।।। स्थाणोर्चरितृम ।।।
।।। शिवदयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।। अथ श्री सप्तमोअध्याय ।।
बोले सूत सुनौ मुनि बृन्दा । शिव की कथा देनि आनन्दा ।।
जो सुनि सफल जनम हुय जावै । लोक सुजस परलोक बनावै ।।
सुनहु भार्गव कथा पुरानी । जीवन जन्म सफल अध हानी ।।
शक्ति स्वरूप सती तन पाई । जनमी प्रथम दक्ष ग्रह जाई ।।
तहॉ सती शंकरहि बिबाही । लोकहु वेद विदित जग मॉही ।।
वैर दच्क्ष शिव दोउ दिसि रोषा । तजी सती शिव दक्ष् के दोषा ।।
दक्ष सती दय फिर न बुलाई । सती बहुरि पिता ग्रह आई ।।
वैर जमातर ससुर की कोई । नारि अनादर दोउ दिसि होई ।।
दोहा-1 क
विधि हरि हर ई श्वर अहे जे न कामबस बास ।
इनके गरभ न मैथुनी पुत्र न पतनी आस ।।
1ख
काली कमला ब्रह्म त्रिय सती गवरि गुण खानि ।
इनके पुत्र न गरभ ते सुत इच्छा अनुमानि ।।
सूत सती केहि विधि केहि कारण । पितु ग्रह जायसु देह निवारण ।।
सूत सुमिर शिव हर्ष समेता । कहा कि शौनक सुनौ सचेता ।।
एक समय विधि के मख माही । सुर मुनि सव आये हरि नाही ।।
दक्ष तहां सो अवसर पायउ । अहमित ब्रम्ह सभासद आयेउ ।।
मिले सकल उठि शीश नवाये । उठे न विधि शिव ना सिर नाये ।।
शम्भु न उठे ससुर मन मानी । दक्ष मरषि बोलेसि कटु बानी ।।
शिव तै दयसि न आदर मोही । करेसि स्व शिष्य सुता दै तोही ।।
बैठि सभा सद मद गत ज्ञाना । मोहि न पितु समान मन जाना ।।
सोरठा-2क
तोहि न शर्म अकाम करो तो सेवक सुता दय ।
तदपि न विनय प्रणाम दयो अनादर सभा मय ।।
दोहा-2ख
दक्ष तरेरे नयन कर वक्र भौह मुख वाम ।
बोले मरषि महेश पर उठो न करो प्रणाम ।।
शिव अपमान करेसि तै मोरा । रूप अमंगल होवहि तोरा ।।
शिव तौ साधु नहि कछु कहेउ । पलटि साप नंदी गण दयेउ ।।
सब दुज बर तुम होउ भिखारी । विप्र धरम तजि पर अपकारी ।।
घर घर भोजन जाचहु दाना । तदपि होत गृह प्रति अपमाना ।।
तब भृगु मुनि करि नयन तरेरे । तिरछी भृकुटि बचन करेरे ।।
फरकत अधर थरथरत देहा । दयेउ शाप उठि तजि कुल नेहा ।।
शिव सेवक होवहि धनहीना । भेष अमंगल पर आधीना ।।
दोहा- 3
होय जटिल खल भसम धर कारक पर अपकार ।
दुरभच्छी दूषित अमल विष मदिरा आधार ।।
बहुरि दयेसि नंदी गण शापा । करहु परस्पर दुज परितापा ।।
होउ परस्पर सकल विरोधी । सहि न सकौ पर सम्पति क्रोधी ।।
उठे विप्र सब करत कलापा । दक्ष दयसि पुनि शिव कौ शापा ।।
अव ते शिव न लखै मख भागा । वसहि मसान विभूति विरागा ।।
प्रथम रुद्र मख भाखन आवै । सुरण संग निज भाग न पावै ।।
