Sunday, 17 April 2011

छब्बीसबां अध्याय त्रतीयपाद

।। श्री गणंशाय नमः ।।

।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।

।। अथ श्री त्रतीय पाद ।।

।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे प्रथमोअध्याय ।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


कह मधुसुदन सुर मुनि धाता । सेवन सुनहु विस्व विख्याता ।।

शिव पूजा जगभव भय हरणी । दुःख शोक अघ ओघ विदरणी ।।

जन्म भये सुधरै जग करनी । मुक्ति हेत भव सागर तरणी ।।

तजि के तुम्है देव देवेशा । सुन्दर मूरति लिंग महेशा ।।

तारक तनय निहत सहवंशा । माया मय प्रेरित मय अंशा ।।

निहचै सो माया करि दूरी । शंभु रहित नासै सब भूरी ।।

येहि विधि शंभु रहित जो होई । कुल समेत नासै नर सोई ।।

शंकर बिमुख यदपि धनमाना । सपनेउ लहहि न सुख सनमाना ।।

दोहा-1

धन्य मातु पितु जाति कुल, शिव सेवक सुत जासु ।।

शिवदयाल खल मात पितु, सुत शिव द्रोही तासु ।।

धनि पितु मातु धन्य सुत सोई । जाके उर शिव पद रति होई ।।

धृग संतति सो धृग पितु माता । शिव द्रोही निन्दक अज्ञाता ।।

शिव पूजत वांछित फल पावै । अमर होय कि शिव पुर जावै ।।

पूजयनीय शिव लिंग मूतिंधर । सुख अभिलाष तो सेवहु शिवहर ।।

सुर पुंगव कृपाल शिवदेवा । सर्व देवमय सदा अभेवा ।।

सकल देव पूजहि जग माही । तदपि शभु पूजन सम नाही ।।

यथा लता तरू सींचत मूला । सुलभ सघन पल्लव फल फूला ।।

प्रथम सु हम पूजे कल्पादी । लिंग मूर्ति शिव देव अनादी ।।

दोहा-2

सहस कमल हम अर्पहि सादर । प्रेम सहित पूजहि निसि वासर ।।

सूचित प्रेम परीक्षा कीन्हा । कमल एक कमला हरि लीन्हा ।।

अरपत मंत्र सुमन एक हीना । तब हम उर विचार अस कीन्हा ।।

अधपूजे तजिये नहि शंकर । यदपि होय दु़ःख रोग भंयकर ।।

शिव पूजन खंडित जो त्यागै । विप्र धेनु वध पातक लागै ।।

हम यह निज मन मंत्र बिचारा । पंकज नयन कहत संसारा ।।

शिवहि समरयो नयन निकारी । अति प्रसन्न प्रधटे त्रिपुरारी ।।

नयन प्रथम समपूरण कीन्हा । तब शिव चक्र सुदर्शन दीन्हा ।।

दोहा-3

सोई शिव सर्वज्ञ प्रभु सब सेवत सब काल ।।

मनोकामना ते लहत, धेवत नित शिवद्याल ।।

सोई सिव सुमिरै सब काला । विद्याधर प्रति जन्म विशाला ।।

शिव-शिव कहि जे जन जमुहाई । तिन समीप जम काल न जाई ।।

जे जन शिव सुमिरण करि सोवै । तिनहि दुःख सपने नहि होवै ।।

शिव शिव समिरि प्रात नित जागै । तिनके उर अघ ओघ न लागै ।।

भूतन पति मसान के वासी । सुमिरत शिवहि प्रेत भय नासी ।।

पाप दाप मैं शिव शिव कहई । तिनको अध संकट ना लहई ।।

शिव सुमिरै देय कछु दाना । पुन्य अमोघ कल्प अवसाना ।।

दोहा 4

शिव सेवत कुष्टी तरै अरु कृपणी वस काम ।

शिवदयाल हर भक्ति विन तन धन धाम निकाम ।।

शिव कहि जग्य करै औ करावै । अजर अमोघ अतुल फल पावै ।।

शिव शिव सुमिर करै जो काजा । पूरण होय सकल सुख साजा ।।

शिव कहि सूर चढ़ै संग्रामा । समर विजै अंतहु शिव धामा ।।

शिव सुमिरै जे मरती वारा । ते नहि आवहि फिर संसारा ।।

लिंग रूप मय शिव सब देवा । लिंग प्रकासित देव अभेवा ।।

लिंगहि पूजि असुर सुर मानव । किन्नर जच्छ सिद्ध अहि दानव ।।

