Sunday, 17 April 2011

सष्ठम अध्याय

।।। स्थाणोर्चरित्रम ।।।

।।।अथ श्री स्थाणोर्चरितृम षष्टमोअध्याय ।।।



हरषि सूत वोले मृदुवानी । सुनु शौनक शिव कथा पुरानी ।।

विधि विनती सुनि शिव आदेसे । प्राण रूप हरि अण्ड प्रवेसे ।।

चौविस सहित सचेतन काजा । सब तिहि नाम पुरुष वै राजा ।।

चरण आदि लगि अंत ललाटा । बिरचे चौदह भुवन विराटा ।।

तल पताल पद उपरि रसातल । गुल्फ महातल जानु तलातल ।।

परिअन वितल सुतल दुय जंघा । कटि तट अतल विश्व तन संघा ।।

धरणि संधि वंधन भभ नाभी । ह्रदि सरलोक महर ग्रीवामी ।।

मुख मै जन ललाट तप लोका । महारंघ्र शिर सत्य विशोका ।।

दोहा-1

सो विरंचि के धाम लगि , चौदह भुवन प्रकाश ।

अपर लोक जिहि योग जो , सो तह करै निवास ।।


भुजबल इन्द्र भाल ते शंकर । भृकुटी करकस काल भयंकर ।।

नासिक पुटन अस्वनी कुमारा । जमु जंबुकर दंत गण तारा ।।

श्रवण ते गण शारदा रसना । आनन अनल तालु ते बरुणा ।।

युगल नैन सो सूरज सोमा । अस्थि पहाड़ विटप गण रोमा ।।

अधर लोभ परि ओठ सुलाजा । नसा जाल नद नदी विराजा ।।

धरम उदर से पीठि अधरमा । माया हसन मोहि जग भरमा ।।

मित्रा वरुण ब्रषन विधि लिंगा । वीरज धर उपजावन अंगा ।।

कुच्छि समुद्र नाभि लगि मंदा । जासु तनय सो मदन अनंदा ।।

दोहा-2

तुष्टा प्रधटो गुह्य थल शुक्र शुकृत अनुसार ।

बुधि से बुध गुरु ह्रदय मगर नैन आधार ।।

स्वास पमन मेघा बलि केशा । छंद धातु मुनि मन राकेशा ।।

पलकै पाख विपल दिन राती । स्वैदिज तासु अखिल पशु जाती ।।

अस वैराट रूप अविराशा । जो जिहि लायक सो तिहि वाशा ।।

तिह छण ह्रदय विरंचि विचारा । अवहि न वरधै सृष्टि अपारा ।।

विधि तव चारि पुत्र उपजाये । मानस उरध रेत मन भाये ।।

सनक सनन्दन सनत कुमारा । सहित सनातन चारि उदारा ।।

महा भागवत पारम हंसा । निपुन ज्ञान विज्ञान वतंसा ।।

विधि कह तिनहि प्रजा निर्माबन । कह तिन हमहि ज्ञान मन भावन ।।

दोहा-3

लखि विराग युत चारि सुत , मन विरंचि कर क्रोध ।

साप देन उमगे बहुरि , रिसि रोकेसि करि वोध ।।


शाप देन कह मति अनुसारी । पुनि रोकेसि रिसि तनय विचारी ।।

रुकै न समरथ रोष भयंकर । विधि भृकुटी से प्रघटे शंकर ।।

रोदत रुद्र रजत निर्माना । रुद्र सुनाम विरंचि बखाना ।।

पूछेसि रुद्र तुम्है दुख काहा । कहव कि सो हम करै निबाहा ।।

बोले बिहसि विरंचि निरंतर । साधु वचन भाये तुम शंकर ।।

अब तुम होव सृष्टि संघारक । अनव्यापिनी सृष्टि निरधारक ।।

विरचौ प्रजा अनेक विधाना । सुनि अज गिरा शम्भु भगवाना ।।

बोले वचन लोक दुख हारक । करै तुम्हार उचित निरधारक ।।

दोहा-4

विरचै सृष्टि सनसनाती , तब आयुस अनुसार ।

येहि विधि अंगीकार करि , प्रजा हेत मन धार ।।


सृष्टि करन शंकर मन लाये । निज गुण रूप प्रजा निरमाये ।।

विरचे बहुत भूत गण नाना । प्रेत पिशाच उरग गज छाना ।।

भक्झण करण सकल सो धाये । विश्व सहित विधि हर पर आये ।।

हंसि बृह्मा तब सवहि निवारी । कहेसि रुद्र तुम जग भय हारी ।।

