।।। स्थाणोर्चरित्रम ।।।
।।।अथ श्री स्थाणोर्चरितृम षष्टमोअध्याय ।।।
हरषि सूत वोले मृदुवानी । सुनु शौनक शिव कथा पुरानी ।।
विधि विनती सुनि शिव आदेसे । प्राण रूप हरि अण्ड प्रवेसे ।।
चौविस सहित सचेतन काजा । सब तिहि नाम पुरुष वै राजा ।।
चरण आदि लगि अंत ललाटा । बिरचे चौदह भुवन विराटा ।।
तल पताल पद उपरि रसातल । गुल्फ महातल जानु तलातल ।।
परिअन वितल सुतल दुय जंघा । कटि तट अतल विश्व तन संघा ।।
धरणि संधि वंधन भभ नाभी । ह्रदि सरलोक महर ग्रीवामी ।।
मुख मै जन ललाट तप लोका । महारंघ्र शिर सत्य विशोका ।।
दोहा-1
सो विरंचि के धाम लगि , चौदह भुवन प्रकाश ।
अपर लोक जिहि योग जो , सो तह करै निवास ।।
भुजबल इन्द्र भाल ते शंकर । भृकुटी करकस काल भयंकर ।।
नासिक पुटन अस्वनी कुमारा । जमु जंबुकर दंत गण तारा ।।
श्रवण ते गण शारदा रसना । आनन अनल तालु ते बरुणा ।।
युगल नैन सो सूरज सोमा । अस्थि पहाड़ विटप गण रोमा ।।
अधर लोभ परि ओठ सुलाजा । नसा जाल नद नदी विराजा ।।
धरम उदर से पीठि अधरमा । माया हसन मोहि जग भरमा ।।
मित्रा वरुण ब्रषन विधि लिंगा । वीरज धर उपजावन अंगा ।।
कुच्छि समुद्र नाभि लगि मंदा । जासु तनय सो मदन अनंदा ।।
दोहा-2
तुष्टा प्रधटो गुह्य थल शुक्र शुकृत अनुसार ।
बुधि से बुध गुरु ह्रदय मगर नैन आधार ।।
स्वास पमन मेघा बलि केशा । छंद धातु मुनि मन राकेशा ।।
पलकै पाख विपल दिन राती । स्वैदिज तासु अखिल पशु जाती ।।
अस वैराट रूप अविराशा । जो जिहि लायक सो तिहि वाशा ।।
तिह छण ह्रदय विरंचि विचारा । अवहि न वरधै सृष्टि अपारा ।।
विधि तव चारि पुत्र उपजाये । मानस उरध रेत मन भाये ।।
सनक सनन्दन सनत कुमारा । सहित सनातन चारि उदारा ।।
महा भागवत पारम हंसा । निपुन ज्ञान विज्ञान वतंसा ।।
विधि कह तिनहि प्रजा निर्माबन । कह तिन हमहि ज्ञान मन भावन ।।
दोहा-3
लखि विराग युत चारि सुत , मन विरंचि कर क्रोध ।
साप देन उमगे बहुरि , रिसि रोकेसि करि वोध ।।
शाप देन कह मति अनुसारी । पुनि रोकेसि रिसि तनय विचारी ।।
रुकै न समरथ रोष भयंकर । विधि भृकुटी से प्रघटे शंकर ।।
रोदत रुद्र रजत निर्माना । रुद्र सुनाम विरंचि बखाना ।।
पूछेसि रुद्र तुम्है दुख काहा । कहव कि सो हम करै निबाहा ।।
बोले बिहसि विरंचि निरंतर । साधु वचन भाये तुम शंकर ।।
अब तुम होव सृष्टि संघारक । अनव्यापिनी सृष्टि निरधारक ।।
विरचौ प्रजा अनेक विधाना । सुनि अज गिरा शम्भु भगवाना ।।
बोले वचन लोक दुख हारक । करै तुम्हार उचित निरधारक ।।
