।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्तीयपाद पंचदशोध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
शौनक सुनहु चरित हित कामा । जवहि विरंचि गये निज धामा ।।
मुनिन वुलाय कही विधि वानी । सुनहु देव ऋिषि हित अनुमानी ।।
जो सुख इच्छा सदा तुम्हारे । चलहु संग लगि वचन हमारे ।।
विधि अस कहि मुनि सुरण समेता । गमने छीर पयोनिधि केता ।।
तंहा सकल मिलि करहि विचारा । अस्तुति कीजिय कौन प्रकारा ।।
नमत मुदित मुनि देव विधाता । शेष सेज सायन सुरत्राता ।।
जगन्नाथ जय भक्त अभय प्रद । कमला कांत नौमि मंगल सद ।।
अच्युत अखिलेश्वर अविनासी । अलख अगोचर अग जग वासी ।।
छंद
वंदौ श्रीवत्स श्रिया सहितं सुमिरे भव सागर निर्वहितं ।
धनश्याम पीत पटावरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
तन चारु चतुर्भुजते अमलं कर शंख औ चक्र गदा कमलं ।
मणि कुन्डल क्रीट अलंकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
पुरुषोत्तम जय श्री वत्स विभुं रवि कोटिन भास प्रयास प्रभुं ।
नव नीरज नयन शुभं अरुणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
कंदर्प करोर लखे अरुचै माया दासी सम दूर नचै ।
निधि रिद्धि सुसिद्धि उपाकरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
वहु भूषन भूषिन अंग अलं सुख मुक्ति विमुक्ति प्रदं अचलं ।
सर्व शरष्य मही धरणं प्रणमामि रमा रमणेशरणं ।।
सोरठा 1
उर वैजयंती माल मेघ श्याम अभिराम तन ।
पद वंदन शिवद्याल विश्व भरण भव भय हरण ।।
दोहा -1
तुलसी कुमुद सरोरुह पारिजात गंधार ।
शिवद्याल पंचमि निर्मित वन माला विस्तार ।।
तन वन माला धरे सुरत्राता । नौमि कृपानिधि पद जलजाता ।।
ज्ञानांजन प्रभु भव भय भंजन । निश्चर गंजन जन मन रंजन ।।
सेवत हरि दुर्लभ गत पावै । मिटै दोष कलि कलषु नसावै ।।
जिहि दुख को लखि परै न पारा । ताहू को नाथ करत निरधारा ।।
करहु कृपा करि हरि दुख दूरी । जय घन श्याम रही धुनि पूरी ।।
यद्धपि कृपानिधि संकट हारी । प्रभु प्रसीद देवेश मुरारी ।।
पुरुषोत्तम कृपाल करुणाकर । जगन्नाथ जगपति जै जगधर ।।
दरष देउ अव ओघ विदारी । सुर रंजन गंजन तमचारी ।।
दोहा-2
नौमि अनादि अनंत प्रभु अनभव अगम अपार ।
शिवदयाल विधि विनय करि देव ऋषिन अधिकार ।।
यह अस्तुति विधि कृत अति पावनि । कोमल सुन्दर सुगम सुहावनि ।।
तब प्रघटे वैकुण्ड विहारी । जै जै धुनि सुर मुनिन उचारी ।।
बोले मधुसूदन गोविन्दा । किहि कारण आये सुरबृंदा ।।
सब मिलि स्वारथ करौ विचारी । दरश हमार सकल दुख हारी ।।
तब वोले मुनि देव विधाता । संसय हरण उभय सुरत्राता ।।
भजन तुम्हार सदा हितकारी । तदपि सु कहौ विधान विचारी ।।
नित पूजन कीजिय कहौ काको । सेवन सुभग बतावहु ताको ।।
कवन काल अरिचै केहि भांती । जो शिव ईश्वर अमल अजाती ।।
दोहा -3
पूजन रुचिर वतावौ श्रीपति करुणा ऐन ।
शिवदयाल कृपाल दयाल हुय हरि वोले मृदु वैन ।।
।।। इति श्री शिव तरित्र महत्मे पंचदशोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।। द्वतीयपाद समाप्त ।।
।।।--- स्थाणोर्चरित्रम ---।।। राम ।।।
No comments:
Post a Comment