तब शिव उठे सहित संदेहा । सगण गये विमुख गिरि गेहा ।।
संभृम उठे सकल तजि कामा । सुर मुनि गये सवै निज धामा ।।
ससुर वैर तजि सती निरंतर । करि समाधि वैठे गिरि शंकर ।।
दोहा- 4
कछु दिन वीते विधि कृपा भये ते दक्ष प्रजेस ।
तदपि न भावी वस तजे अनुचित वैर महेश ।।
होनहार दुखः जिनहि अपारा । नासै सुमति कुमति अनुसारा ।।
वैर ससुर सारेन लगि कोई । पति पतनी विरोध अति होई ।।
दंपति कपट कलह जदि होई । तह दुय मै सुख लहै न कोई ।।
दझ प्रजापति सासन पाई । अहंकार करि मख निर्माई ।।
वैर सुमिर शिव सती विहाई । सबहि निमंत्रण दये पठाई ।।
आये विधि हरि मुनि सुर सर्वा । मनु फणि जक्ष पितर गंधर्वा ।।
सुत वनिता समेत सब आवै । नभ मारग विमान चठ़ि गावै ।।
छुटी समाधि तुरत शिव जागे । ब्रम्ह निरंतर सुमिरन लागे ।।
दोहा-5
सती सुअवसर जानि के गमनी शिव के तीर ।
आगे आसन दये शिव करि आदर धरि धीर ।।
सुनि सुर बधुन केर कल गाना । पूछति सती शिवहि विधि नाना ।।
देवन वधू मधूर धुनि गावै । चठ़ि विमान किहि के कह जावै ।।
कहै सती सन शिव हरषाई । तव पितु दछ जज्ञ निरमाई ।।
हमरे वैर न तुम्हहि वुलावा । सो कछु मोर न दोष अ भावा ।।
छोटेन कौ यह उचित सुकामा । करै बड़िन कौ प्रथम प्रणामा ।।
जदि जेठे सब गुरुण प्रधाना । गौरव कुल सब गुरू समाना ।।
जेठिन पाटा छोटेन पानी । पान प्रणाम बड़े कौ जानी ।।
सवकौ आसन असन समाना । जथा योग आसन गुणवाना ।।
दोहा-6क
जेठे हम सन्यास पुनि ईश्वर पुनि जामात ।
पद प्रछालि कन्या दई आदि न प्रणत सुहात ।।
दोहा-6 ख
यह जमातर धरम सुचि पितु सम नेह विदाम् ।
उठिके लिये न ससुर प्रथम न करहि प्रणाम ।।
बड़ेन प्रथम प्रणाम बखाने । तद छोटेन कर कुशल न जाने ।।
तदपि जमातर गुरु ब प्रधाना । प्रणवत् ससुरै पाप समाना ।।
हम अस जानि न करे प्रणामा । दछ साप दय करि अरि कामा ।।
सो सुनि सती गमन मन भावा । कह कर जोरि शिवै सिर नावा ।।
आयसु देउ समय शुभ पाई । पितु कृत उत्सव देखहि जाई ।।
शिव शंकर वर जो सनमानी । बिन बोले जनि जाहु भवानी ।।
सोचि सती मन करेसि विचारा । पिता समान भवन भरतारा ।।
हमकौ उभय पछ दुखदाई । अस कछु काल वितावहि जाई ।।
दोहा-7
संसय करि संकेत मन शिवहि कहा समुझाय ।
होत न मंगलकाज नित मिलै मातु मैं जाय ।।
शिव कह जाउ जो विना बुलाये । सादर सुख सनमान घटाये ।।
रहै न जस कीरत कुल षानी । सुख सनेह सद जीवन हानी ।।
हठ करि कहा सती हम जावैं । शिव सद कहा करौ मन भावै ।।
बहुत भांति शिव करो निषेदा । सती व माने वचन विभेदा ।।