दोहा-4
विरचै सृष्टि सनसनाती , तब आयुस अनुसार ।
येहि विधि अंगीकार करि , प्रजा हेत मन धार ।।
सृष्टि करन शंकर मन लाये । निज गुण रूप प्रजा निरमाये ।।
विरचे बहुत भूत गण नाना । प्रेत पिशाच उरग गज छाना ।।
भक्झण करण सकल सो धाये । विश्व सहित विधि हर पर आये ।।
हंसि बृह्मा तब सवहि निवारी । कहेसि रुद्र तुम जग भय हारी ।।
मन थिरता करि धीरज लावौ । तामस प्रजा न हर निरमावौ ।।
करव जाय तप प्रजा विराशा । हर लै प्रजा गये कैलाशा ।।
शंकर करन कठिन तप लागे । काली सहित ह्रदय अनुरागे ।।
विधि तव सात पुत्र उपजाये । गृह मेधी रिषि सकल कहाये ।।
सोरठा-5क
विरचे अंग विभाग , आठ अपर अरु सात जे ।
तीन सहित वैराग , पन्द्रह मैं मुनि वर दसौ ।।
दोहा-5ख
नारद मित्रा वरुण भृगु , अंगिर पुलह पुलस्ति ।
करदम अत्रि मरीच क्रतु , दझ्झ वशिष्ट अगस्ति ।।
विधि तव तीन शक्ति उपजाई । करन हेत प्रय नारि सुहाई ।।
सावित्री सरसुति गायत्री । परम सुन्दरी अति पावित्री ।।
नारि भाव विधि तनहि निहारे । सबै रिषिन जे वचन उचारे ।।
तात सुता संगम अनुरागे । अस केहु करी न करिहै आगे ।।
तुम ईश्वर हुय करत अधर्मा । तद जग को नहि करहि कुकरमा ।।
विधि मुख फेरो सो करि सरमा । तब पीठी से प्रघट अधरमा ।।
विधि सो अंग तजो छण माहीं । अपर देह धर तीनहु व्याहीं ।।
एक शक्ति अंशन त्रै वामा । तव से पतनी कर त्रिय नामा ।।
दोहा-6
विधि के वांये भौंह लगि , पघटी ग्यारह वाम ।
रुदऩ सब संग्रह करी , प्रथम सु काली नाम ।।
रुद्र अंग सब नील विलोहित । काली तन श्यामल जग मोहित ।।
प्रथम रुद्र भव शंकर नामा । सो शिव गौर वरण अभिरामा ।।
र ल उ ड ब व श ष स वरण बाची । सवद भेद अक्झर गुण राची ।।
काली कारी तन घन शौरी । तासु अंश प्रघटी सो गौरी ।।
उभय अंश मिलि अरुण सुहाई । सती दझ् गृह जनमी जाई ।।
पुनि विरचे विधि सुर सब जाती । देव पितर मुनि जन वहु भांती ।।
विधि सुत सैव सकल वैरागी । चारि उरध रेता त्रय त्यागी ।।
आन प्रजापति गृही सुहावन । तिनको वंश सुनौ अति पावन ।।
दोहा-7
नारद मन उतसंग से , कर्दम छाया पाय ।
दझ भये अंगुष्ठ से , यहि क्रम दस उपजाय ।।
विधि सुत प्रघट उदर से धरमा । विरचन हेत सकल सत करमा ।।
वहुरि विरंचि विचार सुभावै । अब मैथुनी सृष्टि निरमावै ।।
अस विचार निज देह प्रभावा । सुत स्वायंभुव मनु उपजावा ।।
तासु अंग अज करेसि द्वय भागा । दाहिन पुरुष वाम त्रिय लागा ।।
तिन कर मैथुन भाव रमन्या । उपजाये दुय सुत त्रै कन्या ।।
