।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे त्रतीयपाद द्वतीयोअ्ध्याय ।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
ऋषिन वहुरि पूंछा संवादा । शंभु कथा फिर व्यास प्रसादा ।।
शिव पूजन विधि सुरण सुनाई । सो मोहि सूत कहौ समुझाई ।।
सुनि विरंचि मुख देवन कीन्ही । पूजन सोय कहौ हित चीन्ही ।।
तव कह सूत सुनहु मुनि वृन्दा । शिव अरचा दायक आनन्दा ।।
सो संवाद कहौ निरधारा । युग सनकादि विरंचि कुमारा ।।
तिनहि व्यास पूंछी एक वारा । तिन सब कही सहित विस्तारा ।।
हम सो व्यास वदन सुनि पाई । कहई विचार यथा श्रुति गाई ।।
कह विरंचि सुनहु मुनि देवा । परम कठिन शिव शंकर सेवा ।।
दोहा - 1
भूसुर भूभुज वैश्य पुनि वरण सूद्र लौ चारि ।
तामहि चारौ वरण के धर्म कहौ विस्तारि ।।
प्रथमैं अति दुरलभ नर देहा । तामौ गृह सुत दार सनेहा ।।
तापर सब निज पच्छ सनेही । जग मैं ममता मोह न केही ।।
चारि वरण अरु त्रै दस जाती । सप्त वधिक द्वादस परधाती ।।
जौन जाति जग जनमै जाई । निज कुल धर्म करै समुदाई ।।
अति दुरलभ नर तन संसारा । दुरलभ उत्तम कुल अवतारा ।।
तापर दुरलभ दुज कुल धर्मा । अति दुरलभ विद्या सत कर्मा ।।
विवुध कहै धनि विप्र शरीरा । विद्या विनय विदुष सो धीरा ।।
दुज वर वंस जन्म जो धरई । संध्या तरपन हुय जप करई ।।
दोहा - 2 क
वेद पठन पाठन जजन जाजन प्रति गृह दान ।
व्राह्मण के षट कर्म शुभ छत्री के तीन प्रधान ।।
2ख
छत्री के हित कर्म त्रै जजन पठन श्रुति दान ।
वैश्य सूद्र दुय करि सकै जज्ञदान सनमान ।।
छत्री वंश जनम जो पावै । समर मरण तौ जग जस छावै ।।
वैश्य वंश पावै अवतारा । पशु पालनी बाणिज वैपारा ।।
सूद्र वंश जो जन अवतरई । छेत्र ववन दुज सेवन करई ।।
जिहि जिहि जाति जाय अवतरई । निज कुल धर्म लाग सब करई ।।
जाति धर्म जग जदपि अनेका । अन्तिम निज कुल धर्म विवेका ।।
निज कुल धर्म सदैव सहायक । पर कुल धर्म सदा भयदायक ।।
जब लग ह्रदय न प्रघटै ग्याना । तब लगि कर्म आचरण माना ।।
कर्म से सहस गुणी तप जागा । तपते सहस गुण जय अनुरागा ।।
फल जपते सहस्र गुण ध्याना । सदा प्रशंशत बिबुध निधाना ।।
दोहा - 3
ध्यान से विदित विचार उर तव प्रधटत विज्ञान ।
शिवद्याल भक्ति से विरति होय दोनौ मोक्ष प्रधान ।।
ब्रह्म विचार ध्यान रत अहई । तिनहि समीप सदा शिव रहई ।।
योग ध्यान जब निरषैं शंकर । होय ज्ञान साधन तेहि अन्तर ।।
पातक पुंज दहन मन ध्याना । सोइहि हम सर मन विज्ञाना ।।
विदित ब्रह्म विद्या वुध जोई । विद्या सकल विसुद्धित सोई ।।
यह अज्ञान विदित जग माही । सुख दुख क्रिया विचारत नाही ।।
ज्ञान विसुद्ध ह्रदय शिव अच्छर । परानंद कर लिंग दिगंवर ।।
निष्कल सर्वग योगिन उर वर । लिंग दुय विधि बाहर अरु अंतर ।।
सूझ्म अंतर बाहिर स्थूला । भेद जीव प्रतिमा अनुकूला ।।
दोहा - 4
स्थूल अंग जगमैं भृमै सपनै सूझ्म देह ।
कारण तन सुख सोवही तुरिय हंस गत नेह ।।
कर्म यग्य रत पूजिय स्थूला । सूझ्म ध्यान ग्यान की मूला ।।
अस तन केरि भावना हेता । सेवत बाहिर लिंग चित चेता ।।
जव अध्यातम ग्यान विकाशा । सो सूझ्म शिव लिंग प्रकाशा ।।
यथा थूल मृत काष्ट विकल्पा । अहो विचार वुद्धि अति अल्पा ।।
थूल मैं निहचै कृत जग माही । परम तत्व वादी ते नाही ।।
जव लगि ह्रदय न ज्ञान प्रकाशा । तब लग भजिय मूर्ति अनि आशा ।।
निष्कल सकल उदय जव ज्ञाना । शिव मय जग जग मय शिव जाना ।।
येहि विधि ग्यान सहित नर जोई । ताके उर दुख दोष न कोई ।।
दोहा 5
तजे कर्म जिन ज्ञान विन शिखि मूढता विवाद ।
शिवदयाल वांतासि ते अपरै करण विषाद ।।
तिनहि विधान न संग्रह त्यागा । जिनके ह्रदय ग्यान वैरागा ।।
गृह वस कर्म न वन्धन ज्ञानी । यथा कमल दल भिदै न पानी ।।
जलि अध्यातम ग्यान न साधै । तव लगि कर्म न शिव अवराधे ।।
नैन कमल जग पीत दिखाई । जिमि दिशि भ्रम परदिश चितजाई ।।
जिमि घन पटल छाह दिवि जावै । भ्रम वस रवि शशि झपे वतावै ।।
इमि भव रूप मायावस माही । भ्रम सबके उर छूटत नाही ।।
जिमि दर्पन प्रतिविम्व प्रकाशा । मलिन भये मलिनै आभासा ।।
तैसे माया मलिन सरीरा । शंभु शक्ति धेवैं ते धीरा ।।
दोहा -6 क
अंवर अंतर दर्शित चन्द्र दिवाकर एक ।
घट प्रति जल छाया विदित तृष्ना रूप अनेक ।।
6ख
जो जल मलिन तौ मलिन नर विछाह तरंगन भंग ।
तेहि विधि जीव सुनित्य यह भरमत माया संग ।।
जे जग सुने औ दर्शित जेते । प्रघटे सकल शिवात्मक तेते ।।
एक ईश बहु भांति दिखाई । जिमि जग भेद जगत अधिकाई ।।
सब संसार सकल तन धारी । परम ईश भाषै श्रुति चारी ।।
अस विज्ञान विदित उरजाके । प्रतिमादिक पुजित नहि ताके ।।
जे जन जग विज्ञान विहीना । ते प्रतिमा पूजहि हुय दीना ।।
चहत उच पदवी आरूढ़ा । विन आलंवन लहै न मूढ़ा ।।
सगुण उपासक प्रतिमा सेवहि । ते निर्गुण पावहि निर्भेवहि ।।
चन्दन पुष्प धूप अरु दीपा । विन मूरति केहि दैय समीपा ।।
दोहा 7
प्रथम सुकरम पूजि शिव तजिय कामना काम ।
शिवद्याल शिवार्षन करिय सब पुन्य पाप बिर राम ।।
जव लगि नहि प्रघटै विज्ञाना । तब लगि कीजिय मूर्ति विधाना ।।
ज्ञान अभाव न पूजहि जोई । पातन होय अधोगति होई ।।
यहि कारण सुर नर मुनि बृंदा । करिय सुजाति कर्म गत निंदा ।।
जब जह होय भक्त गति जैसी ।शिव पूजा कीजिय तंह तैसी ।।
व्रह्म विचारण शिव सब मांही । सर्व एक रस दुकिआ नाही ।।
तारक मूल सुभाव सुसंगा । पाय सुसंग कथा रस रंगा ।।
श्रवण से मनन मनन से ध्याना । ध्यान से अधिआसन अधिग्याना ।।
भक्ति से विरति विवेक विरागा । तव सूझै शिव पद अनुरागा ।।
दोहा -8
भक्ति सेहोय विराग उर जोग से प्रघटत ज्ञान ।
शिवदयाल शिव कथा रति दायक पद निर्वान ।।
पुन्य पाप जब उभौ नसावै । तव निवास शिव उर पुर पावै ।।
मूल कथा जे सब तरु शाखा । फल विज्ञान फूल अभिलाषा ।।
ताकर पत्र विगत सब संगा । फल रस जीवन मुक्ति विहंगा ।।
विनि शिव पूजन विन जप दाना । छुटहि न दुख विधि माना ।।
जब लगि देह सुपांतक भ्राजा । तब लगि लहै न सिद्धि समाजा ।।
विगत पाप संपूरण कामा । सफल जन्म सुमिरत शिव नामा ।।
यथा मलिन षट चढ़ै न रंगा । धुये वसन सव रंग प्रसंगा ।।
तथा कुसंगति मल संदेहा । दाहन दोष शम्भु पद नेहा ।।
दोहा - 9
कर्म मूल देवन कै पूजा । पूजन मूल गुरू नहि दूजा ।।
गुरु व्रह्मा गुरु हरि हर देवा । विद्या मुक्ति देनि गुरु सेवा ।।
सब कर मूल एक सतसंगा । जासे होत कथा रस रंगा ।।
सत संगत महिमा अधिकाई । सुलभ मुक्ति रति भक्ति उपाई ।।
काकी मति न कुसंगति नासी । अन्त दहिन उर जग उपहासी ।।
पाय कुसंगन से चतुराई । तथा सुसंग सकल सुखदाई ।।
सप्त स्वर्ग अपवर्ग विशेषा । तुलहि न सुख सतसंग अलेषा ।।
सत संगति प्रभाव गुरु लाभा । गुरु ते मिलहि मंत्र विधि आभा ।।
दोहा -10-
गुरु संतोषी चाहिये शील सुभाय सनेह ।
उत्तिम कुल गुण ज्ञान युत भक्ति विराग विदेह ।।
गुरु गुण पावन पर्म कृपालू । वेद विधायक सवहि दयालू ।।
मंत्र से लाभ देव पूजा व्रत । व्रत अरचन से होत भक्ति रत ।।
भक्ति से प्रघट विरति कै ग्याना । विरति ज्ञान दायक विज्ञाना ।।
सो विज्ञान निवारण भेदा । हरण सकल भ्रम संसय खेदा ।।
हम तुम पूत्र मान अपमाना । जीत हारि सुख दुख सम जाना ।।
दुंद रहित पावहि शिव शंकर । उभय बीच दुख दाह भयंकर ।।
जव दर्शे शिव समन कलेशा । रहै न दुख दरिद्र लवलेशा ।।
गृह आश्रम अस विरला कोई । पावहि मुक्ति पदारथ सोई ।।
दोहा - 11
परमहंस शिव तत्व मय जग मैं विरला कोय ।
शिवद्याल तासु दर्शन करे मुक्ति पदारथ होय ।।
यदि जग मैं अस होवै सोई । तेहि दरसे अध मोचन होई ।।
तीरथ सकल दरसै के आशा । करहि सदा तह चहै निवासा ।।
ते जन नहि सब तीर्थन माही । देव शिला तिन पट तर नाही ।।
देखउ खोजि सकल जग मांही । मुनि सप्तम नहि वहु विज्ञानी ।।
विन मन्जत पुनीत सर सरिता । चलत चरण वन तीर्थ पुनीता ।।
जनि लगि रहै अस्थिर गृह मांही । पूजिय शिव गिरिजा भ्रम नाही ।।
मधुसूदन पूजिय विधि नाना । सूर्ज वायु गणपति सविधाना ।।
पूजिय एक शम्भु श्रुति भाषा । सीचत मूल तृपित लरु शाखा ।।
दोहा - 12 क
तृपित सवै पूजन करै देवन मूल महेश ।
यथा मूल सींचत विटप शाषा सीचि नवेश ।।
12ख
शिव शंकर जग शंकर पूजि त्रियंवक देव ।
सर्व भूत हित रत सदा शिवदयाल नित सेव ।।
।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयोअ्ध्याय ।।
Sunday, 17 April 2011
छब्बीसबां अध्याय त्रतीयपाद
।। श्री गणंशाय नमः ।।
।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।
।। अथ श्री त्रतीय पाद ।।
।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे प्रथमोअध्याय ।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
कह मधुसुदन सुर मुनि धाता । सेवन सुनहु विस्व विख्याता ।।
शिव पूजा जगभव भय हरणी । दुःख शोक अघ ओघ विदरणी ।।
जन्म भये सुधरै जग करनी । मुक्ति हेत भव सागर तरणी ।।
तजि के तुम्है देव देवेशा । सुन्दर मूरति लिंग महेशा ।।
तारक तनय निहत सहवंशा । माया मय प्रेरित मय अंशा ।।
निहचै सो माया करि दूरी । शंभु रहित नासै सब भूरी ।।
येहि विधि शंभु रहित जो होई । कुल समेत नासै नर सोई ।।
शंकर बिमुख यदपि धनमाना । सपनेउ लहहि न सुख सनमाना ।।
दोहा-1
धन्य मातु पितु जाति कुल, शिव सेवक सुत जासु ।।
शिवदयाल खल मात पितु, सुत शिव द्रोही तासु ।।
धनि पितु मातु धन्य सुत सोई । जाके उर शिव पद रति होई ।।
धृग संतति सो धृग पितु माता । शिव द्रोही निन्दक अज्ञाता ।।
शिव पूजत वांछित फल पावै । अमर होय कि शिव पुर जावै ।।
पूजयनीय शिव लिंग मूतिंधर । सुख अभिलाष तो सेवहु शिवहर ।।
सुर पुंगव कृपाल शिवदेवा । सर्व देवमय सदा अभेवा ।।
सकल देव पूजहि जग माही । तदपि शभु पूजन सम नाही ।।
यथा लता तरू सींचत मूला । सुलभ सघन पल्लव फल फूला ।।
प्रथम सु हम पूजे कल्पादी । लिंग मूर्ति शिव देव अनादी ।।
दोहा-2
सहस कमल हम अर्पहि सादर । प्रेम सहित पूजहि निसि वासर ।।
सूचित प्रेम परीक्षा कीन्हा । कमल एक कमला हरि लीन्हा ।।
अरपत मंत्र सुमन एक हीना । तब हम उर विचार अस कीन्हा ।।
अधपूजे तजिये नहि शंकर । यदपि होय दु़ःख रोग भंयकर ।।
शिव पूजन खंडित जो त्यागै । विप्र धेनु वध पातक लागै ।।
हम यह निज मन मंत्र बिचारा । पंकज नयन कहत संसारा ।।
शिवहि समरयो नयन निकारी । अति प्रसन्न प्रधटे त्रिपुरारी ।।
नयन प्रथम समपूरण कीन्हा । तब शिव चक्र सुदर्शन दीन्हा ।।
दोहा-3
सोई शिव सर्वज्ञ प्रभु सब सेवत सब काल ।।
मनोकामना ते लहत, धेवत नित शिवद्याल ।।
सोई सिव सुमिरै सब काला । विद्याधर प्रति जन्म विशाला ।।
शिव-शिव कहि जे जन जमुहाई । तिन समीप जम काल न जाई ।।
जे जन शिव सुमिरण करि सोवै । तिनहि दुःख सपने नहि होवै ।।
शिव शिव समिरि प्रात नित जागै । तिनके उर अघ ओघ न लागै ।।
भूतन पति मसान के वासी । सुमिरत शिवहि प्रेत भय नासी ।।
पाप दाप मैं शिव शिव कहई । तिनको अध संकट ना लहई ।।
शिव सुमिरै देय कछु दाना । पुन्य अमोघ कल्प अवसाना ।।
दोहा 4
शिव सेवत कुष्टी तरै अरु कृपणी वस काम ।
शिवदयाल हर भक्ति विन तन धन धाम निकाम ।।
शिव कहि जग्य करै औ करावै । अजर अमोघ अतुल फल पावै ।।
शिव शिव सुमिर करै जो काजा । पूरण होय सकल सुख साजा ।।
शिव कहि सूर चढ़ै संग्रामा । समर विजै अंतहु शिव धामा ।।
शिव सुमिरै जे मरती वारा । ते नहि आवहि फिर संसारा ।।
लिंग रूप मय शिव सब देवा । लिंग प्रकासित देव अभेवा ।।
लिंगहि पूजि असुर सुर मानव । किन्नर जच्छ सिद्ध अहि दानव ।।
पावहि मुक्ति करैं कुल पावन । आठौ सिद्धि लहै मन भावन ।।
छण भरि लौ त्यागै शिव नामा । वृथा होय सो काल विरामा ।।
दोहा 5
पल भर लौ जे शिव जपै ते निवसै कैलाश ।
तजे रहै जे सदा शिव अमित वर्ष दुख ग्रास ।।
हम अरु विधि प्रजेश महिपाला । विश्व विरद लोकप दिगपाला ।।
शिव दर्शन हित नित प्रति जावै । पूजति लिंग सिद्ध सब पावै ।।
ते कर वर मार्जहि शिव धामा । ते मुख सफल जपै हरि नामा ।।
सो सिर सफल जो शिवहि नवावै । चरण सफल शिव क्षेत्र मझावै ।।
दर्शहि लिंग सफल सो लोचन । श्रवण सफल सिव कथा सुरोचन ।।
शंभु कथा सुनि पुलकित अंगा । सो तन सफल सदा अघ भंगा ।।
सफल मातु पुतु सुत बढ़ भागी । जो शिव चरण कमल अनुरागी ।।
नहि तौ वांझ किमि तनय प्रसूती । जिन हरि कथा न वंदि विभूती ।।
दोहा- 6
धेनु धाम धन धरणि मणि रथ तुरंग गजराज ।
भूषन वासन वसन लगि विनि शोक समाज ।।
शंभु कथा रस करहि न पाना । श्रवण तासु अहि भवन समाना ।।
जिन शिव लिंग न दर्शन जाना । ते लोचन खद्योत समाना ।।
शिव सन्मुख जे नवहि न माथा । मुकुट भार सम शीश अकाथा ।।
शिव शिव जपहि न जिनकी जिहा । ते दादुर सम वचन अलोहा ।।
शंभु क्षेत्र जे पग नहि जांही । जीवत सब सम तेज गमांही ।।
जिन शिव पूजन करहि न जाना । ते कर क्रूर कठोर समाना ।।
जे शिव कथा न सुनि हरषाई । कुलिष कठिन छाती निठुराई ।।
शिव पूजन हित प्रेम न जाना । सो नर स्वान श्रृगाल समाना ।।
दोहा - 7
स्वान स्वामि उपकार करि पथ परषै खल संत ।
निसि गति सगुण ऋगाल मुख मृतक वानि गुण अंत ।।
मानुस सकल सरीर अकाजा । पशुपल अस्थि चर्म पर काजा ।।
पर स्वारथ पशुतन सब जीवा । नर निकाम दुखन कै पीवा ।।
भोजन निद्रा मैथुन साजा । सकल जीव कै नित कै काजा ।।
मनुज हेतु शिव सेवन पावन । दान पुन्य रत भक्ति सुहावन ।।
नेम घर्म व्रत संयम त्यागा । हरि हर सेवन छमा विरागा ।।
जो अस होय तो मानुष नीका । ना तरु पशु उत्तम नर फीका ।।
जड़ चेतन तन धर सव नीके । चल परहित तरु फलै अमीके ।।
पसु तृन चरै करै पय ईंधन । मनुज भोग वियंजन मल गंधन ।।
दोहा -8
अहंकार मद काम छल तृश्ना मोह विकार ।
लोभ क्रोध मत्सर सकल मानुष तन आधार ।।
तरु देय छाह पत्र फल फूला । मनुज सबल रंकै प्रतिकूला ।।
तापर यह शरीर छण भंगा । कृमि विट भस्म कर्म गति अंगा ।।
ग्रह सम्पति सब तोय तरंगा । दामिन गति जीवन तन भंगा ।।
ताते तजि नर तन अभिमाना । निस दिन सुमिरौ शंभु सुजाना ।।
सर्पादिक विषधर हर भूषन । शिव सुमिरत करि सकै न दूषन ।।
सेवहि पुरुष लिंग त्रिय गिरजा । लिंग विभेद गवरि गुण सिरजा ।।
सुनहु देव ऋषि मन अनुमानी । देव लिंग अब कहौ वषानी ।।
निज अनुरूप मूर्ति निरमाई । पूजहु लिंग धातु मणि लाई ।।
दोहा - 9क
श्रीपति कहि सब शिव चरित प्रेम सहित हित पाय ।
मृण मय मणि मय धातु मय मूरत भेद सुनाय ।।
सोरठा -
विहसे सुर समुदाय विष्णु वचन सुनि ह्रदय गुनि ।
हर्ष न ह्रदय समाय तन पुलकित गद गद गिरा ।।
सुनि मूरति पूजन शिव धामा । देव ऋषिन किये हरिहि प्रणामा ।।
सुनि विरंचि मधुसूदन वचना । कही विश्व कर मैं करु रचना ।।
गुण विरंचि वाणी विसुकर्मा । अमित लिंग देवन हित निरमा ।।
प्रथक प्रथक मूरति निरमाई । सुर अनुरूप अनूप सुहाई ।
सो मुनि तुम सन कहौ वखानी । सुनहु वेद वितचित हित मानी ।।
शिव पूजन ते भव भय नासा । विद्या अरु तप तेज प्रकाशा ।।
सुख सम्पति जेतक जग मांही । पूजत शिव दुर्लभ कछु नांही ।।
जो कछु होय कामना जाके । सेवहि पद शंकर गिरिजा के ।।
दोहा - 10
विसुकर्मा शिव लिंग रचि देव ऋषिन वहु भांति ।
दयेउ सवै गुण भेद करि शंकर प्रतिमा पांति ।।
सोई शिव लिंग सुभग विसुकरमा । दये सुरन साधक शिव धर्मा ।।
विलग विलग मूरति वहु भांती । दयी सुरन सो वरणौ जाती ।।
इन्द्र नील मणि मय रचि लिंगा । हरि पूजन हित दये अभंगा ।।
कनक लिंग विधि पूजन हेता । सुवरन लिंग कुवेर प्रचेता ।।
रवि कौ दीन ताम्र मय लिंगा । इंद्रय पद्म राग मय पिंगा ।।
घर मैं दय प्रतिमा मणि पीता । शिवा लई मूरति नवनीता ।।
जछन दय दधि लिंग निरंतर । वरुणै श्यामल मणि मय अंतर ।।
रजत लिंग दय विश्वै देवै । आठौ वसुन रजत निरभेवै ।।
दोहा -11
द्रोण लिंग गोमय धरा गोवर गवरि वनाय ।
नन्द यशोदा गोप भये कृष्ण भये सुत आय ।।
रांगे मूरति वायु अधारा । पार्थिव कै अस्विनी कुमारा ।।
व्राह्मण अर व्राह्मणन की नारी । मृदा लिंग तिन हेत विचारी ।।
आठ अनन्तादिक अहिराजा । दय प्रवाल मूरति तिन काजा ।।
वज्र विभावसु कमलै फंटिका । सोम राज कौ मोतिन घंटिका ।।
लौह लिंग लै भूत पिसाचा । दैत्य राछसन गोमय राचा ।।
रतन जड़ित मूरति बृह्मानी । प्रष्ट लिंग छाया हितआनी ।।
लिंग ज्योति मय पावक लयेउ । मृण मय लिंग ऋषिन कौ दयेउ ।।
सारद मूरति लई धनन्तर । अमित पन्थ पय पिवहि निरंतर ।।
दोहा - 12
विधि हरि हर सुर असुर नर नाग जछ् महिपाल ।
लय लय मूरति विरति युत पूजन हित सब काल।।
लिंग मूर्ति दय सवहि सुहाई । पूजा विधि हरि वहुरि वताई ।।
भये कृपानिधि अन्तरध्याना । गये धाम निज विधि सुर आना ।।
पाय लिंग सुर नर मुनि बृन्दा । विधि प्रति पूछत सहित अनन्दा ।।
नाथ कृपा करि अति हित पाई । शंकर पूजन देउ वताई ।।
हर्षि महर्षि वचन सुनि धाता । शिव पूजा विधि कहि विख्याता ।।
सो विधि सुनि मुनि देव अनन्दे गम नित गृह विरंचि पद वन्दे ।।
निज ग्रह जाय सकल सुर जाती । पूजे लिंग सुने जेहि भांती ।।
भये सकल सुर पूरण कामा । युवतिन सहित लहे विश्रामा ।।
दोहा - 13
शिव पूजे रावण असुर लहेउ लंक निज राज ।
मृत्यु पाय हरि कर गयो शिव पुर सहित समाज ।।
शिव कौ पूजि चक्र हरि पायेउ । चतुरानन विधि नाम कहायेउ ।।
सेवत दिति दुय सुत जाये । महावली वैकुण्ठ डिगाये ।।
विश्वामित्र करेउ शिव सेवन । भये बृह्म ऋिषि जीति मुनि देवन ।।
अत्रि वशिष्ठ लागि मुनि देवा । लहे मनोरथ करि शिव सेवा ।।
ते अधिकार अधिक सरसाये मन वांछित अमोघ फल पाये ।।
सो शिव पूजा जग सुख दायक । दोष हरणि भव सिंधु सहायक ।।
सकल विभव दायनि दुख हरणी । भव भेषज जन रोग विदरणी ।।
जो विधि करि फल पावहि लोका । सिद्धि लहै छूटय दुख शोका ।।
दोहा-14
सदा पूज्य शिव सवन के फल दायक तत् काल ।
पूजन के वहु सुख लहत सो पूजति शिवद्याल ।।
।। इति श्री शिव चरित्र प्रथमोअध्याय ।।
।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।
।। अथ श्री त्रतीय पाद ।।
।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे प्रथमोअध्याय ।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
कह मधुसुदन सुर मुनि धाता । सेवन सुनहु विस्व विख्याता ।।
शिव पूजा जगभव भय हरणी । दुःख शोक अघ ओघ विदरणी ।।
जन्म भये सुधरै जग करनी । मुक्ति हेत भव सागर तरणी ।।
तजि के तुम्है देव देवेशा । सुन्दर मूरति लिंग महेशा ।।
तारक तनय निहत सहवंशा । माया मय प्रेरित मय अंशा ।।
निहचै सो माया करि दूरी । शंभु रहित नासै सब भूरी ।।
येहि विधि शंभु रहित जो होई । कुल समेत नासै नर सोई ।।
शंकर बिमुख यदपि धनमाना । सपनेउ लहहि न सुख सनमाना ।।
दोहा-1
धन्य मातु पितु जाति कुल, शिव सेवक सुत जासु ।।
शिवदयाल खल मात पितु, सुत शिव द्रोही तासु ।।
धनि पितु मातु धन्य सुत सोई । जाके उर शिव पद रति होई ।।
धृग संतति सो धृग पितु माता । शिव द्रोही निन्दक अज्ञाता ।।
शिव पूजत वांछित फल पावै । अमर होय कि शिव पुर जावै ।।
पूजयनीय शिव लिंग मूतिंधर । सुख अभिलाष तो सेवहु शिवहर ।।
सुर पुंगव कृपाल शिवदेवा । सर्व देवमय सदा अभेवा ।।
सकल देव पूजहि जग माही । तदपि शभु पूजन सम नाही ।।
यथा लता तरू सींचत मूला । सुलभ सघन पल्लव फल फूला ।।
प्रथम सु हम पूजे कल्पादी । लिंग मूर्ति शिव देव अनादी ।।
दोहा-2
सहस कमल हम अर्पहि सादर । प्रेम सहित पूजहि निसि वासर ।।
सूचित प्रेम परीक्षा कीन्हा । कमल एक कमला हरि लीन्हा ।।
अरपत मंत्र सुमन एक हीना । तब हम उर विचार अस कीन्हा ।।
अधपूजे तजिये नहि शंकर । यदपि होय दु़ःख रोग भंयकर ।।
शिव पूजन खंडित जो त्यागै । विप्र धेनु वध पातक लागै ।।
हम यह निज मन मंत्र बिचारा । पंकज नयन कहत संसारा ।।
शिवहि समरयो नयन निकारी । अति प्रसन्न प्रधटे त्रिपुरारी ।।
नयन प्रथम समपूरण कीन्हा । तब शिव चक्र सुदर्शन दीन्हा ।।
दोहा-3
सोई शिव सर्वज्ञ प्रभु सब सेवत सब काल ।।
मनोकामना ते लहत, धेवत नित शिवद्याल ।।
सोई सिव सुमिरै सब काला । विद्याधर प्रति जन्म विशाला ।।
शिव-शिव कहि जे जन जमुहाई । तिन समीप जम काल न जाई ।।
जे जन शिव सुमिरण करि सोवै । तिनहि दुःख सपने नहि होवै ।।
शिव शिव समिरि प्रात नित जागै । तिनके उर अघ ओघ न लागै ।।
भूतन पति मसान के वासी । सुमिरत शिवहि प्रेत भय नासी ।।
पाप दाप मैं शिव शिव कहई । तिनको अध संकट ना लहई ।।
शिव सुमिरै देय कछु दाना । पुन्य अमोघ कल्प अवसाना ।।
दोहा 4
शिव सेवत कुष्टी तरै अरु कृपणी वस काम ।
शिवदयाल हर भक्ति विन तन धन धाम निकाम ।।
शिव कहि जग्य करै औ करावै । अजर अमोघ अतुल फल पावै ।।
शिव शिव सुमिर करै जो काजा । पूरण होय सकल सुख साजा ।।
शिव कहि सूर चढ़ै संग्रामा । समर विजै अंतहु शिव धामा ।।
शिव सुमिरै जे मरती वारा । ते नहि आवहि फिर संसारा ।।
लिंग रूप मय शिव सब देवा । लिंग प्रकासित देव अभेवा ।।
लिंगहि पूजि असुर सुर मानव । किन्नर जच्छ सिद्ध अहि दानव ।।
पावहि मुक्ति करैं कुल पावन । आठौ सिद्धि लहै मन भावन ।।
छण भरि लौ त्यागै शिव नामा । वृथा होय सो काल विरामा ।।
दोहा 5
पल भर लौ जे शिव जपै ते निवसै कैलाश ।
तजे रहै जे सदा शिव अमित वर्ष दुख ग्रास ।।
हम अरु विधि प्रजेश महिपाला । विश्व विरद लोकप दिगपाला ।।
शिव दर्शन हित नित प्रति जावै । पूजति लिंग सिद्ध सब पावै ।।
ते कर वर मार्जहि शिव धामा । ते मुख सफल जपै हरि नामा ।।
सो सिर सफल जो शिवहि नवावै । चरण सफल शिव क्षेत्र मझावै ।।
दर्शहि लिंग सफल सो लोचन । श्रवण सफल सिव कथा सुरोचन ।।
शंभु कथा सुनि पुलकित अंगा । सो तन सफल सदा अघ भंगा ।।
सफल मातु पुतु सुत बढ़ भागी । जो शिव चरण कमल अनुरागी ।।
नहि तौ वांझ किमि तनय प्रसूती । जिन हरि कथा न वंदि विभूती ।।
दोहा- 6
धेनु धाम धन धरणि मणि रथ तुरंग गजराज ।
भूषन वासन वसन लगि विनि शोक समाज ।।
शंभु कथा रस करहि न पाना । श्रवण तासु अहि भवन समाना ।।
जिन शिव लिंग न दर्शन जाना । ते लोचन खद्योत समाना ।।
शिव सन्मुख जे नवहि न माथा । मुकुट भार सम शीश अकाथा ।।
शिव शिव जपहि न जिनकी जिहा । ते दादुर सम वचन अलोहा ।।
शंभु क्षेत्र जे पग नहि जांही । जीवत सब सम तेज गमांही ।।
जिन शिव पूजन करहि न जाना । ते कर क्रूर कठोर समाना ।।
जे शिव कथा न सुनि हरषाई । कुलिष कठिन छाती निठुराई ।।
शिव पूजन हित प्रेम न जाना । सो नर स्वान श्रृगाल समाना ।।
दोहा - 7
स्वान स्वामि उपकार करि पथ परषै खल संत ।
निसि गति सगुण ऋगाल मुख मृतक वानि गुण अंत ।।
मानुस सकल सरीर अकाजा । पशुपल अस्थि चर्म पर काजा ।।
पर स्वारथ पशुतन सब जीवा । नर निकाम दुखन कै पीवा ।।
भोजन निद्रा मैथुन साजा । सकल जीव कै नित कै काजा ।।
मनुज हेतु शिव सेवन पावन । दान पुन्य रत भक्ति सुहावन ।।
नेम घर्म व्रत संयम त्यागा । हरि हर सेवन छमा विरागा ।।
जो अस होय तो मानुष नीका । ना तरु पशु उत्तम नर फीका ।।
जड़ चेतन तन धर सव नीके । चल परहित तरु फलै अमीके ।।
पसु तृन चरै करै पय ईंधन । मनुज भोग वियंजन मल गंधन ।।
दोहा -8
अहंकार मद काम छल तृश्ना मोह विकार ।
लोभ क्रोध मत्सर सकल मानुष तन आधार ।।
तरु देय छाह पत्र फल फूला । मनुज सबल रंकै प्रतिकूला ।।
तापर यह शरीर छण भंगा । कृमि विट भस्म कर्म गति अंगा ।।
ग्रह सम्पति सब तोय तरंगा । दामिन गति जीवन तन भंगा ।।
ताते तजि नर तन अभिमाना । निस दिन सुमिरौ शंभु सुजाना ।।
सर्पादिक विषधर हर भूषन । शिव सुमिरत करि सकै न दूषन ।।
सेवहि पुरुष लिंग त्रिय गिरजा । लिंग विभेद गवरि गुण सिरजा ।।
सुनहु देव ऋषि मन अनुमानी । देव लिंग अब कहौ वषानी ।।
निज अनुरूप मूर्ति निरमाई । पूजहु लिंग धातु मणि लाई ।।
दोहा - 9क
श्रीपति कहि सब शिव चरित प्रेम सहित हित पाय ।
मृण मय मणि मय धातु मय मूरत भेद सुनाय ।।
सोरठा -
विहसे सुर समुदाय विष्णु वचन सुनि ह्रदय गुनि ।
हर्ष न ह्रदय समाय तन पुलकित गद गद गिरा ।।
सुनि मूरति पूजन शिव धामा । देव ऋषिन किये हरिहि प्रणामा ।।
सुनि विरंचि मधुसूदन वचना । कही विश्व कर मैं करु रचना ।।
गुण विरंचि वाणी विसुकर्मा । अमित लिंग देवन हित निरमा ।।
प्रथक प्रथक मूरति निरमाई । सुर अनुरूप अनूप सुहाई ।
सो मुनि तुम सन कहौ वखानी । सुनहु वेद वितचित हित मानी ।।
शिव पूजन ते भव भय नासा । विद्या अरु तप तेज प्रकाशा ।।
सुख सम्पति जेतक जग मांही । पूजत शिव दुर्लभ कछु नांही ।।
जो कछु होय कामना जाके । सेवहि पद शंकर गिरिजा के ।।
दोहा - 10
विसुकर्मा शिव लिंग रचि देव ऋषिन वहु भांति ।
दयेउ सवै गुण भेद करि शंकर प्रतिमा पांति ।।
सोई शिव लिंग सुभग विसुकरमा । दये सुरन साधक शिव धर्मा ।।
विलग विलग मूरति वहु भांती । दयी सुरन सो वरणौ जाती ।।
इन्द्र नील मणि मय रचि लिंगा । हरि पूजन हित दये अभंगा ।।
कनक लिंग विधि पूजन हेता । सुवरन लिंग कुवेर प्रचेता ।।
रवि कौ दीन ताम्र मय लिंगा । इंद्रय पद्म राग मय पिंगा ।।
घर मैं दय प्रतिमा मणि पीता । शिवा लई मूरति नवनीता ।।
