Sunday, 17 April 2011

अष्टम अध्याय

अथ श्री शिव पुराण परिपाटी अष्टमोअध्याय

शिव चरित्र महात्म

स्थाणोर्चरितृम

छन्द -1

पूजि गणपति स्वामि कार्तिक कीर्ति नंदी भृंगही ।।

अष्ट दल कर पदम आसन प्रणव लेखे श्रंगही ।।

मलय चंदन सुमन अछत धूप दीप समर्पही ।।

शिवदयाल सर्वसु देत शंकर वेल दल अर्पही ।।

दोहा-1

पूरब दिसि अणिमा लिखै प्राकम्या अगनेव ।

दच्छिन दिसि लधिमा लिखै नैरित ई सितु सेव ।।

पश्चिम दिसि महिमा लिखि लीजै । वायव दिसि प्रणव लिख दीजै ।।

प्राप्ति कज उत्तर दल धरिये । सर बच्छा ईशान पसारिये ।।

सोम करणि कलिषि अधभानू । सूर्य अधोगत लिखै कृशानू ।।

धर्मोदय क्रम कलप अनंता । अव्यक्तादि चतुर्दिशि वंता ।।

त्रिगुण सोम कर अंतर चारी । ईश्वर अंतर बहिर निहारी ।।

वामदेव यह मंत्र उचारी । शिव पद्मासन पर विस्तारी ।।

सानिधि पढ़ै रुद्र गायत्री । मंत्र अघोर निवेदय तंत्री ।।

पढ़ि ईशान मंत्र दश अच्छर । वारि गंध सृग पूजै शंकर ।।

दोहा-2

अस षोडस उपचार कर नित पूजै शशि भाल ।

अछय मंत्र वं वं पढ़ै नास रहित शिव द्याल ।।

पाद्य आचमन अर्ध विधाना । पंचगव्य शिव कर स्नाना ।।

दधि मधु दूध ऊष रस धृत पल । पंचामृत मंजै शिव अविचल ।।

प्रणव षडंग उदक अस नापै । श्वेत वसन ऊपर से झांपै ।।

चंदन लेपि वसन करि दूरी । अरपहि तंदुल अछ्त पूरी ।।

अपामार्ग कुश दुरवा पाटल । युग कर सुजाती उतपल ।।

करण मल्लिका अरक मालती । मंजु वेलदल सुरण जालती ।।

पुनि शिव कौ अस्नाना करावै । सहस धार जल शीश चढावै ।।

करि समंत्र फल दायक पुजा । शिव सेवन सम हेत न दुजा ।।

दोहा-3

सहस धार अरपै शिवै। जल पढ़ि मंत्र विवेक ।।

सावकाश सामरथ विन। तदपि एक सै एक ।।

तिनके मंत्र उच्चारण करई । पंच प्रमान आन अनुसरई ।।

वाँग मीय होतारण शिरसा । दशअछर दुय ज्ञांति अविरसा ।।

देवव्रत ज्येष्ट साम्यावर । मृत्युंजय जपि अरु पंचाछर ।।

पुरुष सूक्त लगि पुष्प रथंतर । सहस धार कै शत मष्येतर ।।

पढ़ि शुभ मंत्र कि नाम उचारी । प्रणव आदि श्रुति सेत निहारी ।।

चन्दन सुमन शंभु सिर अरपी । प्रणव सहित नव वसन समर्पी ।।

निष्फल अछर शिव शशि भाषा । राजत फटिक सुतेज प्रकाशा ।।

पुनि मुनि जे सब मंत्र उचारी । पूजहि प्रेम सहित मद नारी ।।

दोहा-4

नील रुद्र लगि रुद्र निशा सूल शुभ जानि ।

अरुण भयउ अथवर्ण श्री सूल वषानि ।।

सर्व लोक मय कारक कारण । सकल विश्वमय सदा अराधक ।।

विधि हरि हर सुर इंद्र अगोचर । विदित वेद वेदांत लिंग धर ।।

आदि मध्य अवशान रहित हर । शंभु तत्व भेषन भव रुज पर ।।

लिंग विशद शिव तत्व अनूपा । पूजि लिंग शिर प्रणव सरूपा ।।

ताम्बूल दय आरति कारी । नमस्कार अस्तव अनुसारी ।।

दय शुभ अर्ध अरध परिकरमा । शिव पद सुमन समर्पि सधरमा ।।

