
।।। श्री स्थाणोर्चरित्रम ।।।
।। अथ श्री शिवचरित्र महात्मे त्रतीयोध्याय ।।
।।। शिवदयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
शौनक सुनौ जु भा तिहि अंदर । विष्णु भ्रमें बहु काल निरंतर ।।
मिली न लिंग मूल लघु सूकर । वर्ष सहस लगि आये ऊपर ।।
लिंग अंत जनिवो करि इच्छा । मिलो न मूल अनेक परीछा ।।
सर्व जतन करि मूल न पाये । तब लगि तंह विरंचि फिरि आये ।।
उभय थकित भये मीलित लोचन । लहेउ न कहुं विसराम विरोचन ।।
श्रमित शरीर स्वमन संविगना । शिव माया मोहित चित भगना ।।
करन लगे बहु विनय प्रणामा । सुमिरै कहा कि यह पर रामा ।।
नाम रहित अन दर्शित रूपा । नित विकसित आकार अनूपा ।।
सोरठा - 1 क
रूप लिंग सम जात , सदा अलिंग अरूप शिव ।
स्वस्थ चित्त करि ज्ञात , ध्यान पंथ गोचर ह्रदय ।।
दोहा - 1 ख
बोले शिवै प्रणाम करि , विधि अरु विष्णु सुजान ।
जोशि शोशि विनवौ तुमहि , रूप न जानत ध्यान ।।
अस्तुति करत वर्ष शत वीते । तव आनन्द शव्द भयो तिहि ते ।।
विदित ब्रह्म स्वर वर्ण ओंकारा । पूरि रहो भरि सकल अधारा ।।
महा शब्द सुनि विष्णु विधाता । करै चिंतमत कुत यह जाता ।।
कहै जहां ते शब्द निरामा । सो शिव तुमको नमो प्रणामा ।।
प्रगट लिंग के दक्झिण भागा । देखि सनातन रूप विराजा ।।
आदि अ कार वरण सत संता । उत्तर वरण उ कार अनंता ।।
मध्य म कार वरण सो अंता । नारद येहि क्रम त्रिगुण रमंता ।।
प्रथम अ कार उ कार म कारा । येहि विधि से अक्झर अनुसारा ।।
सोरठा 2क
सूर्य मंडलाकार , अक्झर प्रथम अ कार शत ।
पावक मंडल सार , उत्तर अंक उ कार अज ।।
दोहा - 2 ख
शशि मंडल आकार सम , तम गुण मध्य म कार ।
शिव धाल दिखावै मध्य मा , अंत होत अनुसार ।।
तिहि पर दर्शित फटिक प्रकाशा । तुरिय अतीत अमृत अविराशा ।।
निष्कल निरूपद्रव निरद्वन्दा । केवल तत्व सुसत्य अनन्दा ।
वर्जित अंतर वहिर अनन्ता । रहित सु आदि मध्य अरु अन्ता ।।
सोपि सदा अनन्द कर कारण । परे ब्रह्म पारायण तारण ।।
मधि ओंकार मकार प्रधाना । सोपि नील लोहित भगवाना ।।
विदित उ कार विस्व करतारा । जग पालक सुप्रसिद्धि अ कारा ।।
उदित म कार अनुग्रह कारक । नित्य अभव सो भव हम धारक ।
सुनि विरंचि हरि विसमै मानी । येहि अंतर प्रधटो गुण खानी ।।
सोरठा - 3 क
सो शिव सोभित रूप , सुन्दर गौर कपूर सम ।
अदभुत अंग अनूप , पंच वक्र दशभुज सुभग ।।
दोहा - 3 ख
भूषण अंग अनेक विधि , कांति अनेक प्रकार ।।
क्रंदु इंदु अरु फटिक सम , भासत अंग अपार ।।
महा पराक्रम परम उदारा । महा पुरुष लच्छन अनुसारा ।।
देखि परम सुन्दर शिव रूपा । निज इच्छा निरमान अनूपा ।।
विधि हरि तिन्है जानि शिव धामा । श्रुति संमत करि विनय प्रणामा ।।
विधि हरि मंत्रन शिव संतोषे । सद तिहि लिंग निरंजन पोषे ।।
दिव्य सबद मय रूप दिखाये । वेद वरण मैं तन दरसाये ।।
मूर्ध अकार सिरसि आकारा । अक्झर अंग वदन स्वर सारा ।।
दहिने नैन इ कार विराजत । वाम विलोचन ई छवि राजत ।।
लधु उ कार स्वर दहिने काना । श्रवन वाम ऊ कार प्रधाना ।।
दोहा - 4
त्रृ दहिने कपोल पर , ऋ वाये पर भास ।
लृ त्वृ नासा पुटन पर , दुय दिशि क्रम संकास ।।
ऊपर ओठ विदित ए कारा । विम्ब अधर एै कार अधारा ।।
ओ औ दंत पंक्ति क्रम सो है । अं अः उभय तालुनी सो है ।।
कादिक पंच कर कमल न दायें । चादिषु पंच कमल कर वायें ।।
अंक दहिन पद टादिषु पांचा । तादिषु पंच वाम पद राचा ।।
उदर उदित सो पदम प कारा । दहिनो पाश्र्व फ कार अधारा ।।