प्रथम सुपुत्र प्रयव्रत नामा । सुतन हेत जिन द्वीप निरामा ।।
सात दिवस जिन चक्र चलाये । रथ पारिखा समुद्र निरमाये ।।
सुत उत्थान पाद लधु तासू । घ्रुव हरि भक्त भये सुत तासू ।।
दोहा-8
स्वायंभुव की त्रै सुता , सकल सुलझन धाम ।
देवहुती आकूति पुनि , अपर प्रसूती नाम ।।
देव हुती स्वायंभुव कन्या । पर्म सुन्दरी लोक लवन्या ।।
उभय पछ विधि आयुस माही । दवहुती कर्दमहि विवाही ।।
तिनकै सात सुता सुत एका । कपिल नाम सिद्धेस विवेका ।।
सात सुता विधि सुतन बिबाही । अनसुयआ लगि सब सुख माही ।।
मित्र तनय मैत्रेय सुहाये । जिन विदुरै भागवत सुनाये ।।
मित्रा वरुण सुविधि मख धामा । लखि उरबसी भये वस कामा ।।
खसो मदन डारेसि घट मांही । युगल पुत्र प्रघटे तिहि पांही ।।
पुनि अपसरै दये यह शापा । तुम नर लोक वसौ वस तापा ।।
स्थाणोर्चरितृम एक
दोहा-9
कुंभज मित्रा वरुण के तनय अगस्त वषिष्ठ ।
जे प्रथमै मिमि साप वस नास भये लग इष्ट ।।
अत्रि रिषय अनुसुअया संगा । दंपति मिलि तप करै अभंगा ।।
अस्तुति करैं धरणि धर शीशा । दरशे देव जो प्रभु जगदीशा ।।
सती धर्म लगि मुनि तप सारा । विधि हरि हर आये इक वारा ।।
कहा कि मुनि वर मांग प्रवीनो । कहसि अत्रि सुत होव सु तीनो ।।
तथाअस्तु कहि तव त्रय देवा । अन्तर हित गमने अनभेवा ।।
मुनि मन भाव गर्भ लगि माता । समय पाय त्रे देव सुजाता ।।
विधि कर अंश चन्द्र प्रकाशा । हरि दत्तात्रय हर दुर्वासा ।।
उभय सुज्ञान कला अवतंशा । दच्झ शाप लगि शशि निरवंशा ।।
दोहा-10
विस्वश्रवा पुलस्त सुत जिनके प्रिय दुय वाम ।
देव सुता प्रिय इडं विडा अपर कैकसो नाम ।।
नाम कुवेर इडंविडा जाये । जच्झ राज सो धनद कहाये ।।
मालवन्त दानव की कन्या । नाम केकसी पर्म लवन्या ।।
विस्वश्रवा की सो प्रिय नारी । तिहिके तीन पुत्र बलधारी ।।
रावण कुम्भकरण अभिमानी । आन विभीषण हरि जन ज्ञानी ।।
अगिर तनय बृहसपति आदी । देवन गुरु परमारथ वादी ।।
भृगु के सुत शुक्रादि सुजाना । असुर पुरोहित वेद निधाना ।।
सवा लच्झ बिधा अधिकाबी । संजीवनी आसुरी मायाबी ।।
आन सुनौ मुनि अधरम वंशा । पुत्र मदन मत्सर मद हिंसा ।।
दोहा-11
स्वायुंभुव कर सुता अकूती । परम सुंदरी लोक विभूती ।
सो विरंचि सुत रुचि कै नारी । पुत्र जग्य अवतार मुरारी ।।
करदम सुता कला गुण धामा । सो विधि सुत मरीच प्रिय वामा ।।
तासु तनय कश्यप गुण धारी । तिन कर वंश अखिल संसारी ।।
दच्झ प्रचेत प्रसूति सुपाई । सुत दुख छाढ़ि सुता उपजाई ।।
तिन मैं ते दश धर्म बिबाही । कश्यप तिय तेरह तिन मांही ।।