माथ नाय मन शिव अवराधै । हाथ पुष्प धरि अंजलि वांधै ।।

मंत्रन सहित प्रार्थना करये । करि प्रणाम शिव आगे धरिये ।।


दोहा-5

जदि पूजा जपनेम लगि करे जु जान अजान ।

करौ सफल सो सवै देउ अछै वरदान ।।

सुमन समर्पि शिवै अनुरागी । मंगल करण शरण वर मांगी ।।

लै कुश उदक सु आशिष लीजै । शिवै सुमाथ मारजन कीजै ।।

शांति पाठ करि करै प्रणामा । शिव सेवत परिपूरण कामा ।।

बहुर पढ़ै शिव मंत्र अघोरा । पुनर आगमन हित शिव भोरा ।।

भाव समेत भक्ति वर मागै । अस कहि शंभु चरण अनुरागे ।।

सकल आश तजि शिव तव सरणा । देउ सुचरण भक्ति रति करणा ।।

शिव प्रार्थना करै फल दायक । गण परिवार समेत विनायक ।।

हरष समेत सदा शिव धामा । छेवहि सेवहि करै प्रणामा ।।

दोहा-6

नहि आवाहन जानत नही विसरजन वेश ।

पूजा रचा न विदित उर होउ प्रसीद महेश ।।

पावहि परम भक्ति हर हेरे । पग पग सवहि सिद्धि तिन केरे ।।

सब फल हित सेवै षट मासा । सब दुख रोग नसै अनयासा ।।

संकट सकल कठिनता जेती । हर हर करत हरै हर तेती ।।

वरधै सब शुभ फल सुख नाना । शुक्ल पक्छ के चन्द्र समाना ।।

करै सोम बृत अरचन एहा । पावहि तनय सुहाग सनेहा ।।

पूजि अकोला तरु तर भावै । अमर होय कि मृतक जिआवै ।।

येहि विधि शिव पूजै ध्यावै । शंभु सपथ वांछित फल पावै ।।

शिव शिव जपै दोष दुख नासै । अंत समय शिव लोक निवासै ।।

दोहा-7

शौनक सुनि मैं व्यास मुख कही यथारथ जानि ।

शंभु कथा अति पावनी कह शिवदयाल बखानि ।।

पंचाक्छर महिमा बलवाना । सुनहु तासु इतिहास पुराना ।।

पावन एक दनुज मधु नामा । लगि निज नाम वसायसु दामा ।।

सो मधुवन मधुपुरी कहावै । दरसे मनुज मनोरथ पावै ।।

मधु विधि हरि प्रिय धाम बसाये । मधुसूदन तब नाम कहाये ।।

सो मथुरा हरि कौ अति प्यारी । तज तन सौ वैकुन्ठ विचारी ।।

धरे स्वतंत्र कृष्ण अवतारा । माधव नाम तहां अनुसारा ।।

तह दशार्ह नाम भयो राजा । जदु के वंश विशद शुभ काजा ।।

विधावंत तरुण गुण वाना । सूर वीर मति धीर सुजाना ।।

दोहा- 8

काशि राज तनया तरुण रूप शील गुण धाम ।

तेहि विवाहि दशार्ह नृप कलावती शुभ नाम ।।

एक समय रति हित निशि काला । नारि निकट नृप गयेउ विहाला ।।

त्रियबृत मै शिव तेज प्रतापा । करति पंचअछर शिव जापा ।।

भूपति कहत सेज प्रिय आवौ । करौ काम रति अति सुख पावौ ।।

कह त्रिय हम शंकर बृत माही । अवहि काल रति पति को नाहीं ।।

तब नृप कहा सुनौ प्रिय रानी । पतिबृत धर्म करौ मम बानी ।।

तब त्रिय कहै सुनौ मम स्वामी । सुख न लहै एतिन संग कामी ।।

रितु मैं गुरु बिन काम विहीनी । रोगिन बृति अप्रीति अलीनी ।।

इतनी त्रियन संग करि भोगा । सुख न लहै जन मदन वियोगा ।।

दोहा- 9