जछन दय दधि लिंग निरंतर । वरुणै श्यामल मणि मय अंतर ।।
रजत लिंग दय विश्वै देवै । आठौ वसुन रजत निरभेवै ।।
दोहा -11
द्रोण लिंग गोमय धरा गोवर गवरि वनाय ।
नन्द यशोदा गोप भये कृष्ण भये सुत आय ।।
रांगे मूरति वायु अधारा । पार्थिव कै अस्विनी कुमारा ।।
व्राह्मण अर व्राह्मणन की नारी । मृदा लिंग तिन हेत विचारी ।।
आठ अनन्तादिक अहिराजा । दय प्रवाल मूरति तिन काजा ।।
वज्र विभावसु कमलै फंटिका । सोम राज कौ मोतिन घंटिका ।।
लौह लिंग लै भूत पिसाचा । दैत्य राछसन गोमय राचा ।।
रतन जड़ित मूरति बृह्मानी । प्रष्ट लिंग छाया हितआनी ।।
लिंग ज्योति मय पावक लयेउ । मृण मय लिंग ऋषिन कौ दयेउ ।।
सारद मूरति लई धनन्तर । अमित पन्थ पय पिवहि निरंतर ।।
दोहा - 12
विधि हरि हर सुर असुर नर नाग जछ् महिपाल ।
लय लय मूरति विरति युत पूजन हित सब काल।।
लिंग मूर्ति दय सवहि सुहाई । पूजा विधि हरि वहुरि वताई ।।
भये कृपानिधि अन्तरध्याना । गये धाम निज विधि सुर आना ।।
पाय लिंग सुर नर मुनि बृन्दा । विधि प्रति पूछत सहित अनन्दा ।।
नाथ कृपा करि अति हित पाई । शंकर पूजन देउ वताई ।।
हर्षि महर्षि वचन सुनि धाता । शिव पूजा विधि कहि विख्याता ।।
सो विधि सुनि मुनि देव अनन्दे गम नित गृह विरंचि पद वन्दे ।।
निज ग्रह जाय सकल सुर जाती । पूजे लिंग सुने जेहि भांती ।।
भये सकल सुर पूरण कामा । युवतिन सहित लहे विश्रामा ।।
दोहा - 13
शिव पूजे रावण असुर लहेउ लंक निज राज ।
मृत्यु पाय हरि कर गयो शिव पुर सहित समाज ।।
शिव कौ पूजि चक्र हरि पायेउ । चतुरानन विधि नाम कहायेउ ।।
सेवत दिति दुय सुत जाये । महावली वैकुण्ठ डिगाये ।।
विश्वामित्र करेउ शिव सेवन । भये बृह्म ऋिषि जीति मुनि देवन ।।
अत्रि वशिष्ठ लागि मुनि देवा । लहे मनोरथ करि शिव सेवा ।।
ते अधिकार अधिक सरसाये मन वांछित अमोघ फल पाये ।।
सो शिव पूजा जग सुख दायक । दोष हरणि भव सिंधु सहायक ।।
सकल विभव दायनि दुख हरणी । भव भेषज जन रोग विदरणी ।।
जो विधि करि फल पावहि लोका । सिद्धि लहै छूटय दुख शोका ।।
दोहा-14
सदा पूज्य शिव सवन के फल दायक तत् काल ।
पूजन के वहु सुख लहत सो पूजति शिवद्याल ।।
।। इति श्री शिव चरित्र प्रथमोअध्याय ।।
पच्चीसबां अध्याय
।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्तीयपाद पंचदशोध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
शौनक सुनहु चरित हित कामा । जवहि विरंचि गये निज धामा ।।
मुनिन वुलाय कही विधि वानी । सुनहु देव ऋिषि हित अनुमानी ।।
जो सुख इच्छा सदा तुम्हारे । चलहु संग लगि वचन हमारे ।।
विधि अस कहि मुनि सुरण समेता । गमने छीर पयोनिधि केता ।।
तंहा सकल मिलि करहि विचारा । अस्तुति कीजिय कौन प्रकारा ।।
नमत मुदित मुनि देव विधाता । शेष सेज सायन सुरत्राता ।।
जगन्नाथ जय भक्त अभय प्रद । कमला कांत नौमि मंगल सद ।।
अच्युत अखिलेश्वर अविनासी । अलख अगोचर अग जग वासी ।।
छंद
वंदौ श्रीवत्स श्रिया सहितं सुमिरे भव सागर निर्वहितं ।
धनश्याम पीत पटावरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
तन चारु चतुर्भुजते अमलं कर शंख औ चक्र गदा कमलं ।
मणि कुन्डल क्रीट अलंकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
पुरुषोत्तम जय श्री वत्स विभुं रवि कोटिन भास प्रयास प्रभुं ।
नव नीरज नयन शुभं अरुणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
कंदर्प करोर लखे अरुचै माया दासी सम दूर नचै ।
निधि रिद्धि सुसिद्धि उपाकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
वहु भूषन भूषिन अंग अलं सुख मुक्ति विमुक्ति प्रदं अचलं ।
सर्व शरष्य मही धरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
सोरठा 1
उर वैजयंती माल मेघ श्याम अभिराम तन ।
पद वंदन शिवद्याल विश्व भरण भव भय हरण ।।
दोहा -1
तुलसी कुमुद सरोरुह पारिजात गंधार ।
शिवद्याल पंचमि निर्मित वन माला विस्तार ।।
तन वन माला धरे सुरत्राता । नौमि कृपानिधि पद जलजाता ।।
ज्ञानांजन प्रभु भव भय भंजन । निश्चर गंजन जन मन रंजन ।।
सेवत हरि दुर्लभ गत पावै । मिटै दोष कलि कलषु नसावै ।।
जिहि दुख को लखि परै न पारा । ताहू को नाथ करत निरधारा ।।
करहु कृपा करि हरि दुख दूरी । जय घन श्याम रही धुनि पूरी ।।
यद्धपि कृपानिधि संकट हारी । प्रभु प्रसीद देवेश मुरारी ।।
पुरुषोत्तम कृपाल करुणाकर । जगन्नाथ जगपति जै जगधर ।।
दरष देउ अव ओघ विदारी । सुर रंजन गंजन तमचारी ।।
दोहा-2
नौमि अनादि अनंत प्रभु अनभव अगम अपार ।
शिवदयाल विधि विनय करि देव ऋषिन अधिकार ।।
यह अस्तुति विधि कृत अति पावनि । कोमल सुन्दर सुगम सुहावनि ।।
तब प्रघटे वैकुण्ड विहारी । जै जै धुनि सुर मुनिन उचारी ।।
बोले मधुसूदन गोविन्दा । किहि कारण आये सुरबृंदा ।।
सब मिलि स्वारथ करौ विचारी । दरश हमार सकल दुख हारी ।।
तब वोले मुनि देव विधाता । संसय हरण उभय सुरत्राता ।।
भजन तुम्हार सदा हितकारी । तदपि सु कहौ विधान विचारी ।।
नित पूजन कीजिय कहौ काको । सेवन सुभग बतावहु ताको ।।
कवन काल अरिचै केहि भांती । जो शिव ईश्वर अमल अजाती ।।
दोहा -3
पूजन रुचिर वतावौ श्रीपति करुणा ऐन ।
शिवदयाल कृपाल दयाल हुय हरि वोले मृदु वैन ।।
।।। इति श्री शिव तरित्र महत्मे पंचदशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।। द्वतीयपाद समाप्त ।।
।।।--- स्थाणोर्चरित्रम ---।।। राम ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
शौनक सुनहु चरित हित कामा । जवहि विरंचि गये निज धामा ।।
मुनिन वुलाय कही विधि वानी । सुनहु देव ऋिषि हित अनुमानी ।।
जो सुख इच्छा सदा तुम्हारे । चलहु संग लगि वचन हमारे ।।
विधि अस कहि मुनि सुरण समेता । गमने छीर पयोनिधि केता ।।
तंहा सकल मिलि करहि विचारा । अस्तुति कीजिय कौन प्रकारा ।।
नमत मुदित मुनि देव विधाता । शेष सेज सायन सुरत्राता ।।
जगन्नाथ जय भक्त अभय प्रद । कमला कांत नौमि मंगल सद ।।
अच्युत अखिलेश्वर अविनासी । अलख अगोचर अग जग वासी ।।
छंद
वंदौ श्रीवत्स श्रिया सहितं सुमिरे भव सागर निर्वहितं ।
धनश्याम पीत पटावरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
तन चारु चतुर्भुजते अमलं कर शंख औ चक्र गदा कमलं ।
मणि कुन्डल क्रीट अलंकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
पुरुषोत्तम जय श्री वत्स विभुं रवि कोटिन भास प्रयास प्रभुं ।
नव नीरज नयन शुभं अरुणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
कंदर्प करोर लखे अरुचै माया दासी सम दूर नचै ।
निधि रिद्धि सुसिद्धि उपाकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
वहु भूषन भूषिन अंग अलं सुख मुक्ति विमुक्ति प्रदं अचलं ।
सर्व शरष्य मही धरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
सोरठा 1
उर वैजयंती माल मेघ श्याम अभिराम तन ।
पद वंदन शिवद्याल विश्व भरण भव भय हरण ।।
दोहा -1
तुलसी कुमुद सरोरुह पारिजात गंधार ।
शिवद्याल पंचमि निर्मित वन माला विस्तार ।।
तन वन माला धरे सुरत्राता । नौमि कृपानिधि पद जलजाता ।।
ज्ञानांजन प्रभु भव भय भंजन । निश्चर गंजन जन मन रंजन ।।
सेवत हरि दुर्लभ गत पावै । मिटै दोष कलि कलषु नसावै ।।
जिहि दुख को लखि परै न पारा । ताहू को नाथ करत निरधारा ।।
करहु कृपा करि हरि दुख दूरी । जय घन श्याम रही धुनि पूरी ।।
यद्धपि कृपानिधि संकट हारी । प्रभु प्रसीद देवेश मुरारी ।।
पुरुषोत्तम कृपाल करुणाकर । जगन्नाथ जगपति जै जगधर ।।
दरष देउ अव ओघ विदारी । सुर रंजन गंजन तमचारी ।।
दोहा-2
नौमि अनादि अनंत प्रभु अनभव अगम अपार ।
शिवदयाल विधि विनय करि देव ऋषिन अधिकार ।।
यह अस्तुति विधि कृत अति पावनि । कोमल सुन्दर सुगम सुहावनि ।।
तब प्रघटे वैकुण्ड विहारी । जै जै धुनि सुर मुनिन उचारी ।।
बोले मधुसूदन गोविन्दा । किहि कारण आये सुरबृंदा ।।
सब मिलि स्वारथ करौ विचारी । दरश हमार सकल दुख हारी ।।
तब वोले मुनि देव विधाता । संसय हरण उभय सुरत्राता ।।
भजन तुम्हार सदा हितकारी । तदपि सु कहौ विधान विचारी ।।
नित पूजन कीजिय कहौ काको । सेवन सुभग बतावहु ताको ।।
कवन काल अरिचै केहि भांती । जो शिव ईश्वर अमल अजाती ।।
दोहा -3
पूजन रुचिर वतावौ श्रीपति करुणा ऐन ।
शिवदयाल कृपाल दयाल हुय हरि वोले मृदु वैन ।।
।।। इति श्री शिव तरित्र महत्मे पंचदशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।। द्वतीयपाद समाप्त ।।
।।।--- स्थाणोर्चरित्रम ---।।। राम ।।।
चौवीसबां अध्याय
।।। अथ श्री शिव पुराण परिपाटी द्वतीयपाद चतुर्दशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
सुनहु ऋषी सो रथ परमाना । सकल देवमय जस निरमाना ।।
शिव हित रथ विरचे विसुकरमा । सर्व लोक मय रचिसुवरणमा ।।
रथ को अंग दाहिनो भानू । द्वादश रवि आरा गज मानू ।।
शोभित वाम चक्र चन्द्रमा । षोठस कला सो आरा निरमा ।।
किरणी समनझ रथ वांये । योग लगन भूषित अंगदाये ।।
षट ऋितु सोच क्रनकै पूठी । द्वादश मास उभय दिशि जूठी ।।
निसि अरु दिवस फरै ढुय लागी । पटली सात वार कै सांगी ।।
पुष्कर अंतरिक्झ दिसि वाँये । नीड़ मेरु मंदर अंग दायें ।।
दोहा - 1
भूषन गंगादिक नदी सिन्धु तुला ये चारि ।
वंधन जंत अनंत अहि पच्छ पैजनीकारि ।।
उदय अस्त गिरि कूवर सोऊ । वत्सर वेग अयन धुर दोउ ।।
तुरग वेद सारथी विधाता । मंत्री भये वियुन सुर त्राता ।।
प्रणत ब्रह्म लघु उभय पताका । सात दीप सो जटित सलाका ।।
महाछत्र जो गगन अखन्डा । मंदर सूल सुभग सोय दन्डा ।।
हिमगिरि धनु गुण शेष भुजंगा । सरसुत घंटा शव्द अभंगा ।।
विष्णु तेज सर पावक गासी । माया जाल मनोरथ ठासी ।।
ये गुरु शेष सकल ब्रह्मण्डा । ते सब जोरि लगे रथ खन्डा ।।
तापर आय चड़े शिव शंकर । जो कालहु के काल भयंकर ।।
दोहा 2
व्रसम रूप धरि भूमिधर सो रथ दियो उठाय ।
चलो पमन मन वेग सम गति नहि वरणि सिराय ।।
रथा रूढ़ शिव देव न देखे । जै जै करहि विजय के लेखे ।।
तिहि अवसर शिव रूप प्रकाशा । मनहु भानु कोटिन संकाशा ।।
शिवा सहित सोभित अधिकाई । वरस सहस नहि वर्णि सिराई ।।
सैन संग चतुरंग सुहाई । विधिही मुनि गण सुर समुदाई ।।
रवि शनि वरुण कुवेरहु ता सन । वायु इन्द्र यम काल षडानन ।।
वीर भद्र नंदी गण भृंगी । समर जुझार महारण रंगी ।।
कुंद दंत हिम करवर झंपन । चंड प्रचंड प्रकंड प्रकंपन ।।
सोरठा - 3क
दूषित त्रिसिखि झंखार सहस पंच सत नयन मुख ।
अजा बदन जंतार कट पूतन सत सिंह ककट ।।
दोहा 3-ख
अधै बक्र हय गज वदन सेनापति जे सर्व ।।
जारि सकै सब लोक पुर चले संग शिव खर्व ।।
हल मुगधर मूसल गिरि साला । तोमर फरष त्रिसूल कराला ।।
खडग भुसुंडि भालु धनु भाथा । चक्र परिधि शक्ती गद हाथा ।।
नाना अस्त्र शस्त्र करधारी । चले सकल कहि जै मदनारी ।।
जटा जूट कर दंड सिधारण । वर्षहि सुमन सिद्ध मुनि चारण ।।
नचै अपसरा गंधर्व गावै । वाजन विविध प्रकार बजाई ।।
सेन संग लै चले महेशा । भूमि भार सहि सके न शेषा ।।
डोली धरणि महीधर कांपै । दिग्गज चिंधारहि पद चांपै ।।
नवे शेष सिर उर सकुचाने । विचली धेनु कमठ अकुलाने ।।
दोहा 4क
इहां पंच मुंडन मिलि जपन धर्म निर्माय ।
त्रिपुराधिप एकत्र करि निज कर इष्ट पुजाय ।।
सोरठा 4ख
देव सुअवसर पाय त्रिपुरासुर इक ठाँह लषि ।
कही शंभु प्रति जाय वेगि नसावहु दनुज पुर ।।
विधि हरि कह सो अवसर पाई । शंभु असुर नासहु दुखदाई ।।
ताहि समय सुर नर मुनि बृंदा । कहैं परस्पर सहित अनंदा ।।
शिव समरथ अचरज कछु नाही । त्रिपुर लोक दहै छण मांही ।।
सो मुनि शिव कार्युक विस्तारा । अगनित कोश प्रमाण अपारा ।।
कीन्ह रुद्र गण धनु टंकारा । वघिर भये सव रब सुनि घोरा ।।
वहुरि काल सम सर संधाना । विकसित पावक प्रलय समाना ।।
शिव त्रिपुरासुर ओर निहारी । कर पिणाक विष विशिष प्रहारी ।।
प्रघट शिखा जनु दामिनि लागी । फुकरत घोर झरत जनु आगी ।।
दोहा - 5
वान विकाशै अखिल जग तेज प्रकाश अपार ।
यथा प्रलय पावक दहय तेज सकल संसार ।।
छण मैं जारि करे पुर छारा । त्रिपुरासुर सिर शिव संघारा ।।
अपर दहे दानव सत कोटी । भई निशाचर दल गति खोटी ।।
सर संकाश भुवन भय हारी । चकित चौंकि सब रहे निहारी ।।
रहेउ शव्द सो भरि त्रैलोका । भये देव मुनि मनुज अशोका ।।
जो शिव रुद्र भयंकर काला ।भुवनांतक भुवनेश कराला ।।
लोक प्रलय शिव नैन उघारत । भृकुटी भंग सवै जग जारत ।।
तिहि शिव कै सोय रूप निहारी । भय वस भये देव मुनि झारी ।।
स भै सकल शिव ओर निहारे । रहे मौन कछु काल विचारे ।।
सोरठा -6क
भय वस कंपित गात उमौ भयंकर रूप लखि ।
ह्रदय बिकल विलखात शंभु समीप न जात कोउ ।।
दोहा - 6 ख
देव दनुज ऋषि मुनि मनुज शिवहि निरखि सकुचात ।
शिवदयाल दसा सोय निरखि हरि वदन मोरि मुस्क्यात ।।
सभै हेरि हरि शैल कुमारी । देव दनुज ऋषि मुनि जन झारी ।।
अति कृपाल सो अवसर जानी । हरि विरंचि वोले मृदु वानी ।।
सदा सवन के भव भय हारी । अव ते नाम भयो त्रिपुरारी ।।
नर निश्चर शिव सेवन करिहै । रुद्र गणन पति हुय अवतरिहै ।।
तेहि अवसर विधि विनय प्रकाशी । जै शंकर महेश कैलाशी ।।
जै हर गंगाधर गिरि वासी । जै शिव चिदानन्द सुख रासी ।।
जै पिणाकधर शिव अविनासी । गिरिपति गिरिजापति गुणरासी ।।
जै शशिधर नित निवसत काशी । शिवदयाल उर सद मन वासी ।।
दोहा - 7
वहुर कहा विधि विनय करि मो प्रण सुनहु महेश ।
सदा सारथी हम रहय तुम रथ पर देवेश ।।
सेवहि नाक नागपुर वासी । विधि हरि अविचल विनय प्रकाशी ।।
तेहि अवसरहि हरि जगदीशा । कर संपुट विनवत नमि शीशा ।।
जै महेश बृषधुज गौरीशा । निर्गुण ब्रह्म सगुण अधि ईशा ।।
जय गंगाधर हर नन्दीशा । प्रकृति पुरुष रूपक जगदीशा ।।
जै डमरूधर शंभु गिरीशा । रूद्र विश्व ई श्वर काशीशा ।।
जै भक्तन प्रिय शांत महीशा । नील कण्ठ करवर अवनीशा ।।
वार वार विनवौ कालीशा । शिवदयाल उर वसौ दिगाशा ।।
तेहि अवसर मुनि देव समूहा । अस्तुति करण लगे मिलि जूहा ।।
छंद
-----–----------- शिव स्तुति -----------------------
नौंमि वृषध्वज चन्द्र शेषर नीलकण्ठ जटा धरं ।।
शीश गंग भुजंग कंकण भस्म अंग करय वरं ।।
लाल कंज विशाल लोचन मुण्डमाल विश्वे श्वरं ।।
व्याघ्र छाल हिमाल आसन फटिक गौर महेश्वरं ।।
मदन दाहन ब्रषभ वाहन डमरु कर धर सुन्दरं ।।
शीश नाग पिणाक पाणी चरण पंकज फणिपुरं ।।
जयति शिव हर कंठ विषधर रुद्र शंभु दिगंवरं ।।
शिवद्यालगिरिजासहित शंकर वसौममउरअनंतरं ।।
सोरठा 8-क
वोले शिव सुखधाम विनय प्रेम वस मगन मन ।
विधि हरि सुर हित काम मागहु वर मन भावनो ।।
दोहा - 8ख
यदि प्रशन्न भगवान शिव जो चाहत वर देन ।
जंहां विकट संकट परै पघटौ दुख हरि लेन ।।
तथा अस्तु वर वोलि महेशा । अपर वचन अब सुनौ सुरेशा ।।
यह असतुति जो सुनै कि गावै । मन वांछित अमोघ फल पावै ।।
तेहि अन्तर मुंडी ते आये । करि प्रणाम मृदु वचन सुनाये ।।
कवहु कृपा निधि तजव न नेहू । अव का मोहि अनुशासन देहू ।।
तिनके वचन सुनत विधि हरि हर । वोले वचन अखिल मंगलकर ।।
सदा सकल रैहौ धनवंता । दयावान कोमल चित संता ।।
तव लगि वसहु मरुस्थल देशा । जव लगि कलयुग करहि प्रवेशा ।।
वन्श तुम्हार रहै जग छाई । पूर्व सिंधु सीमा समिताई ।।
दोहा - 9
तब कुल शिष्य सराउगी वैश्य होय सुभ जाति ।
पूजहि पारस दिउ हरे नेम नाथ वहु भांति ।।
गया से अगिनि कोण त्रय कोसा । तव कुलधर कीटक होयजोसा ।।
तासु तनय हरि वौध्य वतारा । सूद्रन कृत हति हरि महि भारा ।।
श्रद्धा श्राद्ध पितर निरधारा । वोधगया तेहि कहै संसारा ।।
इन्द्र नील मख करी सुरेशा । तंह जगदीश आन भुवनेशा ।।
सो मम अंश वौध समकारा । तेहि कहै जगन्नाथ संसारा ।।
जिनहि दरस पद लहै निर्वाना । पग प्रतिफल गोदान समाना ।।
तब ते अति कुल बढ़ै तुम्हारा । निर्फल होय न वचन हमारा ।।
वहुरि वर्ष सोरह सै वाते । अमर सिंह से उरा प्रतीते ।।
दोहा - 10
अमर सवेरा करि सकै दर्श ते पूरण मास ।
दश गिसि वारह कोस मैं पूरण चन्द्र प्रकाश ।।
प्रलय दिखाय पयोनिधि वारी । शंकर अमरै छल करि मारी ।।
वद्रीवन थपि नर नारायण । रामाश्रय तजि विजय परायण ।।
सो जीते सुर नर मुनि झारी । धर्म जपन मत अति विस्तारी ।।
तब हम सव धरिहै अवतारा । शेष अंश रामाश्रम धारा ।।
ब्रह्म सर्म विधि अरु हम मंडन । शिव शंकराचार्य मत खण्डन ।।
गणपति वक्रतुन्ड मम जेतू । सब करहै मरजादा सेतू ।।
यह सुनि मुडिन कीन्ह प्रणामा । निवसे माड़वाड़ करि धामा ।।
विधि हरि हर भये अन्तरध्याना । गये देव सव निज अस्थाना ।।
दोहा - 11
शिवद्याल सुभग संवाद यह श्रवण करै धरि ध्यान ।
तिनके सकल मनोरथ पुरवै शंभु सुजान ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयोपाद चतुर्दशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
सुनहु ऋषी सो रथ परमाना । सकल देवमय जस निरमाना ।।
शिव हित रथ विरचे विसुकरमा । सर्व लोक मय रचिसुवरणमा ।।
रथ को अंग दाहिनो भानू । द्वादश रवि आरा गज मानू ।।
शोभित वाम चक्र चन्द्रमा । षोठस कला सो आरा निरमा ।।
किरणी समनझ रथ वांये । योग लगन भूषित अंगदाये ।।
षट ऋितु सोच क्रनकै पूठी । द्वादश मास उभय दिशि जूठी ।।
निसि अरु दिवस फरै ढुय लागी । पटली सात वार कै सांगी ।।
पुष्कर अंतरिक्झ दिसि वाँये । नीड़ मेरु मंदर अंग दायें ।।
दोहा - 1
भूषन गंगादिक नदी सिन्धु तुला ये चारि ।
वंधन जंत अनंत अहि पच्छ पैजनीकारि ।।
उदय अस्त गिरि कूवर सोऊ । वत्सर वेग अयन धुर दोउ ।।
तुरग वेद सारथी विधाता । मंत्री भये वियुन सुर त्राता ।।
प्रणत ब्रह्म लघु उभय पताका । सात दीप सो जटित सलाका ।।
महाछत्र जो गगन अखन्डा । मंदर सूल सुभग सोय दन्डा ।।
हिमगिरि धनु गुण शेष भुजंगा । सरसुत घंटा शव्द अभंगा ।।
विष्णु तेज सर पावक गासी । माया जाल मनोरथ ठासी ।।
ये गुरु शेष सकल ब्रह्मण्डा । ते सब जोरि लगे रथ खन्डा ।।
तापर आय चड़े शिव शंकर । जो कालहु के काल भयंकर ।।
दोहा 2
व्रसम रूप धरि भूमिधर सो रथ दियो उठाय ।
चलो पमन मन वेग सम गति नहि वरणि सिराय ।।
रथा रूढ़ शिव देव न देखे । जै जै करहि विजय के लेखे ।।
तिहि अवसर शिव रूप प्रकाशा । मनहु भानु कोटिन संकाशा ।।
शिवा सहित सोभित अधिकाई । वरस सहस नहि वर्णि सिराई ।।
सैन संग चतुरंग सुहाई । विधिही मुनि गण सुर समुदाई ।।
रवि शनि वरुण कुवेरहु ता सन । वायु इन्द्र यम काल षडानन ।।
वीर भद्र नंदी गण भृंगी । समर जुझार महारण रंगी ।।
कुंद दंत हिम करवर झंपन । चंड प्रचंड प्रकंड प्रकंपन ।।
सोरठा - 3क
दूषित त्रिसिखि झंखार सहस पंच सत नयन मुख ।
अजा बदन जंतार कट पूतन सत सिंह ककट ।।
दोहा 3-ख
अधै बक्र हय गज वदन सेनापति जे सर्व ।।
जारि सकै सब लोक पुर चले संग शिव खर्व ।।
हल मुगधर मूसल गिरि साला । तोमर फरष त्रिसूल कराला ।।
खडग भुसुंडि भालु धनु भाथा । चक्र परिधि शक्ती गद हाथा ।।
नाना अस्त्र शस्त्र करधारी । चले सकल कहि जै मदनारी ।।
जटा जूट कर दंड सिधारण । वर्षहि सुमन सिद्ध मुनि चारण ।।
नचै अपसरा गंधर्व गावै । वाजन विविध प्रकार बजाई ।।
सेन संग लै चले महेशा । भूमि भार सहि सके न शेषा ।।
डोली धरणि महीधर कांपै । दिग्गज चिंधारहि पद चांपै ।।
नवे शेष सिर उर सकुचाने । विचली धेनु कमठ अकुलाने ।।
दोहा 4क
इहां पंच मुंडन मिलि जपन धर्म निर्माय ।
त्रिपुराधिप एकत्र करि निज कर इष्ट पुजाय ।।
सोरठा 4ख
देव सुअवसर पाय त्रिपुरासुर इक ठाँह लषि ।
कही शंभु प्रति जाय वेगि नसावहु दनुज पुर ।।
विधि हरि कह सो अवसर पाई । शंभु असुर नासहु दुखदाई ।।
ताहि समय सुर नर मुनि बृंदा । कहैं परस्पर सहित अनंदा ।।
शिव समरथ अचरज कछु नाही । त्रिपुर लोक दहै छण मांही ।।
सो मुनि शिव कार्युक विस्तारा । अगनित कोश प्रमाण अपारा ।।
कीन्ह रुद्र गण धनु टंकारा । वघिर भये सव रब सुनि घोरा ।।
वहुरि काल सम सर संधाना । विकसित पावक प्रलय समाना ।।
शिव त्रिपुरासुर ओर निहारी । कर पिणाक विष विशिष प्रहारी ।।
प्रघट शिखा जनु दामिनि लागी । फुकरत घोर झरत जनु आगी ।।
दोहा - 5
वान विकाशै अखिल जग तेज प्रकाश अपार ।
यथा प्रलय पावक दहय तेज सकल संसार ।।
छण मैं जारि करे पुर छारा । त्रिपुरासुर सिर शिव संघारा ।।
अपर दहे दानव सत कोटी । भई निशाचर दल गति खोटी ।।
सर संकाश भुवन भय हारी । चकित चौंकि सब रहे निहारी ।।
रहेउ शव्द सो भरि त्रैलोका । भये देव मुनि मनुज अशोका ।।
जो शिव रुद्र भयंकर काला ।भुवनांतक भुवनेश कराला ।।
लोक प्रलय शिव नैन उघारत । भृकुटी भंग सवै जग जारत ।।
तिहि शिव कै सोय रूप निहारी । भय वस भये देव मुनि झारी ।।
स भै सकल शिव ओर निहारे । रहे मौन कछु काल विचारे ।।
सोरठा -6क
भय वस कंपित गात उमौ भयंकर रूप लखि ।
ह्रदय बिकल विलखात शंभु समीप न जात कोउ ।।
दोहा - 6 ख
देव दनुज ऋषि मुनि मनुज शिवहि निरखि सकुचात ।
शिवदयाल दसा सोय निरखि हरि वदन मोरि मुस्क्यात ।।
सभै हेरि हरि शैल कुमारी । देव दनुज ऋषि मुनि जन झारी ।।
अति कृपाल सो अवसर जानी । हरि विरंचि वोले मृदु वानी ।।
सदा सवन के भव भय हारी । अव ते नाम भयो त्रिपुरारी ।।
नर निश्चर शिव सेवन करिहै । रुद्र गणन पति हुय अवतरिहै ।।
तेहि अवसर विधि विनय प्रकाशी । जै शंकर महेश कैलाशी ।।
जै हर गंगाधर गिरि वासी । जै शिव चिदानन्द सुख रासी ।।
जै पिणाकधर शिव अविनासी । गिरिपति गिरिजापति गुणरासी ।।
जै शशिधर नित निवसत काशी । शिवदयाल उर सद मन वासी ।।
दोहा - 7
वहुर कहा विधि विनय करि मो प्रण सुनहु महेश ।
सदा सारथी हम रहय तुम रथ पर देवेश ।।
सेवहि नाक नागपुर वासी । विधि हरि अविचल विनय प्रकाशी ।।
तेहि अवसरहि हरि जगदीशा । कर संपुट विनवत नमि शीशा ।।
जै महेश बृषधुज गौरीशा । निर्गुण ब्रह्म सगुण अधि ईशा ।।
जय गंगाधर हर नन्दीशा । प्रकृति पुरुष रूपक जगदीशा ।।
जै डमरूधर शंभु गिरीशा । रूद्र विश्व ई श्वर काशीशा ।।
जै भक्तन प्रिय शांत महीशा । नील कण्ठ करवर अवनीशा ।।
वार वार विनवौ कालीशा । शिवदयाल उर वसौ दिगाशा ।।
तेहि अवसर मुनि देव समूहा । अस्तुति करण लगे मिलि जूहा ।।
छंद
-----–----------- शिव स्तुति -----------------------
नौंमि वृषध्वज चन्द्र शेषर नीलकण्ठ जटा धरं ।।
शीश गंग भुजंग कंकण भस्म अंग करय वरं ।।
लाल कंज विशाल लोचन मुण्डमाल विश्वे श्वरं ।।
व्याघ्र छाल हिमाल आसन फटिक गौर महेश्वरं ।।
मदन दाहन ब्रषभ वाहन डमरु कर धर सुन्दरं ।।
शीश नाग पिणाक पाणी चरण पंकज फणिपुरं ।।
जयति शिव हर कंठ विषधर रुद्र शंभु दिगंवरं ।।
शिवद्यालगिरिजासहित शंकर वसौममउरअनंतरं ।।
सोरठा 8-क
वोले शिव सुखधाम विनय प्रेम वस मगन मन ।
विधि हरि सुर हित काम मागहु वर मन भावनो ।।
दोहा - 8ख
यदि प्रशन्न भगवान शिव जो चाहत वर देन ।
जंहां विकट संकट परै पघटौ दुख हरि लेन ।।
तथा अस्तु वर वोलि महेशा । अपर वचन अब सुनौ सुरेशा ।।
यह असतुति जो सुनै कि गावै । मन वांछित अमोघ फल पावै ।।
तेहि अन्तर मुंडी ते आये । करि प्रणाम मृदु वचन सुनाये ।।
कवहु कृपा निधि तजव न नेहू । अव का मोहि अनुशासन देहू ।।
तिनके वचन सुनत विधि हरि हर । वोले वचन अखिल मंगलकर ।।
सदा सकल रैहौ धनवंता । दयावान कोमल चित संता ।।
तव लगि वसहु मरुस्थल देशा । जव लगि कलयुग करहि प्रवेशा ।।
वन्श तुम्हार रहै जग छाई । पूर्व सिंधु सीमा समिताई ।।
दोहा - 9
तब कुल शिष्य सराउगी वैश्य होय सुभ जाति ।
पूजहि पारस दिउ हरे नेम नाथ वहु भांति ।।
गया से अगिनि कोण त्रय कोसा । तव कुलधर कीटक होयजोसा ।।
तासु तनय हरि वौध्य वतारा । सूद्रन कृत हति हरि महि भारा ।।
श्रद्धा श्राद्ध पितर निरधारा । वोधगया तेहि कहै संसारा ।।
इन्द्र नील मख करी सुरेशा । तंह जगदीश आन भुवनेशा ।।
सो मम अंश वौध समकारा । तेहि कहै जगन्नाथ संसारा ।।
जिनहि दरस पद लहै निर्वाना । पग प्रतिफल गोदान समाना ।।
तब ते अति कुल बढ़ै तुम्हारा । निर्फल होय न वचन हमारा ।।
वहुरि वर्ष सोरह सै वाते । अमर सिंह से उरा प्रतीते ।।
दोहा - 10
अमर सवेरा करि सकै दर्श ते पूरण मास ।
दश गिसि वारह कोस मैं पूरण चन्द्र प्रकाश ।।
प्रलय दिखाय पयोनिधि वारी । शंकर अमरै छल करि मारी ।।
वद्रीवन थपि नर नारायण । रामाश्रय तजि विजय परायण ।।
सो जीते सुर नर मुनि झारी । धर्म जपन मत अति विस्तारी ।।
तब हम सव धरिहै अवतारा । शेष अंश रामाश्रम धारा ।।
ब्रह्म सर्म विधि अरु हम मंडन । शिव शंकराचार्य मत खण्डन ।।
गणपति वक्रतुन्ड मम जेतू । सब करहै मरजादा सेतू ।।
यह सुनि मुडिन कीन्ह प्रणामा । निवसे माड़वाड़ करि धामा ।।
विधि हरि हर भये अन्तरध्याना । गये देव सव निज अस्थाना ।।
दोहा - 11
शिवद्याल सुभग संवाद यह श्रवण करै धरि ध्यान ।
तिनके सकल मनोरथ पुरवै शंभु सुजान ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयोपाद चतुर्दशोअध्याय ।।।
तेइसबां अध्याय
।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे त्रयोदशोध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