मन अनखाय दये शिव शापा । तन मन भंग अंग परतापा ।।
सती चली सब आस विसारी । तब शिव संग दये गण चारी ।।
नारि स्वभाव विगत सन्देहा । मातु पिता कुल संग सनेहा ।।
सती दछ ग्रह पहुंची जाई । प्रेम से मिली मातु उर लाई ।।
दोहा-8 क
हंसत मिली भगिनी सकल उर अपमान उछाह ।
करै परस्पर तरकना सती ह्रदय अति दाह ।।
दोहा-8ख
दछ विमुख धर नगर लगि लई न केउ सनमानि ।
पूछत कुसल न छेम कोउ मन भूपति भय मानि ।।
सोचत सती द्वार पुनि आई । मान भंग अपकीरत पाई ।।
पुनि गवनी मखशाला माही । शंम्भु भाग देखेसि कहुं नाही ।।
सती अनादर वैर विलोकी । सकै न काहू विधि रिसि रोकी ।।
फरकत अधर अंग रिस व्यापी । तब निज रसन दसन से चापी ।।
तन थरहरत अरुण दोउ नैना । कर कंपत कठोर मुख वैना ।।
वोलेसि बचन दछ मख माही । सुनौ सकल मिलि संसय नाही ।।
जनक जग्य जितने सब आये । सुनि शिव को विरोध मनभाये ।।
तिहिको फल पावहु सब कोई । शंकर विमुख उचित जस होई ।।
दोहा-9
जद्धपि जग दारुण दुखः होत अनेक विधान ।
शिवदयाल सबसे कठिन दुसह होत अपिमान ।।
सो अपिमान कीन्ह पितु मोरा । मख मुख भंग होय खल तोरा ।।
तात कुमति उपजी उर तोरे । शंकर विमुख सुजन तव कोरे ।।
पिता सुक्रत सम्भव यह देहा । तजै जतन सत विगत सनेहा ।।
अस कहि तजि पितु मायापूरी । पच्छिम दिशा जान कछु दूरी ।।
करि जलपानि दुकूल सुधारी । वैठसि पद्मासन मन मारी ।।
तजि संसय सनेह सुख संगा । शिव पद सुमिरि ध्यान मन रंगा ।।
करि सत प्राणायाम संजीवन । करखत प्राण नैन उन्मीलन ।।
सती अंग योगानल जारा । उठी ज्वाल भयो हा हाकारा ।।
दोहा-10
ज्योति प्रकाश सती सिर कश्मीर गिरि धाम ।
तवते ज्वालामुखी शुभ लोक विदित अस नाम ।।
रही ज्योति पर्वत पर छाई । तवते ज्वलामुखी कहाई ।।
जो सुत आसय करि तहां जावै । दर्शन करै पुत्र फल पावै ।।
दरसहि पूजहि पाठ सुनावै । सो जन सकल मनोरथ पावै ।।
सती अंश हिमगिरि ग्रह जाई । जनमी पारवती तन पाई ।।
जदि शिव संग दये गण चारी । सती जरत तिन सभा विदारी ।।
मख विध्वंस करन गण लागे । भृगु मुनि ताड़े शिवगण भागे ।।
नारद जाय शम्भु यह कहेउ । यथा चरित मखशाला भयेउ ।।
सती मरण अनहित अपमाना । गण त्रासन मखमाष बखाना ।।
दोहा-11 क
सती मरण सुनि शंकर कहा स्ववैर विचार ।
दछ ह्रदय मद अंकुरा सो अब लेव उखारि ।।
दोहा-11 ख
अस विचार उर कोप करि कारक श्रष्टि संघार ।
आतुर शिव पटकी जटा प्रधटो नीलकुमार ।।
अरुण नयन शिर कुंचित केशा । कर त्रिशूल अ लोहित वेशा ।।