दुइ भूतप दुइ अंगिर नारी । दुइ कृशास्व तारच्छ त्रिय चारी ।।
त्रि नव शेष चन्द्रमहि बिबाही । दछ्छ शाप तिनके सुत नाही ।।
दोहा-12
भानुरलंबा कुकुभ जमि विस्व साध्य मरुत्यानि ।
वसु मुहूर्ति संकल्प दश धर्म पतनि एतानि ।।
भानु के वेद ऋषभ सुत ग्याता । तिनके इन्द्रसेन नृप जाता ।।
लम्बा सुत विध्दोत दमंका । तनजित नवा तासु सुत वंका ।।
कुकुभा के सुत संकट नामा । तासु तनय कीकट अभिरामा ।।
जामि तनय भुवो दरगानि । तिनके स्वरग अनंद विधानि ।।
विस्वा के सुत विस्वे देवा । सो निरवंश त्रियोदश भेवा ।।
साध्या तनय साध्य परमारथ । तिनके अरथ सिद्धि लगि स्वारथ ।।
मरुतो तनय मरुत जै नंता । सो हरि अंश उपेन्द्र जयंता ।।
मुहुर्ति पुत्र मुहूर्त देवगन । सोपि काल फल दायक भूतन ।।
दोहा-13 क
संकल्पा संकलपि सुत सकल काम सुत तासु ।
वसु के पुत्र सुआठ वसु जिनकी लोक सुबासु ।।
13-ख
द्रोण प्राण ध्रुव अर्क वसु अग्नि विभावसु दोष ।
अखिल वंश तिनको सुनौ शिव दयाल संतोष ।।
द्रोण त्रिया अभिमत सुत नामा । हरष शोक भय आदिक तामा ।।
ऊरज स्वति स्वप्राण प्रिय बामा । जेहि सुत आयु परो जब नामा ।।
ध्रुव की नारि धरणि सुख नामा । तिहि के पुत्र बिबिध पुर ग्रामा ।।
अरक वासुना त्रिय शुभ पाई । जने तरब लगि सुत समुदाई ।।
आगिन भार जापिय वसु धारा । पुत्र द्रविण कादय गुण सारा ।।
सुत असकंध सुकृतिका जाता । विदित विपाषा लगि षट माता ।।
वसु अंगिरसी सुत विसु करमा । तासु पुत्र चाझुष मनु षडमा ।।
चाझसु मनु कर साध्या वामा । जनमें विस्व साध्य सुत नामा ।।
दोहा-14
विभा वसुर उषा त्रिया दिवस भये सुत तासु ।
तिन त्रिय निशि प्रत्यूष सुत जाग्रत कर्मणि जासु ।।
दोष सरवरो त्रिय लगि वंशा । सुत शिशु मार चक्र हरि अंशा ।।
भूत भारजा प्रथम सुरूपा । जनमें कोटिक रुद्र अनूपा ।।
भबहु भीम रेवतो बृषाकपि । वामदेव अज उग्र नाम अपि ।।
त्रिय महनि सुत अजैकपादा । अहिर वुध्न वहु रूपज गादा ।।
जे प्रधान अरु भूत विनायक । ग्यारह रुद्र सवै गण पायक ।।
जो कृसास्वकर अर्चिषि भारज । धूम्रकेश सुत जनेउदारज ।।
धिषणा त्रिय लगि पुत्र वेदसिर । देवल वपुना मनु अनुसंधिर ।।
तनय अंगिरस नारि विभेदा । स्वधा के पितर सतो सुत वेदा ।।
दोहा-15 क
तनय अंगिरस के पितर सुधा लगि वाम ।
दुसरे अथरव अंश वेद सतो सुत नाम ।।
15 ख
कद्ववाड़ अनलादया अंत सुअग्नि स्वात ।
वर्धि्ष दाजम अर्जमा वरुन सोमया सात ।।
दशारशय भये प्रथम जो व्याधा । पुनि कालिंजर मृग तन साधा ।।
