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


तब शिव नन्दी गणहि हंकारी । सहित षड़नन शैल कुमारी ।।

जग्य भवन तब प्रविसे जाई । वंदन लगे देव समुदाई ।।

द्वार समीप देव मुनि बृन्दा । कहैकि कह आग्या शिर चन्दा ।।

व्याकुल हुय सुर करैं पुकारा । कह करनीय कहौ निरधारा ।।

हम सब पातकि अधम अभागे । दनुज राज सब परम सुभागे ।।

यह कहि प्रविसे देव शिवाला । करत अनेक शव्द तिहि काला ।।

सो धुनि सुनि कुंभोदर धावा । अति विकराल काल सम आवा ।।

दण्ड ताड़ि मुनि बृन्द गिराये । त्रासे विवुध निकट जे पाये ।।

दोहा -1

कश्यप आदिक मुनि सकल इंद्र आदि सुर बृंद ।

गिरे धरणि शिव शिव सुमिरि परे महा दुख फंद ।।

भय वस हा हा कार पुकारे । अहो देव कस भाग हमारे ।।

हा कृपाल हा हरि जगदीशा । विनवत नवत धरनि धरि शीशा ।।

अय नारायण जन भय हारी । पाहि कृपानिधि शरण तिहारी ।।

अपर देव मुनि कहै विचारी । अवहि न भावी मिटी हमारी ।।

विकल देखि सुर मुनि समुदाई । करुणा निधि करुणा उर आई ।।

कृपा सिन्धु यह अवसर पाई । देव ऋषिन से कहि समुझाई ।।

शिव सेवन हित चित्त लगावौ । तब तुम सकल मनोरथ पावौ ।।

तिहि ते करौ सुगम शिव सेवा । जदपि सुअगम अखण्ड अभेवा ।।

दोहा - 2

यदि असाध्य शिव पूजन परम कठिन सब काल ।

तिनके अवराधन करे सिद्धि होत शिवद्याल ।।

अब तुम किहि कारण दुख कारौ । हमरे मत ह्रदय शिव धारौ ।।

शिव समान को पर उपकारी । वरदै वक्रहि सहे दुख भारी ।।

तदपि न तीसर नयन उघारी । सुकृत दारु जिमि बोरै न वारी ।।

वहुरि सुरन कह अय जगदीशा । तुम कहि दुराराध्य गौरीशा ।।

किहि विधि वस होवै सुरत्राता । सो सब मोहि कहौ विख्याता ।।

कह जगदीश सुनौ मुनि देवा । देंउ वताय मंत्र निरभेवा ।।

विंसति अंक को मंत्र विशाला । निर्मल सुन्दर सुभग रसाला ।।

समुझे वर्ग वरण अरु मात्रा । श्रीपति कहै सुरन प्रति वात्रा ।।

दोहा -3

वरण पांच युग वर्ग वसु मात्रा द्वादश भांति ।

शिवदयाल समुझै कहै वचन भेद त्रै पांति ।।

आठ पांच द्वादश अनुमाना । अंक भेद शिव जपन विधाना ।।

अछर आठ एक अरु तीना । षट त्रय एक अंक मिलि गीना ।।

अंक भेद जानय येहि भांती । शिव शिव मंत्र जपै दिन राती ।।

औरौ मंत्र सुनहु जो बीसा । शीघ्र प्रशन्न होय नन्दीशा ।।

ऊँ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु । कुरु शिवाय नमः ऊँ मंत्र जुरु ।।

