श्रीस्थाणोर्चरित्रम्
----- शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ----
शिव चरित्र महात्म
। ॐ ।
श्री गणेशाय नमः
श्री गिरिजापति चरण कमलेभ्यो नमः
श्री स्थाणोर्चरित्रम्
प्रथम पाद
प्रथमोअध्याय
दोहा
वंदि प्रथम गणनायक , मंगल मूरति रूप ।
तत्व रूप शिव को , जिमिलखि परै अनूप ।।
सारद मातु बन्दि पुनि , वाणी निर्मल होय ।
वरणौ शिव चरित महात्म को , विघ्न परै नहि कोय ।।
विधि हरि सुरगुन सकल , वन्दि धरणि धरि शीश ।
पुरवहु मोर मनोरथ , कृपा करहु बागीश ।।
तत्व रूप मय शक्ति शिव , वन्दौं शीश नवाय ।
सुमिरत नाम रूप को , अज्ञान तम् बिनसाय ।।
वन्दौं सकल धरणि धरि माथा । करब छुटायन शिव कै गाथा ।।
नमि नव नाथ सिद्द चौरासी । नवहुं सूर सामंत नवासी ।।
चौदह भुवन समेंत निवासी । सुरग नरक जेतिक सब रासी ।।
दोहा -1
नव जलचर दस व्योमचर , कृमि ग्यारह खग बीस ।
चतुराशी लक्ष जोनि मह , मनुज चारि पशु तीस ।।
वन्दौ सकल युगल कर जोरी । पूरण करौ लालसा मोरी ।।
सब जग जोनि लाख चौरासी । चारि षानि जल थल नभ वासी ।।
शम्भु शक्ति मय सब जग जानी । विनय प्रणाम करौ सुख मानी ।।
वन्दहु तीरथ लागि प्रयागा । क्षेत्र चारि दश भेद विभागा ।।
चारि धाम गिरि वन जे पावन । गंगादिक नद नदी सुहावन ।।
विन्दु नरायन मान पम्प सर । उत्तम चारि सुआन सरोवर ।।
सात पुरी रमनीक सुहावनि । विदित मुक्ति देनी जग पावनि ।।
द्वादश ज्योर्ति लिंग उप लिंगा । वन्दौ सकल रचित गिरि श्रंगा ।।
सोरठा - 2 क
विनवौ सबै कवीस वाला चौसठ योगिनी ।
वाउन वीर नदीस सात दीप नव देवता ।।
दोहा - 2ख
वन्दउ संत असंत जन शीश नाय कर जोरि ।
पर स्वारथ लगि संत जन दुष्ट अकारण खोरि ।।
विनवौ जामवन्त हनुमन्ता । राम दूत शिव सेवक संता ।।
वन्दौ षटमुख कीरति रंजन । वीर भद्र भ्रंगी नंदी गन।।
नमि नरसिहं पवन उनचासा । छप्पन भैरव ऋषि दुरवासा ।।
सात ऋषिय वसु आठ विशाला । नवग्रह आन दशौ दिगपाला ।।
अष्ट सिद्धि नव निधि रिधि मानी । रमा गवरि काली वृह्मानी ।।
ग्यारह रुद्र स्व बारह भानू । तेरह विश्व देव त्रि कृशानू ।।
कात्यायनि नव कोटिक उरगा । दसहु महा विद्या नव दुर्गा ।।
चौदह विद्या जम दस चारी । वंदहु सकल अवनि सिर धारी ।।
दोहा - 3
सोरह तिथिन के ईश लगि , अष्टादस पौरान ।
सकल वंदि विरचै कथा , भाषा निज अनुमान ।।
सात करण सत्ताइस योगा । अष्टविश नक्षत्र प्रयोगा ।।
संवत साठि नरक चौरासी । वंदौ सब रिषि सहस अठासी ।।
वालखिल्य दस सहस सुभागे । उलटे वहय वड़ै रवि आगे ।।
कर्दम कपिल अंगिरा अरुणा । पुलह पुलस्ति मित्र अरु वरुणा ।।
चलत चक्र क क क्र सकल मुनि पाछे । फिरे भुवन भरि भूतल आछे ।।
जहां निमिष ठहरो वन माही । कहत नैमिषारण तिहि पाही ।।
परत पताल गयो अहि धामा । भयेसि चक्र तीरथ तिहि नामा ।।
