Sunday, 17 April 2011

तेइसबां अध्याय

।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे त्रयोदशोध्याय ।।।

।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।


तब शिव नन्दी गणहि हंकारी । सहित षड़नन शैल कुमारी ।।

जग्य भवन तब प्रविसे जाई । वंदन लगे देव समुदाई ।।

द्वार समीप देव मुनि बृन्दा । कहैकि कह आग्या शिर चन्दा ।।

व्याकुल हुय सुर करैं पुकारा । कह करनीय कहौ निरधारा ।।

हम सब पातकि अधम अभागे । दनुज राज सब परम सुभागे ।।

यह कहि प्रविसे देव शिवाला । करत अनेक शव्द तिहि काला ।।

सो धुनि सुनि कुंभोदर धावा । अति विकराल काल सम आवा ।।

दण्ड ताड़ि मुनि बृन्द गिराये । त्रासे विवुध निकट जे पाये ।।

दोहा -1

कश्यप आदिक मुनि सकल इंद्र आदि सुर बृंद ।

गिरे धरणि शिव शिव सुमिरि परे महा दुख फंद ।।

भय वस हा हा कार पुकारे । अहो देव कस भाग हमारे ।।

हा कृपाल हा हरि जगदीशा । विनवत नवत धरनि धरि शीशा ।।

अय नारायण जन भय हारी । पाहि कृपानिधि शरण तिहारी ।।

अपर देव मुनि कहै विचारी । अवहि न भावी मिटी हमारी ।।

विकल देखि सुर मुनि समुदाई । करुणा निधि करुणा उर आई ।।

कृपा सिन्धु यह अवसर पाई । देव ऋषिन से कहि समुझाई ।।

शिव सेवन हित चित्त लगावौ । तब तुम सकल मनोरथ पावौ ।।

तिहि ते करौ सुगम शिव सेवा । जदपि सुअगम अखण्ड अभेवा ।।

दोहा - 2

यदि असाध्य शिव पूजन परम कठिन सब काल ।

तिनके अवराधन करे सिद्धि होत शिवद्याल ।।

अब तुम किहि कारण दुख कारौ । हमरे मत ह्रदय शिव धारौ ।।

शिव समान को पर उपकारी । वरदै वक्रहि सहे दुख भारी ।।

तदपि न तीसर नयन उघारी । सुकृत दारु जिमि बोरै न वारी ।।

वहुरि सुरन कह अय जगदीशा । तुम कहि दुराराध्य गौरीशा ।।

किहि विधि वस होवै सुरत्राता । सो सब मोहि कहौ विख्याता ।।

कह जगदीश सुनौ मुनि देवा । देंउ वताय मंत्र निरभेवा ।।

विंसति अंक को मंत्र विशाला । निर्मल सुन्दर सुभग रसाला ।।

समुझे वर्ग वरण अरु मात्रा । श्रीपति कहै सुरन प्रति वात्रा ।।

दोहा -3

वरण पांच युग वर्ग वसु मात्रा द्वादश भांति ।

शिवदयाल समुझै कहै वचन भेद त्रै पांति ।।

आठ पांच द्वादश अनुमाना । अंक भेद शिव जपन विधाना ।।

अछर आठ एक अरु तीना । षट त्रय एक अंक मिलि गीना ।।

अंक भेद जानय येहि भांती । शिव शिव मंत्र जपै दिन राती ।।

औरौ मंत्र सुनहु जो बीसा । शीघ्र प्रशन्न होय नन्दीशा ।।

ऊँ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु । कुरु शिवाय नमः ऊँ मंत्र जुरु ।।

एक कोटि जपिकै यह मंत्रा । तव दरसै शिव रूप स्वतंत्रा ।।

देय अखिल कामना अनन्ता । शिव कृपाल कोमिल चित संता ।।

तजौ सकल दुख दुंद हिरासा । दनुज मारि हरिहैं शिव त्रासा ।।

दोहा -4

गोपय दधि मधु धृत रस शिव शिर धार समोय ।

शिवदयाल कोटि यह मंत्र जपि सफल कामना होय ।।

सुनि श्रीपति कै कोमल वानी । संकट हरणि कृपामृत सानी ।।

सकल देव जप ध्यावन लागे । एक कोटि मिति करि अनुरागे ।।

तेहि अनसर प्रघटे शिव शंकर । पंच वक्र त्रय नयन गरलधर ।।

विहसि कहा शिव कृपा निधाना । हम प्रशन्न मांगौ वरदाना ।।

सुर मुनि सवहि प्रशन्यति जानी । विनय करत शिव सुजस वखानी ।।

जयति नाथ शिव कृपा निधाना । अगम अनादि अनंत सुजाना ।।

अछै अजित योगिन उरवासी । सेवक सुखद सदा अविनासी ।।

मदन दहन दानव कुल नासन । अस कहि विनती करेसि प्रकाशन ।।

दोहा - 5

मसि काजर गिरि सिंधु धट सुर तरु लिखनी कार ।।

कागद महि सारद लिखहि शिव गुण लहै न पार ।।

छंद-

नमामि शंभु शंकरं प्रलय समय भयंकरं ।।

परावरं सुरपितं नमामि लोक दीपितं ।।

कपर्दिनं त्रिलोचनं त्रिलोक शोक मोचनं ।।

गणाधिपं सुरेश्वरं नमामि ते महेश्वरम ।।

कार्ज कारण रूपकं सदा शिवं अनूपकं ।।

स्वविश्व व्याप्य वयापकं त्रिताप पाप तापकं ।।

सुरारि बृंद त्रासनं अघौघ मूल नासनं ।।

दुजेन्द्र धेनु रंजनं मदादि दोष भंजनं ।।

इदं स्तोत्र शंकरं नित्यमेव निवेदितं ।।

शिवद्याल निर्मितं पठ़ै सुखं अपर्मितं ।।

सोरठा -6क

अस्तुति विधन विधान करन लगे करन लगे शिवद्याल सुर ।

कह मांगौ वरदान हुय प्रशन्न जगदीश्वर ।।

6ख

पुनि वोले मुनि देव हम सब शरण महेश के ।

यदि प्रशन्न महदेव नासहु पुर त्रिपुरेश के ।।

दोहा - 6ग

विसुकरमा सन वोलि कह प्रभु सो अवसर पाय ।

सहित सारथी रथ धनुष सर सब निरमौ जाय ।।

छंद

विसुकरमा हर शासन पाय ह्रदय हरसाय चलो सिरनाई ।।

देवन लोकन मय रचिकै रथ विस्वकै अर्थ समर्थ बनाई ।।

सो देखि के देव मुनि हरषे अवतौ त्रिपुरासुर दुष्ट नसाई ।।

शिवदयाल कृपाल के शासन ते रथ पर्म विशाल दियो निर्माई ।।



।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे त्रयोदशोध्याय ।।।


।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।

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