मन थिरता करि धीरज लावौ । तामस प्रजा न हर निरमावौ ।।

करव जाय तप प्रजा विराशा । हर लै प्रजा गये कैलाशा ।।

शंकर करन कठिन तप लागे । काली सहित ह्रदय अनुरागे ।।

विधि तव सात पुत्र उपजाये । गृह मेधी रिषि सकल कहाये ।।

सोरठा-5क

विरचे अंग विभाग , आठ अपर अरु सात जे ।

तीन सहित वैराग , पन्द्रह मैं मुनि वर दसौ ।।

दोहा-5ख

नारद मित्रा वरुण भृगु , अंगिर पुलह पुलस्ति ।

करदम अत्रि मरीच क्रतु , दझ्झ वशिष्ट अगस्ति ।।

विधि तव तीन शक्ति उपजाई । करन हेत प्रय नारि सुहाई ।।

सावित्री सरसुति गायत्री । परम सुन्दरी अति पावित्री ।।

नारि भाव विधि तनहि निहारे । सबै रिषिन जे वचन उचारे ।।

तात सुता संगम अनुरागे । अस केहु करी न करिहै आगे ।।

तुम ईश्वर हुय करत अधर्मा । तद जग को नहि करहि कुकरमा ।।

विधि मुख फेरो सो करि सरमा । तब पीठी से प्रघट अधरमा ।।

विधि सो अंग तजो छण माहीं । अपर देह धर तीनहु व्याहीं ।।

एक शक्ति अंशन त्रै वामा । तव से पतनी कर त्रिय नामा ।।

दोहा-6

विधि के वांये भौंह लगि , पघटी ग्यारह वाम ।

रुदऩ सब संग्रह करी , प्रथम सु काली नाम ।।

रुद्र अंग सब नील विलोहित । काली तन श्यामल जग मोहित ।।

प्रथम रुद्र भव शंकर नामा । सो शिव गौर वरण अभिरामा ।।

र ल उ ड ब व श ष स वरण बाची । सवद भेद अक्झर गुण राची ।।

काली कारी तन घन शौरी । तासु अंश प्रघटी सो गौरी ।।

उभय अंश मिलि अरुण सुहाई । सती दझ् गृह जनमी जाई ।।

पुनि विरचे विधि सुर सब जाती । देव पितर मुनि जन वहु भांती ।।

विधि सुत सैव सकल वैरागी । चारि उरध रेता त्रय त्यागी ।।

आन प्रजापति गृही सुहावन । तिनको वंश सुनौ अति पावन ।।

दोहा-7

नारद मन उतसंग से , कर्दम छाया पाय ।

दझ भये अंगुष्ठ से , यहि क्रम दस उपजाय ।।

विधि सुत प्रघट उदर से धरमा । विरचन हेत सकल सत करमा ।।

वहुरि विरंचि विचार सुभावै । अब मैथुनी सृष्टि निरमावै ।।

अस विचार निज देह प्रभावा । सुत स्वायंभुव मनु उपजावा ।।

तासु अंग अज करेसि द्वय भागा । दाहिन पुरुष वाम त्रिय लागा ।।

तिन कर मैथुन भाव रमन्या । उपजाये दुय सुत त्रै कन्या ।।

प्रथम सुपुत्र प्रयव्रत नामा । सुतन हेत जिन द्वीप निरामा ।।

सात दिवस जिन चक्र चलाये । रथ पारिखा समुद्र निरमाये ।।

सुत उत्थान पाद लधु तासू । घ्रुव हरि भक्त भये सुत तासू ।।

दोहा-8

स्वायंभुव की त्रै सुता , सकल सुलझन धाम ।

देवहुती आकूति पुनि , अपर प्रसूती नाम ।।

देव हुती स्वायंभुव कन्या । पर्म सुन्दरी लोक लवन्या ।।

उभय पछ विधि आयुस माही । दवहुती कर्दमहि विवाही ।।

तिनकै सात सुता सुत एका । कपिल नाम सिद्धेस विवेका ।।

सात सुता विधि सुतन बिबाही । अनसुयआ लगि सब सुख माही ।।

मित्र तनय मैत्रेय सुहाये । जिन विदुरै भागवत सुनाये ।।

मित्रा वरुण सुविधि मख धामा । लखि उरबसी भये वस कामा ।।

खसो मदन डारेसि घट मांही । युगल पुत्र प्रघटे तिहि पांही ।।
पुनि अपसरै दये यह शापा । तुम नर लोक वसौ वस तापा ।।

