Sunday, 17 April 2011

प्रथम अध्याय

श्रीस्थाणोर्चरित्रम्
----- शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ----
शिव चरित्र महात्म

। ॐ ।

श्री गणेशाय नमः

श्री गिरिजापति चरण कमलेभ्यो नमः

श्री स्थाणोर्चरित्रम्

प्रथम पाद

प्रथमोअध्याय

दोहा

वंदि प्रथम गणनायक , मंगल मूरति रूप ।

तत्व रूप शिव को , जिमिलखि परै अनूप ।।

सारद मातु बन्दि पुनि , वाणी निर्मल होय ।

वरणौ शिव चरित महात्म को , विघ्न परै नहि कोय ।।

विधि हरि सुरगुन सकल , वन्दि धरणि धरि शीश ।

पुरवहु मोर मनोरथ , कृपा करहु बागीश ।।

तत्व रूप मय शक्ति शिव , वन्दौं शीश नवाय ।

सुमिरत नाम रूप को , अज्ञान तम् बिनसाय ।।

वन्दौं सकल धरणि धरि माथा । करब छुटायन शिव कै गाथा ।।

नमि नव नाथ सिद्द चौरासी । नवहुं सूर सामंत नवासी ।।

चौदह भुवन समेंत निवासी । सुरग नरक जेतिक सब रासी ।।

दोहा -1

नव जलचर दस व्योमचर , कृमि ग्यारह खग बीस ।

चतुराशी लक्ष जोनि मह , मनुज चारि पशु तीस ।।

वन्दौ सकल युगल कर जोरी । पूरण करौ लालसा मोरी ।।

सब जग जोनि लाख चौरासी । चारि षानि जल थल नभ वासी ।।

शम्भु शक्ति मय सब जग जानी । विनय प्रणाम करौ सुख मानी ।।

वन्दहु तीरथ लागि प्रयागा । क्षेत्र चारि दश भेद विभागा ।।

चारि धाम गिरि वन जे पावन । गंगादिक नद नदी सुहावन ।।

विन्दु नरायन मान पम्प सर । उत्तम चारि सुआन सरोवर ।।

सात पुरी रमनीक सुहावनि । विदित मुक्ति देनी जग पावनि ।।

द्वादश ज्योर्ति लिंग उप लिंगा । वन्दौ सकल रचित गिरि श्रंगा ।।

सोरठा - 2 क

विनवौ सबै कवीस वाला चौसठ योगिनी ।

वाउन वीर नदीस सात दीप नव देवता ।।

दोहा - 2ख

वन्दउ संत असंत जन शीश नाय कर जोरि ।

पर स्वारथ लगि संत जन दुष्ट अकारण खोरि ।।

विनवौ जामवन्त हनुमन्ता । राम दूत शिव सेवक संता ।।

वन्दौ षटमुख कीरति रंजन । वीर भद्र भ्रंगी नंदी गन।।

नमि नरसिहं पवन उनचासा । छप्पन भैरव ऋषि दुरवासा ।।

सात ऋषिय वसु आठ विशाला । नवग्रह आन दशौ दिगपाला ।।

अष्ट सिद्धि नव निधि रिधि मानी । रमा गवरि काली वृह्मानी ।।

ग्यारह रुद्र स्व बारह भानू । तेरह विश्व देव त्रि कृशानू ।।

कात्यायनि नव कोटिक उरगा । दसहु महा विद्या नव दुर्गा ।।

चौदह विद्या जम दस चारी । वंदहु सकल अवनि सिर धारी ।।

दोहा - 3

सोरह तिथिन के ईश लगि , अष्टादस पौरान ।

सकल वंदि विरचै कथा , भाषा निज अनुमान ।।

सात करण सत्ताइस योगा । अष्टविश नक्षत्र प्रयोगा ।।

संवत साठि नरक चौरासी । वंदौ सब रिषि सहस अठासी ।।

वालखिल्य दस सहस सुभागे । उलटे वहय वड़ै रवि आगे ।।

कर्दम कपिल अंगिरा अरुणा । पुलह पुलस्ति मित्र अरु वरुणा ।।

चलत चक्र क क क्र सकल मुनि पाछे । फिरे भुवन भरि भूतल आछे ।।

जहां निमिष ठहरो वन माही । कहत नैमिषारण तिहि पाही ।।