एक कोटि जपिकै यह मंत्रा । तव दरसै शिव रूप स्वतंत्रा ।।

देय अखिल कामना अनन्ता । शिव कृपाल कोमिल चित संता ।।

तजौ सकल दुख दुंद हिरासा । दनुज मारि हरिहैं शिव त्रासा ।।

दोहा -4

गोपय दधि मधु धृत रस शिव शिर धार समोय ।

शिवदयाल कोटि यह मंत्र जपि सफल कामना होय ।।

सुनि श्रीपति कै कोमल वानी । संकट हरणि कृपामृत सानी ।।

सकल देव जप ध्यावन लागे । एक कोटि मिति करि अनुरागे ।।

तेहि अनसर प्रघटे शिव शंकर । पंच वक्र त्रय नयन गरलधर ।।

विहसि कहा शिव कृपा निधाना । हम प्रशन्न मांगौ वरदाना ।।

सुर मुनि सवहि प्रशन्यति जानी । विनय करत शिव सुजस वखानी ।।

जयति नाथ शिव कृपा निधाना । अगम अनादि अनंत सुजाना ।।

अछै अजित योगिन उरवासी । सेवक सुखद सदा अविनासी ।।

मदन दहन दानव कुल नासन । अस कहि विनती करेसि प्रकाशन ।।

दोहा - 5

मसि काजर गिरि सिंधु धट सुर तरु लिखनी कार ।।

कागद महि सारद लिखहि शिव गुण लहै न पार ।।

छंद-

नमामि शंभु शंकरं प्रलय समय भयंकरं ।।

परावरं सुरपितं नमामि लोक दीपितं ।।

कपर्दिनं त्रिलोचनं त्रिलोक शोक मोचनं ।।

गणाधिपं सुरेश्वरं नमामि ते महेश्वरम ।।

कार्ज कारण रूपकं सदा शिवं अनूपकं ।।

स्वविश्व व्याप्य वयापकं त्रिताप पाप तापकं ।।

सुरारि बृंद त्रासनं अघौघ मूल नासनं ।।

दुजेन्द्र धेनु रंजनं मदादि दोष भंजनं ।।

इदं स्तोत्र शंकरं नित्यमेव निवेदितं ।।

शिवद्याल निर्मितं पठ़ै सुखं अपर्मितं ।।

सोरठा -6क

अस्तुति विधन विधान करन लगे करन लगे शिवद्याल सुर ।

कह मांगौ वरदान हुय प्रशन्न जगदीश्वर ।।

6ख

पुनि वोले मुनि देव हम सब शरण महेश के ।

यदि प्रशन्न महदेव नासहु पुर त्रिपुरेश के ।।

दोहा - 6ग

विसुकरमा सन वोलि कह प्रभु सो अवसर पाय ।

सहित सारथी रथ धनुष सर सब निरमौ जाय ।।

छंद

विसुकरमा हर शासन पाय ह्रदय हरसाय चलो सिरनाई ।।

देवन लोकन मय रचिकै रथ विस्वकै अर्थ समर्थ बनाई ।।

सो देखि के देव मुनि हरषे अवतौ त्रिपुरासुर दुष्ट नसाई ।।

शिवदयाल कृपाल के शासन ते रथ पर्म विशाल दियो निर्माई ।।



।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे त्रयोदशोध्याय ।।।


।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।

वाइसवां अध्याय

।।।अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद द्वादशोध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