भूपति कही रिषाय प्रिय करौ कौन सत कर्म ।

नेम न त्रिय कौ उचित कछु त्याग पतिबृत धर्म ।।

अस कहि भूप काम अतुराई । बल से कर गहि त्रिय पौढ़ाई ।।

गमन समय परसत उर अंगा । दहत देह नृप तजेउ प्रसंगा ।।

चकित चौंकि भूपति कर शंका । विलग ठाड़ि भये तजि परयंका ।।

विहसि भूप भाखेसि मृदुवानी । सुनौ आचरज सुमुख सयानी ।।

तब तन कोमल कमल समाना । दहत अनल सम लगि उर आना ।।

सो सब प्रिया कहौ समुझाई । शंका समाधान हुय जाई ।।

हंसि नृप नारि कही मृदुवानी । तुम राजन यह बात न जानी ।।

करति पंच अच्छर हम जापा । सो मम तन तेज प्रतापा ।।

दोहा-10

पातक पुंज शरीर तब दासी रत मद पान ।

सो प्रसंग किमि करि सकौ मोरे तेज समान ।।

तब नृप कह सो मंत्र सुनावौ । सकल पाप त्रय ताप नशावौ ।

रानी कहेसि कि हम तब दासी । गुरुण करय ओछे कुल वासी ।।

जदि तुमकौ यह मंत्र बतावै । तौ हम गुरू समान हुय जावै ।।

रहय न पुरुष नारि के नाते । हम कस मंत्र वतावहि ताते ।।

हमकौ मंत्र दयसि दुरवाशा । सो गुरु करे न तुमहि सुपासा ।।

जदि तिनकौ गुरु करो सुजाना । हम तुम भगनी बंधु समाना ।।

जदपि करै दम्पति गुरु एका । प्रथम पुरुष गृह बंधि विवेका ।।

उत्तम कुल गुण धर्म सचेता । शील सुभाय सनेह समेता ।।

दोहा-11

अस पावन दुज गुरु करै शंभु समान विचारि ।

सेवै छल अरु कपट तजि तव पावै फल चारि ।।

तुम राजन मुनि गर्ग बुलाई । गुरु मुख होउ सकल सुख पाई ।।

तब राजा मुनि गरग बुलाये । आदिहु अंत सब चरित सुनाये ।।

गर्ग संग लै परब सुहाये । नारि सहित जमुना तक आये ।।

तब मुनि अंग न्यास कराये । करण शरण मुख मंत्र सुनाये ।।

नृप तन पुलक रोम पथ छोटी । निकरे वाय सकल शत कोटी ।।

जरे पच्छ उढ़ि मरत अधर पर । नृप कह यह अचरज का मुनिवर ।।

मुनि कह तव तन पातक पुंजा । करे अमित अध अधरम वंजा ।।

सो सब निकरे मंत्र प्रभावा । काग कुरूप दहे दुख दावा ।।

दोहा-12

मंत्र पंचअच्छर जपत चारि पदारथ देत ।

शिवदयाल दरिद्र दुख पाप ताप हरि लेत ।।

विनि आशन पूजन विनि प्रेमा । जाय दान विनि ब्रत तप नेमा ।।

जदपि अशुचि अनपावन अंगा । कैसेउ जपै सकल दुख भंगा ।।

भाव अभाव अनरित अलसाई । जपै कहूं कवहूंक मनलाई ।।

सो नर सकल मनोरथ पावै । पंचाक्छर जप करहि करावै ।।

जपहि पुत्र हित संतति पावै । हरै सकल दुख शिवपुर जावै ।।

अस कहि गरग भूप समुझाये । गुरु दच्छिना लयसि घर आये ।।

भूपति जपत गये निज धामा । करे नारि संग निशि विसरामा ।।

भयेसि ह्रदय शीतल सम चंदन । रमन लगे नित हित जदुनंदन ।।

दोहा-13

पंचाछर महिमा अगम भाषत वेद पुराण ।

शारद शेष न कहि सकै किमि शिवधाल वषान ।।

।।।इति श्री शिव पुराण परिपाटी अष्टमोअध्याय ।।।

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