तब शिव नन्दी गणहि हंकारी । सहित षड़नन शैल कुमारी ।।
जग्य भवन तब प्रविसे जाई । वंदन लगे देव समुदाई ।।
द्वार समीप देव मुनि बृन्दा । कहैकि कह आग्या शिर चन्दा ।।
व्याकुल हुय सुर करैं पुकारा । कह करनीय कहौ निरधारा ।।
हम सब पातकि अधम अभागे । दनुज राज सब परम सुभागे ।।
यह कहि प्रविसे देव शिवाला । करत अनेक शव्द तिहि काला ।।
सो धुनि सुनि कुंभोदर धावा । अति विकराल काल सम आवा ।।
दण्ड ताड़ि मुनि बृन्द गिराये । त्रासे विवुध निकट जे पाये ।।
दोहा -1
कश्यप आदिक मुनि सकल इंद्र आदि सुर बृंद ।
गिरे धरणि शिव शिव सुमिरि परे महा दुख फंद ।।
भय वस हा हा कार पुकारे । अहो देव कस भाग हमारे ।।
हा कृपाल हा हरि जगदीशा । विनवत नवत धरनि धरि शीशा ।।
अय नारायण जन भय हारी । पाहि कृपानिधि शरण तिहारी ।।
अपर देव मुनि कहै विचारी । अवहि न भावी मिटी हमारी ।।
विकल देखि सुर मुनि समुदाई । करुणा निधि करुणा उर आई ।।
कृपा सिन्धु यह अवसर पाई । देव ऋषिन से कहि समुझाई ।।
शिव सेवन हित चित्त लगावौ । तब तुम सकल मनोरथ पावौ ।।
तिहि ते करौ सुगम शिव सेवा । जदपि सुअगम अखण्ड अभेवा ।।
दोहा - 2
यदि असाध्य शिव पूजन परम कठिन सब काल ।
तिनके अवराधन करे सिद्धि होत शिवद्याल ।।
अब तुम किहि कारण दुख कारौ । हमरे मत ह्रदय शिव धारौ ।।
शिव समान को पर उपकारी । वरदै वक्रहि सहे दुख भारी ।।
तदपि न तीसर नयन उघारी । सुकृत दारु जिमि बोरै न वारी ।।
वहुरि सुरन कह अय जगदीशा । तुम कहि दुराराध्य गौरीशा ।।
किहि विधि वस होवै सुरत्राता । सो सब मोहि कहौ विख्याता ।।
कह जगदीश सुनौ मुनि देवा । देंउ वताय मंत्र निरभेवा ।।
विंसति अंक को मंत्र विशाला । निर्मल सुन्दर सुभग रसाला ।।
समुझे वर्ग वरण अरु मात्रा । श्रीपति कहै सुरन प्रति वात्रा ।।
दोहा -3
वरण पांच युग वर्ग वसु मात्रा द्वादश भांति ।
शिवदयाल समुझै कहै वचन भेद त्रै पांति ।।
आठ पांच द्वादश अनुमाना । अंक भेद शिव जपन विधाना ।।
अछर आठ एक अरु तीना । षट त्रय एक अंक मिलि गीना ।।
अंक भेद जानय येहि भांती । शिव शिव मंत्र जपै दिन राती ।।
औरौ मंत्र सुनहु जो बीसा । शीघ्र प्रशन्न होय नन्दीशा ।।
ऊँ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु । कुरु शिवाय नमः ऊँ मंत्र जुरु ।।
एक कोटि जपिकै यह मंत्रा । तव दरसै शिव रूप स्वतंत्रा ।।
देय अखिल कामना अनन्ता । शिव कृपाल कोमिल चित संता ।।
तजौ सकल दुख दुंद हिरासा । दनुज मारि हरिहैं शिव त्रासा ।।
दोहा -4
गोपय दधि मधु धृत रस शिव शिर धार समोय ।
शिवदयाल कोटि यह मंत्र जपि सफल कामना होय ।।
सुनि श्रीपति कै कोमल वानी । संकट हरणि कृपामृत सानी ।।
सकल देव जप ध्यावन लागे । एक कोटि मिति करि अनुरागे ।।
तेहि अनसर प्रघटे शिव शंकर । पंच वक्र त्रय नयन गरलधर ।।
विहसि कहा शिव कृपा निधाना । हम प्रशन्न मांगौ वरदाना ।।
सुर मुनि सवहि प्रशन्यति जानी । विनय करत शिव सुजस वखानी ।।
जयति नाथ शिव कृपा निधाना । अगम अनादि अनंत सुजाना ।।
अछै अजित योगिन उरवासी । सेवक सुखद सदा अविनासी ।।
मदन दहन दानव कुल नासन । अस कहि विनती करेसि प्रकाशन ।।
दोहा - 5
मसि काजर गिरि सिंधु धट सुर तरु लिखनी कार ।।
कागद महि सारद लिखहि शिव गुण लहै न पार ।।
छंद-
नमामि शंभु शंकरं प्रलय समय भयंकरं ।।
परावरं सुरपितं नमामि लोक दीपितं ।।
कपर्दिनं त्रिलोचनं त्रिलोक शोक मोचनं ।।
गणाधिपं सुरेश्वरं नमामि ते महेश्वरम ।।
कार्ज कारण रूपकं सदा शिवं अनूपकं ।।
स्वविश्व व्याप्य वयापकं त्रिताप पाप तापकं ।।
सुरारि बृंद त्रासनं अघौघ मूल नासनं ।।
दुजेन्द्र धेनु रंजनं मदादि दोष भंजनं ।।
इदं स्तोत्र शंकरं नित्यमेव निवेदितं ।।
शिवद्याल निर्मितं पठ़ै सुखं अपर्मितं ।।
सोरठा -6क
अस्तुति विधन विधान करन लगे करन लगे शिवद्याल सुर ।
कह मांगौ वरदान हुय प्रशन्न जगदीश्वर ।।
6ख
पुनि वोले मुनि देव हम सब शरण महेश के ।
यदि प्रशन्न महदेव नासहु पुर त्रिपुरेश के ।।
दोहा - 6ग
विसुकरमा सन वोलि कह प्रभु सो अवसर पाय ।
सहित सारथी रथ धनुष सर सब निरमौ जाय ।।
छंद
विसुकरमा हर शासन पाय ह्रदय हरसाय चलो सिरनाई ।।
देवन लोकन मय रचिकै रथ विस्वकै अर्थ समर्थ बनाई ।।
सो देखि के देव मुनि हरषे अवतौ त्रिपुरासुर दुष्ट नसाई ।।
शिवदयाल कृपाल के शासन ते रथ पर्म विशाल दियो निर्माई ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे त्रयोदशोध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
तब शिव नन्दी गणहि हंकारी । सहित षड़नन शैल कुमारी ।।
जग्य भवन तब प्रविसे जाई । वंदन लगे देव समुदाई ।।
द्वार समीप देव मुनि बृन्दा । कहैकि कह आग्या शिर चन्दा ।।
व्याकुल हुय सुर करैं पुकारा । कह करनीय कहौ निरधारा ।।
हम सब पातकि अधम अभागे । दनुज राज सब परम सुभागे ।।
यह कहि प्रविसे देव शिवाला । करत अनेक शव्द तिहि काला ।।
सो धुनि सुनि कुंभोदर धावा । अति विकराल काल सम आवा ।।
दण्ड ताड़ि मुनि बृन्द गिराये । त्रासे विवुध निकट जे पाये ।।
दोहा -1
कश्यप आदिक मुनि सकल इंद्र आदि सुर बृंद ।
गिरे धरणि शिव शिव सुमिरि परे महा दुख फंद ।।
भय वस हा हा कार पुकारे । अहो देव कस भाग हमारे ।।
हा कृपाल हा हरि जगदीशा । विनवत नवत धरनि धरि शीशा ।।
अय नारायण जन भय हारी । पाहि कृपानिधि शरण तिहारी ।।
अपर देव मुनि कहै विचारी । अवहि न भावी मिटी हमारी ।।
विकल देखि सुर मुनि समुदाई । करुणा निधि करुणा उर आई ।।
कृपा सिन्धु यह अवसर पाई । देव ऋषिन से कहि समुझाई ।।
शिव सेवन हित चित्त लगावौ । तब तुम सकल मनोरथ पावौ ।।
तिहि ते करौ सुगम शिव सेवा । जदपि सुअगम अखण्ड अभेवा ।।
दोहा - 2
यदि असाध्य शिव पूजन परम कठिन सब काल ।
तिनके अवराधन करे सिद्धि होत शिवद्याल ।।
अब तुम किहि कारण दुख कारौ । हमरे मत ह्रदय शिव धारौ ।।
शिव समान को पर उपकारी । वरदै वक्रहि सहे दुख भारी ।।
तदपि न तीसर नयन उघारी । सुकृत दारु जिमि बोरै न वारी ।।
वहुरि सुरन कह अय जगदीशा । तुम कहि दुराराध्य गौरीशा ।।
किहि विधि वस होवै सुरत्राता । सो सब मोहि कहौ विख्याता ।।
कह जगदीश सुनौ मुनि देवा । देंउ वताय मंत्र निरभेवा ।।
विंसति अंक को मंत्र विशाला । निर्मल सुन्दर सुभग रसाला ।।
समुझे वर्ग वरण अरु मात्रा । श्रीपति कहै सुरन प्रति वात्रा ।।
दोहा -3
वरण पांच युग वर्ग वसु मात्रा द्वादश भांति ।
शिवदयाल समुझै कहै वचन भेद त्रै पांति ।।
आठ पांच द्वादश अनुमाना । अंक भेद शिव जपन विधाना ।।
अछर आठ एक अरु तीना । षट त्रय एक अंक मिलि गीना ।।
अंक भेद जानय येहि भांती । शिव शिव मंत्र जपै दिन राती ।।
औरौ मंत्र सुनहु जो बीसा । शीघ्र प्रशन्न होय नन्दीशा ।।
ऊँ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु । कुरु शिवाय नमः ऊँ मंत्र जुरु ।।
एक कोटि जपिकै यह मंत्रा । तव दरसै शिव रूप स्वतंत्रा ।।
देय अखिल कामना अनन्ता । शिव कृपाल कोमिल चित संता ।।
तजौ सकल दुख दुंद हिरासा । दनुज मारि हरिहैं शिव त्रासा ।।
दोहा -4
गोपय दधि मधु धृत रस शिव शिर धार समोय ।
शिवदयाल कोटि यह मंत्र जपि सफल कामना होय ।।
सुनि श्रीपति कै कोमल वानी । संकट हरणि कृपामृत सानी ।।
सकल देव जप ध्यावन लागे । एक कोटि मिति करि अनुरागे ।।
तेहि अनसर प्रघटे शिव शंकर । पंच वक्र त्रय नयन गरलधर ।।
विहसि कहा शिव कृपा निधाना । हम प्रशन्न मांगौ वरदाना ।।
सुर मुनि सवहि प्रशन्यति जानी । विनय करत शिव सुजस वखानी ।।
जयति नाथ शिव कृपा निधाना । अगम अनादि अनंत सुजाना ।।
अछै अजित योगिन उरवासी । सेवक सुखद सदा अविनासी ।।
मदन दहन दानव कुल नासन । अस कहि विनती करेसि प्रकाशन ।।
दोहा - 5
मसि काजर गिरि सिंधु धट सुर तरु लिखनी कार ।।
कागद महि सारद लिखहि शिव गुण लहै न पार ।।
छंद-
नमामि शंभु शंकरं प्रलय समय भयंकरं ।।
परावरं सुरपितं नमामि लोक दीपितं ।।
कपर्दिनं त्रिलोचनं त्रिलोक शोक मोचनं ।।
गणाधिपं सुरेश्वरं नमामि ते महेश्वरम ।।
कार्ज कारण रूपकं सदा शिवं अनूपकं ।।
स्वविश्व व्याप्य वयापकं त्रिताप पाप तापकं ।।
सुरारि बृंद त्रासनं अघौघ मूल नासनं ।।
दुजेन्द्र धेनु रंजनं मदादि दोष भंजनं ।।
इदं स्तोत्र शंकरं नित्यमेव निवेदितं ।।
शिवद्याल निर्मितं पठ़ै सुखं अपर्मितं ।।
सोरठा -6क
अस्तुति विधन विधान करन लगे करन लगे शिवद्याल सुर ।
कह मांगौ वरदान हुय प्रशन्न जगदीश्वर ।।
6ख
पुनि वोले मुनि देव हम सब शरण महेश के ।
यदि प्रशन्न महदेव नासहु पुर त्रिपुरेश के ।।
दोहा - 6ग
विसुकरमा सन वोलि कह प्रभु सो अवसर पाय ।
सहित सारथी रथ धनुष सर सब निरमौ जाय ।।
छंद
विसुकरमा हर शासन पाय ह्रदय हरसाय चलो सिरनाई ।।
देवन लोकन मय रचिकै रथ विस्वकै अर्थ समर्थ बनाई ।।
सो देखि के देव मुनि हरषे अवतौ त्रिपुरासुर दुष्ट नसाई ।।
शिवदयाल कृपाल के शासन ते रथ पर्म विशाल दियो निर्माई ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे त्रयोदशोध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
वाइसवां अध्याय
।।।अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद द्वादशोध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
वहुरि सूत कहय मुनि बृन्दा । रहा जपन मत पूरि अनन्दा ।।
प्रघट अधर्म धर्म सब नाशे । जंहां तहां पाखंड प्रकाशे ।।
नारि धर्म वरणाश्रम धर्मा । शिव हरि पूजन जज्ञ सुकर्मा ।।
अस्नान दान तीरथ व्रत पर्वा । वेद धर्म आदिक पथ सर्वा ।।
इनहि आदि दै जे शुभ काजा । दूरि करै मग वेद समाजा ।।
सकल विश्व वस जा माया के । सदा रहहि विधि हरि वस जाके ।।
जा लक्ष्मी कौ तपि निर्भेवा । अमर भये विधि हरि हर देवा ।।
सो लक्ष्मी त्रयपुर सरसाई । तप करि विधि से असुरन पाई ।।
दोहा -1
जो प्रभुता धन धाम लखि मोहत सब संसार ।
सो प्रभुता पूरण त्रिपुर जैनी धन अधिकार ।।
जो धन भुवन चारि दश माही । देवन रत्न त्रिपुर वस पाही ।।
सो तजि नगर वहिर सब आये । प्रभु माया वस मोह जनाये ।।
विष्णु माय निर्मित जो माया । ता वस बुधि मोहै समुदाया ।।
गहि सो पंथ तजे श्रुति धर्मा । शिव तजि गहि पाखंड अकर्मा ।।
यह विधि जव नासे श्रुति सेतू । तजि गये लिंगार्चन बृषकेतू ।।
नारि धर्म नासे अनिआशा । दुराचार मन भये दुरासा ।।
भये कृतार्थ देवन युतहरि । समुरन लगे उमापति सिरधरि ।।
पार्थिव लिंग पूजि परिपोषे । विनती करि हरि शिव संतोषे ।।
दोहा -2
बह्म रूप परमात्मा नारायण शिव रूप ।
रुद्र महे श्वर नौमि हर शिवदयाल अनरूप ।।
इमि विनवत करि दंड प्रणामा । जपत मंत्र सत्रुन्जय नामा ।।
लक्ष् पचास कोटि भय लिंगा । धरि जल मध्य पूजि पंचागा ।।
तेहि अवसर तब तह मुनि अरु देवा । लगे करन विनती कर सेवा ।।
नौमि सर्व आत्मा शिव शंकर । रुद्र प्रचेत विरूप अर्तिहर ।।
जै सुरारि सूदनचित संता । वंदौं आदि अनादि अनन्ता ।।
प्रकृति पुरुष तुमही जगभरता । सिरजन प्रतिपालन संधर्ता ।।
प्रकृति शक्तिमय जगमय धाता । सुर मुनि बदत बरद विख्याता ।।
शिव तुम श्रुतिन मध्य श्रुति सारा । वेद श्रुतिन के जानन हारा ।।
दोहा 3
शिव अमूर्ति वहु मूरति रूप अरूप विरूप ।
जक्ष् पितर किन्नर उरग सुर नर सबके भूप ।।
सिद्धि साध्य मुनिगण गंधरवा । स्थावर आदिक तुम सबसर्वा ।।
भृकुटी वंक प्रलय छिन कारत । तिनहि कवन श्रम असुर संहारत ।।
पाहि शंभु सब शरण तुम्हारे । हरहु नाथ दुख दोष हमारे ।।
मन बच कर्म सेवक सुखदायक । योगिन योग वित्त सुर नायक ।।
तुमही तत्व बदै अस वेदा । तेज राशि जग मैं निरभेदा ।।
परमात्मा जगधर विश्वम्भर । विश्वरूप विश्वै श्वर विषधर ।।
लखे सो सुने सुने तस देखे । जगत गुरू जग विभू विषेखे ।।
गुरु सुमेर मन्दर ब्रह्मंडा । लधुन मध्य परमानु प्रचन्डा ।।
दोहा - 4
सर्वपाणिपादान्त लगि नयन शिरोमुख मेव ।
अनाबृत सर्वज्ञ तुम अनिर्देश महदेव ।।
कोटि भाष्कर सम संकासक । शिव षट रविसति तत्व प्रकाशक ।।
तुम्है छाणि गति दूसर नाही । मोहित सब तब माया मांही ।।
देव विनय सुनि ळखि हरि जापा । नंदी युत हर प्रघट प्रतापा ।।
प्रणवत हरि शिर शिव कर परसा । देव ऋषिन उर आनद सरसा ।।
घन गंभीर गिरा शिव भाषा । सुनहु देव हरि भरि अभिलाषा ।।
नारद वोध विष्णु माया वल । सहित अधर्म भये दानव दल ।।
त्रिपुर विनास करन हम जावै । इन्द्र उपेन्द्र देव मुनि आवै ।।
शंभु वचन सुनि मुनि हरि देवा । कीन्ह प्रणाम वहुरि कह भेवा ।।
दोहा - 5
शंभु विनय यह प्रात नित पठ़ै सुनै मन लाय ।
शिवदयाल विजय संग्राम चढ़ि निहचै शत्रु नसाय ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वादशोध्याय ।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
वहुरि सूत कहय मुनि बृन्दा । रहा जपन मत पूरि अनन्दा ।।
प्रघट अधर्म धर्म सब नाशे । जंहां तहां पाखंड प्रकाशे ।।
नारि धर्म वरणाश्रम धर्मा । शिव हरि पूजन जज्ञ सुकर्मा ।।
अस्नान दान तीरथ व्रत पर्वा । वेद धर्म आदिक पथ सर्वा ।।
इनहि आदि दै जे शुभ काजा । दूरि करै मग वेद समाजा ।।
सकल विश्व वस जा माया के । सदा रहहि विधि हरि वस जाके ।।
जा लक्ष्मी कौ तपि निर्भेवा । अमर भये विधि हरि हर देवा ।।
सो लक्ष्मी त्रयपुर सरसाई । तप करि विधि से असुरन पाई ।।
दोहा -1
जो प्रभुता धन धाम लखि मोहत सब संसार ।
सो प्रभुता पूरण त्रिपुर जैनी धन अधिकार ।।
जो धन भुवन चारि दश माही । देवन रत्न त्रिपुर वस पाही ।।
सो तजि नगर वहिर सब आये । प्रभु माया वस मोह जनाये ।।
विष्णु माय निर्मित जो माया । ता वस बुधि मोहै समुदाया ।।
गहि सो पंथ तजे श्रुति धर्मा । शिव तजि गहि पाखंड अकर्मा ।।
यह विधि जव नासे श्रुति सेतू । तजि गये लिंगार्चन बृषकेतू ।।
नारि धर्म नासे अनिआशा । दुराचार मन भये दुरासा ।।
भये कृतार्थ देवन युतहरि । समुरन लगे उमापति सिरधरि ।।
पार्थिव लिंग पूजि परिपोषे । विनती करि हरि शिव संतोषे ।।
दोहा -2
बह्म रूप परमात्मा नारायण शिव रूप ।
रुद्र महे श्वर नौमि हर शिवदयाल अनरूप ।।
इमि विनवत करि दंड प्रणामा । जपत मंत्र सत्रुन्जय नामा ।।
लक्ष् पचास कोटि भय लिंगा । धरि जल मध्य पूजि पंचागा ।।
तेहि अवसर तब तह मुनि अरु देवा । लगे करन विनती कर सेवा ।।
नौमि सर्व आत्मा शिव शंकर । रुद्र प्रचेत विरूप अर्तिहर ।।
जै सुरारि सूदनचित संता । वंदौं आदि अनादि अनन्ता ।।
प्रकृति पुरुष तुमही जगभरता । सिरजन प्रतिपालन संधर्ता ।।
प्रकृति शक्तिमय जगमय धाता । सुर मुनि बदत बरद विख्याता ।।
शिव तुम श्रुतिन मध्य श्रुति सारा । वेद श्रुतिन के जानन हारा ।।
दोहा 3
शिव अमूर्ति वहु मूरति रूप अरूप विरूप ।
जक्ष् पितर किन्नर उरग सुर नर सबके भूप ।।
सिद्धि साध्य मुनिगण गंधरवा । स्थावर आदिक तुम सबसर्वा ।।
भृकुटी वंक प्रलय छिन कारत । तिनहि कवन श्रम असुर संहारत ।।
पाहि शंभु सब शरण तुम्हारे । हरहु नाथ दुख दोष हमारे ।।
मन बच कर्म सेवक सुखदायक । योगिन योग वित्त सुर नायक ।।
तुमही तत्व बदै अस वेदा । तेज राशि जग मैं निरभेदा ।।
परमात्मा जगधर विश्वम्भर । विश्वरूप विश्वै श्वर विषधर ।।
लखे सो सुने सुने तस देखे । जगत गुरू जग विभू विषेखे ।।
गुरु सुमेर मन्दर ब्रह्मंडा । लधुन मध्य परमानु प्रचन्डा ।।
दोहा - 4
सर्वपाणिपादान्त लगि नयन शिरोमुख मेव ।
अनाबृत सर्वज्ञ तुम अनिर्देश महदेव ।।
कोटि भाष्कर सम संकासक । शिव षट रविसति तत्व प्रकाशक ।।
तुम्है छाणि गति दूसर नाही । मोहित सब तब माया मांही ।।
देव विनय सुनि ळखि हरि जापा । नंदी युत हर प्रघट प्रतापा ।।
प्रणवत हरि शिर शिव कर परसा । देव ऋषिन उर आनद सरसा ।।
घन गंभीर गिरा शिव भाषा । सुनहु देव हरि भरि अभिलाषा ।।
नारद वोध विष्णु माया वल । सहित अधर्म भये दानव दल ।।
त्रिपुर विनास करन हम जावै । इन्द्र उपेन्द्र देव मुनि आवै ।।
शंभु वचन सुनि मुनि हरि देवा । कीन्ह प्रणाम वहुरि कह भेवा ।।
दोहा - 5
शंभु विनय यह प्रात नित पठ़ै सुनै मन लाय ।
शिवदयाल विजय संग्राम चढ़ि निहचै शत्रु नसाय ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वादशोध्याय ।।
इक्कीसबां अध्याय
।।।अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीय पाद एकादशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
अस विचारि जगदीश विरेजा । पुरुष एक निरमेउ निज तेजा ।।
मय मायामय विदित सुरूपा । दानव धर्म विघन अनरूपा ।।
मुंडी मलिन वसन छिष पात्रा । कर मार्जनीकारि पद यात्रा ।।
कर अंवर धरि निज मुख झांपी । हरि सनमुख करजोरि कलापी ।।
करि विनती कह करौ प्रकाशन । हमकौ नाथ कहा अनुशासन ।।
तव बोले प्रभु कृपानिधाना । सुनहु कि जिहि कारण निरमाना ।।
काज हमार करौ मम अंशा । पूजनीय निसि दिवस असंसा ।।
मायन माया मय पढ़ि विद्या । कर्म विवादक वेद कि निंदा ।।
दोहा - 1
विरचि ग्रन्थ सोरह सहस अरिहन मंत्र प्रधान ।
दै हरि पारष नाम धरि पुनि कह सुनौ सुजान ।।
सोरह सहस ग्रंथ तुम धारौ । हम समर्थि दयेसि यह कारौ ।।
विविध भांति माया निरमानौ । वस्य अवस्य करी शुभ जानौ ।।
वाद विरोध रोध सब ठाई । इष्ट अनिष्ट दिखाय सुनाई ।।
उपासना कलपना अनेका । चित्र विचित्र विषद अविवेका ।।
यह प्रकार हरि ताहि बुझावा । मय मायामय शास्त्र पढ़ावा ।।
षोडस सहस शास्त्र उपदेशा । नेम नाथ पारष निरदेशा ।।
मोहनीय तुम सवहि रिझावौ । धर्म जपन मत दैत्य पढ़ावौ ।।
जपन धर्म जव होय प्रकाशा अपर धर्म श्रुति मारग नाशा ।।
दोह- 2
सब जीवन पर दया धरि अपर धर्म करि नाश ।
जग्य योग तरपन क्रिया जप तप नेम निराश ।।
तीनौ असुर विनासन हेता । जाय पढ़ाय दनुज चित चेता ।।
त्रिपुर नास करि धर्म प्रकाशौ । वहुरि मरुस्थल देश निवासौ ।।
द्वापर सूद्र जग्य तप करिहैं । ते हम जैन वौध हुय हरिहैं ।।
तव होवै अति बृद्धि तुम्हारी । शिष्य ते शिष्य प्रशिष्य अधिकारी ।।
कलिगत जपन अधिक विस्तारा । तव श्रीरंग मोर अवतारा ।।
जदपि जगत श्रुति सेतु नसैहौ । हमरी कृपा मुक्ति गति पैहौ ।।
मम अनुशासन यह आचरिहौ । अति धनवंत अंत भव तरिहौ ।।
सुनि सो मुंडी ह्रदय अनन्दे । चलत समय श्रीपति पद वंदे ।।
दोहा - 3
शिष्य चार मुंडी करे हरि आग्या अनुसार ।
तिनहि मुड़ाय पड़ाय निज शास्त्र सहित विस्तार ।।
गुरु संगति सोभित जुग चेला । प्रभुहि प्रणाम कीन तिन मेला ।।
आशिष दै हरि कह तुम पांचा । जस गुरु कोमल सिषि तस रांचा ।।
शिष्यन सहित सुमुंडित मुंडा । कल्पित करहु धर्म पाखन्डा ।।
पात्र सहित अंवर कर धारण । मृदु अल्पक भाषण हित कारण ।।
धर्म लाभ ते परे तत्व वद । कर पुंजिका कारि धरौ पद ।।
अंवर खंड सकल मुख बांधे । मलिन वसन उर हरि अवराधे ।।
हर्षि कृपानिधि विरचे उ नामा । आदि रूप ऋषि यती निरामा ।।
उ पाध्याय आचार जे राचा । भये प्रसिद्ध नाम युत पाचा ।।
दोहा 4
लोक सुखद कारण रचो माया मय निरमाय ।
प्रेम सहित अरिहन जपौ जपत चले शिरनाय ।।
प्रवसि नगर रिषि माया कारी । वहुरि ग्राम ते वन पगु धारी ।।
जगत मोहिनी मायन माया । मिलहि ते शिष्य होंय लखि दाया ।।
जे देखैं ते होय परायण । करैं वेगि सो मत धारायण ।।
हरि प्रेरित नारद तह आये । दनुज गेह हुय शिष्य सिधाये ।।
उठि असुराधिप चरण पखारे । अरध देय आसन वैठारे ।।
शीय नाय पूंछी कुशलाता । नारद कही कुशल बिख्याता ।।
यती धर्म एक येहि वन मांही । लखे बहुत अस दूसर नांही ।।
हमहूं तिनकै लीन्हेसि दीक्झा । तुम गुरु करहु होय जो ई च्छा ।।
दोहा - 5
दानव नारद वचन सुनि देखन जपन समाज ।
शिवदयाल सो चलसि मग कह अब पूरण काज ।।
नारद मुनि दीझालय जिनकी । शिक्षा सुभग लेव हम तिनकी ।।
यह कह दनुज नाथ गयो तंहवा । मुनिवर सहित जती वन जंहवा ।।
देखि ताप भा मोहित माया । कीन्ह प्रणाम वचन निरमाया ।।
दीक्षा देहु हंमय अमलाशय । धर्म सहित उर तेज प्रकाशय ।।
दनुज गिरा सुनि कह ऋषि ज्ञानी । राजन सफल जो जाचत वानी ।।
देउ वचन मम गिरा न टारौ । मृखा न करौ वचन यह हारौ ।।
दनुज महा मोहित वस माया । दये वचन ऋषि तजौ न दाया ।।
ऋषिसत्तम मुख अम्वर खोले । अरिहन मंत्र कान लगि बोले ।।
दोहा - 6
दनुजाधिप शिषि होत ही सकल असुर नर नारि ।
शिवदयाल सवन दीक्षा लई त्रिपुर निवासी झारि ।।
।।।इति श्री शिव चरित्र महत्मे एकादशोध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
अस विचारि जगदीश विरेजा । पुरुष एक निरमेउ निज तेजा ।।
मय मायामय विदित सुरूपा । दानव धर्म विघन अनरूपा ।।
मुंडी मलिन वसन छिष पात्रा । कर मार्जनीकारि पद यात्रा ।।
कर अंवर धरि निज मुख झांपी । हरि सनमुख करजोरि कलापी ।।
करि विनती कह करौ प्रकाशन । हमकौ नाथ कहा अनुशासन ।।
तव बोले प्रभु कृपानिधाना । सुनहु कि जिहि कारण निरमाना ।।
काज हमार करौ मम अंशा । पूजनीय निसि दिवस असंसा ।।
मायन माया मय पढ़ि विद्या । कर्म विवादक वेद कि निंदा ।।
दोहा - 1
विरचि ग्रन्थ सोरह सहस अरिहन मंत्र प्रधान ।
दै हरि पारष नाम धरि पुनि कह सुनौ सुजान ।।
सोरह सहस ग्रंथ तुम धारौ । हम समर्थि दयेसि यह कारौ ।।
विविध भांति माया निरमानौ । वस्य अवस्य करी शुभ जानौ ।।
वाद विरोध रोध सब ठाई । इष्ट अनिष्ट दिखाय सुनाई ।।
उपासना कलपना अनेका । चित्र विचित्र विषद अविवेका ।।
यह प्रकार हरि ताहि बुझावा । मय मायामय शास्त्र पढ़ावा ।।
षोडस सहस शास्त्र उपदेशा । नेम नाथ पारष निरदेशा ।।
मोहनीय तुम सवहि रिझावौ । धर्म जपन मत दैत्य पढ़ावौ ।।
जपन धर्म जव होय प्रकाशा अपर धर्म श्रुति मारग नाशा ।।
दोह- 2
सब जीवन पर दया धरि अपर धर्म करि नाश ।
जग्य योग तरपन क्रिया जप तप नेम निराश ।।
तीनौ असुर विनासन हेता । जाय पढ़ाय दनुज चित चेता ।।
त्रिपुर नास करि धर्म प्रकाशौ । वहुरि मरुस्थल देश निवासौ ।।
द्वापर सूद्र जग्य तप करिहैं । ते हम जैन वौध हुय हरिहैं ।।
तव होवै अति बृद्धि तुम्हारी । शिष्य ते शिष्य प्रशिष्य अधिकारी ।।
कलिगत जपन अधिक विस्तारा । तव श्रीरंग मोर अवतारा ।।
जदपि जगत श्रुति सेतु नसैहौ । हमरी कृपा मुक्ति गति पैहौ ।।
मम अनुशासन यह आचरिहौ । अति धनवंत अंत भव तरिहौ ।।
सुनि सो मुंडी ह्रदय अनन्दे । चलत समय श्रीपति पद वंदे ।।
दोहा - 3
शिष्य चार मुंडी करे हरि आग्या अनुसार ।
तिनहि मुड़ाय पड़ाय निज शास्त्र सहित विस्तार ।।
गुरु संगति सोभित जुग चेला । प्रभुहि प्रणाम कीन तिन मेला ।।
आशिष दै हरि कह तुम पांचा । जस गुरु कोमल सिषि तस रांचा ।।
शिष्यन सहित सुमुंडित मुंडा । कल्पित करहु धर्म पाखन्डा ।।
पात्र सहित अंवर कर धारण । मृदु अल्पक भाषण हित कारण ।।
धर्म लाभ ते परे तत्व वद । कर पुंजिका कारि धरौ पद ।।
अंवर खंड सकल मुख बांधे । मलिन वसन उर हरि अवराधे ।।
हर्षि कृपानिधि विरचे उ नामा । आदि रूप ऋषि यती निरामा ।।
उ पाध्याय आचार जे राचा । भये प्रसिद्ध नाम युत पाचा ।।
दोहा 4
लोक सुखद कारण रचो माया मय निरमाय ।
प्रेम सहित अरिहन जपौ जपत चले शिरनाय ।।
प्रवसि नगर रिषि माया कारी । वहुरि ग्राम ते वन पगु धारी ।।
जगत मोहिनी मायन माया । मिलहि ते शिष्य होंय लखि दाया ।।
जे देखैं ते होय परायण । करैं वेगि सो मत धारायण ।।
हरि प्रेरित नारद तह आये । दनुज गेह हुय शिष्य सिधाये ।।
उठि असुराधिप चरण पखारे । अरध देय आसन वैठारे ।।
शीय नाय पूंछी कुशलाता । नारद कही कुशल बिख्याता ।।
यती धर्म एक येहि वन मांही । लखे बहुत अस दूसर नांही ।।
हमहूं तिनकै लीन्हेसि दीक्झा । तुम गुरु करहु होय जो ई च्छा ।।
दोहा - 5
दानव नारद वचन सुनि देखन जपन समाज ।
शिवदयाल सो चलसि मग कह अब पूरण काज ।।
नारद मुनि दीझालय जिनकी । शिक्षा सुभग लेव हम तिनकी ।।
यह कह दनुज नाथ गयो तंहवा । मुनिवर सहित जती वन जंहवा ।।
देखि ताप भा मोहित माया । कीन्ह प्रणाम वचन निरमाया ।।
दीक्षा देहु हंमय अमलाशय । धर्म सहित उर तेज प्रकाशय ।।
दनुज गिरा सुनि कह ऋषि ज्ञानी । राजन सफल जो जाचत वानी ।।
देउ वचन मम गिरा न टारौ । मृखा न करौ वचन यह हारौ ।।
दनुज महा मोहित वस माया । दये वचन ऋषि तजौ न दाया ।।
ऋषिसत्तम मुख अम्वर खोले । अरिहन मंत्र कान लगि बोले ।।
दोहा - 6
दनुजाधिप शिषि होत ही सकल असुर नर नारि ।
शिवदयाल सवन दीक्षा लई त्रिपुर निवासी झारि ।।
।।।इति श्री शिव चरित्र महत्मे एकादशोध्याय ।।।
बीसवां अध्याय
।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद दशयोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
।।। त्रिपुरासुर प्रकरण ।।।
त्रिपुर दुखद सुनि गुणि मनधाता । कहा कि दनुजन योग न घाता ।।
पुन्यवंत कहुं मरहि न मारे । सुनहू जो सुगम विचार हमारे ।।
जाउ सकुचि तजि शंकर तीरा । वे तमरथ हरहै सब पीरा ।।
ब्रह्म गिरा सुनि सुर मुनि बृंदा । गये शंभु प्रति सहित अनंदा ।।
करि विनती दुःख दुसह सुनावा । सुनि शिव शंकर के मन भावा ।।
बहुरि कहा शिव सुरन वुझाई । दानवंत हत करो न जाई ।।
हैं त्रिपुरासुर अति पुन्याई । धर्म वृद्धि नहि सकहि नसाई ।।