स्थाणोर्चरितृम एक
दोहा-9

कुंभज मित्रा वरुण के तनय अगस्त वषिष्ठ ।

जे प्रथमै मिमि साप वस नास भये लग इष्ट ।।

अत्रि रिषय अनुसुअया संगा । दंपति मिलि तप करै अभंगा ।।

अस्तुति करैं धरणि धर शीशा । दरशे देव जो प्रभु जगदीशा ।।

सती धर्म लगि मुनि तप सारा । विधि हरि हर आये इक वारा ।।

कहा कि मुनि वर मांग प्रवीनो । कहसि अत्रि सुत होव सु तीनो ।।

तथाअस्तु कहि तव त्रय देवा । अन्तर हित गमने अनभेवा ।।

मुनि मन भाव गर्भ लगि माता । समय पाय त्रे देव सुजाता ।।

विधि कर अंश चन्द्र प्रकाशा । हरि दत्तात्रय हर दुर्वासा ।।

उभय सुज्ञान कला अवतंशा । दच्झ शाप लगि शशि निरवंशा ।।

दोहा-10

विस्वश्रवा पुलस्त सुत जिनके प्रिय दुय वाम ।

देव सुता प्रिय इडं विडा अपर कैकसो नाम ।।

नाम कुवेर इडंविडा जाये । जच्झ राज सो धनद कहाये ।।

मालवन्त दानव की कन्या । नाम केकसी पर्म लवन्या ।।

विस्वश्रवा की सो प्रिय नारी । तिहिके तीन पुत्र बलधारी ।।

रावण कुम्भकरण अभिमानी । आन विभीषण हरि जन ज्ञानी ।।

अगिर तनय बृहसपति आदी । देवन गुरु परमारथ वादी ।।

भृगु के सुत शुक्रादि सुजाना । असुर पुरोहित वेद निधाना ।।

सवा लच्झ बिधा अधिकाबी । संजीवनी आसुरी मायाबी ।।

आन सुनौ मुनि अधरम वंशा । पुत्र मदन मत्सर मद हिंसा ।।

दोहा-11

स्वायुंभुव कर सुता अकूती । परम सुंदरी लोक विभूती ।

सो विरंचि सुत रुचि कै नारी । पुत्र जग्य अवतार मुरारी ।।


करदम सुता कला गुण धामा । सो विधि सुत मरीच प्रिय वामा ।।

तासु तनय कश्यप गुण धारी । तिन कर वंश अखिल संसारी ।।

दच्झ प्रचेत प्रसूति सुपाई । सुत दुख छाढ़ि सुता उपजाई ।।

तिन मैं ते दश धर्म बिबाही । कश्यप तिय तेरह तिन मांही ।।

दुइ भूतप दुइ अंगिर नारी । दुइ कृशास्व तारच्छ त्रिय चारी ।।

त्रि नव शेष चन्द्रमहि बिबाही । दछ्छ शाप तिनके सुत नाही ।।

दोहा-12

भानुरलंबा कुकुभ जमि विस्व साध्य मरुत्यानि ।

वसु मुहूर्ति संकल्प दश धर्म पतनि एतानि ।।

भानु के वेद ऋषभ सुत ग्याता । तिनके इन्द्रसेन नृप जाता ।।

लम्बा सुत विध्दोत दमंका । तनजित नवा तासु सुत वंका ।।

कुकुभा के सुत संकट नामा । तासु तनय कीकट अभिरामा ।।

जामि तनय भुवो दरगानि । तिनके स्वरग अनंद विधानि ।।

विस्वा के सुत विस्वे देवा । सो निरवंश त्रियोदश भेवा ।।

साध्या तनय साध्य परमारथ । तिनके अरथ सिद्धि लगि स्वारथ ।।