बहुरि द्वीप सर चक बक वंशा । पुनि भये मान सरोवर हंसा ।।
वहुरि विप्र कुरुझेत्र मझारी । वेद पारगानव गुण धारी ।।
तपसे दिव्य पितर गति पाई । प्रथम श्राद्ध से सुमिरे जाई ।।
दक्झ सुता युग तारच्छ भामिनि । विनिता कहु पतंगी जामिन ।।
जामिन सुत सलभा दल टी डी । पतंगी तनय पतंगा कीडी ।।
कन्दू तनय ब्याल विष धरुणा । विनिता पुत्र गरुण लधु अरुणा ।।
अरुण सूर्यसारथि कर हीना । गरुण विष्णु वाहन लवलीना ।।
दोहा-16
त्रिदस कन्यका दक्ष लगि कश्यप की प्रिय नारि ।
जासु वंश ते सकल जग भये चराचर झार ।।
तिमि के सुत जादौ गण जूहा । सुरमा के सुत सुपद समूहा ।।
सुरमी सुत पशु महिषा गावा । एक सफा दुसफा अनुभावा ।।
इला के पुत्र विटप सव जाती । सकल मरूहा तरु बहु भांती ।।
ताम्रा तनय अमित खग राचा । सेन ग्रध उलूक नष पांचा ।।
क्रोधावसा के सुत सब सरपा । दंद सूक आदिक वस दरपा ।।
मुना के पुत्र अपय रस सर्वा । तनय अरिष्टा गण गंधर्वा ।।
काष्टा तनय सकल पशु जाती । गज लगि पचःनषा बहुभाती ।।
अज मृग सिंह श्वान सव राशी । खेट ग्रामचर घर वन वासी ।।
दोहा-17 अ
सुरसा के सुत खल सकल जातुधान बलवान ।
दनु के इकसठ दानव दस अरु आठ प्रधान ।।
छन्द -
अरुणो विभावसु संवरासुर हय ग्रीव दुमूर्धना ।।
अयोमुख अरु शंकु शिर सुरभानु कपिल अरिष्टना ।।
धूमकेशन विरूपा क्ष्णा विप्रचिक दुरज परुना ।।
शिवदयाल वृष पर्वा पुलोभा एक चक्रोनुतापना ।।
दोहा-17ब
नमुचि वरी सुरभानु की सुता सुप्रभा नाम ।
सरमिष्टा वृष पर्व को सुता जजाति की मात ।।
वैश्वानर युग सुता कुमारी । कश्यप ऋषि कौ बरी विचारी ।।
उप दानवी हयशिश नामा । लगि कालिका पुलोमा वामा ।।
हिरसयाक्ष उपदानवी जाता । क्रतु हयसिरसि हयसिरा ष्याता ।।
सुत पौलोम पुलोमा अंशा । कालिकेय कालिका वतंशा ।।
उभय ने साठि सहस सुत जाये । स्वर्ण निवात कवच सुवसाये ।।
विप्र चित्त सिहिका विवाही । सत सुत राहु केतु ग्रह माही ।।
आदित के बारह सुत अधिकारी । तिनमै हरि वामन सुत धारी ।।
तेज सुद्वादश आदित भाषत । यश कीरत सुनि पातक नाषत ।।
दोहा-18 क
विवस्वाम अरजम पुषा तुष्ट भगा सविस्तार ।
मित्र सक्र वामन वरुण धातु विधातो दार ।।
18 ख
विवस्वान संज्ञा त्रिया ऋद्ध देव सुत जात ।
जा सो वैवस्वत कहे वरतमान जो सात ।।
पुनि मैथुन ते सुत जम जाये । जमुना सुता जु हरि वर पाये ।।
मैथुन दुसह देह धरि अश्वनी । त्रिया छाया तजि तह वन गमनी ।।
दुय छाया मैथुन करणी । जेढे शनि लधु मनु सा वरणी ।।
विवस्वान वन खोजि विचारी । अस्व रूप वडवा रतिकारी ।।