परत पताल गयो अहि धामा । भयेसि चक्र तीरथ तिहि नामा ।।

तेहि देखन विरंचि तह आये । तनय लाम हर्षन बुलवाये ।।

व्यास शिष्य लखि सूत सुजाना । बकता करि विधि गये सुथाना ।।

विनय शौनकादिक अस भाषा । पुरवौ सूत सकल अभिलाषा ।।

सुनत सूत कथा वहु बरणी । जिमि गंगा कलि पातक हरणी ।।

वहुरि शौनकादिक मुनि बोले । सूत सनौ मम् वचन अडोले ।।

दोहा - 5
सूत सकल वरणौ कथा करौ मोहि परिपोष ।

श्रवण रध्र पीयूष सम पिवत नही सन्तोष ।।

सूत कठिन कलि काल अरम्भा । शिव की कथा श्रवन अवलम्वा ।।

शिव रहस्य यदि भांति अनेका । सुगम विशेष समेत विवेका ।।

चारि सहस नव सै सत्ताउन । गये वर्ष कलि पृजा नसाउन ।।

आनि वर्ष पृति अध अधिकारी । बहु व्यभिचार करै नरनारी ।।

मृषा वचन निशि वासर भाषै । छल अरु कपट दंभ उर राषै ।

धर्म रहित पातक अनुसारा । दुराचार अनहित अपकारा ।।

पर पवाद पर धन अभिलाषी । पर पतनी रस पय मन भाषी ।।

दोहा-6
जनपद वेंचै अन्न रस द्विज गण वेचैं वेद ।

केश पृसारनि कामिनी नष्ट सकल वस षेद ।।

द्विज वैश्यारत मदिरा पाना । बरण भृष्ट सब पशू समाना ।

बहु विस्वासधात जन करिहै । निज निज मत पाखंड पसरिहै ।।

पति वंचक पर पति रत नारी । सास ससुर वर वैर विचारी ।।

कुटिल कुतंत्र कुमारग गामी । मात पितहि दूसहि षल कामी ।।

पापी पतित अधम अपराधी । होय सकल जन गरसित व्याधी ।।

विप्र करै सूद्रन कर करमा । साधहि सूद्र दुजन के धरमा ।।

वधहि विप्र गुरु वेदउ गाई । क्षेत्र हरै नृप करि कुटिलाई ।।

नारि स्वतंत्र पुरुष परतंत्रा । वरधि पाप सब चहै निमंत्रा ।।
दोहा-7 क

धोर पाप कलिकाल के , कोटिन कठिन कराल ।

करै सकल नर ना तरै , विनआसै भ्म जाल ।।
दोहा-7ख

कलि षल पावे सवै सुख , संत सुजन संताप ।

सूत प्रबोधउ ग्यान गुण , किमि वरजै सो पाप ।।

नर त्रिय वैर रमै पर दारा । सो त्रिय विलसै पर भरतारा ।।

काम विवस निज नारि दुलारै । हुय स्वतंत्र त्रिय जार सिधारै ।।
होय वरण शंकर दुय प्रेरे । परै नरक लै पितर घनेरे ।।

एहि विधि होय अनेकन दोषा । केहि विधि मनुज लहै संतोषा ।।

सूत कहेउ शिव कथा विशाला । छूटहिं पाप दूषन भ्रम जाला ।।

तुम सब जानत व्यास प्रशादा । भाषहु सुगम शंभु मरजादा ।।

तब मुख कथा अमी रस धारा । पिवै श्रवण पुट वनै विचारा ।।

निर्गुण शंभु सगुण केहि भांती । कहौ सुगम शिव कथा सुहाती ।।

दोहा - 8क

किमि तिष्टहिं शिव सृष्टि के आदि मध्य अरु अन्त ।

किमि सेवै शिवद्याल शिव सद प्रशीद चित संत ।।

सोरठा - 8 ख

हुय प्रशन्न कादेत त्रिकालज्ञ सर्वज्ञ शिव ।

सूत करौ चित चेत अहो लोम हर्षन तनय ।।

।। इति श्री शिव चरित महात्मे प्रथमोअध्याय ।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परपाटी ।।।
।।।श्री स्थाणोर्चरित्रम् ।।।

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