वहुरि सूत कहय मुनि बृन्दा । रहा जपन मत पूरि अनन्दा ।।

प्रघट अधर्म धर्म सब नाशे । जंहां तहां पाखंड प्रकाशे ।।

नारि धर्म वरणाश्रम धर्मा । शिव हरि पूजन जज्ञ सुकर्मा ।।

अस्नान दान तीरथ व्रत पर्वा । वेद धर्म आदिक पथ सर्वा ।।

इनहि आदि दै जे शुभ काजा । दूरि करै मग वेद समाजा ।।

सकल विश्व वस जा माया के । सदा रहहि विधि हरि वस जाके ।।

जा लक्ष्मी कौ तपि निर्भेवा । अमर भये विधि हरि हर देवा ।।

सो लक्ष्मी त्रयपुर सरसाई । तप करि विधि से असुरन पाई ।।

दोहा -1

जो प्रभुता धन धाम लखि मोहत सब संसार ।

सो प्रभुता पूरण त्रिपुर जैनी धन अधिकार ।।

जो धन भुवन चारि दश माही । देवन रत्न त्रिपुर वस पाही ।।

सो तजि नगर वहिर सब आये । प्रभु माया वस मोह जनाये ।।

विष्णु माय निर्मित जो माया । ता वस बुधि मोहै समुदाया ।।

गहि सो पंथ तजे श्रुति धर्मा । शिव तजि गहि पाखंड अकर्मा ।।

यह विधि जव नासे श्रुति सेतू । तजि गये लिंगार्चन बृषकेतू ।।

नारि धर्म नासे अनिआशा । दुराचार मन भये दुरासा ।।

भये कृतार्थ देवन युतहरि । समुरन लगे उमापति सिरधरि ।।

पार्थिव लिंग पूजि परिपोषे । विनती करि हरि शिव संतोषे ।।

दोहा -2

बह्म रूप परमात्मा नारायण शिव रूप ।

रुद्र महे श्वर नौमि हर शिवदयाल अनरूप ।।

इमि विनवत करि दंड प्रणामा । जपत मंत्र सत्रुन्जय नामा ।।

लक्ष् पचास कोटि भय लिंगा । धरि जल मध्य पूजि पंचागा ।।

तेहि अवसर तब तह मुनि अरु देवा । लगे करन विनती कर सेवा ।।

नौमि सर्व आत्मा शिव शंकर । रुद्र प्रचेत विरूप अर्तिहर ।।

जै सुरारि सूदनचित संता । वंदौं आदि अनादि अनन्ता ।।

प्रकृति पुरुष तुमही जगभरता । सिरजन प्रतिपालन संधर्ता ।।

प्रकृति शक्तिमय जगमय धाता । सुर मुनि बदत बरद विख्याता ।।

शिव तुम श्रुतिन मध्य श्रुति सारा । वेद श्रुतिन के जानन हारा ।।

दोहा 3

शिव अमूर्ति वहु मूरति रूप अरूप विरूप ।

जक्ष् पितर किन्नर उरग सुर नर सबके भूप ।।

सिद्धि साध्य मुनिगण गंधरवा । स्थावर आदिक तुम सबसर्वा ।।

भृकुटी वंक प्रलय छिन कारत । तिनहि कवन श्रम असुर संहारत ।।

पाहि शंभु सब शरण तुम्हारे । हरहु नाथ दुख दोष हमारे ।।

मन बच कर्म सेवक सुखदायक । योगिन योग वित्त सुर नायक ।।

तुमही तत्व बदै अस वेदा । तेज राशि जग मैं निरभेदा ।।

परमात्मा जगधर विश्वम्भर । विश्वरूप विश्वै श्वर विषधर ।।

लखे सो सुने सुने तस देखे । जगत गुरू जग विभू विषेखे ।।

गुरु सुमेर मन्दर ब्रह्मंडा । लधुन मध्य परमानु प्रचन्डा ।।

दोहा - 4

सर्वपाणिपादान्त लगि नयन शिरोमुख मेव ।

अनाबृत सर्वज्ञ तुम अनिर्देश महदेव ।।

कोटि भाष्कर सम संकासक । शिव षट रविसति तत्व प्रकाशक ।।

तुम्है छाणि गति दूसर नाही । मोहित सब तब माया मांही ।।

देव विनय सुनि ळखि हरि जापा । नंदी युत हर प्रघट प्रतापा ।।

प्रणवत हरि शिर शिव कर परसा । देव ऋषिन उर आनद सरसा ।।

घन गंभीर गिरा शिव भाषा । सुनहु देव हरि भरि अभिलाषा ।।

नारद वोध विष्णु माया वल । सहित अधर्म भये दानव दल ।।

त्रिपुर विनास करन हम जावै । इन्द्र उपेन्द्र देव मुनि आवै ।।

शंभु वचन सुनि मुनि हरि देवा । कीन्ह प्रणाम वहुरि कह भेवा ।।

दोहा - 5

शंभु विनय यह प्रात नित पठ़ै सुनै मन लाय ।

शिवदयाल विजय संग्राम चढ़ि निहचै शत्रु नसाय ।।



।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वादशोध्याय ।।

इक्कीसबां अध्याय

।।।अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीय पाद एकादशोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