मरुतो तनय मरुत जै नंता । सो हरि अंश उपेन्द्र जयंता ।।

मुहुर्ति पुत्र मुहूर्त देवगन । सोपि काल फल दायक भूतन ।।

दोहा-13 क

संकल्पा संकलपि सुत सकल काम सुत तासु ।

वसु के पुत्र सुआठ वसु जिनकी लोक सुबासु ।।

13-ख

द्रोण प्राण ध्रुव अर्क वसु अग्नि विभावसु दोष ।

अखिल वंश तिनको सुनौ शिव दयाल संतोष ।।

द्रोण त्रिया अभिमत सुत नामा । हरष शोक भय आदिक तामा ।।

ऊरज स्वति स्वप्राण प्रिय बामा । जेहि सुत आयु परो जब नामा ।।

ध्रुव की नारि धरणि सुख नामा । तिहि के पुत्र बिबिध पुर ग्रामा ।।

अरक वासुना त्रिय शुभ पाई । जने तरब लगि सुत समुदाई ।।

आगिन भार जापिय वसु धारा । पुत्र द्रविण कादय गुण सारा ।।

सुत असकंध सुकृतिका जाता । विदित विपाषा लगि षट माता ।।

वसु अंगिरसी सुत विसु करमा । तासु पुत्र चाझुष मनु षडमा ।।

चाझसु मनु कर साध्या वामा । जनमें विस्व साध्य सुत नामा ।।

दोहा-14

विभा वसुर उषा त्रिया दिवस भये सुत तासु ।

तिन त्रिय निशि प्रत्यूष सुत जाग्रत कर्मणि जासु ।।

दोष सरवरो त्रिय लगि वंशा । सुत शिशु मार चक्र हरि अंशा ।।

भूत भारजा प्रथम सुरूपा । जनमें कोटिक रुद्र अनूपा ।।

भबहु भीम रेवतो बृषाकपि । वामदेव अज उग्र नाम अपि ।।

त्रिय महनि सुत अजैकपादा । अहिर वुध्न वहु रूपज गादा ।।

जे प्रधान अरु भूत विनायक । ग्यारह रुद्र सवै गण पायक ।।

जो कृसास्वकर अर्चिषि भारज । धूम्रकेश सुत जनेउदारज ।।

धिषणा त्रिय लगि पुत्र वेदसिर । देवल वपुना मनु अनुसंधिर ।।

तनय अंगिरस नारि विभेदा । स्वधा के पितर सतो सुत वेदा ।।

दोहा-15 क

तनय अंगिरस के पितर सुधा लगि वाम ।

दुसरे अथरव अंश वेद सतो सुत नाम ।।

15 ख

कद्ववाड़ अनलादया अंत सुअग्नि स्वात ।

वर्धि्ष दाजम अर्जमा वरुन सोमया सात ।।


दशारशय भये प्रथम जो व्याधा । पुनि कालिंजर मृग तन साधा ।।

बहुरि द्वीप सर चक बक वंशा । पुनि भये मान सरोवर हंसा ।।

वहुरि विप्र कुरुझेत्र मझारी । वेद पारगानव गुण धारी ।।

तपसे दिव्य पितर गति पाई । प्रथम श्राद्ध से सुमिरे जाई ।।

दक्झ सुता युग तारच्छ भामिनि । विनिता कहु पतंगी जामिन ।।

जामिन सुत सलभा दल टी डी । पतंगी तनय पतंगा कीडी ।।

कन्दू तनय ब्याल विष धरुणा । विनिता पुत्र गरुण लधु अरुणा ।।

अरुण सूर्यसारथि कर हीना । गरुण विष्णु वाहन लवलीना ।।

दोहा-16

त्रिदस कन्यका दक्ष लगि कश्यप की प्रिय नारि ।