जव लगि पुन्य होय अधिकारी । तबलगि सकै न सुरमुनि मारी ।।
दोहा - 1
जदपि सहायक होय प्रभु तौ यह करब उपाय ।
ई श्वर से विनती करौ देवन जतन वताय ।।
धर्म नसावन करौ उपाई । तौ नासय दानव समुदाई ।।
तदपि विष्णु से करहु निवेदन । रखिहै कृपा सिन्धु कछु भेद न ।।
शंभु गिरा सुनि सुर हिय हारे । त्राहि त्राहि हरि शरण पुकारे ।।
करुणानिधि करुणावस प्रघटे । दुसह दुःख देवन के निघटे ।।
विहंसि वचन वोले जग तारण । कहौ सकल सो निज दुख कारण ।।
करि विनती बोले सुर बृन्दा । द्रवहु कृपानिधि करुणाकन्दा ।।
देवन पच्छ हेत चित धरऊ । त्रिपुरासुर वध सूचित करऊ ।।
विष्णु कहा जंह धर्म सनातन । ताके होय न कैसेउ पातन ।।
दोहा- 2
धर्म भरोसो धर्म वल धर्महि सकल समाज ।
शिवदयाल आपने धर्म से सिद्ध होय सब काज ।।
धर्म निकट संकट नहि जाई । भानु उदय जिमि तमसि नसाई ।।
सुनि हरि वचन दुखित भये देवा । सूषे वदन निरासे खेवा ।।
कितै जांय कह करिय कृपाला । कौन जतन निवरै यहि काला ।।
किहि प्रकार त्रिपुरासुर नासै । यह कहि सुर भये दुखित निरासै ।।
अस मैं दुरगति सही न जाई । विनि औसर का करिय उपाई ।।
करि मन मौन चकित चित भयेउ । वहुरि विलखि अस्तुति निरमयेउ ।।
नाथ कृपा करि करब सहाई । दनुज वधन कै करव उपाई ।।
हुय अनाथ नारायण आगे । विनती करण प्रेमवस लागे ।।
जव जब दारुण दुख दहौ देव विप्र दुय जाति ।
शिवद्याल प्रभु अवतार धरि राषत है सव भांति ।।
नमोकृपालाय दिगंवराय अरूपरूपाय विरूपकाय ।
भस्मांगराय सुरेश्वराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
कैलाशवासाय गिरीश्वराय नीलशिखंडाय महेश्वराय ।
लोकेभृमंताय निशामुखाय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
विश्वादिरूपाय विश्वेश्वराय अर्धंगगौरी शशिशेषराय ।
कर्पूरगौराय जटाधराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
काशीनिवाशाय त्रियंवकाय कामंतुनाशाय वरप्रदाय ।
त्रिशूलहस्ताय त्रिलोचनाय श्री नीलकंठाय नमः शिवाय ।।
मृत्युंजये व्याल विभूषणाय कालीकलत्राय बृषध्वजाय ।
पिनाकहस्ताय परावराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
शिवायइदमस्तुतिनिर्मिताय शिवदयालसर्मायरतिप्रदाय ।
इदंश्रवणपाठनभक्तिदाय ध्यायेचिदानन्दअगम शिवाय ।।
गौ द्वज संतन सुरण हित धरि अनेक अवतार ।
शिवद्याल कृपानिधि कृपाकरि करत सदा निरधार ।।
देव विनय सुनि जगन्निबासी । चित चिंतित सुरकाज प्रकासी ।।
सुनहु देव नहि और उपाई । शंभु शरण सेवहु सुखदायी ।।
शिव पूजन पूरण जब होई । तब जौ जांचौ मिलिहै सोई ।।
विनि शिव पूजे सब जग मांही । देव असुर नर का सत नांही ।।
जो चाहौ त्रिपुरासुर दूषन । सेवहु शिव त्रैलोक विभूषन ।।
पूजि शिवहि निश्चर समुदाई । जीतै सुर दुज धर्म नसाई ।।
विना शम्भु पूजे धर्मिष्टा । कौनेउ जतन होय नहि नष्टा ।।
शिव पूजा विनि दशौ प्रयोगा । सिद्धि करण को वैन न योगा ।।
दोहा - 5
थंभन मोहन अकर्षण लूक अगनि वैताल ।
वधन उचाटन वसकरण शिव अधीन शिवद्याल ।।
शिवहि से वैदिक शावर मंत्रा । शिव पूजत शिधि जंत्र औ तंत्रा ।।
जप तप नेम धर्म विधि नाना । शिवहि सै सिद्धि जग्य ब्रतदाना ।।
निहचै चाहौ त्रिपुर विनाशन । करौ सत्य करि शम्भु उपासन ।।
विष्णु वचन सुनि मुनि बृन्दारक । शिंहनाद करि उर हर धारक ।।
मनस चिंति भगवान सुरेशा । पुनि दवन प्रति कह देवेशा ।।
मारि न पापी सकहि अपापी । चाहौ कोटि भांति तत तापै ।।
अजित अवध्य देव अनपापा । ददुजहु सदा नसत बस पापा ।।
देव अनागस अति बल दापा । जीतय दनुज ते रुद्र प्रतापा ।।
दोहा -
तपी विप्र धर्मिष्ट नृप इनहि न लगै प्रयोग ।
एक ते इकइस वार लगि कबहुक सिद्धि संजोग ।।
का विरंचि का हम ऋषि देवा । सत्रुन जीतै विनि शिव सेवा ।।
सर्व काल सबही सब मांही । लीला वर्जित काज कराहीं ।।
पूजके एक अंश ईशाना । देव भये देवत्व समाना ।।
जिनकौ पूजि ब्रह्म पद ब्रह्मा । हम भये विष्णु सेय शिव धर्मा ।।
शिव सेवन विनि तिहि पुर मांही । काहू पुरुष पाई सिद्धि नाही ।।
शिव दीझालय जितिहौ दानव । करि हर इष्टा जग्य सुजानव ।।
एक लच्छ पार्थिव करि पूजा । लिंगार्चन सम पुन्य न दूजा ।।
सुनि हरि गिरा देव मुनि ब्रन्दा । पूजन शिवहि लगे आनन्दा ।।
दोहा - 7
लच्छ लिंग निर्माय के मृण मय तंदुल साथ ।
जल पय दधि मधु धृत रस धारा अर्पी शिव माथ ।।
अछत गंध वेलदल दीपा । पुष्प धूप दय शंम्भु समीपा ।।
सुरण सहित हरि पूजे शंकर प्रघटे शिव कृपाल तिहि अन्तर ।।
काल अगिनि संकास महेशा । काल रुद्र जनु काल दिनेशा ।।
सूल शक्ति कर धनुष अभंगा । भूत सहस्र नल सत सुसंगा ।।
शिव दर्शन करि हरि अनुरागे । करि प्रणाम बोले हरि आगे ।।
त्रिपुरासुर पुर दाहन करहू । दुख मुनिन देवन कर हरऊ ।।
रुद्र परसि कर हरहि प्रणामा । एवमस्तु कहि गये निज धामा ।।
देव मुनिन तब ह्रदय विचारा । विष्णु भक्त वत्सल भगवाना ।।
दोहा -8
शिव प्रसाद सुर काज हित करिहै त्रिपुर विनास ।
विनै कहा प्रभु धर्म वल धटै न मनकी त्रास ।।
दनुज धर्म पथ त्रिपुर निवासी तिनहि नसैहौ किमि अविनासी ।।
तब कह विष्णु सुनौ मुनि देवा । यद्धयपिअ वध त्रिपुरासुर भेवा ।।
पूजै शिव अध छूटै धोरा । यथा कंज दल नीर न वोरा ।।
अवसि पूजि शिव संपति भोगा । लहत असुर नर सुख संयोगा ।।
धर्म विघन हित देव समाजा । त्रिपुर वघन कै विरचै काजा ।।
पुरुषोत्तम प्रभु करहि विचारा । कहि विधि दनुज होय संघारा ।।
जव लगि वेद धर्म शिव सेवा । श्रुचि तब लग नहि नसै अदेवा ।।
हरि देवन कौ आग्या दीन्हा । विघन होय सो चाहिय कीन्हा ।।
दोहा - 9
निहचै श्री हरि सुरण हित विघन हेतु मन भास ।
शिवदयाल संवाद यह सुनत कहत अध नास ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे दशमोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
।।। त्रिपुरासुर प्रकरण ।।।
त्रिपुर दुखद सुनि गुणि मनधाता । कहा कि दनुजन योग न घाता ।।
पुन्यवंत कहुं मरहि न मारे । सुनहू जो सुगम विचार हमारे ।।
जाउ सकुचि तजि शंकर तीरा । वे तमरथ हरहै सब पीरा ।।
ब्रह्म गिरा सुनि सुर मुनि बृंदा । गये शंभु प्रति सहित अनंदा ।।
करि विनती दुःख दुसह सुनावा । सुनि शिव शंकर के मन भावा ।।
बहुरि कहा शिव सुरन वुझाई । दानवंत हत करो न जाई ।।
हैं त्रिपुरासुर अति पुन्याई । धर्म वृद्धि नहि सकहि नसाई ।।
जव लगि पुन्य होय अधिकारी । तबलगि सकै न सुरमुनि मारी ।।
दोहा - 1
जदपि सहायक होय प्रभु तौ यह करब उपाय ।
ई श्वर से विनती करौ देवन जतन वताय ।।
धर्म नसावन करौ उपाई । तौ नासय दानव समुदाई ।।
तदपि विष्णु से करहु निवेदन । रखिहै कृपा सिन्धु कछु भेद न ।।
शंभु गिरा सुनि सुर हिय हारे । त्राहि त्राहि हरि शरण पुकारे ।।
करुणानिधि करुणावस प्रघटे । दुसह दुःख देवन के निघटे ।।
विहंसि वचन वोले जग तारण । कहौ सकल सो निज दुख कारण ।।
करि विनती बोले सुर बृन्दा । द्रवहु कृपानिधि करुणाकन्दा ।।
देवन पच्छ हेत चित धरऊ । त्रिपुरासुर वध सूचित करऊ ।।
विष्णु कहा जंह धर्म सनातन । ताके होय न कैसेउ पातन ।।
दोहा- 2
धर्म भरोसो धर्म वल धर्महि सकल समाज ।
शिवदयाल आपने धर्म से सिद्ध होय सब काज ।।
धर्म निकट संकट नहि जाई । भानु उदय जिमि तमसि नसाई ।।
सुनि हरि वचन दुखित भये देवा । सूषे वदन निरासे खेवा ।।
कितै जांय कह करिय कृपाला । कौन जतन निवरै यहि काला ।।
किहि प्रकार त्रिपुरासुर नासै । यह कहि सुर भये दुखित निरासै ।।
अस मैं दुरगति सही न जाई । विनि औसर का करिय उपाई ।।
करि मन मौन चकित चित भयेउ । वहुरि विलखि अस्तुति निरमयेउ ।।
नाथ कृपा करि करब सहाई । दनुज वधन कै करव उपाई ।।
हुय अनाथ नारायण आगे । विनती करण प्रेमवस लागे ।।
जव जब दारुण दुख दहौ देव विप्र दुय जाति ।
शिवद्याल प्रभु अवतार धरि राषत है सव भांति ।।
नमोकृपालाय दिगंवराय अरूपरूपाय विरूपकाय ।
भस्मांगराय सुरेश्वराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
कैलाशवासाय गिरीश्वराय नीलशिखंडाय महेश्वराय ।
लोकेभृमंताय निशामुखाय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
विश्वादिरूपाय विश्वेश्वराय अर्धंगगौरी शशिशेषराय ।
कर्पूरगौराय जटाधराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
काशीनिवाशाय त्रियंवकाय कामंतुनाशाय वरप्रदाय ।
त्रिशूलहस्ताय त्रिलोचनाय श्री नीलकंठाय नमः शिवाय ।।
मृत्युंजये व्याल विभूषणाय कालीकलत्राय बृषध्वजाय ।
पिनाकहस्ताय परावराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
शिवायइदमस्तुतिनिर्मिताय शिवदयालसर्मायरतिप्रदाय ।
इदंश्रवणपाठनभक्तिदाय ध्यायेचिदानन्दअगम शिवाय ।।
गौ द्वज संतन सुरण हित धरि अनेक अवतार ।
शिवद्याल कृपानिधि कृपाकरि करत सदा निरधार ।।
देव विनय सुनि जगन्निबासी । चित चिंतित सुरकाज प्रकासी ।।
सुनहु देव नहि और उपाई । शंभु शरण सेवहु सुखदायी ।।
शिव पूजन पूरण जब होई । तब जौ जांचौ मिलिहै सोई ।।
विनि शिव पूजे सब जग मांही । देव असुर नर का सत नांही ।।
जो चाहौ त्रिपुरासुर दूषन । सेवहु शिव त्रैलोक विभूषन ।।
पूजि शिवहि निश्चर समुदाई । जीतै सुर दुज धर्म नसाई ।।
विना शम्भु पूजे धर्मिष्टा । कौनेउ जतन होय नहि नष्टा ।।
शिव पूजा विनि दशौ प्रयोगा । सिद्धि करण को वैन न योगा ।।
दोहा - 5
थंभन मोहन अकर्षण लूक अगनि वैताल ।
वधन उचाटन वसकरण शिव अधीन शिवद्याल ।।
शिवहि से वैदिक शावर मंत्रा । शिव पूजत शिधि जंत्र औ तंत्रा ।।
जप तप नेम धर्म विधि नाना । शिवहि सै सिद्धि जग्य ब्रतदाना ।।
निहचै चाहौ त्रिपुर विनाशन । करौ सत्य करि शम्भु उपासन ।।
विष्णु वचन सुनि मुनि बृन्दारक । शिंहनाद करि उर हर धारक ।।
मनस चिंति भगवान सुरेशा । पुनि दवन प्रति कह देवेशा ।।
मारि न पापी सकहि अपापी । चाहौ कोटि भांति तत तापै ।।
अजित अवध्य देव अनपापा । ददुजहु सदा नसत बस पापा ।।
देव अनागस अति बल दापा । जीतय दनुज ते रुद्र प्रतापा ।।
दोहा -
तपी विप्र धर्मिष्ट नृप इनहि न लगै प्रयोग ।
एक ते इकइस वार लगि कबहुक सिद्धि संजोग ।।
का विरंचि का हम ऋषि देवा । सत्रुन जीतै विनि शिव सेवा ।।
सर्व काल सबही सब मांही । लीला वर्जित काज कराहीं ।।
पूजके एक अंश ईशाना । देव भये देवत्व समाना ।।
जिनकौ पूजि ब्रह्म पद ब्रह्मा । हम भये विष्णु सेय शिव धर्मा ।।
शिव सेवन विनि तिहि पुर मांही । काहू पुरुष पाई सिद्धि नाही ।।
शिव दीझालय जितिहौ दानव । करि हर इष्टा जग्य सुजानव ।।
एक लच्छ पार्थिव करि पूजा । लिंगार्चन सम पुन्य न दूजा ।।
सुनि हरि गिरा देव मुनि ब्रन्दा । पूजन शिवहि लगे आनन्दा ।।
दोहा - 7
लच्छ लिंग निर्माय के मृण मय तंदुल साथ ।
जल पय दधि मधु धृत रस धारा अर्पी शिव माथ ।।
अछत गंध वेलदल दीपा । पुष्प धूप दय शंम्भु समीपा ।।
सुरण सहित हरि पूजे शंकर प्रघटे शिव कृपाल तिहि अन्तर ।।
काल अगिनि संकास महेशा । काल रुद्र जनु काल दिनेशा ।।
सूल शक्ति कर धनुष अभंगा । भूत सहस्र नल सत सुसंगा ।।
शिव दर्शन करि हरि अनुरागे । करि प्रणाम बोले हरि आगे ।।
त्रिपुरासुर पुर दाहन करहू । दुख मुनिन देवन कर हरऊ ।।
रुद्र परसि कर हरहि प्रणामा । एवमस्तु कहि गये निज धामा ।।
देव मुनिन तब ह्रदय विचारा । विष्णु भक्त वत्सल भगवाना ।।
दोहा -8
शिव प्रसाद सुर काज हित करिहै त्रिपुर विनास ।
विनै कहा प्रभु धर्म वल धटै न मनकी त्रास ।।
दनुज धर्म पथ त्रिपुर निवासी तिनहि नसैहौ किमि अविनासी ।।
तब कह विष्णु सुनौ मुनि देवा । यद्धयपिअ वध त्रिपुरासुर भेवा ।।
पूजै शिव अध छूटै धोरा । यथा कंज दल नीर न वोरा ।।
अवसि पूजि शिव संपति भोगा । लहत असुर नर सुख संयोगा ।।
धर्म विघन हित देव समाजा । त्रिपुर वघन कै विरचै काजा ।।
पुरुषोत्तम प्रभु करहि विचारा । कहि विधि दनुज होय संघारा ।।
जव लगि वेद धर्म शिव सेवा । श्रुचि तब लग नहि नसै अदेवा ।।
हरि देवन कौ आग्या दीन्हा । विघन होय सो चाहिय कीन्हा ।।
दोहा - 9
निहचै श्री हरि सुरण हित विघन हेतु मन भास ।
शिवदयाल संवाद यह सुनत कहत अध नास ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे दशमोअध्याय ।।।
उन्नीसबां अध्याय - त्रिपुरासुर शिव संग्राम
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद नवमोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
श्रवण सुनो शिव गौरि बिबाहा । सवै ऋषिन मन परम उछाहा ।।
अहो सूत परहित अनुरागी । शिव चरित्र गायक वड़ भागी ।।
कस विवहार भये तिहि वारा । तारक वधन कहौ निरधारा ।।
तब कह सूत सुनौ मुनि बृंदा । शंभु कथा अस हत यम फंदा ।।
यह चरित्र सुनि शंशय नाशा । सो तारक वध करत प्रकाशा ।।
शिव गिरिजा निवसत कैलाशा । नित नव मंगल मोद सुपाशा ।।
शोभा तासु कवन वुध वरणै । कोटि रमा रति लजै अपरणै ।।
शंकर चिदानंद भगवाना । उमा समेत रमै रंग नाना ।।
दोहा -1
यह विधि वीते काल वहु होत न शिव संतानि ।
शिव दयाल तारक त्रसै लोक प्रजा विकलानि ।।
तारक त्रसित देव अकुलाई । भये सकल भयवस इक ठाई ।।
सकल विचार करैं मन मांही । किहि कारण भा शिव सुत नाही ।।
वहु दिन भये सहित जगदम्बा । कवन हेत शिव करत बिलम्बा ।।
यह गुनि देव गये शिव पाहीं । खेद खिन्न मन धीरज नाहीं ।।
यजुर्वेद विधि विनय सु गावै । शिव अस्तुति करि घोर सुनावै ।।
देव परस्पर करै विचारा । शिव समीप सुर को पगु धारा ।।
मन मुस्काय देव समुदाई । कहा अनल पर मंत्र वुझाई ।।
मख मै प्रथम भाग तुम पावौ । परमारथ लगि शिव पह जावौ ।।
दोहा - 2
परमारथ लगि सत पुरुष तन धन सर्वस देत ।
लोक सुजस भय विगत सब भक्ति मुक्ति निज हेत ।।
पावक धरि कपोत सम रूपा । परम विशाल अखण्ड अनूपा ।।
प्रथम गये गिरि शिखर विहंगा । पुनि प्रविसे जंह शिव रस रंगा ।।
कपट कपोत अनल संदीपा । रंति भवन गये शम्भु समीपा ।।
उमा रमणि कह ताहि निहारी । को तुम कपट कंबु तन धारी ।।
करु संग्रह मम शुक्र सम्हारी । अस कहि वीज मेलि मद नारी ।।
अगिन चुंच पुट सो गहि लीन्हा । उड़े गमन देवन पहि कीन्हा ।।
महावीर्य सहि सके न धारी । दुख पीड़ित गंगा मैं डारी ।।
शिव अनंग सहि सकी न गंगा । करि वाहरि जल मेलि तरंगा ।।
दोहा -3
शिव मनोज को सहि सकै महावीर्य वहु भार ।
शिवदयाल दानव दहन अछै अखण्ड अपार ।।
छिपत सुलभ राम शर माही । प्रघटो वालक तन तिहि पाही ।।
कोमल सुलभ दाम सम सुन्दर । राजत रजत प्रकाश फटिकवर ।।
ताही समय करन अस्नाना । राज सुता गई षट परमाना ।।
मंजि नहाय चली जब घरकौ । गंगा तटि लखि वालक सरकौ ।।
कहै सकल तब राजकुमारी । मम पय पिऔ पयोधर धारी ।।
पुलकि परस्पर धरै न धीरा । कै कि प्रथम पिऔ मम छीरा ।।
देखि प्रीत षट भये वदन वर । यक संग षट पिये पयोधर ।।
तब से षट मुख नाम कहाये । कृतिका तनय कार्तिक भाये ।।
दोहा -4
षटमातुर यह विधि विषद स्वामी कार्तिक नाम ।
शिव दयाल गुहि नाम पुनि सिखि वाहन सुख धाम ।।
कार्तिक सित छठि औ शशिवारा । स्वामि कार्तिक जन्म अधारा ।।
प्रथम नाम भयो गिरिजा नन्दन । अपर कुमार नाम जग वन्दन ।।
पुनि अस कंद अगिनिभू नामा । गंग पुत्र शर जन्म निरामा ।।
पारवती सुत परम शक्तिधर । शंभु तनय निर्झरण तापहर ।।
नाम अनेक जाय नहि जाने । हर्षिराज कन्यन सुत माने ।।
तब नारद कैलाश सिधाये । सकल चरित शंकरै सुनाये ।।
सुनि शंकर सब देव बुलाये । नारद प्रेरित सुर गण आये ।।
शिव सेनापति करि अस कन्दा । दल चतुरंग संग मुनि बृन्दा ।।
दोहा - 5
भूत प्रेत गण शिव लये आन देव सब जाति ।
आगे करि अस कन्द कह सेना पति वहुभांति ।।
श्रोनित पुरै चले समुदाई । देव सैन वाजन धुनि छाई ।।
ठोल मृदंग शंख सहनाई । महुअरि भेरि नफीरि सुहाई ।।
डफरि झांझ झनर सिंहा सू वाजे । सोभित सूर समर गलगाजे ।।
नाना वाहन सुर सव जाती । नाना आयुध कर अरि धाती ।।
इन्द्र कुवेर वरुण यम काला । अगिनि वायु लोकप दिगपाला ।।
सूर्यादिक ग्रह शिव गण संगा । शिव आसै भुजवल रण रंगा ।।
नन्दि भृंगि कीरति मणि ग्रीवा । वीरभद्र षड़मुख वल सीवा ।।
भैरव धुनि पूरित चंहुं ओरा । गरजत यथा प्रलय घनघोरा ।।
दोहा - 6
वजै दुंदुभी घोर धुनि ध्वज पताक फहराय ।
महा भयानक संग दल शोभा वरणि न जाय ।।
दल पति आगे चले षडानन । शक्ति लये कर कुक्कुट वाहन ।।
अपर देव गण प्रेत पिछारी । अगिनित आयुध जान सवारी ।।
श्रोनित पुर समीप सब आये । शंख सुरन गण श्रंग वजाये ।।
घेरि दशौ दिसि गुह वल माने । प्रलै काल जनु घन घहराने ।।
सो सुनि घोर दनुज दल धाये । मारु मारु धरु सवद सुनाये ।।
गजरथ अश्व ऊंट खर जाना । जे कामग मय रचित विमाना ।।
चढ़ि अनेक वाहन वहु भांती । सूर समूह असुर सब जाती ।।
गरज तरज भै घोर सुनावै । दानव सैन दसौ दिस धावै ।।
दोहा -7
दनु के सुत सब दानवा दिति के दैत्य अनेक ।
सुरसा के राच्छस सबै असुरै कपट विवेक ।।
बृका मेष अज महिष सवारी । गव गैडा मृग भालु गजारी ।।
शश वानर कुक्कुट कृक लाशा । गिरध कंक वक सेन सुभासा ।।
सरभ गीध लोमड़ी श्रंगाला । स्वान वराह बृषा सु विडाला ।।
पल्ली मकर नक्र झष ब्याला । ऊलूक सारस वरहि मराला ।।
चित्रक वांघ नकुल वल रासी । चक्क कोक नभ जल थल वासी ।।
चड़ि चड़ि जान सुरा सुर धावै । कोटिन अस्त्र शस्त्र गहि आवै ।।
हेम दण्ड कर सेवक साथा । कटि तुनीर सर सारंग हाथा ।।
समर सूर दानव समुदाई । कछुक नाम कहि देउ गिनाई ।।
छंद
नमचि शंवर वाणरय मुख विप्र चेती इल्बला ।।
कालि नाभि दुमुर्द्ध हेति प्रहेति शकुनी उतकला ।।
भूत संतायन अरिष्टक वज्र दंत विरोचना ।।
अस्व ग्रीव अरिष्टक नेमी कपिल धूमर लोचना ।। 1 ।।
मेघ दुंदुभि शंकुशिर मयचक्र द्दक मुर कालया ।।
पौलोम शुभ निशुंभ जृभ निवात कवचक आदया ।।
भिंडिपाल भुसुंडि परसि खुयष्टि पटि असि तोमरा ।।
गदा शक्ति निस्त्रि सपरिधि त्रिशूल चक्र सुमुद गरा ।। 2 ।।
दोहा - 8
अस्त्र शस्त्र वहु विधि लये लरै भिरै वहुभांति ।
वरणी से वरणी जुटैं देव दनुज सब जाति ।।
सिंह नाद करि अनी अरूझै । धूरि पूरि नभ दिशा न सूझै ।।
इंद बिरोचन वरुण सेहेती । कालनाभ यम मित्र प्रहेती ।।
वलि सुत सत जेठो वाणासुर । ते सूरज के संग समरजुर ।।
विसुकरमा से मय राहु से सोमा । संवर तुष्टा पवन पुलोमा ।।
भद्र कालि सन शंभु निशुंभा । अपराजित से नमुच अरंभा ।।
बृष पर्वी अश्विनी कुमारा । उत्कल वीरभद्र रण धारा ।।
भृगु इक्वल कुंभज वातापी । नन्दी समर भूत संतापी ।।
महिष विभावसु जंभ बृषाकपि । शुक्र बृहस्पति नारक शनिरिप ।।
दोहा -9
रण सविता सुर भानु सन चन्द्र केतु संग्राम ।
शिवदयाल जे सुरासुर समर जुरे जै काम ।।
कालनेमि युधिविश्वे देवा । कालकेय वसु आठ युधेवा ।।
मरुत निवात कवच रय चरषण । रुद्र क्रोध वस हरि दुय मरखण ।।
हय ग्रीव हय शिर संग्रामा । वज्रदन्त पावक जै कामा ।।
भ्रंगि सकुनि बृक शंकर जूझा । मेघ दुंदुभी भैरव वूझा ।।
समर स्वामि कार्तिक अरु तारक । सेनापती उभै बल धारक ।।
मुकुट क्रीट पुष्पक मणि चन्द्रक । मोरि मंडि शिखि कवच अखंडक ।।
शोभित शीश मुकुट मणि झलकै । कानन कुण्डल आनन अलकै ।।
दामर छत्र विजन धुज नाना । राजत वीर विराजत जाना ।।
दोहा - 10-
उछरि मुर्ग असकन्द कौ द्वै पद पंज प्रहार ।
नाक नैन लगि मुख श्रवण लै डारे वदन विदार ।।
मुगदर शूल सेल्ह गहि धावै । तोमर भाल कृपान चलावै ।।
सायर कर सारंग सर छूटै । वेधहि चर्म वर्म तन फूटै ।।
दंति दंति रथ सन रथ जूथा । तुरंग तुरंग पद प्यादेन गूथा ।।
गज अंवारिन सांगि चमकै । जनु मेघन दामिनी दमकै ।।
रथ चढ़ि धनु गहि वान चलावै । अहि कराल गिरि से जनु धावै ।।
अस्व वाह कर झेलै भाला । वीर विराजत भेष कराला ।।
पत्य पत्य प्रति खड्ग प्रहारै । कटहि शीश भुज लरहि न हारै ।।
वज्र शरीर शस्त्र वहु टूटैं । सूर समर चढ़ि करनी लूटैं ।।
सोरठा 11क
सर वरषहि संग्राम अस्त्र शस्त्र वहु विधि झरै ।
ते पावहि दिवि धाम समर मरण जे हठि लहै ।।
दोहा -11ख
कटहि शीश भुज ह्रदु कर पद उर कटि अधर धर ।
बहुत होय सत खण्ड पुनि कवंध उठि समर कर ।।
11 ग
रक्त नदी उमगी मही देव असुर दुइ पार ।
कूर्म चर्म कर मीन उर मकर केश सौवार ।।
अंतावरी गीधलै धावै । जनु वालक कर गुडी उड़ावै ।।
जंबुक मास खाइ कट कांही । जोगिन रुधिर पिये रन माही ।।
भैरव नचैहि योगिनी गावै । भूत प्रेत गण ताल वजावै ।।
उठै कवंध वीर रस पागी । रुणड प्रचण्ड लरहि अनुरागी ।।
बीरमाल सुर कन्या डारै । भिरे समर चड़ि सूर न हारै ।।
भाजैहि असुर देव दल दावहि । दलहि मलहि गुय परै गिरावैहि ।।
धावै एक-एक सन जूझै । गिरै मुकुट सिर पाग अरूझै ।।
शम्भु भुजा वल सुर लपिटाने । दैत्य दनुज तजि अनी पराने ।।
दोहा-12
भये विमन दानव सकल । भाजे तजि संग्रम ।।
मिलै न मारग दसौ दिशि । भूलि गये पुर धाम ।।
तात मात सुत स्वजन पुकारे । सुहद सनेही असुर निहारैं ।।
घायल परे अनेक बिचारै । समर मरै शिव लोक सिधारैं ।।
भजे सभय ते समर न आये । घेरि के तारक फेरि बुलाये ।।
असुरन रची वार बहु माया । देवन खन्डि समर निर्माया ।।
पुनि तारक निजमाया राची । बिन हरि हर सुर मानहि सांची ।।
वरषहि रज तृन पवन प्रचंडा । प्रलै मेघ धुनि बृष्टि अखन्डा ।।
अस्थि चर्म नख पल श्रग धारा । केश पांसु आयुध परिवारा ।।
चन्दु बात दश दिसि रब घोरा । पतन होय महि उपल कठोरा ।।
दोहा-13
दामिनि दमकै प्रवल गति, गरजै घोर कठोर ।।
शिव दयाल उमगो जलधि, रक्षक शम्भु किशोर ।।
विचलो सैन देव अकुलाने । समर विहाई त्रिसित विलगाने ।।
जहां जाय भजि देव समूहा । देखहि तहां निसाचर जूहा ।।
देवन विकल देखि शिवनन्दन । करे शक्ति लै असुर निकंदन ।।
छिनमौ काटि आसुरी माया । निरभय करे देव समुदाया ।।
देखि पच्छ सुर यूथय धाये । दानव दल अनेक विचलाये ।।
असुरन तन बृन रक्त उतिरना । जनु कज्जल गिर गैरव झिरना ।।
श्रवित रूधिर सुर सोहत कैसे । मधु माधव किंसुक तरू जैसे ।।
विचली कटक ब्यूह सब फूटे । स्वजन बन्धु सुत सुंदर छूटे ।।
दोहा-14
महाबली दानव सकल, अजै अचल संग्रम ।।
समय पाय विचले सभै, काल विवस विधि वाम ।।
भजै दनुज नहि चमू सम्हारै । सेनापति बल बोलि पुकारै ।।
तन छनभग लगै किहि कामै । समर मरन पावौ सुर धामै ।।
अमर न यह छयभंग शरीरा । क्रिम बिटभसम अंत गति वीरा ।।
तिहि ते बहुरि समर मह आवौ । मरे मुक्ति जीते जस पावौ ।।
अजस होय जिनको जगमाही । तन राखत जीवन सुख नाही ।।
सो सुनि असुर सूर फिरि आये । मारू मारू धरू सोर मचाये ।।
अस्त्र शस्त्र कर नख पद घाता । दन्त मुष्टि तल तरू गिरि पाता ।।
यहि विधि भयेसि घोर संग्रामा । अभिरै लरहि अखिल जै कामा ।।
दोहा-15
दानव दल सो खल प्रवल, धल बल करै अनेक ।।
बहुरि विवुध व्याकुल भये, विचले विगत विवेक ।।
भजे देव समर सुठि हारे । त्राहि त्राहि शिव सरण पूकारे ।।
आरत गिरा सुरन जब टेरी । तब षट वदन देव देशि हेरी ।।
कर धरि सांगि सैन संग आगे । चलत चले सुर दानव भागे ।।
अति बिषाद लखि तारक धावा । षट मुख सन मुख सूल चलावा ।।
शिव सुत काटि कीन्ह दुइ खन्डा । पुनि तिहि छाड़ी शक्ति प्रचंडा ।।
सोउ काटि करसे गुह डारी । साधु साधु सुर मुनिन प्रकारी ।।
तद कर तारक फरस उठावा । सोपि षडानन काटि गिराबा ।।
असि ले सो कृतांत समधायेउ । मारू मारू करि टेरति आयेउ ।।
दोहा-16
कोपि षडानन तारकहि, मारिसु शक्ति प्रचन्ड ।।
परा धरणि शिव शिव सुमिरि निसरी जोति अखन्ड ।।
सो शिव के उर गयेसि समाई । शेष असुर पुर चले पराई ।।
भयो समर श्रोनित पुर घीरा । देवन जीति सुतह करि जोरा ।।
गये दनुज शिव शरण कलेशे । विनय सकल पाताल प्रवेशे ।।
तारक बधन जाति सब देवा । बर्षहि सुमन करै गुरू सेवा ।।
चढि़ विमान दुंदुभी वजावैं । यथा उचित शिव के गुण गावैं ।।
गये देव मुनि षटमुख साथा । शिवहि सौपि सुत नायेसि माथा ।।
इद्रादि सुर विनवन लागे । शीश धरणि धरि शंकर आंगे ।।
करत पक्ष सब काल महेशा । सुनौ मोर यह विनय परेशा ।।
छन्द दुधा- ( शिव स्तुति )
नमामि मीश मीश्वरं । प्रपूजिंतं महीसुरं ।।
कपूर गौर निर्मलं । गले तले हलाहलं ।।
विधिं हरिम् निसेवितं । अदेव देव सेवितं ।।
शरणय शरणात्वा महं । स्वसेवकं मलापहं ।।
अभैप्रदं भुरे स्वरं । नमामि ते सुरेश्वरं ।।
द्वजेंद्र वन्स मंडनं । त्रिताप पाप खण्डनं ।।
सुरारि बृन्द गंजनम् । दुरूक्ति, दुःख भंजनं ।।
निर्वाण रूप निर्भयं । ददाति मुक्ति मक्षयं ।।
दोहा -17
भव संभव अनभव अभव चिदानंद सुर वीर ।
शिव दयाल विनवत सकल जै पिनाक धर धीर ।।
( शिव स्तुति )
शिव सर्वग्य सर्व उर वासी । कपर्दिने बृष ध्वज कैलासी ।।
तीन नयन त्रियंबक त्रिशूलधर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
जटा मुकुट सिर चन्द्र विशाला । तन विभूति उर नर सिर माला ।।
वेद मंत्र सावर धर शंकर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
गिरिजा पति गिरिपति गिरि वासी । तेज पुंज बलनिधि वलरासी ।।
मदन दहन रति लहन सुभगवर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