वीरज दुसह नाक फुरकाये । नाशति नाम युगल सुत जाये ।।
वीज दुभाग नाक पुट धारा । विदित वैद अश्वनी कुमारा ।।
अरजम सुत मातृका नामा । जासु तनय चरषण गुण धामा ।।
जिनके सुत मानुष सव जाती । उप कलपे विरंचि वहु भांती ।।
दोहा-19
पूषा वंश न भाग मख परपोषण हवि खात ।
जासु रदन क्रत दक्ष के वीरभद्र करि धात ।।
दानव सुता रोचना नामा । सोत्वष्टा कै कोमल वामा ।।
तिहिके तनय व्रत विश्रुरूपा । जो देवन उपरोहित निरूपा ।।
जबहि बृहस्पति गये रिसाई । भये ते विमुख निरादर पाई ।।
जवसे सुरपति इन्द्र कहाये । सुरग विशद इन्द्रासन पाये ।।
अहमित इन्द्र पाय बड़ सासन । आये सुर गुरु दिये न आसन ।।
केहि न होत मद प्रभुता पाई । धन विधा मद तन तरुणाई ।।
काहि न मत्सर अनल जराये । शोक समीर न काहि सुखाये ।।
को न भयस प्रभुता मद अंधा । को नहि भृमसि अगम ग्रह धंधा ।।
छंद-
मोह के वश जग को न भयो । अरु माया जाल न काहि फसायो ।।
लोभ कहो किहि को न किये वश । क्रोध औ काम न काहि सतायो ।।
सोंच कलेश चिंता तृश्ना । शंका सापिन काहि न खायो ।।
शिवदयाल बचो इनते विरलो । जिन हरि हर हेतु सुजन्म गवायो ।।
दोहा-20
सुर गुरु के अपमान ते छूटो इन्द्र समाज ।
पुनि वसुरूपै गुरु करो तव पायो निज राज ।।
चौपाई -
देय प्रतीक्ष सुरण मख भागा । दनुज परोक्ष मातु अनुरागा ।।
दानव सबल इन्द्र तव देखी । विस्वरूपा सिर काटि विशेषी ।।
तीनि शिरशि इक भागर गैया । दुसरो तीतर तैति तिरैया ।।
अमी पिवन मुख भा कलविंका । जेहि गवरै आ कहत अलिंका ।।
सुरापान मुख भयो कपिंजल । जो तोतुर सित धूम्र गिरा षल ।।
अन्न अधार तितरी नामा । जासु बचन शुभ तीतर स्यामा ।।
जो दुजालि कुल वध अनुरागे । ताहि विप्र वध सम अध लागै ।।
खग पालै लधु पिंजर जाला । सो मानुष समान चण्डाला ।।
दोहा-21
विस्वरूपा हत्या त्रिविध लगेसि इन्द्र पर धाय ।
गुरु हा दुज हा बंधु हत् एकै मह त्रिगुणाय ।।
चौपाई -
करि सुरेश तीन हय मेधा । जप त्रिकोटि गायत्री वेधा ।।
मुचहि न हत्या बिकल सुरेशा । विनयेसि विधिकौ पाय कलेशा ।।
विधि सो हत्या करि युग भागा । देय भूमि जल त्रिय तरु लागा ।।
धरी धरणि हत्या तद ऊसर । पूरण षात पाय वर दूसर ।।
जल मैं हत्या उद्वबुद्द फेना । धरेसि पाय वर मल हरि लेना ।।
लही विटप हत्या सोइ वादा । कटि अनरोहै विधि परसादा ।।
त्रिय कौ हत्या रितु प्रतिमासा । लयेसि पाप वर संतति आशा ।।
प्रथम दिवस त्रिय सम चांण्डाली । दूसर सम दुज धात कुचाली ।।
दोहा-22