पावहि मुक्ति करैं कुल पावन । आठौ सिद्धि लहै मन भावन ।।

छण भरि लौ त्यागै शिव नामा । वृथा होय सो काल विरामा ।।

दोहा 5

पल भर लौ जे शिव जपै ते निवसै कैलाश ।

तजे रहै जे सदा शिव अमित वर्ष दुख ग्रास ।।

हम अरु विधि प्रजेश महिपाला । विश्व विरद लोकप दिगपाला ।।

शिव दर्शन हित नित प्रति जावै । पूजति लिंग सिद्ध सब पावै ।।

ते कर वर मार्जहि शिव धामा । ते मुख सफल जपै हरि नामा ।।

सो सिर सफल जो शिवहि नवावै । चरण सफल शिव क्षेत्र मझावै ।।

दर्शहि लिंग सफल सो लोचन । श्रवण सफल सिव कथा सुरोचन ।।

शंभु कथा सुनि पुलकित अंगा । सो तन सफल सदा अघ भंगा ।।

सफल मातु पुतु सुत बढ़ भागी । जो शिव चरण कमल अनुरागी ।।

नहि तौ वांझ किमि तनय प्रसूती । जिन हरि कथा न वंदि विभूती ।।

दोहा- 6

धेनु धाम धन धरणि मणि रथ तुरंग गजराज ।

भूषन वासन वसन लगि विनि शोक समाज ।।

शंभु कथा रस करहि न पाना । श्रवण तासु अहि भवन समाना ।।

जिन शिव लिंग न दर्शन जाना । ते लोचन खद्योत समाना ।।

शिव सन्मुख जे नवहि न माथा । मुकुट भार सम शीश अकाथा ।।

शिव शिव जपहि न जिनकी जिहा । ते दादुर सम वचन अलोहा ।।

शंभु क्षेत्र जे पग नहि जांही । जीवत सब सम तेज गमांही ।।

जिन शिव पूजन करहि न जाना । ते कर क्रूर कठोर समाना ।।

जे शिव कथा न सुनि हरषाई । कुलिष कठिन छाती निठुराई ।।

शिव पूजन हित प्रेम न जाना । सो नर स्वान श्रृगाल समाना ।।

दोहा - 7

स्वान स्वामि उपकार करि पथ परषै खल संत ।

निसि गति सगुण ऋगाल मुख मृतक वानि गुण अंत ।।

मानुस सकल सरीर अकाजा । पशुपल अस्थि चर्म पर काजा ।।

पर स्वारथ पशुतन सब जीवा । नर निकाम दुखन कै पीवा ।।

भोजन निद्रा मैथुन साजा । सकल जीव कै नित कै काजा ।।

मनुज हेतु शिव सेवन पावन । दान पुन्य रत भक्ति सुहावन ।।

नेम घर्म व्रत संयम त्यागा । हरि हर सेवन छमा विरागा ।।

जो अस होय तो मानुष नीका । ना तरु पशु उत्तम नर फीका ।।

जड़ चेतन तन धर सव नीके । चल परहित तरु फलै अमीके ।।

पसु तृन चरै करै पय ईंधन । मनुज भोग वियंजन मल गंधन ।।

दोहा -8

अहंकार मद काम छल तृश्ना मोह विकार ।

लोभ क्रोध मत्सर सकल मानुष तन आधार ।।

तरु देय छाह पत्र फल फूला । मनुज सबल रंकै प्रतिकूला ।।

तापर यह शरीर छण भंगा । कृमि विट भस्म कर्म गति अंगा ।।

ग्रह सम्पति सब तोय तरंगा । दामिन गति जीवन तन भंगा ।।

ताते तजि नर तन अभिमाना । निस दिन सुमिरौ शंभु सुजाना ।।

सर्पादिक विषधर हर भूषन । शिव सुमिरत करि सकै न दूषन ।।

सेवहि पुरुष लिंग त्रिय गिरजा । लिंग विभेद गवरि गुण सिरजा ।।

सुनहु देव ऋषि मन अनुमानी । देव लिंग अब कहौ वषानी ।।

निज अनुरूप मूर्ति निरमाई । पूजहु लिंग धातु मणि लाई ।।

दोहा - 9क

श्रीपति कहि सब शिव चरित प्रेम सहित हित पाय ।

मृण मय मणि मय धातु मय मूरत भेद सुनाय ।।

सोरठा -

विहसे सुर समुदाय विष्णु वचन सुनि ह्रदय गुनि ।

हर्ष न ह्रदय समाय तन पुलकित गद गद गिरा ।।

सुनि मूरति पूजन शिव धामा । देव ऋषिन किये हरिहि प्रणामा ।।

सुनि विरंचि मधुसूदन वचना । कही विश्व कर मैं करु रचना ।।

गुण विरंचि वाणी विसुकर्मा । अमित लिंग देवन हित निरमा ।।