चिता भषम भूषण तन व्याला । काली पति कर कलित कपाला ।।
नवसौ शिवदयाल उर शंकर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
दोहा - 18क
लै अनुशासन विनय करि देव गये निज धाम ।
शिदयाल पद पांच पठ़ि सफल होय सव काम ।।
सोरठा-18ख
कर जोरे मुनि बृन्द तिहि औसर अस्तुति करै ।
दायक परमान्द जै महेश दुख दोष हरै ।।
छंद ( शिव स्तुति )
नमोकृपालाय दिगंवराय अरूपरूपाय विरूपकाय ।
भस्मांगराय सुरेश्वराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
कैलाशवासाय गिरीश्वराय नीलशिखंडाय महेश्वराय ।
लोकेभृमंताय निशामुखाय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
विश्वादिरूपाय विश्वेश्वराय अर्धंगगौरी शशिशेषराय ।
कर्पूरगौराय जटाधराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
काशीनिवाशाय त्रियंवकाय कामंतुनाशाय वरप्रदाय ।
त्रिशूलहस्ताय त्रिलोचनाय श्री नीलकंठाय नमः शिवाय ।।
मृत्युंजये व्याल विभूषणाय कालीकलत्राय बृषध्वजाय ।
पिनाकहस्ताय परावराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
शिवायइदमस्तुतिनिर्मिताय शिवदयालसर्मायरतिप्रदाय ।
इदंश्रवणपाठनभक्तिदाय ध्यायेचिदानन्दअगम शिवाय ।।
दोहा - 19
यह अष्टव शिवको रचित वुध शर्मण शिवधाल ।
प्रेम सहित नित नेम करि पढ़ै सफल सव काल ।।
पुनि विनये शिव सिद्धि नवेशा । अछय अनादि अनन्त महेशा ।।
अस्तुति विध्याधरण प्रकाशी । नौमि कृपानिधि शिव कैलाशी ।।
तुम सर्वग्य सर्वमय स्वामी । सर्व भूत हित अन्तरजामी ।।
सगुण शंम्भु जग माया मोहित । भूतन अन्तर नील विलोहित ।।
आतम जीव अखिल जग मांही । विन शिव शक्ति आन कोउ नांही ।।
देवन मैं तुम इन्द्र सुरेशा । असुरन मैं प्रहलाद कुलेशा ।।
सिद्धन कपिल सुजच्छ कुवेरू । वन मैं चन्दन गिरिन सुमेरू ।।
ऋषिन वसिष्ठ मुनिन मैं नारद । जग मैं विष्णु शक्ति मैं सारद ।।
दोहा - 20-
पितरन मैं तुम अर्जमा नागन मैं शिव शेष ।
गंधर्वन मह चित्ररथ विधाधरण गणेश ।।
शिव अच्छरण मूल ओंकारा । वेदन जजुर्वेद निरधारा ।।
तारन चन्द्र ग्रहण मैं भानू । वरण विप्र तेजसा कृशानू ।।
पच्छिन गरुण सर्प कुल काली । धातु हेमरज तम गुण पाली ।।
वट थारुन मैं तरु मैं पीपर । शिव तुम गंगा सर्व नदी वर ।।
नदन सिंधु ह्रद नारायण सर । तीर्थन प्रयाग झेत्र मैं पुष्कर ।।
वन मैं गवरि अंश वृन्दावन । पुरिन मैं काशी इन्द्रिन मैं मन ।।
आश्रम लगि तुम शिव सन्यासी । योगिन विरक्ति यतिन उदासी ।।
परम हंस अति आतम भाषी । तुरिआतीत अगम अविनासी ।।
दोहा - 21
सिंह वलिन मैं गोप श्रुन मनुज मध्य भूपाल ।
पुरुष रूप अन्तरह्रदै वहिर वितावन काल ।।
तब महेश जे सकल विभूती । अपर अखिल संसार प्रसूती ।।
कोटिन सहस कोटि शत रूपा । अखिल अनन्त अखन्ड अनूपा ।।
गनै भूमि सिकता घन धारा । जलधि उर्मि नभमन्डल तारा ।।
शिव गुण रूप गिने नहि जाई । करहि कोटि विधि कोटि उपाई ।।
विनय देव ऋषि दये षडानन । हुय प्रशन्न वोले शिव शासन ।।
जब जब दुखित होय मुनि देवा । तब हम संकट हरैं अमेवा ।।
जाहु भवन शिव अस आदेशे । सब निज निज अधिकार प्रवेशे ।।
कथा व्यास मुनि मुख सुन राखी । सो हम शौनक तुम सन भाषी ।।
दोहा - 22
सुनौ अपर आख्यान मुनि पर्म ललित संवाद ।
रहे तीन तारक तनय तप करि धर्म विषाद ।।
अब तद सुनौ मधुर संवादा । तिहि अवसर भा धर्म विषादा ।।
तारक वध सुनि दनुज दुखारी । तिहि के त्रय सुत अति वल धारी ।।
ते तप करन गये गिरि कानन । नेम सहित करि संजम साधन ।।
ठाड़े अचल वर्ष शत बीते । सहि दुख छुदा पिपासा जीते ।।
बहुरि एक पद लिये उठाई । रहे भानु दिसि द्रष्टि लगाई ।।
सहस वर्ष भरि पवन अधारा । ऊर्ध बाहु शत वर्ष अपारा ।।
वर्ष सहस मस्तक धरि धरणी । उर्ध पाद तप दारुण करणी ।।
जग तापक तप देखि अपारा । देवन सत्य लोक पगु धारा ।।
दोहा -23
करि विनती विधि सो कहा नाथ वेगि वर देहु ।
प्रजा जरत रच्छा करहु जानि हमार सनेहु ।।
बृह्म देव गिरा सुनि धाये । दारूण तप ते दैत्य जगाये ।।
हम प्रशन्न मांगौ वरदाना । कहै दनुज वल दर्प समाना ।।
यदि प्रशन्न देवेश कृपाला । यह वर देवौ केतु मराला ।।
सब जग रहै अविधा पूरी । तव विधि कहा दानवन भूरी ।।
सर्ववसी वर तुमहि न देही करहि अविधा वस कस केही ।।
जाचु अपर वर जो रुचि होई । कहऊ विचार देउं वर सोई ।।
कहैं परस्पर दनुज विचारी । सुनहु जगत पति विनय हमारी ।।
वर देवौ विकसित सब वर्गा । तीन नगर वर भू भुव सर्गा ।।
दोहा -24
वर्ष सहस प्रति परस्पर मिलन चहै तब दोय ।
प्रभु समरथ सो वध करै जब त्रै इक मिलि होय ।।
एकहि वान एक ही वारा । स्वामिन सहित त्रिपुर संघारा ।।
एवमस्तु वर वोलि विधाता । निज दिविधाम गये सुरत्राता ।।
मय वुलाय विधि आज्ञा दीनी । रचहु नगर शुभ सुन्दर तीन्ही ।।
कांचन रजत लोह त्रै जाती । स्वर्ग से क्रम निरमौ येहि भांती ।।
यह कह विधि भये अन्तरध्याना । तप वल मय कृत पुर निर्माना ।।
दिवि कांचनपुर अध विच राजत । आयसुपुर धरनी पर छाजत ।।
तारकाच्छ कांचनपुर वासी । कंजलाच्छ पुर रजत निवासी ।।
आयसुपुर महि विधुनभाली । अति विकराल महा वलसाली ।।
दोहा -25
दैत्य दानवन पूजित मय दानव गुणवान ।
ताहि वसायो तिन पुरन हित कामना समान ।।
तीनौ निज निज पुरण प्रवेसे । कल्प वृक्झ गज वाजि निवेसे ।।
त्रिविधि दुर्ग अति विकट कपाटा । बीथिन वाटन चौहट हाटा ।।
एक एक योजन विस्तारा । सुन्दर सुभग विचित्र प्रकारा ।।
रवि मन्डल विमान वर भासै । पदम राग सम चन्द्र प्रकासै ।।
नाना हर्मि प्रसाद समाजा । गज मुक्ता मणि जाल विराजा ।।
गोपुर द्वार भवन पुर नाना । शिव मंदिर कैलाश समाना ।।
चारण सिद्ध विप्र गंधर्वा । गाय वजाय नचै मिलि सर्वा ।।
ठौर ठौर मंदिर वन वागा । शोभित वापी कूप तड़ागा ।।
दोहा- 26
सोरह साला नगर प्रति पंच भवन आगार ।
दज तुरंग धेनु धन पूरति पुरण अपार ।।
नेम धर्म संजम व्रत नाना । प्रज्ञा दान जंह तंह सनमाना ।।
वेदाध्यायन अगिनित साला । पुन्य लता द्रुम कुटी विशाला ।।
नर धरमग्य पतिवृत नारी । सपनेहु जंहां न कोउ विभिचारी ।।
विलग विलग क्रीड़ा अस्थाना । मंगल कलश द्वार प्रति नाना ।।
तंहा वसैं सब परउपकारी । ऋषि मुनि संत धर्म वृत धारी ।।
सह द्विज महाप्राज्ञ दैत्येशा । करहि अनुगसुत दार निदेशा ।।
सिविका गज तुरंग रथ नाना । फेरहि चढ़ि निज सुन्दर जाना ।।
नील कमल दल कुंचित केशा । अगिनित दैत्य शुभाशुभ वेशा ।।
दोहा - 27
चारहु द्वारण पुरण प्रति चतुरंगिनी अपार ।
निज कारज लवलीन मन को वरनै विस्तार ।।
गये रचित नगर चौपासा । भांति भांति के चरित प्रकाशा ।।
कोई कुपित कोउ कुब्जक वामन । कोउ प्रशांत सज्जन अति पावन ।।
कहुं कहुं मल्ल युद्ध अधिकारी । कोई अस्त्र सीखै कर धारी ।।
धर्म शास्त्र कहुं कथा पुराना । विविध करै प्रति द्वार विधाना ।।
घर घर होम यग्य वहु भांती । दुज जिमाय जेमहि सव जाती ।।
धर्म सनातन जो महि रहई । सो सब विस्तारो तिन तहई ।।
तिनके तेज दहन लगि लोका । इन्द्रदिक सुर सकल सशोका ।।
त्राहि त्राहि विधि शरण पुकारी । नाथ वेगि भय हरौ हमारी ।।
सोरठा 28 क
कह विरंचि मुनि देव कहौ वेगि निज खेद मन ।
सवन कह निज भेव करौ कृपा करुणा भवन ।।
दोहा 28 ख
करि विनती गद गद सुर लोकप दिगपाल ।
करहि निवेदन वेदना किमि वरणै शिवधाल ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद नवमोअध्याय ।।।
।।। त्रिपुरासुर प्रकरण ।।।
।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद नवमोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
श्रवण सुनो शिव गौरि बिबाहा । सवै ऋषिन मन परम उछाहा ।।
अहो सूत परहित अनुरागी । शिव चरित्र गायक वड़ भागी ।।
कस विवहार भये तिहि वारा । तारक वधन कहौ निरधारा ।।
तब कह सूत सुनौ मुनि बृंदा । शंभु कथा अस हत यम फंदा ।।
यह चरित्र सुनि शंशय नाशा । सो तारक वध करत प्रकाशा ।।
शिव गिरिजा निवसत कैलाशा । नित नव मंगल मोद सुपाशा ।।
शोभा तासु कवन वुध वरणै । कोटि रमा रति लजै अपरणै ।।
शंकर चिदानंद भगवाना । उमा समेत रमै रंग नाना ।।
दोहा -1
यह विधि वीते काल वहु होत न शिव संतानि ।
शिव दयाल तारक त्रसै लोक प्रजा विकलानि ।।
तारक त्रसित देव अकुलाई । भये सकल भयवस इक ठाई ।।
सकल विचार करैं मन मांही । किहि कारण भा शिव सुत नाही ।।
वहु दिन भये सहित जगदम्बा । कवन हेत शिव करत बिलम्बा ।।
यह गुनि देव गये शिव पाहीं । खेद खिन्न मन धीरज नाहीं ।।
यजुर्वेद विधि विनय सु गावै । शिव अस्तुति करि घोर सुनावै ।।
देव परस्पर करै विचारा । शिव समीप सुर को पगु धारा ।।
मन मुस्काय देव समुदाई । कहा अनल पर मंत्र वुझाई ।।
मख मै प्रथम भाग तुम पावौ । परमारथ लगि शिव पह जावौ ।।
दोहा - 2
परमारथ लगि सत पुरुष तन धन सर्वस देत ।
लोक सुजस भय विगत सब भक्ति मुक्ति निज हेत ।।
पावक धरि कपोत सम रूपा । परम विशाल अखण्ड अनूपा ।।
प्रथम गये गिरि शिखर विहंगा । पुनि प्रविसे जंह शिव रस रंगा ।।
कपट कपोत अनल संदीपा । रंति भवन गये शम्भु समीपा ।।
उमा रमणि कह ताहि निहारी । को तुम कपट कंबु तन धारी ।।
करु संग्रह मम शुक्र सम्हारी । अस कहि वीज मेलि मद नारी ।।
अगिन चुंच पुट सो गहि लीन्हा । उड़े गमन देवन पहि कीन्हा ।।
महावीर्य सहि सके न धारी । दुख पीड़ित गंगा मैं डारी ।।
शिव अनंग सहि सकी न गंगा । करि वाहरि जल मेलि तरंगा ।।
दोहा -3
शिव मनोज को सहि सकै महावीर्य वहु भार ।
शिवदयाल दानव दहन अछै अखण्ड अपार ।।
छिपत सुलभ राम शर माही । प्रघटो वालक तन तिहि पाही ।।
कोमल सुलभ दाम सम सुन्दर । राजत रजत प्रकाश फटिकवर ।।
ताही समय करन अस्नाना । राज सुता गई षट परमाना ।।
मंजि नहाय चली जब घरकौ । गंगा तटि लखि वालक सरकौ ।।
कहै सकल तब राजकुमारी । मम पय पिऔ पयोधर धारी ।।
पुलकि परस्पर धरै न धीरा । कै कि प्रथम पिऔ मम छीरा ।।
देखि प्रीत षट भये वदन वर । यक संग षट पिये पयोधर ।।
तब से षट मुख नाम कहाये । कृतिका तनय कार्तिक भाये ।।
दोहा -4
षटमातुर यह विधि विषद स्वामी कार्तिक नाम ।
शिव दयाल गुहि नाम पुनि सिखि वाहन सुख धाम ।।
कार्तिक सित छठि औ शशिवारा । स्वामि कार्तिक जन्म अधारा ।।
प्रथम नाम भयो गिरिजा नन्दन । अपर कुमार नाम जग वन्दन ।।
पुनि अस कंद अगिनिभू नामा । गंग पुत्र शर जन्म निरामा ।।
पारवती सुत परम शक्तिधर । शंभु तनय निर्झरण तापहर ।।
नाम अनेक जाय नहि जाने । हर्षिराज कन्यन सुत माने ।।
तब नारद कैलाश सिधाये । सकल चरित शंकरै सुनाये ।।
सुनि शंकर सब देव बुलाये । नारद प्रेरित सुर गण आये ।।
शिव सेनापति करि अस कन्दा । दल चतुरंग संग मुनि बृन्दा ।।
दोहा - 5
भूत प्रेत गण शिव लये आन देव सब जाति ।
आगे करि अस कन्द कह सेना पति वहुभांति ।।
श्रोनित पुरै चले समुदाई । देव सैन वाजन धुनि छाई ।।
ठोल मृदंग शंख सहनाई । महुअरि भेरि नफीरि सुहाई ।।
डफरि झांझ झनर सिंहा सू वाजे । सोभित सूर समर गलगाजे ।।
नाना वाहन सुर सव जाती । नाना आयुध कर अरि धाती ।।
इन्द्र कुवेर वरुण यम काला । अगिनि वायु लोकप दिगपाला ।।
सूर्यादिक ग्रह शिव गण संगा । शिव आसै भुजवल रण रंगा ।।
नन्दि भृंगि कीरति मणि ग्रीवा । वीरभद्र षड़मुख वल सीवा ।।
भैरव धुनि पूरित चंहुं ओरा । गरजत यथा प्रलय घनघोरा ।।
दोहा - 6
वजै दुंदुभी घोर धुनि ध्वज पताक फहराय ।
महा भयानक संग दल शोभा वरणि न जाय ।।
दल पति आगे चले षडानन । शक्ति लये कर कुक्कुट वाहन ।।
अपर देव गण प्रेत पिछारी । अगिनित आयुध जान सवारी ।।
श्रोनित पुर समीप सब आये । शंख सुरन गण श्रंग वजाये ।।
घेरि दशौ दिसि गुह वल माने । प्रलै काल जनु घन घहराने ।।
सो सुनि घोर दनुज दल धाये । मारु मारु धरु सवद सुनाये ।।
गजरथ अश्व ऊंट खर जाना । जे कामग मय रचित विमाना ।।
चढ़ि अनेक वाहन वहु भांती । सूर समूह असुर सब जाती ।।
गरज तरज भै घोर सुनावै । दानव सैन दसौ दिस धावै ।।
दोहा -7
दनु के सुत सब दानवा दिति के दैत्य अनेक ।
सुरसा के राच्छस सबै असुरै कपट विवेक ।।
बृका मेष अज महिष सवारी । गव गैडा मृग भालु गजारी ।।
शश वानर कुक्कुट कृक लाशा । गिरध कंक वक सेन सुभासा ।।
सरभ गीध लोमड़ी श्रंगाला । स्वान वराह बृषा सु विडाला ।।
पल्ली मकर नक्र झष ब्याला । ऊलूक सारस वरहि मराला ।।
चित्रक वांघ नकुल वल रासी । चक्क कोक नभ जल थल वासी ।।
चड़ि चड़ि जान सुरा सुर धावै । कोटिन अस्त्र शस्त्र गहि आवै ।।
हेम दण्ड कर सेवक साथा । कटि तुनीर सर सारंग हाथा ।।
समर सूर दानव समुदाई । कछुक नाम कहि देउ गिनाई ।।
छंद
नमचि शंवर वाणरय मुख विप्र चेती इल्बला ।।
कालि नाभि दुमुर्द्ध हेति प्रहेति शकुनी उतकला ।।
भूत संतायन अरिष्टक वज्र दंत विरोचना ।।
अस्व ग्रीव अरिष्टक नेमी कपिल धूमर लोचना ।। 1 ।।
मेघ दुंदुभि शंकुशिर मयचक्र द्दक मुर कालया ।।
पौलोम शुभ निशुंभ जृभ निवात कवचक आदया ।।
भिंडिपाल भुसुंडि परसि खुयष्टि पटि असि तोमरा ।।
गदा शक्ति निस्त्रि सपरिधि त्रिशूल चक्र सुमुद गरा ।। 2 ।।
दोहा - 8
अस्त्र शस्त्र वहु विधि लये लरै भिरै वहुभांति ।
वरणी से वरणी जुटैं देव दनुज सब जाति ।।
सिंह नाद करि अनी अरूझै । धूरि पूरि नभ दिशा न सूझै ।।
इंद बिरोचन वरुण सेहेती । कालनाभ यम मित्र प्रहेती ।।
वलि सुत सत जेठो वाणासुर । ते सूरज के संग समरजुर ।।
विसुकरमा से मय राहु से सोमा । संवर तुष्टा पवन पुलोमा ।।
भद्र कालि सन शंभु निशुंभा । अपराजित से नमुच अरंभा ।।
बृष पर्वी अश्विनी कुमारा । उत्कल वीरभद्र रण धारा ।।
भृगु इक्वल कुंभज वातापी । नन्दी समर भूत संतापी ।।
महिष विभावसु जंभ बृषाकपि । शुक्र बृहस्पति नारक शनिरिप ।।
दोहा -9
रण सविता सुर भानु सन चन्द्र केतु संग्राम ।
शिवदयाल जे सुरासुर समर जुरे जै काम ।।
कालनेमि युधिविश्वे देवा । कालकेय वसु आठ युधेवा ।।
मरुत निवात कवच रय चरषण । रुद्र क्रोध वस हरि दुय मरखण ।।
हय ग्रीव हय शिर संग्रामा । वज्रदन्त पावक जै कामा ।।
भ्रंगि सकुनि बृक शंकर जूझा । मेघ दुंदुभी भैरव वूझा ।।
समर स्वामि कार्तिक अरु तारक । सेनापती उभै बल धारक ।।
मुकुट क्रीट पुष्पक मणि चन्द्रक । मोरि मंडि शिखि कवच अखंडक ।।
शोभित शीश मुकुट मणि झलकै । कानन कुण्डल आनन अलकै ।।
दामर छत्र विजन धुज नाना । राजत वीर विराजत जाना ।।
दोहा - 10-
उछरि मुर्ग असकन्द कौ द्वै पद पंज प्रहार ।
नाक नैन लगि मुख श्रवण लै डारे वदन विदार ।।
मुगदर शूल सेल्ह गहि धावै । तोमर भाल कृपान चलावै ।।
सायर कर सारंग सर छूटै । वेधहि चर्म वर्म तन फूटै ।।
दंति दंति रथ सन रथ जूथा । तुरंग तुरंग पद प्यादेन गूथा ।।
गज अंवारिन सांगि चमकै । जनु मेघन दामिनी दमकै ।।
रथ चढ़ि धनु गहि वान चलावै । अहि कराल गिरि से जनु धावै ।।
अस्व वाह कर झेलै भाला । वीर विराजत भेष कराला ।।
पत्य पत्य प्रति खड्ग प्रहारै । कटहि शीश भुज लरहि न हारै ।।
वज्र शरीर शस्त्र वहु टूटैं । सूर समर चढ़ि करनी लूटैं ।।
सोरठा 11क
सर वरषहि संग्राम अस्त्र शस्त्र वहु विधि झरै ।
ते पावहि दिवि धाम समर मरण जे हठि लहै ।।
दोहा -11ख
कटहि शीश भुज ह्रदु कर पद उर कटि अधर धर ।
बहुत होय सत खण्ड पुनि कवंध उठि समर कर ।।
11 ग
रक्त नदी उमगी मही देव असुर दुइ पार ।
कूर्म चर्म कर मीन उर मकर केश सौवार ।।
अंतावरी गीधलै धावै । जनु वालक कर गुडी उड़ावै ।।
जंबुक मास खाइ कट कांही । जोगिन रुधिर पिये रन माही ।।
भैरव नचैहि योगिनी गावै । भूत प्रेत गण ताल वजावै ।।
उठै कवंध वीर रस पागी । रुणड प्रचण्ड लरहि अनुरागी ।।
बीरमाल सुर कन्या डारै । भिरे समर चड़ि सूर न हारै ।।
भाजैहि असुर देव दल दावहि । दलहि मलहि गुय परै गिरावैहि ।।
धावै एक-एक सन जूझै । गिरै मुकुट सिर पाग अरूझै ।।
शम्भु भुजा वल सुर लपिटाने । दैत्य दनुज तजि अनी पराने ।।
दोहा-12
भये विमन दानव सकल । भाजे तजि संग्रम ।।
मिलै न मारग दसौ दिशि । भूलि गये पुर धाम ।।
तात मात सुत स्वजन पुकारे । सुहद सनेही असुर निहारैं ।।
घायल परे अनेक बिचारै । समर मरै शिव लोक सिधारैं ।।
भजे सभय ते समर न आये । घेरि के तारक फेरि बुलाये ।।
असुरन रची वार बहु माया । देवन खन्डि समर निर्माया ।।
पुनि तारक निजमाया राची । बिन हरि हर सुर मानहि सांची ।।
वरषहि रज तृन पवन प्रचंडा । प्रलै मेघ धुनि बृष्टि अखन्डा ।।
अस्थि चर्म नख पल श्रग धारा । केश पांसु आयुध परिवारा ।।
चन्दु बात दश दिसि रब घोरा । पतन होय महि उपल कठोरा ।।
दोहा-13
दामिनि दमकै प्रवल गति, गरजै घोर कठोर ।।
शिव दयाल उमगो जलधि, रक्षक शम्भु किशोर ।।
विचलो सैन देव अकुलाने । समर विहाई त्रिसित विलगाने ।।
जहां जाय भजि देव समूहा । देखहि तहां निसाचर जूहा ।।
देवन विकल देखि शिवनन्दन । करे शक्ति लै असुर निकंदन ।।
छिनमौ काटि आसुरी माया । निरभय करे देव समुदाया ।।
देखि पच्छ सुर यूथय धाये । दानव दल अनेक विचलाये ।।
असुरन तन बृन रक्त उतिरना । जनु कज्जल गिर गैरव झिरना ।।
श्रवित रूधिर सुर सोहत कैसे । मधु माधव किंसुक तरू जैसे ।।
विचली कटक ब्यूह सब फूटे । स्वजन बन्धु सुत सुंदर छूटे ।।
दोहा-14
महाबली दानव सकल, अजै अचल संग्रम ।।
समय पाय विचले सभै, काल विवस विधि वाम ।।
भजै दनुज नहि चमू सम्हारै । सेनापति बल बोलि पुकारै ।।
तन छनभग लगै किहि कामै । समर मरन पावौ सुर धामै ।।
अमर न यह छयभंग शरीरा । क्रिम बिटभसम अंत गति वीरा ।।
तिहि ते बहुरि समर मह आवौ । मरे मुक्ति जीते जस पावौ ।।
अजस होय जिनको जगमाही । तन राखत जीवन सुख नाही ।।
सो सुनि असुर सूर फिरि आये । मारू मारू धरू सोर मचाये ।।
अस्त्र शस्त्र कर नख पद घाता । दन्त मुष्टि तल तरू गिरि पाता ।।
यहि विधि भयेसि घोर संग्रामा । अभिरै लरहि अखिल जै कामा ।।
दोहा-15
दानव दल सो खल प्रवल, धल बल करै अनेक ।।
बहुरि विवुध व्याकुल भये, विचले विगत विवेक ।।
भजे देव समर सुठि हारे । त्राहि त्राहि शिव सरण पूकारे ।।
आरत गिरा सुरन जब टेरी । तब षट वदन देव देशि हेरी ।।
कर धरि सांगि सैन संग आगे । चलत चले सुर दानव भागे ।।
अति बिषाद लखि तारक धावा । षट मुख सन मुख सूल चलावा ।।
शिव सुत काटि कीन्ह दुइ खन्डा । पुनि तिहि छाड़ी शक्ति प्रचंडा ।।
सोउ काटि करसे गुह डारी । साधु साधु सुर मुनिन प्रकारी ।।
तद कर तारक फरस उठावा । सोपि षडानन काटि गिराबा ।।
असि ले सो कृतांत समधायेउ । मारू मारू करि टेरति आयेउ ।।
दोहा-16
कोपि षडानन तारकहि, मारिसु शक्ति प्रचन्ड ।।
परा धरणि शिव शिव सुमिरि निसरी जोति अखन्ड ।।
सो शिव के उर गयेसि समाई । शेष असुर पुर चले पराई ।।
भयो समर श्रोनित पुर घीरा । देवन जीति सुतह करि जोरा ।।
गये दनुज शिव शरण कलेशे । विनय सकल पाताल प्रवेशे ।।
तारक बधन जाति सब देवा । बर्षहि सुमन करै गुरू सेवा ।।
चढि़ विमान दुंदुभी वजावैं । यथा उचित शिव के गुण गावैं ।।
गये देव मुनि षटमुख साथा । शिवहि सौपि सुत नायेसि माथा ।।
इद्रादि सुर विनवन लागे । शीश धरणि धरि शंकर आंगे ।।
करत पक्ष सब काल महेशा । सुनौ मोर यह विनय परेशा ।।
छन्द दुधा- ( शिव स्तुति )
नमामि मीश मीश्वरं । प्रपूजिंतं महीसुरं ।।
कपूर गौर निर्मलं । गले तले हलाहलं ।।
विधिं हरिम् निसेवितं । अदेव देव सेवितं ।।
शरणय शरणात्वा महं । स्वसेवकं मलापहं ।।
अभैप्रदं भुरे स्वरं । नमामि ते सुरेश्वरं ।।
द्वजेंद्र वन्स मंडनं । त्रिताप पाप खण्डनं ।।
सुरारि बृन्द गंजनम् । दुरूक्ति, दुःख भंजनं ।।
निर्वाण रूप निर्भयं । ददाति मुक्ति मक्षयं ।।
दोहा -17
भव संभव अनभव अभव चिदानंद सुर वीर ।
शिव दयाल विनवत सकल जै पिनाक धर धीर ।।
( शिव स्तुति )
शिव सर्वग्य सर्व उर वासी । कपर्दिने बृष ध्वज कैलासी ।।
तीन नयन त्रियंबक त्रिशूलधर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
जटा मुकुट सिर चन्द्र विशाला । तन विभूति उर नर सिर माला ।।
वेद मंत्र सावर धर शंकर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
गिरिजा पति गिरिपति गिरि वासी । तेज पुंज बलनिधि वलरासी ।।
मदन दहन रति लहन सुभगवर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
चिता भषम भूषण तन व्याला । काली पति कर कलित कपाला ।।
नवसौ शिवदयाल उर शंकर । जयति जयति जय शिव गंगाधर ।।
दोहा - 18क
लै अनुशासन विनय करि देव गये निज धाम ।
शिदयाल पद पांच पठ़ि सफल होय सव काम ।।
सोरठा-18ख
कर जोरे मुनि बृन्द तिहि औसर अस्तुति करै ।
दायक परमान्द जै महेश दुख दोष हरै ।।
छंद ( शिव स्तुति )
नमोकृपालाय दिगंवराय अरूपरूपाय विरूपकाय ।
भस्मांगराय सुरेश्वराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
कैलाशवासाय गिरीश्वराय नीलशिखंडाय महेश्वराय ।
लोकेभृमंताय निशामुखाय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
विश्वादिरूपाय विश्वेश्वराय अर्धंगगौरी शशिशेषराय ।
कर्पूरगौराय जटाधराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
काशीनिवाशाय त्रियंवकाय कामंतुनाशाय वरप्रदाय ।
त्रिशूलहस्ताय त्रिलोचनाय श्री नीलकंठाय नमः शिवाय ।।
मृत्युंजये व्याल विभूषणाय कालीकलत्राय बृषध्वजाय ।
पिनाकहस्ताय परावराय श्री नील कंठाय नमः शिवाय ।।
शिवायइदमस्तुतिनिर्मिताय शिवदयालसर्मायरतिप्रदाय ।
इदंश्रवणपाठनभक्तिदाय ध्यायेचिदानन्दअगम शिवाय ।।
दोहा - 19
यह अष्टव शिवको रचित वुध शर्मण शिवधाल ।
प्रेम सहित नित नेम करि पढ़ै सफल सव काल ।।
पुनि विनये शिव सिद्धि नवेशा । अछय अनादि अनन्त महेशा ।।
अस्तुति विध्याधरण प्रकाशी । नौमि कृपानिधि शिव कैलाशी ।।
तुम सर्वग्य सर्वमय स्वामी । सर्व भूत हित अन्तरजामी ।।
सगुण शंम्भु जग माया मोहित । भूतन अन्तर नील विलोहित ।।
आतम जीव अखिल जग मांही । विन शिव शक्ति आन कोउ नांही ।।
देवन मैं तुम इन्द्र सुरेशा । असुरन मैं प्रहलाद कुलेशा ।।
सिद्धन कपिल सुजच्छ कुवेरू । वन मैं चन्दन गिरिन सुमेरू ।।
ऋषिन वसिष्ठ मुनिन मैं नारद । जग मैं विष्णु शक्ति मैं सारद ।।
दोहा - 20-
पितरन मैं तुम अर्जमा नागन मैं शिव शेष ।
गंधर्वन मह चित्ररथ विधाधरण गणेश ।।
शिव अच्छरण मूल ओंकारा । वेदन जजुर्वेद निरधारा ।।
तारन चन्द्र ग्रहण मैं भानू । वरण विप्र तेजसा कृशानू ।।
पच्छिन गरुण सर्प कुल काली । धातु हेमरज तम गुण पाली ।।
वट थारुन मैं तरु मैं पीपर । शिव तुम गंगा सर्व नदी वर ।।
नदन सिंधु ह्रद नारायण सर । तीर्थन प्रयाग झेत्र मैं पुष्कर ।।
वन मैं गवरि अंश वृन्दावन । पुरिन मैं काशी इन्द्रिन मैं मन ।।
आश्रम लगि तुम शिव सन्यासी । योगिन विरक्ति यतिन उदासी ।।
परम हंस अति आतम भाषी । तुरिआतीत अगम अविनासी ।।
दोहा - 21
सिंह वलिन मैं गोप श्रुन मनुज मध्य भूपाल ।
पुरुष रूप अन्तरह्रदै वहिर वितावन काल ।।
तब महेश जे सकल विभूती । अपर अखिल संसार प्रसूती ।।
कोटिन सहस कोटि शत रूपा । अखिल अनन्त अखन्ड अनूपा ।।
गनै भूमि सिकता घन धारा । जलधि उर्मि नभमन्डल तारा ।।
शिव गुण रूप गिने नहि जाई । करहि कोटि विधि कोटि उपाई ।।
विनय देव ऋषि दये षडानन । हुय प्रशन्न वोले शिव शासन ।।
जब जब दुखित होय मुनि देवा । तब हम संकट हरैं अमेवा ।।
जाहु भवन शिव अस आदेशे । सब निज निज अधिकार प्रवेशे ।।
कथा व्यास मुनि मुख सुन राखी । सो हम शौनक तुम सन भाषी ।।
दोहा - 22
सुनौ अपर आख्यान मुनि पर्म ललित संवाद ।
रहे तीन तारक तनय तप करि धर्म विषाद ।।
अब तद सुनौ मधुर संवादा । तिहि अवसर भा धर्म विषादा ।।
तारक वध सुनि दनुज दुखारी । तिहि के त्रय सुत अति वल धारी ।।
ते तप करन गये गिरि कानन । नेम सहित करि संजम साधन ।।
ठाड़े अचल वर्ष शत बीते । सहि दुख छुदा पिपासा जीते ।।
बहुरि एक पद लिये उठाई । रहे भानु दिसि द्रष्टि लगाई ।।
सहस वर्ष भरि पवन अधारा । ऊर्ध बाहु शत वर्ष अपारा ।।
वर्ष सहस मस्तक धरि धरणी । उर्ध पाद तप दारुण करणी ।।
जग तापक तप देखि अपारा । देवन सत्य लोक पगु धारा ।।
दोहा -23
करि विनती विधि सो कहा नाथ वेगि वर देहु ।
प्रजा जरत रच्छा करहु जानि हमार सनेहु ।।
बृह्म देव गिरा सुनि धाये । दारूण तप ते दैत्य जगाये ।।
हम प्रशन्न मांगौ वरदाना । कहै दनुज वल दर्प समाना ।।
यदि प्रशन्न देवेश कृपाला । यह वर देवौ केतु मराला ।।
सब जग रहै अविधा पूरी । तव विधि कहा दानवन भूरी ।।
सर्ववसी वर तुमहि न देही करहि अविधा वस कस केही ।।
जाचु अपर वर जो रुचि होई । कहऊ विचार देउं वर सोई ।।
कहैं परस्पर दनुज विचारी । सुनहु जगत पति विनय हमारी ।।
वर देवौ विकसित सब वर्गा । तीन नगर वर भू भुव सर्गा ।।
दोहा -24
वर्ष सहस प्रति परस्पर मिलन चहै तब दोय ।
प्रभु समरथ सो वध करै जब त्रै इक मिलि होय ।।
एकहि वान एक ही वारा । स्वामिन सहित त्रिपुर संघारा ।।
एवमस्तु वर वोलि विधाता । निज दिविधाम गये सुरत्राता ।।
मय वुलाय विधि आज्ञा दीनी । रचहु नगर शुभ सुन्दर तीन्ही ।।
कांचन रजत लोह त्रै जाती । स्वर्ग से क्रम निरमौ येहि भांती ।।