रजोवती दिन तीसरे त्रिय रज को अनुमान ।
चौथे दिन जगयोग सुचि करि भंजन असनान ।।
तव लग मुख न विलोकन योगा । रमि द्विज दोष परै तहि भोगा ।।
संतति होय मलेक्ष निरासै । घर उजरै पितु मातु विनासै ।।
तीन उपरि षट दिन परजंता । जदि दम्पति वस काम रमंता ।।
तद संतान होय खल कोही । मातहि पितहि कलेशन द्रोही ।।
सुता विषम सम दिन सुत आसै । सोरह दिन लौ गरभ निवासै ।।
सविता पतनी प्रंश्रि रमन्या । सपूत पांच पुत्र जुग कन्या ।।
चारि सुता सो जग पावित्री । त्रय व्याहुती अपर सावित्री ।।
जनमें पर्म सुभग सुत पांचा । लोक विदित पावन गुण रांचा ।।
दोहा-23
सोम जजन चन्द्रायन अगिनहोत्र पशु मेध ।
चतुर मास्य सर माह मख शिवदयाल फल एध ।।
चौपाई -
सिद्धिर नाम भगा कर नारी । अंग महिम विभु प्रभु सुत चारी ।।
आशिष वरारोह दुय कन्या । सुव्रत सुन्दरी लोक लवन्या ।।
कहू नाम धातुर की नारी । जननी चारि सुता सुत चारी ।।
बाली सिनो अनुमती राका । चारि सुता ये पर्व पताका ।।
पूरण मास अरु सायां प्राता । दर्श समेत चारि सुत जाता ।।
क्रिया विधाना त्रिय सुत जाता । तपहित पंच अगिनि विष्याता ।।
वरुण की नारि चरखनी नामा । तिहि के सुत भृगु बलमीक विदामा ।।
भृगु के सुत भार्गव सुख भोगी । वालमीक बलमिक सुत योगी ।।
दोहा-24
मित्र नारि रेवती सुत पिप्पल आन अरिष्ट ।
उरवसि मित्रा वरुण के तनय अगस्त वशिष्ट ।।
सुरपति नारि पुलोमा सौभगि । त्रिसुत जयंत रिषभ मीडुक लगि ।।
वामन त्रिय कीरति गति शोका । जनमे पुत्र व्रहत अस लोका ।।
भये सो भगादया सुत जासू । सदा सकल हिय हर्ष हुलासू ।।
दिति सुत हिरएयाक्ष हिरणकुस । अपर पवन उनचास इन्द्र सुस ।।
हिरणाकुस युग सुत समवादा । यह भागवत जेठ प्रहलादा ।।
तिनके पुत्र विरोचन वलधर । तासु पुत्र बलि सुत वानासुर ।।
पर्म भागवत दिति के वंशा । वलि प्रहलाद जासु अवतंसा ।।
स्वायुंभुव सव सुता प्रसूती । विधि सुत दझ वरी अबभूती ।।
सोरठा-
दक्ष प्रजापति नाम जनमी सोरह सुभ सुता ।
देय सुलक्षण धाम तिनमें तेरह धर्म कह ।।
दोहा-25 क
एक स्वधा पितरण दई स्वाहा अगिनि कि वाम ।
सुता सती शिव को वरी सुनौ धर्म को नाम ।।
25 ख
श्रद्धा मैत्री दया वुधि सांति तितिझा तुष्टि ।।
पुष्टि क्रिया ह्री उन्नति मेधा मूरति श्रष्टि ।।
श्रद्धा सुत शुभ मैत्रि प्रसादा । दया अभै बुधि अरथ उपादा ।।
शांति तनय सुख तितिझ क्षेमा । अस्मय पुष्टि तुष्टि मुद प्रेमा ।।
उन्नत दरप योग क्रय एधा । ह्री के प्रश्रय अ स्मृति मेधा ।।
एति धर्म त्रिय वंश धरायण । मूरति सुत दुय नर नारायण ।।