प्रथक प्रथक मूरति निरमाई । सुर अनुरूप अनूप सुहाई ।

सो मुनि तुम सन कहौ वखानी । सुनहु वेद वितचित हित मानी ।।

शिव पूजन ते भव भय नासा । विद्या अरु तप तेज प्रकाशा ।।

सुख सम्पति जेतक जग मांही । पूजत शिव दुर्लभ कछु नांही ।।

जो कछु होय कामना जाके । सेवहि पद शंकर गिरिजा के ।।

दोहा - 10

विसुकर्मा शिव लिंग रचि देव ऋषिन वहु भांति ।

दयेउ सवै गुण भेद करि शंकर प्रतिमा पांति ।।

सोई शिव लिंग सुभग विसुकरमा । दये सुरन साधक शिव धर्मा ।।

विलग विलग मूरति वहु भांती । दयी सुरन सो वरणौ जाती ।।

इन्द्र नील मणि मय रचि लिंगा । हरि पूजन हित दये अभंगा ।।

कनक लिंग विधि पूजन हेता । सुवरन लिंग कुवेर प्रचेता ।।

रवि कौ दीन ताम्र मय लिंगा । इंद्रय पद्म राग मय पिंगा ।।

घर मैं दय प्रतिमा मणि पीता । शिवा लई मूरति नवनीता ।।

जछन दय दधि लिंग निरंतर । वरुणै श्यामल मणि मय अंतर ।।

रजत लिंग दय विश्वै देवै । आठौ वसुन रजत निरभेवै ।।

दोहा -11

द्रोण लिंग गोमय धरा गोवर गवरि वनाय ।

नन्द यशोदा गोप भये कृष्ण भये सुत आय ।।

रांगे मूरति वायु अधारा । पार्थिव कै अस्विनी कुमारा ।।

व्राह्मण अर व्राह्मणन की नारी । मृदा लिंग तिन हेत विचारी ।।

आठ अनन्तादिक अहिराजा । दय प्रवाल मूरति तिन काजा ।।

वज्र विभावसु कमलै फंटिका । सोम राज कौ मोतिन घंटिका ।।

लौह लिंग लै भूत पिसाचा । दैत्य राछसन गोमय राचा ।।

रतन जड़ित मूरति बृह्मानी । प्रष्ट लिंग छाया हितआनी ।।

लिंग ज्योति मय पावक लयेउ । मृण मय लिंग ऋषिन कौ दयेउ ।।

सारद मूरति लई धनन्तर । अमित पन्थ पय पिवहि निरंतर ।।

दोहा - 12

विधि हरि हर सुर असुर नर नाग जछ् महिपाल ।

लय लय मूरति विरति युत पूजन हित सब काल।।

लिंग मूर्ति दय सवहि सुहाई । पूजा विधि हरि वहुरि वताई ।।

भये कृपानिधि अन्तरध्याना । गये धाम निज विधि सुर आना ।।

पाय लिंग सुर नर मुनि बृन्दा । विधि प्रति पूछत सहित अनन्दा ।।

नाथ कृपा करि अति हित पाई । शंकर पूजन देउ वताई ।।

हर्षि महर्षि वचन सुनि धाता । शिव पूजा विधि कहि विख्याता ।।

सो विधि सुनि मुनि देव अनन्दे गम नित गृह विरंचि पद वन्दे ।।

निज ग्रह जाय सकल सुर जाती । पूजे लिंग सुने जेहि भांती ।।

भये सकल सुर पूरण कामा । युवतिन सहित लहे विश्रामा ।।

दोहा - 13

शिव पूजे रावण असुर लहेउ लंक निज राज ।

मृत्यु पाय हरि कर गयो शिव पुर सहित समाज ।।

शिव कौ पूजि चक्र हरि पायेउ । चतुरानन विधि नाम कहायेउ ।।

सेवत दिति दुय सुत जाये । महावली वैकुण्ठ डिगाये ।।

विश्वामित्र करेउ शिव सेवन । भये बृह्म ऋिषि जीति मुनि देवन ।।

अत्रि वशिष्ठ लागि मुनि देवा । लहे मनोरथ करि शिव सेवा ।।

ते अधिकार अधिक सरसाये मन वांछित अमोघ फल पाये ।।

सो शिव पूजा जग सुख दायक । दोष हरणि भव सिंधु सहायक ।।

सकल विभव दायनि दुख हरणी । भव भेषज जन रोग विदरणी ।।

जो विधि करि फल पावहि लोका । सिद्धि लहै छूटय दुख शोका ।।

दोहा-14

सदा पूज्य शिव सवन के फल दायक तत् काल ।

पूजन के वहु सुख लहत सो पूजति शिवद्याल ।।



।। इति श्री शिव चरित्र प्रथमोअध्याय ।।

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