जासु वंश ते सकल जग भये चराचर झार ।।

तिमि के सुत जादौ गण जूहा । सुरमा के सुत सुपद समूहा ।।

सुरमी सुत पशु महिषा गावा । एक सफा दुसफा अनुभावा ।।

इला के पुत्र विटप सव जाती । सकल मरूहा तरु बहु भांती ।।

ताम्रा तनय अमित खग राचा । सेन ग्रध उलूक नष पांचा ।।

क्रोधावसा के सुत सब सरपा । दंद सूक आदिक वस दरपा ।।

मुना के पुत्र अपय रस सर्वा । तनय अरिष्टा गण गंधर्वा ।।

काष्टा तनय सकल पशु जाती । गज लगि पचःनषा बहुभाती ।।

अज मृग सिंह श्वान सव राशी । खेट ग्रामचर घर वन वासी ।।

दोहा-17 अ

सुरसा के सुत खल सकल जातुधान बलवान ।

दनु के इकसठ दानव दस अरु आठ प्रधान ।।

छन्द -

अरुणो विभावसु संवरासुर हय ग्रीव दुमूर्धना ।।

अयोमुख अरु शंकु शिर सुरभानु कपिल अरिष्टना ।।

धूमकेशन विरूपा क्ष्णा विप्रचिक दुरज परुना ।।

शिवदयाल वृष पर्वा पुलोभा एक चक्रोनुतापना ।।

दोहा-17ब

नमुचि वरी सुरभानु की सुता सुप्रभा नाम ।

सरमिष्टा वृष पर्व को सुता जजाति की मात ।।

वैश्वानर युग सुता कुमारी । कश्यप ऋषि कौ बरी विचारी ।।

उप दानवी हयशिश नामा । लगि कालिका पुलोमा वामा ।।

हिरसयाक्ष उपदानवी जाता । क्रतु हयसिरसि हयसिरा ष्याता ।।

सुत पौलोम पुलोमा अंशा । कालिकेय कालिका वतंशा ।।

उभय ने साठि सहस सुत जाये । स्वर्ण निवात कवच सुवसाये ।।

विप्र चित्त सिहिका विवाही । सत सुत राहु केतु ग्रह माही ।।

आदित के बारह सुत अधिकारी । तिनमै हरि वामन सुत धारी ।।

तेज सुद्वादश आदित भाषत । यश कीरत सुनि पातक नाषत ।।

दोहा-18 क

विवस्वाम अरजम पुषा तुष्ट भगा सविस्तार ।

मित्र सक्र वामन वरुण धातु विधातो दार ।।

18 ख

विवस्वान संज्ञा त्रिया ऋद्ध देव सुत जात ।

जा सो वैवस्वत कहे वरतमान जो सात ।।

पुनि मैथुन ते सुत जम जाये । जमुना सुता जु हरि वर पाये ।।

मैथुन दुसह देह धरि अश्वनी । त्रिया छाया तजि तह वन गमनी ।।

दुय छाया मैथुन करणी । जेढे शनि लधु मनु सा वरणी ।।

विवस्वान वन खोजि विचारी । अस्व रूप वडवा रतिकारी ।।

वीरज दुसह नाक फुरकाये । नाशति नाम युगल सुत जाये ।।

वीज दुभाग नाक पुट धारा । विदित वैद अश्वनी कुमारा ।।

अरजम सुत मातृका नामा । जासु तनय चरषण गुण धामा ।।

जिनके सुत मानुष सव जाती । उप कलपे विरंचि वहु भांती ।।

दोहा-19

पूषा वंश न भाग मख परपोषण हवि खात ।

जासु रदन क्रत दक्ष के वीरभद्र करि धात ।।

दानव सुता रोचना नामा । सोत्वष्टा कै कोमल वामा ।।