यह कह विधि भये अन्तरध्याना । तप वल मय कृत पुर निर्माना ।।
दिवि कांचनपुर अध विच राजत । आयसुपुर धरनी पर छाजत ।।
तारकाच्छ कांचनपुर वासी । कंजलाच्छ पुर रजत निवासी ।।
आयसुपुर महि विधुनभाली । अति विकराल महा वलसाली ।।
दोहा -25
दैत्य दानवन पूजित मय दानव गुणवान ।
ताहि वसायो तिन पुरन हित कामना समान ।।
तीनौ निज निज पुरण प्रवेसे । कल्प वृक्झ गज वाजि निवेसे ।।
त्रिविधि दुर्ग अति विकट कपाटा । बीथिन वाटन चौहट हाटा ।।
एक एक योजन विस्तारा । सुन्दर सुभग विचित्र प्रकारा ।।
रवि मन्डल विमान वर भासै । पदम राग सम चन्द्र प्रकासै ।।
नाना हर्मि प्रसाद समाजा । गज मुक्ता मणि जाल विराजा ।।
गोपुर द्वार भवन पुर नाना । शिव मंदिर कैलाश समाना ।।
चारण सिद्ध विप्र गंधर्वा । गाय वजाय नचै मिलि सर्वा ।।
ठौर ठौर मंदिर वन वागा । शोभित वापी कूप तड़ागा ।।
दोहा- 26
सोरह साला नगर प्रति पंच भवन आगार ।
दज तुरंग धेनु धन पूरति पुरण अपार ।।
नेम धर्म संजम व्रत नाना । प्रज्ञा दान जंह तंह सनमाना ।।
वेदाध्यायन अगिनित साला । पुन्य लता द्रुम कुटी विशाला ।।
नर धरमग्य पतिवृत नारी । सपनेहु जंहां न कोउ विभिचारी ।।
विलग विलग क्रीड़ा अस्थाना । मंगल कलश द्वार प्रति नाना ।।
तंहा वसैं सब परउपकारी । ऋषि मुनि संत धर्म वृत धारी ।।
सह द्विज महाप्राज्ञ दैत्येशा । करहि अनुगसुत दार निदेशा ।।
सिविका गज तुरंग रथ नाना । फेरहि चढ़ि निज सुन्दर जाना ।।
नील कमल दल कुंचित केशा । अगिनित दैत्य शुभाशुभ वेशा ।।
दोहा - 27
चारहु द्वारण पुरण प्रति चतुरंगिनी अपार ।
निज कारज लवलीन मन को वरनै विस्तार ।।
गये रचित नगर चौपासा । भांति भांति के चरित प्रकाशा ।।
कोई कुपित कोउ कुब्जक वामन । कोउ प्रशांत सज्जन अति पावन ।।
कहुं कहुं मल्ल युद्ध अधिकारी । कोई अस्त्र सीखै कर धारी ।।
धर्म शास्त्र कहुं कथा पुराना । विविध करै प्रति द्वार विधाना ।।
घर घर होम यग्य वहु भांती । दुज जिमाय जेमहि सव जाती ।।
धर्म सनातन जो महि रहई । सो सब विस्तारो तिन तहई ।।
तिनके तेज दहन लगि लोका । इन्द्रदिक सुर सकल सशोका ।।
त्राहि त्राहि विधि शरण पुकारी । नाथ वेगि भय हरौ हमारी ।।
सोरठा 28 क
कह विरंचि मुनि देव कहौ वेगि निज खेद मन ।
सवन कह निज भेव करौ कृपा करुणा भवन ।।
दोहा 28 ख
करि विनती गद गद सुर लोकप दिगपाल ।
करहि निवेदन वेदना किमि वरणै शिवधाल ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद नवमोअध्याय ।।।
।।। त्रिपुरासुर प्रकरण ।।।
अठारहवां अध्याय
।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद अष्टमोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
मैना सुनौ तत्व शिव एका । वोध भेद तौ वस्तु अनेका ।।
सारद शेष न जानहि भेदा । तत्व वस्तु शिव सम्मत वेदा ।।
भृम वश जथा खंभ जन रूपा । लखि पहिचानत खंभ अनूपा ।।
जेवरि भरम सरप शंकाशा । देखि सीप मैं रजत अभाशा ।।
प्रघटत ज्ञान जून कर जूना । सीप कि सीप छुटे भ्रम दूना ।।
जिमि नटनाटक भेष वनाई । छल छूटत एक रूप दिखाई ।।
चामी कर भूषण वहु भांती । पावक परसि होत एक जाती ।।
एक अंग अंवर विधि नाना । तिमि शिव के वहु रूप निधाना ।।
दोहा - 1
धन सुत दारागार मम बन्धन माया फंद ।
काम क्रोध मोह गत शिव पायेसि आनन्द ।।
मै और मोर तोर यह बन्धन । अहंकार गत शिव फिरि दुंदन ।।
यथा विराग राग दुय भांती । तथा प्रकृति संजोग सुजाती ।।
प्रकृति से परे ब्रह्म शिव सोई । सगुण रूप सबके हित होई ।।
चन्द्र मुकुट कैलास निवासी । जासु कृपा लगि सम गति काशी ।।
यहि प्रशंशि मम डोलत भाला । गिरी करण मणि गई पताला ।।
मणि कर्णिका विदित जग मांही । जेहि मजत कछु दुरलभ नाही ।।
हम सब सो शिव तत्व न जाने । तुम शिव से औगुण अनुमाने ।।
तजि अज्ञान सगुण शिव जानी । भामिनि अरपहु भवहि भवानी ।।
दोहा - 2
सजि आरति मंगल करण बर परछनि करि लेउ ।
भुवन चारि दस जस रहय उमा शंकरहि देउ ।।
मैना तुम शिव रूप न जाना । शिव कोमल कृपाल भगवाना ।।
मैना उर प्रवोध तव आबा । उठि ग्रह आंगन चौक पुराबा ।।
सकल मंगला चार कराये । पितर न्यूति ग्रह देव पुजाये ।।
समय सु जानि हिमंचल आये । सामिग्री वहू शिव पह लाये ।।
सफरि पीन पाठीन पुरानी । कामर कलश कहारन आनी ।।
हिमगिरि वर बरात क्रम धारे । पद पखारि आसन वैठारे ।।
करि मधुरस गंगोदक पाना । पौन प्रजहरु सकल समाना ।।
वहु व्यंजन पकवान मिठाई । सवहि सप्रेम परोसि जिमाई ।।
सोरठा - 3क
पाहुन प्रजा समेत वर वरात कौ छकित करि ।
नाम पौनछक देत शिवदयाल तब से विदित ।।
3-ख
पावन कुल गुरु पाहुने महिमा ते महिमान ।
वर के रात वरात सम परिजन प्रजा सुजान ।।
वर के रच्छ्क विसद वराती । सेवक सकल प्रजा वहु भांती ।।
हिमगिरि पाहुन प्रजा छकाये । तवहि पौन छक नाम कहाये ।।
गंगाजल सब कह अचवाये । विनै सुनाय वहुरि धर आये ।।
पठयसि शिव सौभाग चढ़ायो । वाजन वजन सुआगन आयो ।।
दहि गल युग दध्यंग लै आये । आतुर वरण वरिउना लाये ।।
चादरि सुभग चन्द्र विरमायेउ । भवन बशिष्ठ प्रतिष्टि पठायेउ ।।
तब सखि उमै उवटि अन्हवायेउ । सुभग सुमन श्रंगार करायेउ ।।
माथ मयूर सिखावलि सोहे । माग मालती मन्जुल गोहे ।।
दोहा - 4
सिर कपोल गुंदि वंदिआ सोभित हर श्रंगार ।
भाल तिलक सूरजमुखी मौरसिरी उर हार ।।
करण फूल करणारुण दंपा । कमल करणिका शोभित कुंपा ।।
करण केतकी माधवि माला । चन्द्रहार चांदनी विशाला ।।
सुभग नाग केशरि नक वे सरि । संधि सेवती को सिंगार करि ।।
वेली गुद वाजू बन्द बन्धन । चंपक चूड़ी कंज कर कंकन ।।
भुज मंदार हाथ हथ कंदर । कुमुद कन्ठ पाउरि पग सुन्दर ।।
मुरबा नूपुर नवल निवारी । चरण चमेली विरचि विचारी ।।
येहि विधि करि श्रंगार नवेली । चारु चौक लय गई सहेली ।।
तह विरंचि कुल रीति कराई । अरचन भेद विधान वताई ।।
छंद
प्रथम कलश गणेश वरुणौ गवरि शिव अरचाय के ।।
अरचि गवरि कुमारि कर सिंदूर मांग लगाय के ।।
रच्छ वन्धन चुनरि सिरधरि धूषन पट पहिराय के ।।
शिवदयाल खरजूर अंजलि गोद रतन भराय के ।।
दोहा- 5क
सनक सनंदन सनातन जेठे सनत कुमार ।
माया निरमित चूनरी सिरधरि चतुरंग सार ।।
सोरठा -5ख
त्रै गुण खौरि लगाय दुयज चन्द्र सिर तिलक दय ।
उमा हाथ पहिराय नवग्रह निरमित नवग्रही ।।
दुज वाजु बन्द वायस दाना । रूद्र अंस राजत निर्माना ।।
शेष रचित सुन्दर मणि माला । विधि गिरजै पहिराय विशाला ।।
मणु कलिपत दय चौदह चूरी । सात रिसिन सिर धरी खजूरी ।।
शंभु शक्ति दुय दल समुझाये । कंचन मणि चरू धौल मिलाये ।।
वागर थालो विधि कर बाई । पारबती परमेस मनाई ।।
विरचि कुवेर कणक पुटमोदा । सघन फूल फल धरि भरि गोदा ।।
पावक रिचत बसन पहिराये । फिरि शिव गण जनवासे आये ।।
जाबक दै सिर चूनरि साधे । युग पूरनि पट कंकन वाँधे ।।
दोहा-6
गिरिजा उठि मंदिर गई, करै वेद कुल रीति ।।
निमे देव देखत उमै, विधि से यह पर तीति ।।
कन्या के तन त्रय वसत चन्द्र अनल गंधर्व ।।
रजकी कर सिंदूर तद, माँग भरावत सर्व ।।
चंद्र मुखी त्रिय नाम कलापा । चूमत पुरूष देत शशि सापा ।।
वसि गंधर्व पयोधर सर्बा । मरदै मनुज सपै गंधरवा ।।
पावक वसत नारि भग अंगा । दहै देह पति करत प्रशंगा ।।
तद रजकी सिंदूर लगावै । तजैं देव तब त्रियजन भावे ।।
तदपि करै अति संग सुहावै । तौ ततकाल जुगल फल पावै ।।
शंभु हुहा बहु निरत प्रकासे । होय विविधि मंगल जनबासे ।।
तिहि औसर तह नारद आये । कुशल पूछि शिव निकट बुलाये ।।
सुनि मुनि के उर आनन्द छाये । शिवै प्रवोध करण मन लाये ।।
दो-7
हरण हेत मैना मन खेदा । दुलहा वनौ विवाह विभेदा ।।
तुनहु नाथ गौरव गुण गाता । धरहु रूप सुन्दर सुर त्राता ।।
कोमल गौर किशोर मनोहर । भक्त वत्स कर वर गंगाधर ।।
जगमोहन अति सुंदर रूपा । वनौ विशाल विशेष अनुपा ।।
गिरिजा मन विनयै तिहि काला । सुभग स्वरूप धरौ शशि माला ।।
शिव नारद की सुनि मृद बानी । अरू गिरजा मन की गति जानी ।।
का बरसा कृषि सालि सुखाने । काल बिहाय कहा पछिताने ।।
अस बिचारि हर भेष बनाये । सहस चन्द्र रवि रूप दिखाये ।।
दोहा-8
तब मैना पै जाय के, नारद कह समुझाय ।।
अब देखौ शिव रूप गुण, कोटि काम अधिकाय ।।
जटा मुकटफड़ि मौर विशाला । नयन तीन दूसर शशि भाला ।।
गौर फटिक मुख पावक रोचक । गोल कपोल मदन मद मोचन ।।
चिवुक चारु सुन्दर वर नासा । रदन पांति तारका प्रकाशा ।।
विम्वाधर वर कुन्डल कानन । पूरण चन्द्र प्रकाशत आनन ।
मुख प्रशन्न त्रिवली उर सोहा । नाभि गम्भीर निरखि मन मोहा ।।
रुद्र अचछि उर श्यामल माला । नाग विभूषन केहरि छाला ।।
कर त्रिशूल वर अंग विभूती । नील कण्ठ शुभ ठमरू संजूती ।।
बाहन बृषभ सुगन्ध लगाये । शिव सुन्दर वर भेष वनाये ।।
दोहा - 10
वर वरात साजत सकल शिवदयाल निज भाग ।
शंकर उमा विवाह सुनि मन उमगत अनुराग ।।
जानि सुअवसर समय सुहाये । शिवय हिमंचल वोलि पठाये ।।
सब सुर मुनि शिव संग सिधाये । सुन्दर सुभग रूप धरि आये ।।
वाहन विसद अनेक प्रकारा । सकल रूप धरि चले अपारा ।।
शिव गण लये अनेक पताका । वहु विधि करैं देव सब साका ।।
गज तुरंग रथ पादप नाना । वाहन अखिल अनेक विमाना ।।
ढोल दुंदभी भेरि उपंगा । उफरा वीणा बेणु म्रदंगा ।।
शहनाई बांसुरी सुर साला । झांझ पखावज औ करताला ।।
धेनुमुखा सहरगि सैतारा । अनहद घन्ट शंख ध्वनि धारा ।।
सोरठा- 11क
करहि अप्सरा गान विविध भांति बाजा बजहिं ।
विरदा वली विमान देव सुमन वरषा करहि ।।
11ख
होत अनेक विधान कौतुक हिमगिरि द्वार मय ।
बरनै कवि को आन सारद शेष न कहि सकै ।।
दोहा 11ग
सागर उद बेलास रिस शिव की देख वरात ।
अगम जानि मैना मगन हर्ष न ह्रदय समात ।।
उमग तरंग अंग मै बाढ़ी । चित्र लिखे सम रहि गई ठाड़ी ।।
पुनि मैना मृदु वचन उचारे । सुता जनम धनि भाग हमारे ।।
धन्य उमा धनि परवत राजा । कहि लजान लखि शम्भु समाजा ।।
अगिले सोच सकुचि मन मांही । लगि कालिमा कहत कछु नाही ।।
तब लगि शिव आये गिरि द्वारे । मयना मंगल थार सम्हारे ।।
विधि हरि हरै पूजि गुण जाने । आरति कर सुर मुनि सनमाने ।।
सो सुधि पाय नगर नर नारी । आये सब गृह काज विसारी ।।
बहुत नारि सुत सुता समेता । चली दरस हित शम्भु निकेता ।।
दोहा -13
वाल विरध सुर मुनि मनुज चारि वरण सब जाति ।
शिव दरसन आये सकल धन धन सो शिव राति ।।
जै शिव कहत देव मुनि वृन्दा । रहो भवन भरपूरि अनन्दा ।।
फागुन मास असित शशिवारा । शिव चौदस निसीत अवतारा ।।
शिव को रिषिन जन्म दिन जाना । मंगल कारज वरजित माना ।।
पुनि रवि संग चन्द्र छय देखा । वर्जित करे विवाह विशेषा ।।
देव दिवस षट मास प्रमाना । उत्तरायण सूरज सम जाना ।।
तितनिय देव निशा परकाशा । दक्छिणायण सूरज षट मासा ।।
वीते दिवस देव निसि आई । कर्क सिंह रवि रासि विहाई ।।
पितरण पच्छ पितर दिन मानी । पूजि विसर्जि पितर निसि जानी ।।
दोहा - 14
आश्विन महिना पच्छ सित शिव सेवा मनलाय ।
परिवा ते आरम्भ करि आठ दिवस निसि पाय ।।
सूर्य चन्द्र शिव संग वराती । भयो मास षट दिन सोई राती ।।
गवरि विवाह द्वार शिव आये । देखन पुर नर नारि सिधाये ।।
अपर स्वामि सेवा तजि धाई । पति संगति अनेक तजि आई ।।
कोउ विपरीत विभूषन चीरा । बालक तजे पिअत अध छीरा ।।
वहुतक सखी संग लै धाई । कोउ रसना वन्धन युत आई ।।
कोउ आई तजि गृह परिपाका । कोउ अंजन कर गहे सलाका ।।
कर आदर्श लये वहु धाई । कोउ गो दोहन तजि विलगाई ।।
चली सकल तजि कारज नाना । शिव लखि मोही जग पति जाना ।।
सोरठा- 15क
तन की दशा विसारि जढ़वत भई अचेत सब ।
भाग सराहे नारि शिवहि देख आनन्द मन
दोहा 15 ख
मौन रही सब एक छण पुनि बोली हरषाय ।
धनि गिरिजा वड़ भागिनी शिव देखे जिहि पाय ।।
कहैं परस्पर सब सुख माही । पुन्य पुन्ज हम सम कोउ नाही ।।
यथा नाम शिव तस गुण रूपा । गुण सरूप सम नाम अनूपा ।।
सुने श्रवण तस आंखिन देखे । सफल जन्म हम आजु अलेखे ।।
बानि अचच्छु नयन विन जीहा । शिव दरसन को कहे समीहा ।।
हिमगिरि पुरवासी सब आये । भाव जोग शिव दरसन पाये ।।
यथा योग करि विनय प्रणामा । कहै सकल परिपूरन कामा ।।
धनि गिरिजा शंकर वर पाये । अजर अमर सब भांति सुहाये ।।
तिहि औसर जिन शंभु न देखे । भानु उदय जनु उलूकलेखे ।।
दोहा - 16
गिरिजा दारुण तप करे पाये अचल सुहाग ।
अहो भाग हम सवन के शिव देखे जिहि भाग ।।
विनि सुभाग पति मिलै न सुन्दर । पापा ते लाभ कुटिल खल किंकर ।।
भाग विना सुभ मिलै न दुलही । दोष ते होत नारि खल कलही ।।
विना भागसे मिलै न अस वर । यथा रमै हरि गिरिजै शंकर ।।
अस कहि सब दल दुर्वा लाये । शिवै अरचि फल फूल चढ़ाये ।।
धन्य धन्य शिव जयति पकारैं । चन्दन अछत फूल सिर छारैं ।।
सात कुम्भ घट कलश धराये । झालर वन्दन वारि बन्धाये ।।
कुंकुम दूर्व अछत कुश धारे । अरचो शिवय हिमंचल द्वारे ।।
अन्तर पमर शम्भु तब आये । मैना कंचन थार सजाये ।।
दोहा -17 क
मणि माणिक आरति रची सुरभी धृत आघाय ।
वरती विशद कपूर की चौमुख दीप जगाय ।।
17ख
मैना भूषन वसन धरि करि सोरह श्रंगार ।
सखिन संग लै शंभु पह गै वर परछन द्वार ।।
देवन गरल कंठ शिव लेखे । कहै कि काहुन अवहि न देखे ।।
लखि मैना विरचै भय मानी । नीलकंठ लग चादर तानी ।।
तवसे अन्तर पट न दिखाबै । कमल रोचना सकल कराबै ।।
देखि रूप सुन्दर मद नारी । तव मैना आरती उतारी ।।
करि रोचना हास करि हरषी । गहि बाधिवर कर आकरषी ।।
फणि फुफुकार शंभु कर व्याला । भाजि गिरी गिरिनारि विहाला ।।
लोटि हसै सुर मुनि लगि थोभा । हंसय नारि मैना मन छोभा ।।
दसन जीह नारद विधि चांपी । सुर मुनि मौन उमा तन कांपी ।।
दोहा-18
प्रथम हिमंचल वेदिका, राखी रूचिर बनाय ।।
हरित बामस मणडप रचे, पान उसीरण छाय ।।
बमदन वारि कदलि युग खम्भा । माँझ सविधि वेदिका अरंभा ।।
सीप जनित यदि तिर्जग होती । तिनसे चतुर कहै गजमोती ।।
झुंपक झालरि शोभन दायक । बर्तुल बेसरि कुंडल भायक ।।
गज मुक्ता गज केशर होई । धात्री फल सम दुर्लभ सोई ।।
गजसिर मुक्ता ब्रणव है नीरा । सिहहि सुलभ सुगंध समीरा ।।
मान सरोवर मुक्त मगाये । तंदुल सम सितलंव सुहाये ।।
तिन गज मोतिन चौक पुराये । तब मंडप समीप शिव आये ।।
गजमुक्ता तंदुल अनुभावै । तेहि जब तंदुल चौक पुरावै ।।
दोहा-19
तब हिमिगिरि मैना सहित. करि मज्जन अस्नान ।।
आये मंडप निकट सद, ग्रथं जोरि कर गान ।।
हिमगिरि शिवै अरचि बैठारे । पुनि विष्टर दै चरण पखारे ।।
तद विरंचि बरणे मुनि चारी । रिगु, यजु, साम, अथर्वणधारी ।।
चारिउ श्रुति शरीर धरि आये । वेद ऋचा निज निज मुख गाये ।।
शिव सनमुख बैठे गिरिभूपा । मयना दाहिन अंग अनुपा ।।
अरध देय पुनि विषटर छाये । शिव कौ हिमि आचमन कराये ।।
तब हिमि गिरि मधुपर्क मगायेउ । वर कर दै तिन मंथि मिलायेउ ।।
अनामिका अंगूठा शिवजोरी । दधि अर्पण चंदमै करोरो ।।
उभै पच्छ अघ दोष नसावन । मिले होत मधु पर्क सुपावन ।।
दोहा-20
त्रिपल धेनु दधि सर्करा, दुय पल धृत पल एक ।।
शिवदयाल मधुपर्क तद, पावन मंत्र विवेक ।।
शिव सो दयेसि हिमाचल हाथा । लै मधुपर्क नाय पदमाथा ।।
सो शिव कौ मधुपर्क दिमाये । सादर दुय दुकूल पहिरकये ।।
अंग न्यास तब शिवहि कराये । वाक प्राण दृग बल उपजाये ।।
गौर मंत्र महि खड़ग दयोरी । पाप ताप सब त्रिन सम तोरी ।।
युगुल बसन ते उमै धराये । चंद्र मुखिन मृदु मंगल दाये ।।
तद विरंचि सब कृत्य कराई । गवरि बुलाय चौक पर आई ।।
उमा संमजन शिवदिसि देखी । पहिरायेसि जयमाल विशेषी ।।
सखिन सैन करि उमा हंकारि । शिव सनमुख बुलाय बैठारी ।।
दोहा-21
प्रथम ऋषीसन साखि उचारी । शिव हरि विधि शिव सुत भ्रमकारी ।।
उमा पक्ष पुनि मुनि धुनि धारी । मरिचिय कश्यप हेम कुमारी ।।
तद भूधर दक्षिण दिसि आये । उत्तर मुख मैंना दिसि दायें ।।
शिव गिरजा के चरण पखारे । भाल तिलक सिरमाल सुधारे ।।
पीत पाणि पुनि गवरि कराई । पंच रतन फलकर धरवाई ।।
हिमि गिरी गहि कुस कन्या पानी । शिवहि समर्पी उमा भवानी ।।
मैना हिमगिर भवन सिधाये । नारिन मंगलचार सुनाये ।।
गिरजा शिव दाहिन दिसि आई । ग्रथ वांधि विधि कृत्य कराई ।।
दोहा - 22
पंचाहुत करि उमा शिव पूजे गवरि गणेश ।
आदि देव आविचल सदा हारक हानि कलेश ।।
सो सुनि जनि कोउ करै अंदेशा । अगम अनादि अनन्त गणेशा ।।
संजुषि अनल अवाहन कारी । विधि वेश्वानल पघट प्रजारी ।।
पथमै करि परिकरमा एका । त्रिविध होम सुर साखि अनेका ।।
प्रति लाजाहुति गवरि अगारे । त्रय परिकरमा उमा शिव कारे ।।
गिरिजा कर कंकण मणि शीशा । थकित चरण लखि छाह गिरीशा ।।
वंदी करण वंदना लागे । चकित देव आये शिव आगे ।।
येहि विधि भये परिक्रमा चारी । पचई भामरि शिव पगु धारी ।।
उमा भई तिहि समत पिछारे । मंडप सहित परिक्रमा कारे ।।
दोहा - 23
पुनि आसन पै उमा शिव वैठि यथावत आय ।
उमा मुदित आनन्द शिव हर्ष न ह्रदय समाय ।।
शिव कालहु का काल महेशा । निस दिन डरपहि काल कलेशा ।।
अंतर पट शिव उमै कराये । डरपि काल छिपि आहुत पाये ।।
सात पुरी पद पुरण वसाये । उमा चरण पुनि सिला छुआये ।।
पद अंगूठा लखि विधि के भर्मा । भये मदन वस विसरे धर्मा ।।
पतन काम पद चापि अधारा । मथत कनिक ते भये कुमारा ।।
वटुक असंख्या ब्रह्म सूत्र वर । कच्छादुद दश सहस जटाधर ।।
विधि कौ नमस्कार करि हर्षे । तिनहि देखि विधि पै शिव मर्षे ।।
शिवहि सकोप देखि मुनि देवा । सहित विरंचि करै सब सेवा ।।
दोहा -24
विधि सुरसरि शंकरै मिली हरष सो आय ।
शिवदयाले शिव उमा भै राखी जटन छिपाय ।।
ते वटुका सूरज व्रत धारी । वेद पार गंता तप कारी ।।
रथ आगे पाछे वहु धावै । रवि कौ अस्तुति विनय सुनावै ।।
वहुरि विरंचि करे असनाना । पठत वेद शिव गिरा प्रमाना ।।
विधि विवाह विधि शेष करायेउ । रवि ध्रुव अवधि करी दर्शायेउ ।।
दाहिनि गवरि बाम त्रिपुरारी । कह शंकर सुनु शैल कुमारी ।।
भयेउ विवाह वाम दिसि आवौ । पावन तप श्रम शोक नसावौ ।।
कहेसि उमा शिव लखि सांकूला । नाथ आज विसरे सब सूला ।।
अब लग रही सु तात कुमारी । भइ अब शिव सेवकी तिहारी ।।
दोहा-25
जुग पावन मधुपर्क ते, मख पूरण विधि कारि ।
चले न पति के बामत्रिय, तब लगि पिता कुमारि ।।
दासी जानि दया नित कीजै । सात वचन शिव मांगे दीजै ।।
प्रथम बचन दाहिन बैठारी । करहु दान मख शषि मुरारी ।।
दुसरे व्रत चंद्रायान शीजै । शशि रवि शाखि संग मिलि कीजै ।।
तिसरे विधि हरि हर हर दै साखी । दीनहु पन पालव समराषी ।।
चतुर्थ साखि वेद दय चारी । मम कर धन संचय विवहारी ।।
पचये साखि लोक पति राचा । हमहि मत्रि पालौ पशु पाचा ।।
दय षट शास्त्र साखि मद नारी । असन वसन दीजौ रितूकारी ।।
सतये सात रिषिन करि साखी । छमौ दोष सखि अनमधि माखी ।।
दोहा-26
वचन दये शिव उमा उठि, शिव तद कहा सुभाउ ।।
पाच वचन अव हमहि दय, वाम अंग तव जाउ ।।
सात वचन करि अंगीकारा । उमै कहा शिव धर्म विचारा ।।
पर भरता पर गेह विहाई । तरणो विपिन अकेलि न जाई ।।
पुनि दुपहर निशीथ सो एका । वहिर न जाय विहाय विवेका ।।
उमा कहति पदि लगै जु आगी । प्राण वचावहि अकि तन त्यागी ।।
शिव कह जाय सु प्राण बचजाई । विपति काल मर जाद न जाई ।।
दूसरि चारि भाति मद त्यागी । सो शुभ लच्छणि पर्म सुभागी ।।
धन गज मद मदिरा तरूणाई । सनमुख षमय सखिन संग जाई ।।
तीसर वचन त्रियै तुखदाई । बिनु बोले पितु गेह न जाई ।।
दोहा-27
यदि बिन बोले पिता ग्रह, जाय प्रेमहित मानि ।।
रहै न आदर मान सुख, जस कीरति कुल कानि ।।
जदपि स्वतंत्र नारि अनुभाववै । हठ करि जाय सती गति पावै ।।
होय भ्रात सुत पति जगमाहीं । पट भूषण लय जाय कि नाहीं ।।
शिव कह लोभ लागि यदि जावै । तद न मान अपमान कहावै ।।
निज पति मूरख पंडित आना । त्रिय पति कीरति करै बखाना ।।
उमा कहा शिव शुभ कि खुटाई । व्यास गदी सब करत बड़ाई ।।
शिव कह व्यास वेद मम अंशा । धरम कथा सुनि करे प्रशंशा ।।
भरतु कुरूप कुचैल मलीना । पर पति भूषन बसन प्रवीना ।।
नारि धर्म पर प्रति अघ अंशा । दुलहा कहय करहि प्रशंशा ।।
दोहा-28
दुलहा कहे ते दोष अति, वर बोले सम जार ।।
समुझि नारि साधन करै, सदा धर्म उपचार ।।
त्रिय कौ पति व्रत धर्म सहाई । पति सेवा नित सहस बड़ाई ।।
तब गिरजा कह सुनौ महेशा । बहुरि कहौ यह शुभ उपदेशा ।।
तब बरकत यदि व्याहन आवै । पुर नर नारि पुकारत धावै ।।
सखि सुन्दर वर व्याहन आयो । अपर परसपर कहै बनायो ।।
कोउ कहै दुलहा अति नीका । सो शिव उचित कि बानि विलीका ।।
शिव कह उमा ग्राम बर आवै । दुलहा कहि के सब त्रिय धावै ।।
पति व्रत लखै न कहै न आवै । मध्यम निजसम योग जनावै ।।
सुत सम लघु समान सो भ्राता । दीरघ पितु समान गुण गाता ।।
दोहा-29
माथे मुकुट विवाह को, तब लौ अंश हमार ।।
दोष न दुलहा वर कहे, नारि लोक विवहार ।।
सवैय्याः-
यह उत्तिम नारि के चित्त वसय । मम कांत विहाय न दूसर कोई ।।
तस मध्यम देखि विचार करय । सुत बन्धु पिता सम दोष न होई ।।
कुलकानि कौ मानि बचै सो निकिष्ट । अधमा विनि औसर भै वसजोई ।।
शिव दयाल कहै शशिभाल हिमाल पै । सेवहि गौरि पती व्रत सोई ।।
दोहा -30
शम्भु गिरा सुनि प्रेम बस हर्ष न ह्रदय समाय ।
उमा सुअवसर पाय के वैठि वाम पिसि जाय ।।
उमा सुमंगल करि शिव पूजै । शिवहु मांग सेंदुर भरि कूजे ।।
विनि शिव उमा विवाह न होई । मूरति जुगल कि सिंदुरि सोई ।।
करि अभिषेक तिलक विधि हरषे । पठि धुनि वेद सुमन सुर सुर वरषे ।।
मुनि समूह बृन्दारक बृन्दा । आसिष देय सहित आनन्दा ।।
विनवै सकल जाति सुर सेई । नगर नारि नर आसिष देई ।।
वोले सुर मुनि विष्नु विधाता । जगत पिता शिव गिरिजा माता ।।
त्रिय उमंग मन मंगल गाये । नेगिन नेग निछावरि पाये ।।
शिव गिरिजा गिरि गेह सिधाये । मैना निज कुल देव पुजाये ।।
दोहा- 31
मैना मंगल रूप लखि दधि शर्करा मगाय ।
शिव गिरि जै लह कौर दय जेवत गारी गाय ।।
दीपक वरती शिव सुमिलाई । वहुरि विहसि मैना वलि जाई ।।
धेनु धरणि धन मणि गण चीरा । गज तुरंग रथ हाटक हीरा ।।
दय वहु दान विप्रवर तोषे । गायक जाचक सब परिपोषे ।।
तब शिव फिरि जनवासे आये । वोलि अपसरण नृत्य कराये ।।
वहुरि हिमंचल वोलि पठाये । सह बरात जिम नारहि आये ।।
शिव विरंचि हरि सब मुनि देवा । चरण धोय हिमिगिरि करि सेवा ।।
भोजन कह आंगन बैठारे । तीरथ परसै पाक सम्हारे ।।
बहु रस देय सरोवर झारी । सब सरिता मिलि गावहि गारी ।।
छंद
गारी मधुर सुर वधू गावै व्यंग बचन सुनावही ।।
होत कौतुक विविध मन्डप सुमन सुर वरषावही ।।
छप्पन भोग छतीस व्यंजन छरस अभृत जिमावही ।।
शिवधाल हिमिगिरि गेह धनि जह भोग देव लगावही ।।
येहि भांति नित पकवान मेवा सुरन प्रति सरसावही ।।
पांच अमृत परसि हिमगिरि सवहि मांथ नवावहीं ।।
अलक नन्दा उदक निरमल सवहि लै अचवावहीं ।।
शिवदयाल शिव जिमनार गावहि सुनै शिव पद पावहीं ।।
चौथे दिवस चतुर्थी करमा । शिव आये मखशाल सुधरमा ।।
विधि समधा फल फूल मंगाये । शिव समूह कुश बेदि बनाये ।।
गिरिजै सखिन मंजि अन्हवाई । करि सिंगार शुभ चौकय लाई ।।
धृत पायस विधि होम कराये । शेष पाक सह भोज सधाये ।।
सादर गिरिजा परसि जिमाये । पंच ग्रास शिव भोग लगाये ।।
पुनि जुठार शिव उमै गहाये । प्रेम प्रसाद गवरि हंसि खाये ।।
शिव गिरिजा कर कंकण खोले । कठिन सूत्र पट गांठि कठोले ।।
शिव कर नाग लपेटी उरझै । कंकण पारवती पै नहि सुरझै ।।
दोहा - 32 क
जूप कर्म करि उमा शिव फल विरंचि भरि गोद ।
शिव उठि जनवासे गये गृह गई उमा समोद ।।
32 ख
विदा चहै सकुचाय सब प्रेम प्रीत सरसाय ।
हिमिगिरि आये शंभु प्रति हर्ष न ह्रदय समाय ।।
उभै पच्छ सब नित अकुताहीं । मांगहि विदा धीर उर नाहीं ।।
हिमिगिरि विनै कहा कर जोरी । सफल करौ शिव सदन वहोरी ।।
अर्ध देय कर शिव सिर गंगा । का भूषण मणि बलय भुजंगा ।।
कहा तिलक शशि शीश प्रकाशा । देव सु कह आसन कैलाशा ।।
अनुचर धनद भेंट का दीजै । कवन भांति परिचरचा कीजै ।।
कहा देउ कैलास निवासी । उमा दई करि राखौ दासी ।।
देवन हिमिगिरि देखि अधीना । कहा कि गिरि तुम सर्वसु दीना ।।
शिव गिरिजा पद पूजि सुकाजा । आयु ते भयसि गिरिन के राजा ।।
दोहा - 33
जग कीरत कुल की विरधि कन्या रतन जगाद ।
तीन रतन शिव कौ मिले हिमिगिरि तोर प्रसाद ।।
तव कर जोरि कहा गिरि राया । विनती सुनहु देव समुदाया ।।
सेवक समुझि दया अव कीजै । होव प्रसीद अचल वर दीजै ।।
हरि महेश तीरथ सब देवा । अंसन इहनि बसौ निरभेवा ।।
निवसे तह सब तीरथ सुरगन । तपोभूमि हिमिगिरि बदरीवन ।।
केशव अंश बदरि नारायण । आश्रम देखि सकल तारायण ।।
भये केदार नाथ शिव अंशा । तेहि परसे पावन जन वंशा ।।
उत्तर काशिक तीर्थ विभागा । विष्णु प्राग लगि देव प्रयागा ।।
सहित विरंचि देव मुनि बृंदा । बसे हिमालय सहित अनंदा ।।
दोहा - 34
विधि सुरेश लगि देव मुनि सर सरिता समुदाय ।
शिवदयाल तीरथ सकल हिमिगिरि निवसे आय ।।
शंभु गये तब हिमिगिरि गेहा । मैना गहि पद सहित सनेहा ।।
शिव से कहि तन दशा विसारी । पारवती मोहि अधिक पिआरी ।।
छमा योग चित दोष न धरिऔ । दासी जानि दया नित करिऔ ।।
यह कहि मंडप गूंथि खुलाई । मृदु पंचामृत दयेसि जिमाई ।।