पारस वाम ब कार विराजत । कांधेन पर भ कार सो भ्राजत ।।
ह्रिदय म कार मनोहर सोहै । महादेव योगेश्वर जो हैं ।।
य कारादि लगि अत श कारा । वरण सात धातुन कर सारा ।।
दोहा - 5
रूप ह कार सुनाभि पर , मुख पर अंक छ कार ।
वरण शव्द मय रूप गुण , शिव के अंग अधार ।।
शिवा सहित भगवंत महेशा । प्रधटे हेतु सकल उपदेशा ।।
तिनहि देख विधि विष्णु विदामा । करेसि प्रार्थना विनय प्रणामा ।।
सद प्रशन्न बोले शिव शंकर । हम प्रसीद मांगौ वांछित वर ।।
सो सुनि मुनि हरि हमै समेता । कहैं कि यदि प्रसीद शिव चेता ।।
हमहि विधातै वदहु विचारी । किहि किहि कारज को अधिकारी ।।
कारण कारज करि उपदेशा । यदि इछसि तद करौ महेशा ।।
सो सुनि शिव अनुशासन सारा । भये विरचि जगत करतारा ।।
होउ भुवन पालक भगवाना । विश्व भरण दुख हरण प्रधाना ।।
दोहा - 6
विधि भृकुटी से अंस मम , होय शम्भु अवतार ।
विदित रुद्र शंकर हरे , कारक सृष्टि संघार ।।
यह जो देवी प्रकृति भवानी । नारायण आशय गुण खानी ।।
तासु अंश प्रधटै ब्रह्मानी । होय विरंचि शक्ति सो जानी ।।
आन शक्ति जो प्रकृति से होई । लछ्मी नाम विष्णु प्रिय सोई ।।
बहुर शक्ति यदि प्रधटै काली । शंकर आशय विदित कपाली ।।
जोति रूप गुण कारज अरथा । होय त्रिशक्ति परम सामरथा ।।
तीन देव त्रय शक्ति समेता । करब सृष्टि कारज पर हेता ।।
हरि वहु समरथ वहु अधिकारा । खल वध जग हित बहु अवतारा ।।
तिहि विधि काली सब समरथा । खल शालन जग पालन अरथा ।।
सोरठा - 7 क
विचरन विधि अधिकार , विस्व प्राण वरदान शुभ ।।
विष्णु अखिल आधार , सकल भुवन पालन करण ।।
दोहा - 7ख
शिव कर विधा मंत्र वर , सृष्टि संघारन काल ।
ताल निरत ढक पंच नव , सूत्र व्याकरण जाल ।।
सुनि कह विष्णु सुनौ शिवधरमा । करौ तुम्हार कहे सब करमा ।।
पुनि कछु बोध ह्रदय मम आवा । करण योग शिव तुमहि सुभावा ।।
सुनि सो गिरा कहो शिव शंकर । दयसु तब हित काम अछै वर ।।
तव हम अरु हरि बोले वानी । प्रनत सदा शिव देव स्व जानी ।।
कहव स्व पूजन सेवन ध्याना । जो करि समरथ होय सुजाना ।।
सुनि शिव मंत्र दये निज रूपा । त्रिगुण आतमा विदित अनूपा ।।
मंत्र प्रथम ओंकार सुनाए । परम तत्व विज्ञान बताये ।।
बीज प्रणव स्वर ब्रह्म कहावै । लहै ज्ञान गुण जपहि कि गावै ।।
दोहा - 8
सो हरि परम तत्व गुण , ज्ञान रूप मय देखि ।
पूछेसि भेद उपाय पुनि , मंत्र तत्व तिहि लेखि ।।
पुनि ऊपर लखि मंत्र प्रधाना । करेसि प्रनाम विष्णु भगवाना ।।
वेद शिरोमणि शिव अनुसारा । सहित कला पंचक ओंकारा ।।
बहुरि तत्वमति मंत्र उचारा । ईश्वर जीव ब्रह्म निरधारा ।।
सुद्ध फटिक संकाश अनूपा । मेधा कार परम शुभ रूपा ।।
महावाक्य शिव ययुर प्रधाना । वेद वदन वर वानि त्रिमाना ।।
मंत्र सकल कामारथ साधक । विविघ यती योगिन आराधक ।।
पुनि गायत्री मंत्र उचारा । तासु महा लछण गुण सारा ।।
सोभित चौबिस बरण विधायक । सेवत चारि वर्ग फल दायक ।।
सोरठा - 9
पुनि पंचाक्छर देय , मंत्र स्व मृत्युंजय कहेसि ।
चिंता मणि दरसाय , वहुरि दछिणा मूर्ति दय ।।
छंद -
उरध मुख ओंकार सयुक्त त्रिपद गायत्री कहा ।।
पूर्व मुख दय पंच अछर उत्तर मृत्युंजय महा ।।
शुभग पच्छिम वदन शिव के मंत्र चिन्तामणि बहा ।।
शिवधाल शिव दक्छिन मूरति मंत्र दक्छिन मुख अहा ।।
दोहा- 10
पंच मंत्र दय पंच मुख , शिव गत अंतर ध्यान ।
वाण मंत्र विधि हरि जपे , भये समर्थ सुजान ।।
।।इति श्री शिव चरित महात्मे तृतीयोअध्याय ।।
No comments:
Post a Comment