कहै करजोरि शंम्भु यह सोई । अब हम करैं जो आयसु होई ।।
तद वोले महेश मन मरषी । सुनौ पुत्र मम गिरा अधरषी ।।
वीरण बिषद भद्र अधिकारा । वीरभद्र तब नाम उदारा ।।
अब तुम सेनपति सो कहावौ । हरद्वार कनखल चलि जावो ।।
दछहि दलौ करौ मखभंगा । कृतुकारण विदीरण अंगा ।।
भृंगी आदि सकल गण टेरे । आये पमन सम शिव के प्रेरे ।।
चलेउ शम्भु गण अनो अपारा । गरजै तरजै करहि चिघारा ।।
दोहा-12
चलत चमू टूटे बिटप, फूटहि गिर पाषान ।।
सिन्धु थर हरे बन हलै, डोलति भूमि निदान ।।
शंकति शेष बिरद आकुलाने । उठी रेनु तम तरणि छिपाने ।।
घोर सबद सुनि मुनि मखशाला । कहै परस्पर सकल विहाला ।।
ना जग प्रलय न समर सुवरणी । नतु नव खण्ड अराजक धरणी ।।
जनु लूटत जग चोर समूहा । निडर कुटिल खल बल करि हूहा ।।
भृगु मुनि कहा कि सुनौ प्रजेशा । उत्तर दिशि आचरज विशेशा ।।
धूरि पूरि दश दिशि अंधियारा । प्रलय मेघ सम घोर अपारा ।।
कोउ कहै सती मरण भल नाही । शंकर विमुख न सुख जग माही ।।
कोउ कहै दक्ष उचित नहि कीन्हा । जगदम्विकहि अनादर दीना ।।
दोहा-13
बोलि उठे तह अपर सब कुशल न शम्भु बिरोध ।।
सजग होउ सुर मुनि मनुज दक्ष कहत करि क्रोध ।।
संभृम संकल भये उठि ठाडे़ । रक्षक दक्ष सुभट करि गाढे़ ।।
तब लगि सवै रद्र गण आये । मख रच्छक सब मार गिराये ।।
जेहि पावै तेहि मार गिरावै । सनमुख लरै सुभट जो आवै ।।
भैरव नचहि जोगिनी गावै । भूत प्रेत सब ताल वजावै ।।
चहुं दिशि घायल वीर विराजै । नाचहि शम्भुगणज गहि वाजै ।।
मोहित वीर विमोहित गाजै । समर मोहिनी वाजने वाजै ।।
वीरभद्र धुनि करि गति नाचा । जहं तहां धावहि विकट पिशाचा ।।
दोहा-14
भृगु मुनि मख रक्षा करत भुज करि बचन उचारि ।
तासु केश गण चिवुकमय लैअ समश्रु उखार ।।
पूषन हंसत गहेसि चंडी सी । तोरे वदन ते रद नख वत्तीसी ।।
भगा करे तव नयन तरेरे । नयन काढ़ि होय तिन केरे ।।
दच्छहि वीर भद्र गहि लयेउ । शीश तोर पूरण हुति दयउ ।।
काहु के कर पद भुज अंगा । काहुय करउ सकल तन भंगा ।।
येहिविधि सकल विकल करिडारे । सुरमुनि सब शिवशरण पुकारे ।।
भये विकल सव देव मुनिन्दा । मन सोचहि ब्रंदारक ब्रंदा ।।
गये अखिल सुर मुनि कैलाशा । शिवहि देखि वट छौह निवासा ।।
तरक मुदया हरि चर्माशन । जटा जूट शशि भाल प्रकाशन ।।
दोहा-15
सुर मुनि विनवत वेद विधि होव प्रशीद महेश ।
सब कर तन पूरण करौ माथो दच्छ प्रजेष ।।
तब शिव कहा दझ मख आये । शंकर विमुख उचित फल पाये ।।
शम्भु अनादर मख निरमावै । होय विधन फल पूर न पावै ।।