शंकर सास ससुर परितोषे । चले विदा हुई शिव सुख लेखे ।।
सारद मैना वोलि कुमारी । ममता सहित गोद वैठारी ।।
नारि धर्म सुचि लगी सिखावन । पतिव्रत कर्म अछै सो पावन ।।
तासु शतांश सती कर धर्मा । तहि दशांश उत्तम कुल कर्मा ।।
दोहा -35
पतिव्रत धर्म अगाध गुण सुखदायक सब काल ।
विनु श्रम भव सागर तरै पति सेवत शिवदयाल ।।
उमा करेउ नित पति पद पूजा । तिहि समान फल त्रियहि न दूजा ।।
गवरि भई तुम परम सुभागी । कहि अंचल मुख पोछन लागी ।।
भरे सनेह नयन युग नीरा । करै विलाप सु धरै न धीरा ।।
जननि सप्रेम सनेह निहारी । कहै परसपर सब पुर नारी ।।
किहि कारण विरची विधि वामा । पराधीन पर वस विसरामा ।।
अस कहि मात सुता पुर नारी । पुलकि प्रेम भरि नैनन वारी ।।
सगुण समै रहै पलकन अंका । यथा कृपन धन पारस रंका ।।
दोहा - 36
आशिष दै सब सुर बधू सादर शीश नवाय ।
नारि बृन्द सब नीति कहि गिरिजै धर्म सिखाय ।।
बहु विधि कहि मरजादा सेतू । विदा करे गिरिजा बृष केतू ।।
चले बृषभ चढ़ि शंकर आछे । गवरि लजाति चली पद पाछे ।।
उमा पयादेहि लखि हिमराजा । वाहन सिंह दये करि साजा ।।
चली गवरि चढ़ि शंकर साथा । सकल सुरन तव नाये माथा ।।
करि विनती सुर वारहि वारा । चहत तारकासुर निरधारा ।।
शिव आयसु लै देव समूहा । चले भवन संग सेवक जूहा ।।
करत प्रशंशा सब मन मांही । शंम्भु उमा पटतरि कोउ नांही ।।
खेद सकल देवन मन माहीं । तारक वध विनवै शिव पाहीं ।।
दोहा - 37
गये गन्ध मादन लग सकल पठावन हेत ।
शिव गमने कैलाश गिरि लै गण गौरि समेत ।।
छंद
तेहि काल हिमंचल हेरि रहे । यदि मोह विछोह न जात सहे ।।
सिगरे मिलि वाजन शव्द करैं । अन मंगल जो न सुनाय परै ।।
दय आशिष शंभु प्रणाम किये । करि नेह सवहि पलटाय दिये ।।
दय दायज शैल प्रनाम करे । जग जन्म कृतारथ मानि फिरे ।।
सत आशिष देय चले धर कौ । फिर हेरि रहे गिरिजा हर कौ ।।
गमने गृह शैल समाज लये । शिव पारवती कैलाश गये ।।
हर गौरि विवाह जो गावै सुनै । दुख दोष नसै अधओध धुनै ।।
यह रोगी सुनै सब रोग नसैं । मन योगिन के जगदीश वसैं ।।
दोहा -38
सुमिरै जो करि कामना गवरि महेश विवाह ।
शिवदयाल पावै सवै नित नव अंग उछाह ।।
छंद
यदि रंक सुनै धन धाम लहै । बंध्या सुत लाभ जो नेम गहै ।।
व्रत बन्धु विवाह कहै कि सुने । कछु होय न खेद विनोद घने ।।
मख मंगल आदि सुनै कि कहै । सब काज मनोरथ पूर लहै ।।
रण युद्ध विवाद मैं जीत सरै । शिव दयाल कहै शिव सत्य करै ।।
गिरि दावानल यदि जाय परै । घेरत वन बाध पढ़े उवरै ।।
तरणी परि भौर जहाज भ्रमै । भ्रम सोच मिटै जु कथा चिरमै।।
विपदा दुख संकट शोक परै । सुनि गाय कथा सवसे निवरै ।।
करि नेम कथा पर चित्त धरै । नर मुक्ति लहै भव सिन्धु तरै ।।
दोहा - 39
गिरिजा शंभु विवाह गुण सुनै कहै धरि ध्यान ।।
शिवदयाल सब कामना पुरवै शंभु सुजान ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद अष्टमोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
मैना सुनौ तत्व शिव एका । वोध भेद तौ वस्तु अनेका ।।
सारद शेष न जानहि भेदा । तत्व वस्तु शिव सम्मत वेदा ।।
भृम वश जथा खंभ जन रूपा । लखि पहिचानत खंभ अनूपा ।।
जेवरि भरम सरप शंकाशा । देखि सीप मैं रजत अभाशा ।।
प्रघटत ज्ञान जून कर जूना । सीप कि सीप छुटे भ्रम दूना ।।
जिमि नटनाटक भेष वनाई । छल छूटत एक रूप दिखाई ।।
चामी कर भूषण वहु भांती । पावक परसि होत एक जाती ।।
एक अंग अंवर विधि नाना । तिमि शिव के वहु रूप निधाना ।।
दोहा - 1
धन सुत दारागार मम बन्धन माया फंद ।
काम क्रोध मोह गत शिव पायेसि आनन्द ।।
मै और मोर तोर यह बन्धन । अहंकार गत शिव फिरि दुंदन ।।
यथा विराग राग दुय भांती । तथा प्रकृति संजोग सुजाती ।।
प्रकृति से परे ब्रह्म शिव सोई । सगुण रूप सबके हित होई ।।
चन्द्र मुकुट कैलास निवासी । जासु कृपा लगि सम गति काशी ।।
यहि प्रशंशि मम डोलत भाला । गिरी करण मणि गई पताला ।।
मणि कर्णिका विदित जग मांही । जेहि मजत कछु दुरलभ नाही ।।
हम सब सो शिव तत्व न जाने । तुम शिव से औगुण अनुमाने ।।
तजि अज्ञान सगुण शिव जानी । भामिनि अरपहु भवहि भवानी ।।
दोहा - 2
सजि आरति मंगल करण बर परछनि करि लेउ ।
भुवन चारि दस जस रहय उमा शंकरहि देउ ।।
मैना तुम शिव रूप न जाना । शिव कोमल कृपाल भगवाना ।।
मैना उर प्रवोध तव आबा । उठि ग्रह आंगन चौक पुराबा ।।
सकल मंगला चार कराये । पितर न्यूति ग्रह देव पुजाये ।।
समय सु जानि हिमंचल आये । सामिग्री वहू शिव पह लाये ।।
सफरि पीन पाठीन पुरानी । कामर कलश कहारन आनी ।।
हिमगिरि वर बरात क्रम धारे । पद पखारि आसन वैठारे ।।
करि मधुरस गंगोदक पाना । पौन प्रजहरु सकल समाना ।।
वहु व्यंजन पकवान मिठाई । सवहि सप्रेम परोसि जिमाई ।।
सोरठा - 3क
पाहुन प्रजा समेत वर वरात कौ छकित करि ।
नाम पौनछक देत शिवदयाल तब से विदित ।।
3-ख
पावन कुल गुरु पाहुने महिमा ते महिमान ।
वर के रात वरात सम परिजन प्रजा सुजान ।।
वर के रच्छ्क विसद वराती । सेवक सकल प्रजा वहु भांती ।।
हिमगिरि पाहुन प्रजा छकाये । तवहि पौन छक नाम कहाये ।।
गंगाजल सब कह अचवाये । विनै सुनाय वहुरि धर आये ।।
पठयसि शिव सौभाग चढ़ायो । वाजन वजन सुआगन आयो ।।
दहि गल युग दध्यंग लै आये । आतुर वरण वरिउना लाये ।।
चादरि सुभग चन्द्र विरमायेउ । भवन बशिष्ठ प्रतिष्टि पठायेउ ।।
तब सखि उमै उवटि अन्हवायेउ । सुभग सुमन श्रंगार करायेउ ।।
माथ मयूर सिखावलि सोहे । माग मालती मन्जुल गोहे ।।
दोहा - 4
सिर कपोल गुंदि वंदिआ सोभित हर श्रंगार ।
भाल तिलक सूरजमुखी मौरसिरी उर हार ।।
करण फूल करणारुण दंपा । कमल करणिका शोभित कुंपा ।।
करण केतकी माधवि माला । चन्द्रहार चांदनी विशाला ।।
सुभग नाग केशरि नक वे सरि । संधि सेवती को सिंगार करि ।।
वेली गुद वाजू बन्द बन्धन । चंपक चूड़ी कंज कर कंकन ।।
भुज मंदार हाथ हथ कंदर । कुमुद कन्ठ पाउरि पग सुन्दर ।।
मुरबा नूपुर नवल निवारी । चरण चमेली विरचि विचारी ।।
येहि विधि करि श्रंगार नवेली । चारु चौक लय गई सहेली ।।
तह विरंचि कुल रीति कराई । अरचन भेद विधान वताई ।।
छंद
प्रथम कलश गणेश वरुणौ गवरि शिव अरचाय के ।।
अरचि गवरि कुमारि कर सिंदूर मांग लगाय के ।।
रच्छ वन्धन चुनरि सिरधरि धूषन पट पहिराय के ।।
शिवदयाल खरजूर अंजलि गोद रतन भराय के ।।
दोहा- 5क
सनक सनंदन सनातन जेठे सनत कुमार ।
माया निरमित चूनरी सिरधरि चतुरंग सार ।।
सोरठा -5ख
त्रै गुण खौरि लगाय दुयज चन्द्र सिर तिलक दय ।
उमा हाथ पहिराय नवग्रह निरमित नवग्रही ।।
दुज वाजु बन्द वायस दाना । रूद्र अंस राजत निर्माना ।।
शेष रचित सुन्दर मणि माला । विधि गिरजै पहिराय विशाला ।।
मणु कलिपत दय चौदह चूरी । सात रिसिन सिर धरी खजूरी ।।
शंभु शक्ति दुय दल समुझाये । कंचन मणि चरू धौल मिलाये ।।
वागर थालो विधि कर बाई । पारबती परमेस मनाई ।।
विरचि कुवेर कणक पुटमोदा । सघन फूल फल धरि भरि गोदा ।।
पावक रिचत बसन पहिराये । फिरि शिव गण जनवासे आये ।।
जाबक दै सिर चूनरि साधे । युग पूरनि पट कंकन वाँधे ।।
दोहा-6
गिरिजा उठि मंदिर गई, करै वेद कुल रीति ।।
निमे देव देखत उमै, विधि से यह पर तीति ।।
कन्या के तन त्रय वसत चन्द्र अनल गंधर्व ।।
रजकी कर सिंदूर तद, माँग भरावत सर्व ।।
चंद्र मुखी त्रिय नाम कलापा । चूमत पुरूष देत शशि सापा ।।
वसि गंधर्व पयोधर सर्बा । मरदै मनुज सपै गंधरवा ।।
पावक वसत नारि भग अंगा । दहै देह पति करत प्रशंगा ।।
तद रजकी सिंदूर लगावै । तजैं देव तब त्रियजन भावे ।।
तदपि करै अति संग सुहावै । तौ ततकाल जुगल फल पावै ।।
शंभु हुहा बहु निरत प्रकासे । होय विविधि मंगल जनबासे ।।
तिहि औसर तह नारद आये । कुशल पूछि शिव निकट बुलाये ।।
सुनि मुनि के उर आनन्द छाये । शिवै प्रवोध करण मन लाये ।।
दो-7
हरण हेत मैना मन खेदा । दुलहा वनौ विवाह विभेदा ।।
तुनहु नाथ गौरव गुण गाता । धरहु रूप सुन्दर सुर त्राता ।।
कोमल गौर किशोर मनोहर । भक्त वत्स कर वर गंगाधर ।।
जगमोहन अति सुंदर रूपा । वनौ विशाल विशेष अनुपा ।।
गिरिजा मन विनयै तिहि काला । सुभग स्वरूप धरौ शशि माला ।।
शिव नारद की सुनि मृद बानी । अरू गिरजा मन की गति जानी ।।
का बरसा कृषि सालि सुखाने । काल बिहाय कहा पछिताने ।।
अस बिचारि हर भेष बनाये । सहस चन्द्र रवि रूप दिखाये ।।
दोहा-8
तब मैना पै जाय के, नारद कह समुझाय ।।
अब देखौ शिव रूप गुण, कोटि काम अधिकाय ।।
जटा मुकटफड़ि मौर विशाला । नयन तीन दूसर शशि भाला ।।
गौर फटिक मुख पावक रोचक । गोल कपोल मदन मद मोचन ।।
चिवुक चारु सुन्दर वर नासा । रदन पांति तारका प्रकाशा ।।
विम्वाधर वर कुन्डल कानन । पूरण चन्द्र प्रकाशत आनन ।
मुख प्रशन्न त्रिवली उर सोहा । नाभि गम्भीर निरखि मन मोहा ।।
रुद्र अचछि उर श्यामल माला । नाग विभूषन केहरि छाला ।।
कर त्रिशूल वर अंग विभूती । नील कण्ठ शुभ ठमरू संजूती ।।
बाहन बृषभ सुगन्ध लगाये । शिव सुन्दर वर भेष वनाये ।।
दोहा - 10
वर वरात साजत सकल शिवदयाल निज भाग ।
शंकर उमा विवाह सुनि मन उमगत अनुराग ।।
जानि सुअवसर समय सुहाये । शिवय हिमंचल वोलि पठाये ।।
सब सुर मुनि शिव संग सिधाये । सुन्दर सुभग रूप धरि आये ।।
वाहन विसद अनेक प्रकारा । सकल रूप धरि चले अपारा ।।
शिव गण लये अनेक पताका । वहु विधि करैं देव सब साका ।।
गज तुरंग रथ पादप नाना । वाहन अखिल अनेक विमाना ।।
ढोल दुंदभी भेरि उपंगा । उफरा वीणा बेणु म्रदंगा ।।
शहनाई बांसुरी सुर साला । झांझ पखावज औ करताला ।।
धेनुमुखा सहरगि सैतारा । अनहद घन्ट शंख ध्वनि धारा ।।
सोरठा- 11क
करहि अप्सरा गान विविध भांति बाजा बजहिं ।
विरदा वली विमान देव सुमन वरषा करहि ।।
11ख
होत अनेक विधान कौतुक हिमगिरि द्वार मय ।
बरनै कवि को आन सारद शेष न कहि सकै ।।
दोहा 11ग
सागर उद बेलास रिस शिव की देख वरात ।
अगम जानि मैना मगन हर्ष न ह्रदय समात ।।
उमग तरंग अंग मै बाढ़ी । चित्र लिखे सम रहि गई ठाड़ी ।।
पुनि मैना मृदु वचन उचारे । सुता जनम धनि भाग हमारे ।।
धन्य उमा धनि परवत राजा । कहि लजान लखि शम्भु समाजा ।।
अगिले सोच सकुचि मन मांही । लगि कालिमा कहत कछु नाही ।।
तब लगि शिव आये गिरि द्वारे । मयना मंगल थार सम्हारे ।।
विधि हरि हरै पूजि गुण जाने । आरति कर सुर मुनि सनमाने ।।
सो सुधि पाय नगर नर नारी । आये सब गृह काज विसारी ।।
बहुत नारि सुत सुता समेता । चली दरस हित शम्भु निकेता ।।
दोहा -13
वाल विरध सुर मुनि मनुज चारि वरण सब जाति ।
शिव दरसन आये सकल धन धन सो शिव राति ।।
जै शिव कहत देव मुनि वृन्दा । रहो भवन भरपूरि अनन्दा ।।
फागुन मास असित शशिवारा । शिव चौदस निसीत अवतारा ।।
शिव को रिषिन जन्म दिन जाना । मंगल कारज वरजित माना ।।
पुनि रवि संग चन्द्र छय देखा । वर्जित करे विवाह विशेषा ।।
देव दिवस षट मास प्रमाना । उत्तरायण सूरज सम जाना ।।
तितनिय देव निशा परकाशा । दक्छिणायण सूरज षट मासा ।।
वीते दिवस देव निसि आई । कर्क सिंह रवि रासि विहाई ।।
पितरण पच्छ पितर दिन मानी । पूजि विसर्जि पितर निसि जानी ।।
दोहा - 14
आश्विन महिना पच्छ सित शिव सेवा मनलाय ।
परिवा ते आरम्भ करि आठ दिवस निसि पाय ।।
सूर्य चन्द्र शिव संग वराती । भयो मास षट दिन सोई राती ।।
गवरि विवाह द्वार शिव आये । देखन पुर नर नारि सिधाये ।।
अपर स्वामि सेवा तजि धाई । पति संगति अनेक तजि आई ।।
कोउ विपरीत विभूषन चीरा । बालक तजे पिअत अध छीरा ।।
वहुतक सखी संग लै धाई । कोउ रसना वन्धन युत आई ।।
कोउ आई तजि गृह परिपाका । कोउ अंजन कर गहे सलाका ।।
कर आदर्श लये वहु धाई । कोउ गो दोहन तजि विलगाई ।।
चली सकल तजि कारज नाना । शिव लखि मोही जग पति जाना ।।
सोरठा- 15क
तन की दशा विसारि जढ़वत भई अचेत सब ।
भाग सराहे नारि शिवहि देख आनन्द मन
दोहा 15 ख
मौन रही सब एक छण पुनि बोली हरषाय ।
धनि गिरिजा वड़ भागिनी शिव देखे जिहि पाय ।।
कहैं परस्पर सब सुख माही । पुन्य पुन्ज हम सम कोउ नाही ।।
यथा नाम शिव तस गुण रूपा । गुण सरूप सम नाम अनूपा ।।
सुने श्रवण तस आंखिन देखे । सफल जन्म हम आजु अलेखे ।।
बानि अचच्छु नयन विन जीहा । शिव दरसन को कहे समीहा ।।
हिमगिरि पुरवासी सब आये । भाव जोग शिव दरसन पाये ।।
यथा योग करि विनय प्रणामा । कहै सकल परिपूरन कामा ।।
धनि गिरिजा शंकर वर पाये । अजर अमर सब भांति सुहाये ।।
तिहि औसर जिन शंभु न देखे । भानु उदय जनु उलूकलेखे ।।
दोहा - 16
गिरिजा दारुण तप करे पाये अचल सुहाग ।
अहो भाग हम सवन के शिव देखे जिहि भाग ।।
विनि सुभाग पति मिलै न सुन्दर । पापा ते लाभ कुटिल खल किंकर ।।
भाग विना सुभ मिलै न दुलही । दोष ते होत नारि खल कलही ।।
विना भागसे मिलै न अस वर । यथा रमै हरि गिरिजै शंकर ।।
अस कहि सब दल दुर्वा लाये । शिवै अरचि फल फूल चढ़ाये ।।
धन्य धन्य शिव जयति पकारैं । चन्दन अछत फूल सिर छारैं ।।
सात कुम्भ घट कलश धराये । झालर वन्दन वारि बन्धाये ।।
कुंकुम दूर्व अछत कुश धारे । अरचो शिवय हिमंचल द्वारे ।।
अन्तर पमर शम्भु तब आये । मैना कंचन थार सजाये ।।
दोहा -17 क
मणि माणिक आरति रची सुरभी धृत आघाय ।
वरती विशद कपूर की चौमुख दीप जगाय ।।
17ख
मैना भूषन वसन धरि करि सोरह श्रंगार ।
सखिन संग लै शंभु पह गै वर परछन द्वार ।।
देवन गरल कंठ शिव लेखे । कहै कि काहुन अवहि न देखे ।।
लखि मैना विरचै भय मानी । नीलकंठ लग चादर तानी ।।
तवसे अन्तर पट न दिखाबै । कमल रोचना सकल कराबै ।।
देखि रूप सुन्दर मद नारी । तव मैना आरती उतारी ।।
करि रोचना हास करि हरषी । गहि बाधिवर कर आकरषी ।।
फणि फुफुकार शंभु कर व्याला । भाजि गिरी गिरिनारि विहाला ।।
लोटि हसै सुर मुनि लगि थोभा । हंसय नारि मैना मन छोभा ।।
दसन जीह नारद विधि चांपी । सुर मुनि मौन उमा तन कांपी ।।
दोहा-18
प्रथम हिमंचल वेदिका, राखी रूचिर बनाय ।।
हरित बामस मणडप रचे, पान उसीरण छाय ।।
बमदन वारि कदलि युग खम्भा । माँझ सविधि वेदिका अरंभा ।।
सीप जनित यदि तिर्जग होती । तिनसे चतुर कहै गजमोती ।।
झुंपक झालरि शोभन दायक । बर्तुल बेसरि कुंडल भायक ।।
गज मुक्ता गज केशर होई । धात्री फल सम दुर्लभ सोई ।।
गजसिर मुक्ता ब्रणव है नीरा । सिहहि सुलभ सुगंध समीरा ।।
मान सरोवर मुक्त मगाये । तंदुल सम सितलंव सुहाये ।।
तिन गज मोतिन चौक पुराये । तब मंडप समीप शिव आये ।।
गजमुक्ता तंदुल अनुभावै । तेहि जब तंदुल चौक पुरावै ।।
दोहा-19
तब हिमिगिरि मैना सहित. करि मज्जन अस्नान ।।
आये मंडप निकट सद, ग्रथं जोरि कर गान ।।
हिमगिरि शिवै अरचि बैठारे । पुनि विष्टर दै चरण पखारे ।।
तद विरंचि बरणे मुनि चारी । रिगु, यजु, साम, अथर्वणधारी ।।
चारिउ श्रुति शरीर धरि आये । वेद ऋचा निज निज मुख गाये ।।
शिव सनमुख बैठे गिरिभूपा । मयना दाहिन अंग अनुपा ।।
अरध देय पुनि विषटर छाये । शिव कौ हिमि आचमन कराये ।।
तब हिमि गिरि मधुपर्क मगायेउ । वर कर दै तिन मंथि मिलायेउ ।।
अनामिका अंगूठा शिवजोरी । दधि अर्पण चंदमै करोरो ।।
उभै पच्छ अघ दोष नसावन । मिले होत मधु पर्क सुपावन ।।
दोहा-20
त्रिपल धेनु दधि सर्करा, दुय पल धृत पल एक ।।
शिवदयाल मधुपर्क तद, पावन मंत्र विवेक ।।
शिव सो दयेसि हिमाचल हाथा । लै मधुपर्क नाय पदमाथा ।।
सो शिव कौ मधुपर्क दिमाये । सादर दुय दुकूल पहिरकये ।।
अंग न्यास तब शिवहि कराये । वाक प्राण दृग बल उपजाये ।।
गौर मंत्र महि खड़ग दयोरी । पाप ताप सब त्रिन सम तोरी ।।
युगुल बसन ते उमै धराये । चंद्र मुखिन मृदु मंगल दाये ।।
तद विरंचि सब कृत्य कराई । गवरि बुलाय चौक पर आई ।।
उमा संमजन शिवदिसि देखी । पहिरायेसि जयमाल विशेषी ।।
सखिन सैन करि उमा हंकारि । शिव सनमुख बुलाय बैठारी ।।
दोहा-21
प्रथम ऋषीसन साखि उचारी । शिव हरि विधि शिव सुत भ्रमकारी ।।
उमा पक्ष पुनि मुनि धुनि धारी । मरिचिय कश्यप हेम कुमारी ।।
तद भूधर दक्षिण दिसि आये । उत्तर मुख मैंना दिसि दायें ।।
शिव गिरजा के चरण पखारे । भाल तिलक सिरमाल सुधारे ।।
पीत पाणि पुनि गवरि कराई । पंच रतन फलकर धरवाई ।।
हिमि गिरी गहि कुस कन्या पानी । शिवहि समर्पी उमा भवानी ।।
मैना हिमगिर भवन सिधाये । नारिन मंगलचार सुनाये ।।
गिरजा शिव दाहिन दिसि आई । ग्रथ वांधि विधि कृत्य कराई ।।
दोहा - 22
पंचाहुत करि उमा शिव पूजे गवरि गणेश ।
आदि देव आविचल सदा हारक हानि कलेश ।।
सो सुनि जनि कोउ करै अंदेशा । अगम अनादि अनन्त गणेशा ।।
संजुषि अनल अवाहन कारी । विधि वेश्वानल पघट प्रजारी ।।
पथमै करि परिकरमा एका । त्रिविध होम सुर साखि अनेका ।।
प्रति लाजाहुति गवरि अगारे । त्रय परिकरमा उमा शिव कारे ।।
गिरिजा कर कंकण मणि शीशा । थकित चरण लखि छाह गिरीशा ।।
वंदी करण वंदना लागे । चकित देव आये शिव आगे ।।
येहि विधि भये परिक्रमा चारी । पचई भामरि शिव पगु धारी ।।
उमा भई तिहि समत पिछारे । मंडप सहित परिक्रमा कारे ।।
दोहा - 23
पुनि आसन पै उमा शिव वैठि यथावत आय ।
उमा मुदित आनन्द शिव हर्ष न ह्रदय समाय ।।
शिव कालहु का काल महेशा । निस दिन डरपहि काल कलेशा ।।
अंतर पट शिव उमै कराये । डरपि काल छिपि आहुत पाये ।।
सात पुरी पद पुरण वसाये । उमा चरण पुनि सिला छुआये ।।
पद अंगूठा लखि विधि के भर्मा । भये मदन वस विसरे धर्मा ।।
पतन काम पद चापि अधारा । मथत कनिक ते भये कुमारा ।।
वटुक असंख्या ब्रह्म सूत्र वर । कच्छादुद दश सहस जटाधर ।।
विधि कौ नमस्कार करि हर्षे । तिनहि देखि विधि पै शिव मर्षे ।।
शिवहि सकोप देखि मुनि देवा । सहित विरंचि करै सब सेवा ।।
दोहा -24
विधि सुरसरि शंकरै मिली हरष सो आय ।
शिवदयाले शिव उमा भै राखी जटन छिपाय ।।
ते वटुका सूरज व्रत धारी । वेद पार गंता तप कारी ।।
रथ आगे पाछे वहु धावै । रवि कौ अस्तुति विनय सुनावै ।।
वहुरि विरंचि करे असनाना । पठत वेद शिव गिरा प्रमाना ।।
विधि विवाह विधि शेष करायेउ । रवि ध्रुव अवधि करी दर्शायेउ ।।
दाहिनि गवरि बाम त्रिपुरारी । कह शंकर सुनु शैल कुमारी ।।
भयेउ विवाह वाम दिसि आवौ । पावन तप श्रम शोक नसावौ ।।
कहेसि उमा शिव लखि सांकूला । नाथ आज विसरे सब सूला ।।
अब लग रही सु तात कुमारी । भइ अब शिव सेवकी तिहारी ।।
दोहा-25
जुग पावन मधुपर्क ते, मख पूरण विधि कारि ।
चले न पति के बामत्रिय, तब लगि पिता कुमारि ।।
दासी जानि दया नित कीजै । सात वचन शिव मांगे दीजै ।।
प्रथम बचन दाहिन बैठारी । करहु दान मख शषि मुरारी ।।
दुसरे व्रत चंद्रायान शीजै । शशि रवि शाखि संग मिलि कीजै ।।
तिसरे विधि हरि हर हर दै साखी । दीनहु पन पालव समराषी ।।
चतुर्थ साखि वेद दय चारी । मम कर धन संचय विवहारी ।।
पचये साखि लोक पति राचा । हमहि मत्रि पालौ पशु पाचा ।।
दय षट शास्त्र साखि मद नारी । असन वसन दीजौ रितूकारी ।।
सतये सात रिषिन करि साखी । छमौ दोष सखि अनमधि माखी ।।
दोहा-26
वचन दये शिव उमा उठि, शिव तद कहा सुभाउ ।।
पाच वचन अव हमहि दय, वाम अंग तव जाउ ।।
सात वचन करि अंगीकारा । उमै कहा शिव धर्म विचारा ।।
पर भरता पर गेह विहाई । तरणो विपिन अकेलि न जाई ।।
पुनि दुपहर निशीथ सो एका । वहिर न जाय विहाय विवेका ।।
उमा कहति पदि लगै जु आगी । प्राण वचावहि अकि तन त्यागी ।।
शिव कह जाय सु प्राण बचजाई । विपति काल मर जाद न जाई ।।
दूसरि चारि भाति मद त्यागी । सो शुभ लच्छणि पर्म सुभागी ।।
धन गज मद मदिरा तरूणाई । सनमुख षमय सखिन संग जाई ।।
तीसर वचन त्रियै तुखदाई । बिनु बोले पितु गेह न जाई ।।
दोहा-27
यदि बिन बोले पिता ग्रह, जाय प्रेमहित मानि ।।
रहै न आदर मान सुख, जस कीरति कुल कानि ।।
जदपि स्वतंत्र नारि अनुभाववै । हठ करि जाय सती गति पावै ।।
होय भ्रात सुत पति जगमाहीं । पट भूषण लय जाय कि नाहीं ।।
शिव कह लोभ लागि यदि जावै । तद न मान अपमान कहावै ।।
निज पति मूरख पंडित आना । त्रिय पति कीरति करै बखाना ।।
उमा कहा शिव शुभ कि खुटाई । व्यास गदी सब करत बड़ाई ।।
शिव कह व्यास वेद मम अंशा । धरम कथा सुनि करे प्रशंशा ।।
भरतु कुरूप कुचैल मलीना । पर पति भूषन बसन प्रवीना ।।
नारि धर्म पर प्रति अघ अंशा । दुलहा कहय करहि प्रशंशा ।।
दोहा-28
दुलहा कहे ते दोष अति, वर बोले सम जार ।।
समुझि नारि साधन करै, सदा धर्म उपचार ।।
त्रिय कौ पति व्रत धर्म सहाई । पति सेवा नित सहस बड़ाई ।।
तब गिरजा कह सुनौ महेशा । बहुरि कहौ यह शुभ उपदेशा ।।
तब बरकत यदि व्याहन आवै । पुर नर नारि पुकारत धावै ।।
सखि सुन्दर वर व्याहन आयो । अपर परसपर कहै बनायो ।।
कोउ कहै दुलहा अति नीका । सो शिव उचित कि बानि विलीका ।।
शिव कह उमा ग्राम बर आवै । दुलहा कहि के सब त्रिय धावै ।।
पति व्रत लखै न कहै न आवै । मध्यम निजसम योग जनावै ।।
सुत सम लघु समान सो भ्राता । दीरघ पितु समान गुण गाता ।।
दोहा-29
माथे मुकुट विवाह को, तब लौ अंश हमार ।।
दोष न दुलहा वर कहे, नारि लोक विवहार ।।
सवैय्याः-
यह उत्तिम नारि के चित्त वसय । मम कांत विहाय न दूसर कोई ।।
तस मध्यम देखि विचार करय । सुत बन्धु पिता सम दोष न होई ।।
कुलकानि कौ मानि बचै सो निकिष्ट । अधमा विनि औसर भै वसजोई ।।
शिव दयाल कहै शशिभाल हिमाल पै । सेवहि गौरि पती व्रत सोई ।।
दोहा -30
शम्भु गिरा सुनि प्रेम बस हर्ष न ह्रदय समाय ।
उमा सुअवसर पाय के वैठि वाम पिसि जाय ।।
उमा सुमंगल करि शिव पूजै । शिवहु मांग सेंदुर भरि कूजे ।।
विनि शिव उमा विवाह न होई । मूरति जुगल कि सिंदुरि सोई ।।
करि अभिषेक तिलक विधि हरषे । पठि धुनि वेद सुमन सुर सुर वरषे ।।
मुनि समूह बृन्दारक बृन्दा । आसिष देय सहित आनन्दा ।।
विनवै सकल जाति सुर सेई । नगर नारि नर आसिष देई ।।
वोले सुर मुनि विष्नु विधाता । जगत पिता शिव गिरिजा माता ।।
त्रिय उमंग मन मंगल गाये । नेगिन नेग निछावरि पाये ।।
शिव गिरिजा गिरि गेह सिधाये । मैना निज कुल देव पुजाये ।।
दोहा- 31
मैना मंगल रूप लखि दधि शर्करा मगाय ।
शिव गिरि जै लह कौर दय जेवत गारी गाय ।।
दीपक वरती शिव सुमिलाई । वहुरि विहसि मैना वलि जाई ।।
धेनु धरणि धन मणि गण चीरा । गज तुरंग रथ हाटक हीरा ।।
दय वहु दान विप्रवर तोषे । गायक जाचक सब परिपोषे ।।
तब शिव फिरि जनवासे आये । वोलि अपसरण नृत्य कराये ।।
वहुरि हिमंचल वोलि पठाये । सह बरात जिम नारहि आये ।।
शिव विरंचि हरि सब मुनि देवा । चरण धोय हिमिगिरि करि सेवा ।।
भोजन कह आंगन बैठारे । तीरथ परसै पाक सम्हारे ।।
बहु रस देय सरोवर झारी । सब सरिता मिलि गावहि गारी ।।
छंद
गारी मधुर सुर वधू गावै व्यंग बचन सुनावही ।।
होत कौतुक विविध मन्डप सुमन सुर वरषावही ।।
छप्पन भोग छतीस व्यंजन छरस अभृत जिमावही ।।
शिवधाल हिमिगिरि गेह धनि जह भोग देव लगावही ।।
येहि भांति नित पकवान मेवा सुरन प्रति सरसावही ।।
पांच अमृत परसि हिमगिरि सवहि मांथ नवावहीं ।।
अलक नन्दा उदक निरमल सवहि लै अचवावहीं ।।
शिवदयाल शिव जिमनार गावहि सुनै शिव पद पावहीं ।।
चौथे दिवस चतुर्थी करमा । शिव आये मखशाल सुधरमा ।।
विधि समधा फल फूल मंगाये । शिव समूह कुश बेदि बनाये ।।
गिरिजै सखिन मंजि अन्हवाई । करि सिंगार शुभ चौकय लाई ।।
धृत पायस विधि होम कराये । शेष पाक सह भोज सधाये ।।
सादर गिरिजा परसि जिमाये । पंच ग्रास शिव भोग लगाये ।।
पुनि जुठार शिव उमै गहाये । प्रेम प्रसाद गवरि हंसि खाये ।।
शिव गिरिजा कर कंकण खोले । कठिन सूत्र पट गांठि कठोले ।।
शिव कर नाग लपेटी उरझै । कंकण पारवती पै नहि सुरझै ।।
दोहा - 32 क
जूप कर्म करि उमा शिव फल विरंचि भरि गोद ।
शिव उठि जनवासे गये गृह गई उमा समोद ।।
32 ख
विदा चहै सकुचाय सब प्रेम प्रीत सरसाय ।
हिमिगिरि आये शंभु प्रति हर्ष न ह्रदय समाय ।।
उभै पच्छ सब नित अकुताहीं । मांगहि विदा धीर उर नाहीं ।।
हिमिगिरि विनै कहा कर जोरी । सफल करौ शिव सदन वहोरी ।।
अर्ध देय कर शिव सिर गंगा । का भूषण मणि बलय भुजंगा ।।
कहा तिलक शशि शीश प्रकाशा । देव सु कह आसन कैलाशा ।।
अनुचर धनद भेंट का दीजै । कवन भांति परिचरचा कीजै ।।
कहा देउ कैलास निवासी । उमा दई करि राखौ दासी ।।
देवन हिमिगिरि देखि अधीना । कहा कि गिरि तुम सर्वसु दीना ।।
शिव गिरिजा पद पूजि सुकाजा । आयु ते भयसि गिरिन के राजा ।।
दोहा - 33
जग कीरत कुल की विरधि कन्या रतन जगाद ।
तीन रतन शिव कौ मिले हिमिगिरि तोर प्रसाद ।।
तव कर जोरि कहा गिरि राया । विनती सुनहु देव समुदाया ।।
सेवक समुझि दया अव कीजै । होव प्रसीद अचल वर दीजै ।।
हरि महेश तीरथ सब देवा । अंसन इहनि बसौ निरभेवा ।।
निवसे तह सब तीरथ सुरगन । तपोभूमि हिमिगिरि बदरीवन ।।
केशव अंश बदरि नारायण । आश्रम देखि सकल तारायण ।।
भये केदार नाथ शिव अंशा । तेहि परसे पावन जन वंशा ।।
उत्तर काशिक तीर्थ विभागा । विष्णु प्राग लगि देव प्रयागा ।।
सहित विरंचि देव मुनि बृंदा । बसे हिमालय सहित अनंदा ।।
दोहा - 34
विधि सुरेश लगि देव मुनि सर सरिता समुदाय ।