तेहि देखन विरंचि तह आये । तनय लाम हर्षन बुलवाये ।।
व्यास शिष्य लखि सूत सुजाना । बकता करि विधि गये सुथाना ।।
विनय शौनकादिक अस भाषा । पुरवौ सूत सकल अभिलाषा ।।
सुनत सूत कथा वहु बरणी । जिमि गंगा कलि पातक हरणी ।।
वहुरि शौनकादिक मुनि बोले । सूत सनौ मम् वचन अडोले ।।
दोहा - 5
सूत सकल वरणौ कथा करौ मोहि परिपोष ।
श्रवण रध्र पीयूष सम पिवत नही सन्तोष ।।
सूत कठिन कलि काल अरम्भा । शिव की कथा श्रवन अवलम्वा ।।
शिव रहस्य यदि भांति अनेका । सुगम विशेष समेत विवेका ।।
चारि सहस नव सै सत्ताउन । गये वर्ष कलि पृजा नसाउन ।।
आनि वर्ष पृति अध अधिकारी । बहु व्यभिचार करै नरनारी ।।
मृषा वचन निशि वासर भाषै । छल अरु कपट दंभ उर राषै ।
धर्म रहित पातक अनुसारा । दुराचार अनहित अपकारा ।।
पर पवाद पर धन अभिलाषी । पर पतनी रस पय मन भाषी ।।
दोहा-6
जनपद वेंचै अन्न रस द्विज गण वेचैं वेद ।
केश पृसारनि कामिनी नष्ट सकल वस षेद ।।
द्विज वैश्यारत मदिरा पाना । बरण भृष्ट सब पशू समाना ।
बहु विस्वासधात जन करिहै । निज निज मत पाखंड पसरिहै ।।
पति वंचक पर पति रत नारी । सास ससुर वर वैर विचारी ।।
कुटिल कुतंत्र कुमारग गामी । मात पितहि दूसहि षल कामी ।।
पापी पतित अधम अपराधी । होय सकल जन गरसित व्याधी ।।
विप्र करै सूद्रन कर करमा । साधहि सूद्र दुजन के धरमा ।।
वधहि विप्र गुरु वेदउ गाई । क्षेत्र हरै नृप करि कुटिलाई ।।
नारि स्वतंत्र पुरुष परतंत्रा । वरधि पाप सब चहै निमंत्रा ।।
दोहा-7 क
धोर पाप कलिकाल के , कोटिन कठिन कराल ।
करै सकल नर ना तरै , विनआसै भ्म जाल ।।
दोहा-7ख
कलि षल पावे सवै सुख , संत सुजन संताप ।
सूत प्रबोधउ ग्यान गुण , किमि वरजै सो पाप ।।
नर त्रिय वैर रमै पर दारा । सो त्रिय विलसै पर भरतारा ।।
काम विवस निज नारि दुलारै । हुय स्वतंत्र त्रिय जार सिधारै ।।
होय वरण शंकर दुय प्रेरे । परै नरक लै पितर घनेरे ।।
एहि विधि होय अनेकन दोषा । केहि विधि मनुज लहै संतोषा ।।
सूत कहेउ शिव कथा विशाला । छूटहिं पाप दूषन भ्रम जाला ।।
तुम सब जानत व्यास प्रशादा । भाषहु सुगम शंभु मरजादा ।।
तब मुख कथा अमी रस धारा । पिवै श्रवण पुट वनै विचारा ।।
निर्गुण शंभु सगुण केहि भांती । कहौ सुगम शिव कथा सुहाती ।।
दोहा - 8क
किमि तिष्टहिं शिव सृष्टि के आदि मध्य अरु अन्त ।
किमि सेवै शिवद्याल शिव सद प्रशीद चित संत ।।
सोरठा - 8 ख
हुय प्रशन्न कादेत त्रिकालज्ञ सर्वज्ञ शिव ।
सूत करौ चित चेत अहो लोम हर्षन तनय ।।
।। इति श्री शिव चरित महात्मे प्रथमोअध्याय ।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परपाटी ।।।
।।।श्री स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
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