तुम सब विनय करी जेहि लागे । लहो भाग मख हमसे आगे ।।
पुरवा अदंत खाय पर पेखो । भोजहि भगा परायो देखो ।।
भृग अस मश्रु अरो है फेरी । पूरहि देह अपर सव केरी ।।
अब जो रहो दच्छ तन रुण्डा । जरो लागि पूरण हुति मुण्डा ।।
जग्य योग जदि बलि पशु आये । छाग तनय शिर काटि भगाये ।।
अजसुता लागि अजासुत शीशा । धरिक वंध पुनि करे अधीशा ।।
दोहा-16 क
वीरभद्र जो प्रथम तह करो दछ शिर भंग ।
अज मुख धरि संजीवनी करि परिपूरण अंग ।।
दोहा-16 ख
दच्छ प्रजापति उठे तव मगन मेख मुख पाय ।
वक वकाय वकुरे ववकि वं वं विनय वनाय ।।
दोला छंद
वं वं व्रषवध्वज विश्व विभो । व्रष वाहन वेद विनोदप्रभो ।।
वरभाल विशालसुवाल विदो । वाघंवरधर वरदानप्रदो ।।
वहुव्याल विभूषणपाति वने । विषधारणकंठ विभूतिसने ।।
वरवारणचर्म विछावनको । विनवौ वुधिवास वसावनको ।।
विदु विश्व विमोहितकांतिरते । विधनेश विनायकभूतपते ।।
विनवौविभुवानि विलाशप्रभो । विश्वाधर वेदविकाशविभो ।।
विनवै वसु विष्णु विरंचिदिवो । वंदित व्रंदारक व्रंदशिवो ।।
विलोल विलोचनकंजअरुणा । विदुवन्हि विभावसुत्रैतरुणा ।।
दोहा-17क
यह अष्टक मंगल करण भाषो दछ प्रजेष ।
शिवदयाल वाचैं सुनै नासै विघन कलेष ।।
दोहा-17 ख
वं वं विगत विनाश है अवम् कहावत नाश ।
शिवदयाल वं वं वदत उभै लोक परकाश ।।
दछ्छ विनय करि वुकर वदनवर । हंसे सकल सुनि विहंसे शंकर ।।
कह शिव हम प्रसीद वर मांगौ । दच्छ कहा शिव यह अनुरागौ ।।
हम तब करे दोष वहुतेरे । बरबस वैर विषाद घनेरे ।।
दये शाप मख भाग न पावौ । छमहु शंभु सो दोष नसावौ ।।
जग्य जोग देवन संग भावौ । मख उच्छिष्ट भाग अब पावौ ।।
तवते सब जन गाल वजावै । वं वं वं वं कहि शिवहि रिझावै ।।
अब सो चरित सुनहु अति पावन । पारवती कर जनम सुहावन ।।
पितरण सुता मानसी मैना । शैल राज पतनी सुख एैना ।।
दोहा-18
तासु गरभ आगम उमा सती अंश अनुसार ।
गवरि नाम जनमी सुता पारवती अवतार ।।
गिरिजा नाम हिमाचल कन्या । सती शिरोमणि परम लवन्या ।।
तब अवराधि शंभु पति पाये । लोकन विदित वेद जस गाये ।।
जेहि सेवत फल मिलैं अनेका । सुख सम्पति सुत नेक विवेका ।।
शिव गिरिजा सेवन अनुभावै । सो शुभ सकल मनोरथ पावै ।।
जेहि जानत शिव लोक सिधावै । शंभु सपथ सेवक सुख पावै ।।
अति उदार सुनि वैन अमोले । सहस अठासी रिषि हंसि वोले ।।
धन्य सूत शुभ चरित उचारा । शंभु कथा अमिरत रस धारा ।।
तव मुख चुअत पिवत पुट काना । होन त्रपित करत हम पाना ।।
दोहा-19
शिव संतोषत कौन विधि हुय प्रसीद कह देत ।
जप तप सेवन क्रम कहौ पूजन मंत्र समेत ।।