जासु जनम वहै त्रिविध बयारी । शीतल मंद सुगंध पियारी ।।
ग्रह सुपंथ नभ निर्मल तारा । गिरि प्रशेद सरिता शुभ धारा ।।
देव सकल बाजने बजावै । नृत अपसरा गंधरव गावै ।।
जै जै करै सुमन सुर वरसे । नभ दुंदुभी बजै सुर हर्षे ।।
दोहा-26
जिनको तप लखि इन्द्र डरि रंभा मदन वुलाय ।
चाहत डिगावन सखालय करे अनेक उपाय ।।
डरपे इन्द्र डिगे हरि नाही । तिन विरची बहु त्रिय तन पाही ।।
दै सब इन्द्र कह लै जावौ । हमैं न रचि माया दरसावौ ।।
इन्द्र न एकौ लेत लजाई । चलो भवन मन मैं पछिताई ।।
तब हरि देख इन्द्र मन छोभा । दै उरवसी सुरग कर शोभा ।।
अपर सु अंतरध्यान परायण । करण लगे तप नर नारायण ।।
अगिनि त्रिया स्वाहा त्रि सुतासन । सुचि पावक पवमान हुतासन ।।
स्वधा पितर पतनी गुण धामा । तनय सोम पा लगि अभिरामा ।।
दक्ष की सुता सती गुण खानी । शिवै समरपी जानि भवानी ।।
दोहा- 27 क
निर्गुण ब्रह्म सगुण मय विधि हरि शंकर नाम ।
रजगुण विधि हरि सतोगुण शम्भु तमोगुण धाम ।।
27 ख
तथा गुण मयी देवि त्रय सतगुण कमला नाम ।
ब्रह्माणी गुण राजसी तमगुण काली श्याम ।।
विदित महा काली गुण धामा । दक्ष की सुता सती अस नामा ।।
तहां सती शंकरहि विवाही । निज गुण रूप सती सुत नाही ।।
पति पितु खेद तजी तह देहा । पारवती भइ हिमगिर ग्रेहा ।।
तब तह गिरिजा शिवै विवाही । नाम रूप बहु गिने न जाही ।।
भद्रा गवरि चण्डिका विजया । दुर्गा उमा भगवती जया ।।
कामाख्या कामदा क्रमंति । भद्र कालि कालिका जयंति ।।
चामुण्डा सति शिवा भवानी । नाम अनेक सकल गुण खानी ।।
धरे विविध तन मिलि गुण रूपा । करै सुकारज सकल अनूपा ।।
दोहा-28
सृष्टि वंश उतपति सुने सवके मन आनन्द ।
शिवदयाल बोले बहुर । शोनकादि मुनि बृन्द ।।
सूत सकल जानत इतिहासा । तब मुखँ अम्बुज कथा प्रथा प्रकाशा ।।
पिये करण पुट चरित पियूषा । उर संतोष न निवरै भुषा ।।
सुनि पुराण पोषे मन माही । तिन विशेष रस पाएसि नाही ।।
सुचि सुन्दर शिव कथा सुनावौ । चरित पुराण मनोहर गावौ ।।
प्रधटी प्रथम दक्ष ग्रह माही । सती नाम तह शिवहि विवाही ।।
पारवती भई हिमगिर धामा । शिवहि वरी तह गिरजा नामा ।।
शिव केहि भांति एक तन माही । सनी उमा दुय जनम विवाही ।।
भयो न सती पुत्र केहि कारण । केहि विधि पारवती तन धारण ।।
दोहा-29
रुचिर चरित जे अपर पुनि कहौ सूत समुझाय ।
शिवदयाल कहि मौन भये रहे कथा मन लाय ।।
इति श्री शिव चरित्र महात्म षष्टोअध्याय
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