शिवदयाल तीरथ सकल हिमिगिरि निवसे आय ।।
शंभु गये तब हिमिगिरि गेहा । मैना गहि पद सहित सनेहा ।।
शिव से कहि तन दशा विसारी । पारवती मोहि अधिक पिआरी ।।
छमा योग चित दोष न धरिऔ । दासी जानि दया नित करिऔ ।।
यह कहि मंडप गूंथि खुलाई । मृदु पंचामृत दयेसि जिमाई ।।
शंकर सास ससुर परितोषे । चले विदा हुई शिव सुख लेखे ।।
सारद मैना वोलि कुमारी । ममता सहित गोद वैठारी ।।
नारि धर्म सुचि लगी सिखावन । पतिव्रत कर्म अछै सो पावन ।।
तासु शतांश सती कर धर्मा । तहि दशांश उत्तम कुल कर्मा ।।
दोहा -35
पतिव्रत धर्म अगाध गुण सुखदायक सब काल ।
विनु श्रम भव सागर तरै पति सेवत शिवदयाल ।।
उमा करेउ नित पति पद पूजा । तिहि समान फल त्रियहि न दूजा ।।
गवरि भई तुम परम सुभागी । कहि अंचल मुख पोछन लागी ।।
भरे सनेह नयन युग नीरा । करै विलाप सु धरै न धीरा ।।
जननि सप्रेम सनेह निहारी । कहै परसपर सब पुर नारी ।।
किहि कारण विरची विधि वामा । पराधीन पर वस विसरामा ।।
अस कहि मात सुता पुर नारी । पुलकि प्रेम भरि नैनन वारी ।।
सगुण समै रहै पलकन अंका । यथा कृपन धन पारस रंका ।।
दोहा - 36
आशिष दै सब सुर बधू सादर शीश नवाय ।
नारि बृन्द सब नीति कहि गिरिजै धर्म सिखाय ।।
बहु विधि कहि मरजादा सेतू । विदा करे गिरिजा बृष केतू ।।
चले बृषभ चढ़ि शंकर आछे । गवरि लजाति चली पद पाछे ।।
उमा पयादेहि लखि हिमराजा । वाहन सिंह दये करि साजा ।।
चली गवरि चढ़ि शंकर साथा । सकल सुरन तव नाये माथा ।।
करि विनती सुर वारहि वारा । चहत तारकासुर निरधारा ।।
शिव आयसु लै देव समूहा । चले भवन संग सेवक जूहा ।।
करत प्रशंशा सब मन मांही । शंम्भु उमा पटतरि कोउ नांही ।।
खेद सकल देवन मन माहीं । तारक वध विनवै शिव पाहीं ।।
दोहा - 37
गये गन्ध मादन लग सकल पठावन हेत ।
शिव गमने कैलाश गिरि लै गण गौरि समेत ।।
छंद
तेहि काल हिमंचल हेरि रहे । यदि मोह विछोह न जात सहे ।।
सिगरे मिलि वाजन शव्द करैं । अन मंगल जो न सुनाय परै ।।
दय आशिष शंभु प्रणाम किये । करि नेह सवहि पलटाय दिये ।।
दय दायज शैल प्रनाम करे । जग जन्म कृतारथ मानि फिरे ।।
सत आशिष देय चले धर कौ । फिर हेरि रहे गिरिजा हर कौ ।।
गमने गृह शैल समाज लये । शिव पारवती कैलाश गये ।।
हर गौरि विवाह जो गावै सुनै । दुख दोष नसै अधओध धुनै ।।
यह रोगी सुनै सब रोग नसैं । मन योगिन के जगदीश वसैं ।।
दोहा -38
सुमिरै जो करि कामना गवरि महेश विवाह ।
शिवदयाल पावै सवै नित नव अंग उछाह ।।
छंद
यदि रंक सुनै धन धाम लहै । बंध्या सुत लाभ जो नेम गहै ।।
व्रत बन्धु विवाह कहै कि सुने । कछु होय न खेद विनोद घने ।।
मख मंगल आदि सुनै कि कहै । सब काज मनोरथ पूर लहै ।।
रण युद्ध विवाद मैं जीत सरै । शिव दयाल कहै शिव सत्य करै ।।
गिरि दावानल यदि जाय परै । घेरत वन बाध पढ़े उवरै ।।
तरणी परि भौर जहाज भ्रमै । भ्रम सोच मिटै जु कथा चिरमै।।
विपदा दुख संकट शोक परै । सुनि गाय कथा सवसे निवरै ।।
करि नेम कथा पर चित्त धरै । नर मुक्ति लहै भव सिन्धु तरै ।।
दोहा - 39
गिरिजा शंभु विवाह गुण सुनै कहै धरि ध्यान ।।
शिवदयाल सब कामना पुरवै शंभु सुजान ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद अष्टमोअध्याय ।।।
सत्रहवां अध्याय
।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद सप्तमोअध्याय ।।।
।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
मरछा गत सम्हार उर आई । क्रोध तरंग अंग अधिकाई ।।
विकसे कंज नयन अरुणारे । कंटक जो कटु वचन उचारे ।।
मैना कहति सुनौ मुनि ज्ञानी । प्रथम कही तुम्हहू छलसानी ।।
गिरिजै कंत मिले शिव शंकर । हेम तुंग तप करे निरंतर ।।
सो सुनि उमा कठिन तप साधे । करे नेम जप शिव अबराधे ।।
दये तासु फल विधि भयदायक । शिव पाये पति प्रेत सहायक ।।
कौन उपाय करब येहि राती । यह दुख निवरै मुनि केहि भांती ।।
जरय मातु अरु सुता दुलारी । जद अजोग वर लहै कुमारी ।।
दोहा -1
खल जड़ मूरख छोट बड़ वृत्ति हीन तन छीन ।
सुता न ये तिन बरयगुण रूप शील कुल हीन ।।
तजि रोगिल मद अंध अदीपा । ना अति दूर न अधिक समीपा ।।
वर सुंदर पुर देश बड़ाई । शीलवंत पर सभा सुहाई ।।
गुण से सुख संपति निरलोभा । विदित दशौ दिशि कुल की शोभा ।।
नारद कपट नारि उर दोषा । अन्तर पर घर गमन सरोखा ।।
पग तरजनी से अगूठा हीना । थूल केश वड़ मान मलीना ।।
जे विधवा गुण गान कलेशा । योग दरिद्र सकल तन केशा ।।
वड़े श्रवन रद नाद गंभीरा । वहु भच्छिन सुभाव निरधीरा ।।
कटुवादिन यह मिति आदेशा । सो त्रिय दायक सवहि कलेशा ।।
दोहा -3
रिषिय तने हमकौ छलो कपट चातुरी जोय ।
कांच संग्रही कनक तजि धीरज का विधि होय ।।
तजि सूरज खद्धोत उदोपी । चंदन छांड़ि कदमा थोपी ।।
कन भक्छे तजि तंदुल पायस । तजे हंस गहि पिंजर वायस ।।
सुरसरि तजि कूपोदक पाना । तजि धृत अंड तैल भ्रग साना ।।
सिंह विहाय के सेव श्रंगाला । तजि पीतांवर लै मृगछाला ।।
तजि विभूति ग्रह मख रुचि संगा । मर्दन चिता भसम सब अंगा ।।
उमा तपी सुर तजि शिव हेता । घिग वे रिषि धिग वुद्धि विचेता ।।
धिग कुलक्रिया दाच्छि तपतुच्छा । धिग तनधन ग्रहधिग ममकुच्छा ।।
हिमगिरि ओर न मुख दरशावौ । सप्त रिषिन का वदन दिखावौ ।।
दोहा- 4
अब कह नारद सांच तुम सबके पिता महेश ।
तिनहि बिबाहौं का कुंअरि यह अयोग उपदेश ।।
कह नारद सुनु देवि अजीता । वचन कहे तुम सो विपरीता ।।
जगत पिता शिव सब सामरथा । वाल न विरध न जुवान न विरथा ।।
तव मैना कह सुनु मुनि गारी । शिवहि बिबाहन कही कुमारी ।।
रहि न वांझ मैं तन कनजाता । गरभ न गिरा न भा अपघाता ।।
वाध सिंह वन गये न खाई । असुरण का सन कौ न विहाई ।।
डसी न सरपन हती न काला । यह सुख देखन हेत हिमाला ।।
डसी न सरपन हती न काला । यह सुख देख न हेतहि माला ।।
गिरि ते गिरौ करौ तन छारा । कै सिर छेदि उभैअ सिधारा ।।
मै कह करव सुता कह जाई । कहि हा दैव गिरेसि मुरछाई ।।
दोहा - 5
मैना वचन विषाद सुनि खेद सकल संसार ।
सुनत नारि नर नगर के आये हिमगिरि द्वार ।।
तब सो सुनि विरंचि तंह आये । आंगन मंगल पितर पुजाये ।।
सात ऋषभ तिलवाय सुलाये । सात सुभागिन उमहि चढ़ाये ।।
हरसित मंगल गावहि नारी । देय मधुर सुर सुन्दर गारी ।।
सुनि गिरिनाथ मोद मन धाये । पूजि पहुनई करि लोटाये ।।
पलटि रिषय मैना पह जाई । करत हिमालय सहस वड़ाई ।।
नारद मैनहि वोधि उठायउ । कहि मृदुवानि रिषिन समुझायेउ ।।
शिव पर तोहि वहुत अज्ञाना । रूप जथावत नहि पहिचाना ।।
कह मैना अब रिषि फिर आये । करि दुर्वोध ह्रदय मद छाये।।
दोहा - 6
देखत महा विकार विघि कह मैना सुन वैन ।
देवन कारज तोर हित सुख देखौ भरि नैन ।।
शिव करता पालन संहरता । किमि सुख लहौ न जानौ धरता ।।
सुनि विधि गिरा कही पुनि मैना । बृथा कहो किमि कारज वैना ।।
जदपि महा सुन्दर शिव रूपा । तदपि न लायक उमा अनूपा ।।
तिहि अवसर आये सब देवा । इन्द्रादिकन कहेउ निज भेवा ।।
शिव सर्वेश सकल जग धारक । हम सब शिव के आज्ञाकारक ।।
देवन अखिल सुखद शिव शंकर । सकल सुफल तब सुता निरंतर ।।
हम सब धनि पावन गिरि धरणी । धनि हिमगिरि धनि तोरि सुकरणी ।।
धनि तब सुता सवै अध परसनि । उठि के करव द्वार वर परछनि ।।
दोहा -7
मैना देवन वचन सुनि कह सवहि कर मेष ।
देव न उमा कुरूप शिव जले अमंगल रूप ।।
सप्त रिषिन तब कहा वुझाई । जगदम्विका गवरि तुम जाई ।।
उमा विवाहन जौ शिव आये । तुम प्रताप हम दरशन पाये ।।
हठ तजिके अरचौ शशि भाला । करहु विशाद न मंगल काला ।।
उठि अरचहु शिव शाला आये । परम लाभ शिव दर्शन पाये ।।
दानपात्र शिव हिमगिरि दाता । देउ संग मिलि सुजस बराता ।।
अहो भाग शिव आयेसि द्वारे । करौ सगुन शुभ मंगल भारे ।।
मैना वचन सकोप उचारे । आब अशिव अब द्वार हमारे ।।
नारद वचन तजौ मरजादा । शिवय न देव गवरि करिवादा ।।
छंद
गिरि कही विकल विलोकि वनिता प्रिया सोक जु परिहौ ।।
को कहन ते आये पमरि यह समुझि मन धीरज धरौ ।।
फूल फल दल विरचि आरति सगुण शिव अरचन करौ ।।
शिवदयाल उमा बिबाह मंगल सकल भामिन अनुसरौ ।।
दोहा- 8
हम जानत सरवज्ञ शिव सवै अनुग्रह देत ।
तजि विशाद शंकर भजौ उमा बिबाहन हेत ।।
सुनि मैना कह बचन विचारी । नाथ गवरि मुहि प्राण पिआरी ।।
उमा करे तप शिव अवराधी । गिरते गिरौ कंठ मंह बांधी ।।
मंगल ग्रहण कि पावक जारौं । बरौं न गवरि गरल दै मारौं ।।
सुजस नसाय अजस मैं लीहौं । जीवत सुता न शिव कौ दीनौ ।।
जदि तुम देव छुटै पति नेहा । तौ विष खाय तजब निज देहा ।।
सो सुनि पुर नर नारि सिधारे । आय बरात भीर भय द्वारे ।।
सुनत हिमंचल आतुर धाये । कर आरति फल फूल सुहाये ।।
मैना कर जब सुमन छुआये । विप्र बधुन शिव शीश चढ़ाये ।।
दोहा - 9
तब लग आये द्वार शिव हिमगिरि चरण प्रछालि ।
अरचि तिलक मणि भेट दै वेद रीति कुल चालि ।।
प्रथम उमा जब फूल चढ़ाये । शीश नाय मन विनय सुनाये ।।
कह कि धरौ हर भेष अनूपा । मातु विषाद छुटय लखि रूपा ।।
नेग निवेरि पवेरि तमासे । पलटि महेश गये जनवासे ।।
यहां गवरि जननी पहि जाई । करति प्रवोध मात चितलाई ।।
मात सुनौ मम हेत सुहावन । रूप किशोर सदा शिव पावन ।।
मातु न करिअ विधि विपरीती । तजि निज धर्म सूद्र कुल नीती ।।
जथा करौ तुम अस आचारा । हंसहि नारि नर सब संसारा ।।
मैना शिव सन करिसि विरोधा । तस मै कुमति अकारण क्रोधा।।
दोहा - 10
तब मैना कह कोप करि हमहि सुता संताप ।
हंसहि कहा सब नारि नर लेय मोर यह साप ।।
सुनिके द्वार बरात विभेवा । सुता बिबाह मातु उर खेदा ।।
अवते करै सकल यह रीती । विदित विषाद न होय प्रतीती ।।
वहुरि उमा कह प्रेम समेता । आय मातु सुन वचन बिचेता ।।
भाग समान मिलै भर तारा । करम लेख को मेटन हारा ।।
यथा करम अंकुर फल पाये । हरष शोक मन भेद रमाये ।।
आयु करम विधा धन मरणा । पूरब जन्म बस पांच अकरणा ।।
लिखे ललाट शंभु पति पाये । अब जननी का खेद बढ़ाये ।।
आय परम योगी शिव शंकर । सरवे श्वर शम्भु पिनाक धर ।।
दोहा- 11
वालक विरध न युवा शिव सदा अनंत विशाल ।
जन्म न मृत्यु न जरा तन ना महेश वश काल ।।
अछै अनादि अजित विकराला । शिव सब मैं समान सब काला ।।
यहि अवसर आये सव देवा । किंकर भाव करन शिव सेवा ।।
कौन अधिक शिव से जग मांही । जीवन सफल करौ कस नाही ।।
शिव कह दान देव हरषाई । करौ भवन पावन मन लाई ।।
तजि विषाद आनन्द उर आनौ । करौ बिबाह सज्जन शिव मानौ ।।
यदि न करौ वर और न कोई । यस अरु अजस काल वस होई ।।
सिंह भाग किमि हरय श्रंगाला । मन वच कर्म वसे शशि भाला ।।
हर वर हित हम गायेसि गाता । जेहि मन भरै करसि तै माता ।।
दोहा - 12
सुनत वचन मैना मरषि गवरि कलेबर धारि ।
दन्त घात खरपर धरषि तलहति मुष्टि प्रहारि ।।
मारत लखि मुनि दया बिचारी । उमहि दूर लय गयसि निवारी ।।
तिहि विधि से मातहि कर दूरी । परुष वचन मैना मुख पूरी ।।
मम ग्रह उपजी उमा अभागी । जनमत मरी न पावक लागी ।।
कै विष देउ कि पावक जारौ । करहु उपाय अनेगन मारौ ।।
डारहु कूप कि सिर अस भेदी । छेपहु उदधि आयुधन छेदी ।।
सुता संघारि तजहुं निज देहा । यह वर लागि करे अस नेहा ।।
मात न पिता कुटुम कुल भ्राता । नहि चातुर नाही जय गाता ।।
ना धन धाम न सुन्दर वाहन । वस्त्र न भूषन संग न पाहन ।।
दोहा - 13
नहि ज्ञान नहि पवित्र तन ना गुण गण लव लेश ।
येहि तन गिरिजै कस वरै महा अघोर महेश ।।
तेज प्रकाश न सुन्दर भेषा । शिव तर नहि एकउ गुण देखा ।।
तब लग हरि मैना पहि आये । मधुर मनोहर वैन सुनाये ।।
तुम पितरण की मानस कन्या । गिरि पतनी गुण रूप लवन्या ।।
बाह्मण कुल उत्तिम पद पाये । शील सुभाय जगत यश छाये ।।
तब अवतार लोक हित कैसे । पर्म धर्म विद् सुर गुरु जैसे ।।
अपर कहा लग करहु बड़ाई । तुम सम को पुनीत अधिकाई ।।
जिनकर सुता उमा जगदम्बा । जासु अंश जग सब अवलम्बा ।।
अगम अनादि अनन्त भवानी । शक्ति स्वरूप तेज गुण खानी ।।
दोहा -14
मैना तब तन्या गवरि तासु तनय त्रैलोक ।
नाम रुप बहु जन्म बहु हरण हेत भै शोक ।।
अचल तासु कारण मरजादा । हरण मोहमद क्रोध विषादा ।।
मैना सुनहु सुभग इतिहासा । होय प्रबोध मान भ्रम नाशा ।।
सहित विरोध कहौ कछु खेदा । छमहु देवि यदि जानहु भेदा ।।
हम अरु देव मुनीश विधाता । का तुम्हरिउ समान नहि ज्ञाता ।।
ते सब शिव गुण तत्व न जाने । निर्गुण ब्रह्म सगुण शिव माने ।।
इच्छा तासु प्रकृति निरमाना । निज इच्छा भव पुरुष प्रधाना ।।
प्रकृति से उमा रमा ब्रह्मानी । सो तव सुता गवरि गुण खानी ।।
पुरुष रूप सो शिव सर्वेशा । तासु त्रिगुण विधि विष्णु महेशा ।।
दोहा- 15
रज गुण ब्रह्मा सतो हम तामस गुरू महेश ।
शिवदयाल विरचै भरै हरी करैं उपदेश ।।
सिव से विदित वेद संसारा । थावर जंगम सुर निरधारा ।।
होत हुय गये होय जो आगे । सो सब विश्व होत शिव लागे ।।
प्रथमै विधि हम साहस वर्षा । भर्मत पारन लहे न हर्षा ।।
सत्य ज्ञान मय व्यापक व्यापी । गये समीप अछै लग कांपी ।।
अजर अमर सुर मुनि मैं आने । नित सेवै अरु आयसु मानै ।।
हम अरु ब्रह्म रुद्र मुनि देवा । सूर्य चन्द्र ग्रह अधिपति जेवा ।।
सरिता सर तरु गिरि वन वागा । जीव चराचर धरणि विभागा ।।
ओषधि सकल देव सब जाती । अखिल भुवन योनी बहु भांती ।।
दोहा-16
लव निमेष ते कल्प लगि विधि ते लगि परमानु ।
शंम्भु शक्ति मय सकल जग निहचै भायिनि जानु ।।
शिव अरूप निज रूप अनूपा । यथा विटप फल फूल विरूपा ।।
एक मूल तरु पर्न अनेका । तथा सकल जग शंकर एका ।।
आदि मध्य शिव अन्त अनन्तर । शिवमय सर्व सर्वमय शंकर ।।
यथा सूत्र मय सूची कारण । तथा कार्ज कारण शिव धारण ।।
शिव सो हम हमसो शिव जानौ । अपनौ कौ शिवही कर मानौ ।।
निसि दिन गुण तिथि वार रासि मत । योग करण गुण लगन मुहूरत ।।
संवत अयन पच्छ रितु मासा । युग मनु अन्तर कल्प बिनाशा ।।
यह सब काल रूप अवतंसा । सब शिवमय सब मैं शिव अंशा ।।
दोहा - 17क
कारज कारण परस्पर दोनौ एकहि भाव ।
कारण शिव कारज सकल एकै एक सुहाव ।।
17ख
शिवदयाल अज्ञान मत कारण कारज भेद ।
सकल विश्व शिवमय लखै ज्ञानी करैं न खेद ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद सप्तमोअध्याय ।।।
।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
मरछा गत सम्हार उर आई । क्रोध तरंग अंग अधिकाई ।।
विकसे कंज नयन अरुणारे । कंटक जो कटु वचन उचारे ।।
मैना कहति सुनौ मुनि ज्ञानी । प्रथम कही तुम्हहू छलसानी ।।
गिरिजै कंत मिले शिव शंकर । हेम तुंग तप करे निरंतर ।।
सो सुनि उमा कठिन तप साधे । करे नेम जप शिव अबराधे ।।
दये तासु फल विधि भयदायक । शिव पाये पति प्रेत सहायक ।।
कौन उपाय करब येहि राती । यह दुख निवरै मुनि केहि भांती ।।
जरय मातु अरु सुता दुलारी । जद अजोग वर लहै कुमारी ।।
दोहा -1
खल जड़ मूरख छोट बड़ वृत्ति हीन तन छीन ।
सुता न ये तिन बरयगुण रूप शील कुल हीन ।।
तजि रोगिल मद अंध अदीपा । ना अति दूर न अधिक समीपा ।।
वर सुंदर पुर देश बड़ाई । शीलवंत पर सभा सुहाई ।।
गुण से सुख संपति निरलोभा । विदित दशौ दिशि कुल की शोभा ।।
नारद कपट नारि उर दोषा । अन्तर पर घर गमन सरोखा ।।
पग तरजनी से अगूठा हीना । थूल केश वड़ मान मलीना ।।
जे विधवा गुण गान कलेशा । योग दरिद्र सकल तन केशा ।।
वड़े श्रवन रद नाद गंभीरा । वहु भच्छिन सुभाव निरधीरा ।।
कटुवादिन यह मिति आदेशा । सो त्रिय दायक सवहि कलेशा ।।
दोहा -3
रिषिय तने हमकौ छलो कपट चातुरी जोय ।
कांच संग्रही कनक तजि धीरज का विधि होय ।।
तजि सूरज खद्धोत उदोपी । चंदन छांड़ि कदमा थोपी ।।
कन भक्छे तजि तंदुल पायस । तजे हंस गहि पिंजर वायस ।।
सुरसरि तजि कूपोदक पाना । तजि धृत अंड तैल भ्रग साना ।।
सिंह विहाय के सेव श्रंगाला । तजि पीतांवर लै मृगछाला ।।
तजि विभूति ग्रह मख रुचि संगा । मर्दन चिता भसम सब अंगा ।।
उमा तपी सुर तजि शिव हेता । घिग वे रिषि धिग वुद्धि विचेता ।।
धिग कुलक्रिया दाच्छि तपतुच्छा । धिग तनधन ग्रहधिग ममकुच्छा ।।
हिमगिरि ओर न मुख दरशावौ । सप्त रिषिन का वदन दिखावौ ।।
दोहा- 4
अब कह नारद सांच तुम सबके पिता महेश ।
तिनहि बिबाहौं का कुंअरि यह अयोग उपदेश ।।
कह नारद सुनु देवि अजीता । वचन कहे तुम सो विपरीता ।।
जगत पिता शिव सब सामरथा । वाल न विरध न जुवान न विरथा ।।
तव मैना कह सुनु मुनि गारी । शिवहि बिबाहन कही कुमारी ।।
रहि न वांझ मैं तन कनजाता । गरभ न गिरा न भा अपघाता ।।
वाध सिंह वन गये न खाई । असुरण का सन कौ न विहाई ।।
डसी न सरपन हती न काला । यह सुख देखन हेत हिमाला ।।
डसी न सरपन हती न काला । यह सुख देख न हेतहि माला ।।
गिरि ते गिरौ करौ तन छारा । कै सिर छेदि उभैअ सिधारा ।।
मै कह करव सुता कह जाई । कहि हा दैव गिरेसि मुरछाई ।।
दोहा - 5
मैना वचन विषाद सुनि खेद सकल संसार ।
सुनत नारि नर नगर के आये हिमगिरि द्वार ।।
तब सो सुनि विरंचि तंह आये । आंगन मंगल पितर पुजाये ।।
सात ऋषभ तिलवाय सुलाये । सात सुभागिन उमहि चढ़ाये ।।
हरसित मंगल गावहि नारी । देय मधुर सुर सुन्दर गारी ।।
सुनि गिरिनाथ मोद मन धाये । पूजि पहुनई करि लोटाये ।।
पलटि रिषय मैना पह जाई । करत हिमालय सहस वड़ाई ।।
नारद मैनहि वोधि उठायउ । कहि मृदुवानि रिषिन समुझायेउ ।।
शिव पर तोहि वहुत अज्ञाना । रूप जथावत नहि पहिचाना ।।
कह मैना अब रिषि फिर आये । करि दुर्वोध ह्रदय मद छाये।।
दोहा - 6
देखत महा विकार विघि कह मैना सुन वैन ।
देवन कारज तोर हित सुख देखौ भरि नैन ।।
शिव करता पालन संहरता । किमि सुख लहौ न जानौ धरता ।।
सुनि विधि गिरा कही पुनि मैना । बृथा कहो किमि कारज वैना ।।
जदपि महा सुन्दर शिव रूपा । तदपि न लायक उमा अनूपा ।।
तिहि अवसर आये सब देवा । इन्द्रादिकन कहेउ निज भेवा ।।
शिव सर्वेश सकल जग धारक । हम सब शिव के आज्ञाकारक ।।
देवन अखिल सुखद शिव शंकर । सकल सुफल तब सुता निरंतर ।।
हम सब धनि पावन गिरि धरणी । धनि हिमगिरि धनि तोरि सुकरणी ।।
धनि तब सुता सवै अध परसनि । उठि के करव द्वार वर परछनि ।।
दोहा -7
मैना देवन वचन सुनि कह सवहि कर मेष ।
देव न उमा कुरूप शिव जले अमंगल रूप ।।
सप्त रिषिन तब कहा वुझाई । जगदम्विका गवरि तुम जाई ।।
उमा विवाहन जौ शिव आये । तुम प्रताप हम दरशन पाये ।।
हठ तजिके अरचौ शशि भाला । करहु विशाद न मंगल काला ।।
उठि अरचहु शिव शाला आये । परम लाभ शिव दर्शन पाये ।।
दानपात्र शिव हिमगिरि दाता । देउ संग मिलि सुजस बराता ।।
अहो भाग शिव आयेसि द्वारे । करौ सगुन शुभ मंगल भारे ।।
मैना वचन सकोप उचारे । आब अशिव अब द्वार हमारे ।।
नारद वचन तजौ मरजादा । शिवय न देव गवरि करिवादा ।।
छंद
गिरि कही विकल विलोकि वनिता प्रिया सोक जु परिहौ ।।
को कहन ते आये पमरि यह समुझि मन धीरज धरौ ।।
फूल फल दल विरचि आरति सगुण शिव अरचन करौ ।।
शिवदयाल उमा बिबाह मंगल सकल भामिन अनुसरौ ।।
दोहा- 8
हम जानत सरवज्ञ शिव सवै अनुग्रह देत ।
तजि विशाद शंकर भजौ उमा बिबाहन हेत ।।
सुनि मैना कह बचन विचारी । नाथ गवरि मुहि प्राण पिआरी ।।
उमा करे तप शिव अवराधी । गिरते गिरौ कंठ मंह बांधी ।।
मंगल ग्रहण कि पावक जारौं । बरौं न गवरि गरल दै मारौं ।।
सुजस नसाय अजस मैं लीहौं । जीवत सुता न शिव कौ दीनौ ।।
जदि तुम देव छुटै पति नेहा । तौ विष खाय तजब निज देहा ।।
सो सुनि पुर नर नारि सिधारे । आय बरात भीर भय द्वारे ।।
सुनत हिमंचल आतुर धाये । कर आरति फल फूल सुहाये ।।
मैना कर जब सुमन छुआये । विप्र बधुन शिव शीश चढ़ाये ।।
दोहा - 9
तब लग आये द्वार शिव हिमगिरि चरण प्रछालि ।
अरचि तिलक मणि भेट दै वेद रीति कुल चालि ।।
प्रथम उमा जब फूल चढ़ाये । शीश नाय मन विनय सुनाये ।।
कह कि धरौ हर भेष अनूपा । मातु विषाद छुटय लखि रूपा ।।
नेग निवेरि पवेरि तमासे । पलटि महेश गये जनवासे ।।
यहां गवरि जननी पहि जाई । करति प्रवोध मात चितलाई ।।
मात सुनौ मम हेत सुहावन । रूप किशोर सदा शिव पावन ।।
मातु न करिअ विधि विपरीती । तजि निज धर्म सूद्र कुल नीती ।।
जथा करौ तुम अस आचारा । हंसहि नारि नर सब संसारा ।।
मैना शिव सन करिसि विरोधा । तस मै कुमति अकारण क्रोधा।।
दोहा - 10
तब मैना कह कोप करि हमहि सुता संताप ।
हंसहि कहा सब नारि नर लेय मोर यह साप ।।
सुनिके द्वार बरात विभेवा । सुता बिबाह मातु उर खेदा ।।
अवते करै सकल यह रीती । विदित विषाद न होय प्रतीती ।।
वहुरि उमा कह प्रेम समेता । आय मातु सुन वचन बिचेता ।।
भाग समान मिलै भर तारा । करम लेख को मेटन हारा ।।
यथा करम अंकुर फल पाये । हरष शोक मन भेद रमाये ।।
आयु करम विधा धन मरणा । पूरब जन्म बस पांच अकरणा ।।
लिखे ललाट शंभु पति पाये । अब जननी का खेद बढ़ाये ।।
आय परम योगी शिव शंकर । सरवे श्वर शम्भु पिनाक धर ।।
दोहा- 11
वालक विरध न युवा शिव सदा अनंत विशाल ।
जन्म न मृत्यु न जरा तन ना महेश वश काल ।।
अछै अनादि अजित विकराला । शिव सब मैं समान सब काला ।।
यहि अवसर आये सव देवा । किंकर भाव करन शिव सेवा ।।
कौन अधिक शिव से जग मांही । जीवन सफल करौ कस नाही ।।
शिव कह दान देव हरषाई । करौ भवन पावन मन लाई ।।
तजि विषाद आनन्द उर आनौ । करौ बिबाह सज्जन शिव मानौ ।।
यदि न करौ वर और न कोई । यस अरु अजस काल वस होई ।।
सिंह भाग किमि हरय श्रंगाला । मन वच कर्म वसे शशि भाला ।।
हर वर हित हम गायेसि गाता । जेहि मन भरै करसि तै माता ।।
दोहा - 12
सुनत वचन मैना मरषि गवरि कलेबर धारि ।
दन्त घात खरपर धरषि तलहति मुष्टि प्रहारि ।।
मारत लखि मुनि दया बिचारी । उमहि दूर लय गयसि निवारी ।।
तिहि विधि से मातहि कर दूरी । परुष वचन मैना मुख पूरी ।।
मम ग्रह उपजी उमा अभागी । जनमत मरी न पावक लागी ।।
कै विष देउ कि पावक जारौ । करहु उपाय अनेगन मारौ ।।
डारहु कूप कि सिर अस भेदी । छेपहु उदधि आयुधन छेदी ।।
सुता संघारि तजहुं निज देहा । यह वर लागि करे अस नेहा ।।
मात न पिता कुटुम कुल भ्राता । नहि चातुर नाही जय गाता ।।
ना धन धाम न सुन्दर वाहन । वस्त्र न भूषन संग न पाहन ।।
दोहा - 13
नहि ज्ञान नहि पवित्र तन ना गुण गण लव लेश ।
येहि तन गिरिजै कस वरै महा अघोर महेश ।।
तेज प्रकाश न सुन्दर भेषा । शिव तर नहि एकउ गुण देखा ।।
तब लग हरि मैना पहि आये । मधुर मनोहर वैन सुनाये ।।
तुम पितरण की मानस कन्या । गिरि पतनी गुण रूप लवन्या ।।
बाह्मण कुल उत्तिम पद पाये । शील सुभाय जगत यश छाये ।।
तब अवतार लोक हित कैसे । पर्म धर्म विद् सुर गुरु जैसे ।।
अपर कहा लग करहु बड़ाई । तुम सम को पुनीत अधिकाई ।।
जिनकर सुता उमा जगदम्बा । जासु अंश जग सब अवलम्बा ।।
अगम अनादि अनन्त भवानी । शक्ति स्वरूप तेज गुण खानी ।।
दोहा -14
मैना तब तन्या गवरि तासु तनय त्रैलोक ।
नाम रुप बहु जन्म बहु हरण हेत भै शोक ।।
अचल तासु कारण मरजादा । हरण मोहमद क्रोध विषादा ।।
मैना सुनहु सुभग इतिहासा । होय प्रबोध मान भ्रम नाशा ।।
सहित विरोध कहौ कछु खेदा । छमहु देवि यदि जानहु भेदा ।।
हम अरु देव मुनीश विधाता । का तुम्हरिउ समान नहि ज्ञाता ।।
ते सब शिव गुण तत्व न जाने । निर्गुण ब्रह्म सगुण शिव माने ।।
इच्छा तासु प्रकृति निरमाना । निज इच्छा भव पुरुष प्रधाना ।।
प्रकृति से उमा रमा ब्रह्मानी । सो तव सुता गवरि गुण खानी ।।
पुरुष रूप सो शिव सर्वेशा । तासु त्रिगुण विधि विष्णु महेशा ।।
दोहा- 15
रज गुण ब्रह्मा सतो हम तामस गुरू महेश ।
शिवदयाल विरचै भरै हरी करैं उपदेश ।।
सिव से विदित वेद संसारा । थावर जंगम सुर निरधारा ।।
होत हुय गये होय जो आगे । सो सब विश्व होत शिव लागे ।।
प्रथमै विधि हम साहस वर्षा । भर्मत पारन लहे न हर्षा ।।
सत्य ज्ञान मय व्यापक व्यापी । गये समीप अछै लग कांपी ।।
अजर अमर सुर मुनि मैं आने । नित सेवै अरु आयसु मानै ।।
हम अरु ब्रह्म रुद्र मुनि देवा । सूर्य चन्द्र ग्रह अधिपति जेवा ।।
सरिता सर तरु गिरि वन वागा । जीव चराचर धरणि विभागा ।।
ओषधि सकल देव सब जाती । अखिल भुवन योनी बहु भांती ।।
दोहा-16
लव निमेष ते कल्प लगि विधि ते लगि परमानु ।
शंम्भु शक्ति मय सकल जग निहचै भायिनि जानु ।।
शिव अरूप निज रूप अनूपा । यथा विटप फल फूल विरूपा ।।
एक मूल तरु पर्न अनेका । तथा सकल जग शंकर एका ।।
आदि मध्य शिव अन्त अनन्तर । शिवमय सर्व सर्वमय शंकर ।।
यथा सूत्र मय सूची कारण । तथा कार्ज कारण शिव धारण ।।
शिव सो हम हमसो शिव जानौ । अपनौ कौ शिवही कर मानौ ।।
निसि दिन गुण तिथि वार रासि मत । योग करण गुण लगन मुहूरत ।।
संवत अयन पच्छ रितु मासा । युग मनु अन्तर कल्प बिनाशा ।।
यह सब काल रूप अवतंसा । सब शिवमय सब मैं शिव अंशा ।।
दोहा - 17क
कारज कारण परस्पर दोनौ एकहि भाव ।
कारण शिव कारज सकल एकै एक सुहाव ।।
17ख
शिवदयाल अज्ञान मत कारण कारज भेद ।
सकल विश्व शिवमय लखै ज्ञानी करैं न खेद ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीयपाद सप्तमोअध्याय ।।।
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