शिव आराधन कर्म बतावौ । सेवन पूजन फल दरसावौ ।।
केहि विधि गिरिजा जन्म उछाहू । नाम कर्म तप लागि विवाहू ।।
सब मंगल षटमुख अवतारा । तारक वधन त्रिपुर संहारा ।।
जोति लिंग संख्या अधिकारा । उतपति विधि समेत विस्तारा ।।
अपर जो महालिंग शुभ चारी । परम लिंग उपलिंगन धारी ।।
प्रधट प्रभाव दरश फल भावौ । सबके सब संवाद सुनावौ ।।
दुजवर छत्रिय वैश्य सूद्र त्रिय । को किहि विधि पूजै शिव संप्रिय ।।
यथा व्यास मुनि मुख सुनिपाई । श्रुति समेत सब कहौ वुझाई ।।
दोहा- 20
शिवै सुमिर करि सूत कह सुनौ सकल मुनि बृंद ।।
सुनी यथारथ व्यास मुख कहैं सहित आनन्द ।।
शौनक पूछेसि कथा सुनीकी । भगतन सुखद अभक्तन फीकी ।।
शिव हरि कौ यह कथा सुनाई । हरि के मुख विरंचि सुनि पाई ।।
उपमनि कह व्यासै समुझाई । सत्यवती सुत हम सन गाई ।।
श्रोता वकता षट सम्वादी । शिव अनादि शिवकथा अनादी ।।
शिव पूजन यह वेदन गावा । लोक सुखद परलोक बनावा ।।
सो हम तुम सन कहैं वखानी । शिव पूजा विधान शुभ जानी ।।
शम्भु कथा शत वरष अधारा । कहि न सकहि संजुत विस्तारा ।।
दोहा-21
सो संछेप कहब हम यथा सुमति अनुसार ।
श्रुति सम्मति पौराण गति भाषा बिसद अपार ।।
भूतक देहक दैविक तापा । नासहि सकल करत शिव जापा ।।
नव कठोर शिव शिव अनुसरई । नाम नाव करि नर भवतरई ।।
मंत्र पंचअछर अति पावन । कष्ट शोक दुःख दोष नसावन ।।
कलिमल सहित सकल संतापा । हर हर करत हरत सब पापा ।।
परमभक्ति करि पूजै शंकर । रिद्धि सिद्धि सब लहैं अनंतर ।।
दुःख दारिद कुरोग अरि लम्पट । शिव सुमिरे नासहि षट संकट ।।
संतति संपति लगि शिव सेबै । अरथ कामना सब शिव देवै ।।
करहि मनोरथ जो जग मांहीं । शिव सेवत कछु दुरलभ नाही ।।
दोहा- 22
येहि विधि नित पूजन करै शिव सेवै करि प्रेम ।
चारि बरण कै विलग विधि शिवदयाल नित नेम ।।
ब्रह्म मुहूरत उठै प्रभाता । सुमिरै हर गुरु पद जलजाता ।।
तीरथ छेत्र धाम गिरि कानन । सुमिर पुनीत वेद अनुशासन ।।
श्रीपति जगहु करण जगमंगल । असकहि धेवै हरि नख शिख तल ।।
मेध श्याम युगभुजा विशाला । उर कौस्तुभ मणि उर वन माला ।।
भाल विशाल तिलक अतिरोचन । तरुण अरुण पंकज सम लोचन ।।
गोल कपोल अधर विम्वाफल । क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डल ।।
चिवुक चारु सुन्दर वर ग्रीवा । कम्बु कण्ठके हरि वल शीवा ।।
शुक चुंचकि सम शोभित नासा । रदन पांति तारका प्रकाशा ।।
दोहा-23क
अरुण कमल सम कर चरण त्रिवली उदर विशाल ।
अखिल कोटि सत मदन सम शुभग सुमिरि शिवधाल ।।