तिहिके तनय व्रत विश्रुरूपा । जो देवन उपरोहित निरूपा ।।

जबहि बृहस्पति गये रिसाई । भये ते विमुख निरादर पाई ।।

जवसे सुरपति इन्द्र कहाये । सुरग विशद इन्द्रासन पाये ।।

अहमित इन्द्र पाय बड़ सासन । आये सुर गुरु दिये न आसन ।।

केहि न होत मद प्रभुता पाई । धन विधा मद तन तरुणाई ।।

काहि न मत्सर अनल जराये । शोक समीर न काहि सुखाये ।।

को न भयस प्रभुता मद अंधा । को नहि भृमसि अगम ग्रह धंधा ।।

छंद-

मोह के वश जग को न भयो । अरु माया जाल न काहि फसायो ।।

लोभ कहो किहि को न किये वश । क्रोध औ काम न काहि सतायो ।।

सोंच कलेश चिंता तृश्ना । शंका सापिन काहि न खायो ।।

शिवदयाल बचो इनते विरलो । जिन हरि हर हेतु सुजन्म गवायो ।।

दोहा-20

सुर गुरु के अपमान ते छूटो इन्द्र समाज ।

पुनि वसुरूपै गुरु करो तव पायो निज राज ।।

चौपाई -

देय प्रतीक्ष सुरण मख भागा । दनुज परोक्ष मातु अनुरागा ।।

दानव सबल इन्द्र तव देखी । विस्वरूपा सिर काटि विशेषी ।।

तीनि शिरशि इक भागर गैया । दुसरो तीतर तैति तिरैया ।।

अमी पिवन मुख भा कलविंका । जेहि गवरै आ कहत अलिंका ।।

सुरापान मुख भयो कपिंजल । जो तोतुर सित धूम्र गिरा षल ।।

अन्न अधार तितरी नामा । जासु बचन शुभ तीतर स्यामा ।।

जो दुजालि कुल वध अनुरागे । ताहि विप्र वध सम अध लागै ।।

खग पालै लधु पिंजर जाला । सो मानुष समान चण्डाला ।।

दोहा-21

विस्वरूपा हत्या त्रिविध लगेसि इन्द्र पर धाय ।

गुरु हा दुज हा बंधु हत् एकै मह त्रिगुणाय ।।

चौपाई -

करि सुरेश तीन हय मेधा । जप त्रिकोटि गायत्री वेधा ।।

मुचहि न हत्या बिकल सुरेशा । विनयेसि विधिकौ पाय कलेशा ।।

विधि सो हत्या करि युग भागा । देय भूमि जल त्रिय तरु लागा ।।

धरी धरणि हत्या तद ऊसर । पूरण षात पाय वर दूसर ।।

जल मैं हत्या उद्वबुद्द फेना । धरेसि पाय वर मल हरि लेना ।।

लही विटप हत्या सोइ वादा । कटि अनरोहै विधि परसादा ।।

त्रिय कौ हत्या रितु प्रतिमासा । लयेसि पाप वर संतति आशा ।।

प्रथम दिवस त्रिय सम चांण्डाली । दूसर सम दुज धात कुचाली ।।

दोहा-22

रजोवती दिन तीसरे त्रिय रज को अनुमान ।

चौथे दिन जगयोग सुचि करि भंजन असनान ।।

तव लग मुख न विलोकन योगा । रमि द्विज दोष परै तहि भोगा ।।

संतति होय मलेक्ष निरासै । घर उजरै पितु मातु विनासै ।।

तीन उपरि षट दिन परजंता । जदि दम्पति वस काम रमंता ।।

