Sunday, 17 April 2011

पच्चीसबां अध्याय

।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्तीयपाद पंचदशोध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


शौनक सुनहु चरित हित कामा । जवहि विरंचि गये निज धामा ।।

मुनिन वुलाय कही विधि वानी । सुनहु देव ऋिषि हित अनुमानी ।।

जो सुख इच्छा सदा तुम्हारे । चलहु संग लगि वचन हमारे ।।

विधि अस कहि मुनि सुरण समेता । गमने छीर पयोनिधि केता ।।

तंहा सकल मिलि करहि विचारा । अस्तुति कीजिय कौन प्रकारा ।।

नमत मुदित मुनि देव विधाता । शेष सेज सायन सुरत्राता ।।

जगन्नाथ जय भक्त अभय प्रद । कमला कांत नौमि मंगल सद ।।

अच्युत अखिलेश्वर अविनासी । अलख अगोचर अग जग वासी ।।

छंद

वंदौ श्रीवत्स श्रिया सहितं सुमिरे भव सागर निर्वहितं ।

धनश्याम पीत पटावरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

तन चारु चतुर्भुजते अमलं कर शंख औ चक्र गदा कमलं ।

मणि कुन्डल क्रीट अलंकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

पुरुषोत्तम जय श्री वत्स विभुं रवि कोटिन भास प्रयास प्रभुं ।

नव नीरज नयन शुभं अरुणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

कंदर्प करोर लखे अरुचै माया दासी सम दूर नचै ।

निधि रिद्धि सुसिद्धि उपाकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

वहु भूषन भूषिन अंग अलं सुख मुक्ति विमुक्ति प्रदं अचलं ।

सर्व शरष्य मही धरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।

सोरठा 1

उर वैजयंती माल मेघ श्याम अभिराम तन ।

पद वंदन शिवद्याल विश्व भरण भव भय हरण ।।

दोहा -1

तुलसी कुमुद सरोरुह पारिजात गंधार ।

शिवद्याल पंचमि निर्मित वन माला विस्तार ।।


तन वन माला धरे सुरत्राता । नौमि कृपानिधि पद जलजाता ।।

ज्ञानांजन प्रभु भव भय भंजन । निश्चर गंजन जन मन रंजन ।।

सेवत हरि दुर्लभ गत पावै । मिटै दोष कलि कलषु नसावै ।।

जिहि दुख को लखि परै न पारा । ताहू को नाथ करत निरधारा ।।

करहु कृपा करि हरि दुख दूरी । जय घन श्याम रही धुनि पूरी ।।

यद्धपि कृपानिधि संकट हारी । प्रभु प्रसीद देवेश मुरारी ।।

पुरुषोत्तम कृपाल करुणाकर । जगन्नाथ जगपति जै जगधर ।।

दरष देउ अव ओघ विदारी । सुर रंजन गंजन तमचारी ।।

दोहा-2

नौमि अनादि अनंत प्रभु अनभव अगम अपार ।

शिवदयाल विधि विनय करि देव ऋषिन अधिकार ।।

यह अस्तुति विधि कृत अति पावनि । कोमल सुन्दर सुगम सुहावनि ।।

तब प्रघटे वैकुण्ड विहारी । जै जै धुनि सुर मुनिन उचारी ।।

बोले मधुसूदन गोविन्दा । किहि कारण आये सुरबृंदा ।।

सब मिलि स्वारथ करौ विचारी । दरश हमार सकल दुख हारी ।।

तब वोले मुनि देव विधाता । संसय हरण उभय सुरत्राता ।।

भजन तुम्हार सदा हितकारी । तदपि सु कहौ विधान विचारी ।।

नित पूजन कीजिय कहौ काको । सेवन सुभग बतावहु ताको ।।

कवन काल अरिचै केहि भांती । जो शिव ईश्वर अमल अजाती ।।

दोहा -3

पूजन रुचिर वतावौ श्रीपति करुणा ऐन ।

शिवदयाल कृपाल दयाल हुय हरि वोले मृदु वैन ।।


।।। इति श्री शिव तरित्र महत्मे पंचदशोअध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।। द्वतीयपाद समाप्त ।।
।।।--- स्थाणोर्चरित्रम ---।।। राम ।।।

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