दोहा-23ख
दहिना वरती शंख शुभ चक्र सुदर्शन नाम ।
विसद गदा कौमोद की पदम सहस दल दाम ।।
सोरठा-23ग
धरे चारु कर चारि शंख चक्र पंकज गदा ।
या विधि ध्यान सुधारि शिवद्याल सुमिरै सदा ।।
सोरठा-23ख
दच्छिन दिशि को जाय मल मोचन क्रम आचरै ।
पावन मृदा मंगाय पंच वार मंजन करै ।।
छत्रिय चार वैश्य त्रै वारा । सूद्र वार दुय मंजन सारा ।।
येहि विधि से कर चरण प्रछालै । सूद्र समान त्रियन क्रय चालै ।।
रदन धोवनो अंगुल द्वादश । धोवहि द्विज भूभुज एकादश ।।
वैश्यन कौ दश त्रिय सूद्र नबांगुल । येहि प्रकार धोवै मुख से मल ।।
मंजन करि तीरथ अनुमाना ।। देश काल विधि करि अस्नाना ।।
कहि पुण्डरीकाच्छ आचमना । मंत्रि धौति धारण करि वसना ।।
एकांतर अस्थल मन धारी । संध्या वंदन विधि अनुसारी ।।
मन थिर पूजा सदन प्रवेशा । धरि सब सामा निकट महेशा ।।
दोहा-24
प्रथम पूजिये कलश धरि मूरति गवरि गणेश ।
द्वारपाल दिगपाल हरि कीरति सगण दिनेश ।।
पुनि तह पीठ कलपना कारी । अथवा कमल अष्ट दल धारी ।।
तापर शिव मूरति कर थापन । त्रै आचमन करै हरि जापन ।।
प्राणायाम करै त्रै वारा । ध्यान त्र्ययंवक येहि आकारा ।।
पंचवक्र दशभुज शशिभाला । व्याघचर्म अम्बर गजछाला ।।
जटाजूट उर फटिक प्रकाशा । अहि आभरण विभूत अवराशा ।।
सैव रूप थापै परमेश्वर । पूजि मनोरथ पावै सब नर ।।
प्रथम आचमन कर धट थापी । विलग दर्भ युत धट अस नापी ।।
प्रणव मंत्र जपि कुश कर लीजै । सकल वस्तु परिमार्जन कीजै ।।
दोहा-25
मूल मंत्र से न्यास करि पावन करि सब देह ।
करै न्यास षटअंग पुनि प्रणव सहित शिव नेह ।।
चंदन लय कर नीर उरीशा । शंभु चरण पर अरपै धीरा ।।
पुनि कपूर जल मूल तमाला । जाती तज कंकोल विशाला ।।
सब कर चूरण करै सुधारी । कलश आचमन धट मैं डारी ।।
पंचगव्य शुभ रचहि विचारी । सुरभी मुद्रा करि कर धारी ।।
निज तन लेपहि सम अस्नाना । करहि आचमन रंचक पाना ।।
पुनि पंचामृत सुरुचि बनावै । सो शिव को अस्नान करावै ।।
गोपय धाय अछीन चढ़ावै । शिव शिव जपहि कि मंत्र सुनावै ।।
जपहि षडाछर सेवहि शंकर । दह्य पाप सारूप्य होय नर ।।
दोहा-26 क
कुरुक्षेत्र गंगा गया पुष्कर प्राग प्रभास ।
मंजन पूजन तर्पने शिवदयाल यह वास ।।
दोहा-26 ख
चंदन डारै घटन प्रति धेनु मुद्र कर धारि ।
शिवद्याल तेहि नीर से पूजै शिव त्रिपुरारि ।।
।।।इति श्री शिव पुराण परिपाटी सप्तमोअध्याय ।।।
शिव चरित्र महात्म
स्थाणोर्चरितृम
राम
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