तद संतान होय खल कोही । मातहि पितहि कलेशन द्रोही ।।

सुता विषम सम दिन सुत आसै । सोरह दिन लौ गरभ निवासै ।।

सविता पतनी प्रंश्रि रमन्या । सपूत पांच पुत्र जुग कन्या ।।

चारि सुता सो जग पावित्री । त्रय व्याहुती अपर सावित्री ।।

जनमें पर्म सुभग सुत पांचा । लोक विदित पावन गुण रांचा ।।

दोहा-23

सोम जजन चन्द्रायन अगिनहोत्र पशु मेध ।

चतुर मास्य सर माह मख शिवदयाल फल एध ।।


चौपाई -

सिद्धिर नाम भगा कर नारी । अंग महिम विभु प्रभु सुत चारी ।।

आशिष वरारोह दुय कन्या । सुव्रत सुन्दरी लोक लवन्या ।।

कहू नाम धातुर की नारी । जननी चारि सुता सुत चारी ।।

बाली सिनो अनुमती राका । चारि सुता ये पर्व पताका ।।

पूरण मास अरु सायां प्राता । दर्श समेत चारि सुत जाता ।।

क्रिया विधाना त्रिय सुत जाता । तपहित पंच अगिनि विष्याता ।।

वरुण की नारि चरखनी नामा । तिहि के सुत भृगु बलमीक विदामा ।।

भृगु के सुत भार्गव सुख भोगी । वालमीक बलमिक सुत योगी ।।

दोहा-24

मित्र नारि रेवती सुत पिप्पल आन अरिष्ट ।

उरवसि मित्रा वरुण के तनय अगस्त वशिष्ट ।।

सुरपति नारि पुलोमा सौभगि । त्रिसुत जयंत रिषभ मीडुक लगि ।।

वामन त्रिय कीरति गति शोका । जनमे पुत्र व्रहत अस लोका ।।

भये सो भगादया सुत जासू । सदा सकल हिय हर्ष हुलासू ।।

दिति सुत हिरएयाक्ष हिरणकुस । अपर पवन उनचास इन्द्र सुस ।।

हिरणाकुस युग सुत समवादा । यह भागवत जेठ प्रहलादा ।।

तिनके पुत्र विरोचन वलधर । तासु पुत्र बलि सुत वानासुर ।।

पर्म भागवत दिति के वंशा । वलि प्रहलाद जासु अवतंसा ।।

स्वायुंभुव सव सुता प्रसूती । विधि सुत दझ वरी अबभूती ।।

सोरठा-

दक्ष प्रजापति नाम जनमी सोरह सुभ सुता ।

देय सुलक्षण धाम तिनमें तेरह धर्म कह ।।

दोहा-25 क

एक स्वधा पितरण दई स्वाहा अगिनि कि वाम ।

सुता सती शिव को वरी सुनौ धर्म को नाम ।।

25 ख

श्रद्धा मैत्री दया वुधि सांति तितिझा तुष्टि ।।

पुष्टि क्रिया ह्री उन्नति मेधा मूरति श्रष्टि ।।

श्रद्धा सुत शुभ मैत्रि प्रसादा । दया अभै बुधि अरथ उपादा ।।

शांति तनय सुख तितिझ क्षेमा । अस्मय पुष्टि तुष्टि मुद प्रेमा ।।

उन्नत दरप योग क्रय एधा । ह्री के प्रश्रय अ स्मृति मेधा ।।

एति धर्म त्रिय वंश धरायण । मूरति सुत दुय नर नारायण ।।

जासु जनम वहै त्रिविध बयारी । शीतल मंद सुगंध पियारी ।।

ग्रह सुपंथ नभ निर्मल तारा । गिरि प्रशेद सरिता शुभ धारा ।।