अस विचारि जगदीश विरेजा । पुरुष एक निरमेउ निज तेजा ।।

मय मायामय विदित सुरूपा । दानव धर्म विघन अनरूपा ।।

मुंडी मलिन वसन छिष पात्रा । कर मार्जनीकारि पद यात्रा ।।

कर अंवर धरि निज मुख झांपी । हरि सनमुख करजोरि कलापी ।।

करि विनती कह करौ प्रकाशन । हमकौ नाथ कहा अनुशासन ।।

तव बोले प्रभु कृपानिधाना । सुनहु कि जिहि कारण निरमाना ।।

काज हमार करौ मम अंशा । पूजनीय निसि दिवस असंसा ।।

मायन माया मय पढ़ि विद्या । कर्म विवादक वेद कि निंदा ।।

दोहा - 1

विरचि ग्रन्थ सोरह सहस अरिहन मंत्र प्रधान ।

दै हरि पारष नाम धरि पुनि कह सुनौ सुजान ।।

सोरह सहस ग्रंथ तुम धारौ । हम समर्थि दयेसि यह कारौ ।।

विविध भांति माया निरमानौ । वस्य अवस्य करी शुभ जानौ ।।

वाद विरोध रोध सब ठाई । इष्ट अनिष्ट दिखाय सुनाई ।।

उपासना कलपना अनेका । चित्र विचित्र विषद अविवेका ।।

यह प्रकार हरि ताहि बुझावा । मय मायामय शास्त्र पढ़ावा ।।

षोडस सहस शास्त्र उपदेशा । नेम नाथ पारष निरदेशा ।।

मोहनीय तुम सवहि रिझावौ । धर्म जपन मत दैत्य पढ़ावौ ।।

जपन धर्म जव होय प्रकाशा अपर धर्म श्रुति मारग नाशा ।।

दोह- 2

सब जीवन पर दया धरि अपर धर्म करि नाश ।

जग्य योग तरपन क्रिया जप तप नेम निराश ।।

तीनौ असुर विनासन हेता । जाय पढ़ाय दनुज चित चेता ।।

त्रिपुर नास करि धर्म प्रकाशौ । वहुरि मरुस्थल देश निवासौ ।।

द्वापर सूद्र जग्य तप करिहैं । ते हम जैन वौध हुय हरिहैं ।।

तव होवै अति बृद्धि तुम्हारी । शिष्य ते शिष्य प्रशिष्य अधिकारी ।।

कलिगत जपन अधिक विस्तारा । तव श्रीरंग मोर अवतारा ।।

जदपि जगत श्रुति सेतु नसैहौ । हमरी कृपा मुक्ति गति पैहौ ।।

मम अनुशासन यह आचरिहौ । अति धनवंत अंत भव तरिहौ ।।

सुनि सो मुंडी ह्रदय अनन्दे । चलत समय श्रीपति पद वंदे ।।

दोहा - 3

शिष्य चार मुंडी करे हरि आग्या अनुसार ।

तिनहि मुड़ाय पड़ाय निज शास्त्र सहित विस्तार ।।

गुरु संगति सोभित जुग चेला । प्रभुहि प्रणाम कीन तिन मेला ।।

आशिष दै हरि कह तुम पांचा । जस गुरु कोमल सिषि तस रांचा ।।

शिष्यन सहित सुमुंडित मुंडा । कल्पित करहु धर्म पाखन्डा ।।

पात्र सहित अंवर कर धारण । मृदु अल्पक भाषण हित कारण ।।

धर्म लाभ ते परे तत्व वद । कर पुंजिका कारि धरौ पद ।।

अंवर खंड सकल मुख बांधे । मलिन वसन उर हरि अवराधे ।।

हर्षि कृपानिधि विरचे उ नामा । आदि रूप ऋषि यती निरामा ।।

उ पाध्याय आचार जे राचा । भये प्रसिद्ध नाम युत पाचा ।।

दोहा 4

लोक सुखद कारण रचो माया मय निरमाय ।

प्रेम सहित अरिहन जपौ जपत चले शिरनाय ।।

प्रवसि नगर रिषि माया कारी । वहुरि ग्राम ते वन पगु धारी ।।

जगत मोहिनी मायन माया । मिलहि ते शिष्य होंय लखि दाया ।।

जे देखैं ते होय परायण । करैं वेगि सो मत धारायण ।।

हरि प्रेरित नारद तह आये । दनुज गेह हुय शिष्य सिधाये ।।

उठि असुराधिप चरण पखारे । अरध देय आसन वैठारे ।।

शीय नाय पूंछी कुशलाता । नारद कही कुशल बिख्याता ।।

यती धर्म एक येहि वन मांही । लखे बहुत अस दूसर नांही ।।

हमहूं तिनकै लीन्हेसि दीक्झा । तुम गुरु करहु होय जो ई च्छा ।।

दोहा - 5

दानव नारद वचन सुनि देखन जपन समाज ।

शिवदयाल सो चलसि मग कह अब पूरण काज ।।

नारद मुनि दीझालय जिनकी । शिक्षा सुभग लेव हम तिनकी ।।

यह कह दनुज नाथ गयो तंहवा । मुनिवर सहित जती वन जंहवा ।।

देखि ताप भा मोहित माया । कीन्ह प्रणाम वचन निरमाया ।।

दीक्षा देहु हंमय अमलाशय । धर्म सहित उर तेज प्रकाशय ।।

दनुज गिरा सुनि कह ऋषि ज्ञानी । राजन सफल जो जाचत वानी ।।

देउ वचन मम गिरा न टारौ । मृखा न करौ वचन यह हारौ ।।

दनुज महा मोहित वस माया । दये वचन ऋषि तजौ न दाया ।।

ऋषिसत्तम मुख अम्वर खोले । अरिहन मंत्र कान लगि बोले ।।

दोहा - 6

दनुजाधिप शिषि होत ही सकल असुर नर नारि ।

शिवदयाल सवन दीक्षा लई त्रिपुर निवासी झारि ।।



।।।इति श्री शिव चरित्र महत्मे एकादशोध्याय ।।।