देव सकल बाजने बजावै । नृत अपसरा गंधरव गावै ।।

जै जै करै सुमन सुर वरसे । नभ दुंदुभी बजै सुर हर्षे ।।

दोहा-26

जिनको तप लखि इन्द्र डरि रंभा मदन वुलाय ।

चाहत डिगावन सखालय करे अनेक उपाय ।।

डरपे इन्द्र डिगे हरि नाही । तिन विरची बहु त्रिय तन पाही ।।

दै सब इन्द्र कह लै जावौ । हमैं न रचि माया दरसावौ ।।

इन्द्र न एकौ लेत लजाई । चलो भवन मन मैं पछिताई ।।

तब हरि देख इन्द्र मन छोभा । दै उरवसी सुरग कर शोभा ।।

अपर सु अंतरध्यान परायण । करण लगे तप नर नारायण ।।

अगिनि त्रिया स्वाहा त्रि सुतासन । सुचि पावक पवमान हुतासन ।।

स्वधा पितर पतनी गुण धामा । तनय सोम पा लगि अभिरामा ।।

दक्ष की सुता सती गुण खानी । शिवै समरपी जानि भवानी ।।

दोहा- 27 क

निर्गुण ब्रह्म सगुण मय विधि हरि शंकर नाम ।

रजगुण विधि हरि सतोगुण शम्भु तमोगुण धाम ।।

27 ख

तथा गुण मयी देवि त्रय सतगुण कमला नाम ।

ब्रह्माणी गुण राजसी तमगुण काली श्याम ।।

विदित महा काली गुण धामा । दक्ष की सुता सती अस नामा ।।

तहां सती शंकरहि विवाही । निज गुण रूप सती सुत नाही ।।

पति पितु खेद तजी तह देहा । पारवती भइ हिमगिर ग्रेहा ।।

तब तह गिरिजा शिवै विवाही । नाम रूप बहु गिने न जाही ।।

भद्रा गवरि चण्डिका विजया । दुर्गा उमा भगवती जया ।।

कामाख्या कामदा क्रमंति । भद्र कालि कालिका जयंति ।।

चामुण्डा सति शिवा भवानी । नाम अनेक सकल गुण खानी ।।

धरे विविध तन मिलि गुण रूपा । करै सुकारज सकल अनूपा ।।

दोहा-28

सृष्टि वंश उतपति सुने सवके मन आनन्द ।

शिवदयाल बोले बहुर । शोनकादि मुनि बृन्द ।।

सूत सकल जानत इतिहासा । तब मुखँ अम्बुज कथा प्रथा प्रकाशा ।।

पिये करण पुट चरित पियूषा । उर संतोष न निवरै भुषा ।।

सुनि पुराण पोषे मन माही । तिन विशेष रस पाएसि नाही ।।

सुचि सुन्दर शिव कथा सुनावौ । चरित पुराण मनोहर गावौ ।।

प्रधटी प्रथम दक्ष ग्रह माही । सती नाम तह शिवहि विवाही ।।

पारवती भई हिमगिर धामा । शिवहि वरी तह गिरजा नामा ।।

शिव केहि भांति एक तन माही । सनी उमा दुय जनम विवाही ।।

भयो न सती पुत्र केहि कारण । केहि विधि पारवती तन धारण ।।

दोहा-29

रुचिर चरित जे अपर पुनि कहौ सूत समुझाय ।

शिवदयाल कहि मौन भये रहे कथा मन लाय ।।


इति श्री शिव चरित्र महात्म षष्टोअध्याय

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