Sunday, 17 April 2011

सप्तम अध्याय

।।। स्थाणोर्चरितृम ।।।

।।। शिवदयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।। अथ श्री सप्तमोअध्याय ।।

बोले सूत सुनौ मुनि बृन्दा । शिव की कथा देनि आनन्दा ।।

जो सुनि सफल जनम हुय जावै । लोक सुजस परलोक बनावै ।।

सुनहु भार्गव कथा पुरानी । जीवन जन्म सफल अध हानी ।।

शक्ति स्वरूप सती तन पाई । जनमी प्रथम दक्ष ग्रह जाई ।।

तहॉ सती शंकरहि बिबाही । लोकहु वेद विदित जग मॉही ।।

वैर दच्क्ष शिव दोउ दिसि रोषा । तजी सती शिव दक्ष् के दोषा ।।

दक्ष सती दय फिर न बुलाई । सती बहुरि पिता ग्रह आई ।।

वैर जमातर ससुर की कोई । नारि अनादर दोउ दिसि होई ।।

दोहा-1 क

विधि हरि हर ई श्वर अहे जे न कामबस बास ।

इनके गरभ न मैथुनी पुत्र न पतनी आस ।।

1ख

काली कमला ब्रह्म त्रिय सती गवरि गुण खानि ।

इनके पुत्र न गरभ ते सुत इच्छा अनुमानि ।।

सूत सती केहि विधि केहि कारण । पितु ग्रह जायसु देह निवारण ।।

सूत सुमिर शिव हर्ष समेता । कहा कि शौनक सुनौ सचेता ।।

एक समय विधि के मख माही । सुर मुनि सव आये हरि नाही ।।

दक्ष तहां सो अवसर पायउ । अहमित ब्रम्ह सभासद आयेउ ।।

मिले सकल उठि शीश नवाये । उठे न विधि शिव ना सिर नाये ।।

शम्भु न उठे ससुर मन मानी । दक्ष मरषि बोलेसि कटु बानी ।।

शिव तै दयसि न आदर मोही । करेसि स्व शिष्य सुता दै तोही ।।

बैठि सभा सद मद गत ज्ञाना । मोहि न पितु समान मन जाना ।।

सोरठा-2क

तोहि न शर्म अकाम करो तो सेवक सुता दय ।

तदपि न विनय प्रणाम दयो अनादर सभा मय ।।

दोहा-2ख

दक्ष तरेरे नयन कर वक्र भौह मुख वाम ।

बोले मरषि महेश पर उठो न करो प्रणाम ।।

शिव अपमान करेसि तै मोरा । रूप अमंगल होवहि तोरा ।।

शिव तौ साधु नहि कछु कहेउ । पलटि साप नंदी गण दयेउ ।।

सब दुज बर तुम होउ भिखारी । विप्र धरम तजि पर अपकारी ।।

घर घर भोजन जाचहु दाना । तदपि होत गृह प्रति अपमाना ।।

तब भृगु मुनि करि नयन तरेरे । तिरछी भृकुटि बचन करेरे ।।

फरकत अधर थरथरत देहा । दयेउ शाप उठि तजि कुल नेहा ।।

शिव सेवक होवहि धनहीना । भेष अमंगल पर आधीना ।।

दोहा- 3

होय जटिल खल भसम धर कारक पर अपकार ।

दुरभच्छी दूषित अमल विष मदिरा आधार ।।

बहुरि दयेसि नंदी गण शापा । करहु परस्पर दुज परितापा ।।

होउ परस्पर सकल विरोधी । सहि न सकौ पर सम्पति क्रोधी ।।

उठे विप्र सब करत कलापा । दक्ष दयसि पुनि शिव कौ शापा ।।

अव ते शिव न लखै मख भागा । वसहि मसान विभूति विरागा ।।

प्रथम रुद्र मख भाखन आवै । सुरण संग निज भाग न पावै ।।

तब शिव उठे सहित संदेहा । सगण गये विमुख गिरि गेहा ।।

संभृम उठे सकल तजि कामा । सुर मुनि गये सवै निज धामा ।।

ससुर वैर तजि सती निरंतर । करि समाधि वैठे गिरि शंकर ।।

दोहा- 4

कछु दिन वीते विधि कृपा भये ते दक्ष प्रजेस ।

तदपि न भावी वस तजे अनुचित वैर महेश ।।

होनहार दुखः जिनहि अपारा । नासै सुमति कुमति अनुसारा ।।

वैर ससुर सारेन लगि कोई । पति पतनी विरोध अति होई ।।

दंपति कपट कलह जदि होई । तह दुय मै सुख लहै न कोई ।।

दझ प्रजापति सासन पाई । अहंकार करि मख निर्माई ।।

वैर सुमिर शिव सती विहाई । सबहि निमंत्रण दये पठाई ।।

आये विधि हरि मुनि सुर सर्वा । मनु फणि जक्ष पितर गंधर्वा ।।

सुत वनिता समेत सब आवै । नभ मारग विमान चठ़ि गावै ।।

छुटी समाधि तुरत शिव जागे । ब्रम्ह निरंतर सुमिरन लागे ।।

दोहा-5

सती सुअवसर जानि के गमनी शिव के तीर ।

आगे आसन दये शिव करि आदर धरि धीर ।।

सुनि सुर बधुन केर कल गाना । पूछति सती शिवहि विधि नाना ।।

देवन वधू मधूर धुनि गावै । चठ़ि विमान किहि के कह जावै ।।

कहै सती सन शिव हरषाई । तव पितु दछ जज्ञ निरमाई ।।

हमरे वैर न तुम्हहि वुलावा । सो कछु मोर न दोष अ भावा ।।

छोटेन कौ यह उचित सुकामा । करै बड़िन कौ प्रथम प्रणामा ।।

जदि जेठे सब गुरुण प्रधाना । गौरव कुल सब गुरू समाना ।।

जेठिन पाटा छोटेन पानी । पान प्रणाम बड़े कौ जानी ।।

सवकौ आसन असन समाना । जथा योग आसन गुणवाना ।।

दोहा-6क

जेठे हम सन्यास पुनि ईश्वर पुनि जामात ।

पद प्रछालि कन्या दई आदि न प्रणत सुहात ।।

दोहा-6 ख

यह जमातर धरम सुचि पितु सम नेह विदाम् ।

उठिके लिये न ससुर प्रथम न करहि प्रणाम ।।

बड़ेन प्रथम प्रणाम बखाने । तद छोटेन कर कुशल न जाने ।।

तदपि जमातर गुरु ब प्रधाना । प्रणवत् ससुरै पाप समाना ।।

हम अस जानि न करे प्रणामा । दछ साप दय करि अरि कामा ।।

सो सुनि सती गमन मन भावा । कह कर जोरि शिवै सिर नावा ।।

आयसु देउ समय शुभ पाई । पितु कृत उत्सव देखहि जाई ।।

शिव शंकर वर जो सनमानी । बिन बोले जनि जाहु भवानी ।।

सोचि सती मन करेसि विचारा । पिता समान भवन भरतारा ।।

हमकौ उभय पछ दुखदाई । अस कछु काल वितावहि जाई ।।

दोहा-7

संसय करि संकेत मन शिवहि कहा समुझाय ।

होत न मंगलकाज नित मिलै मातु मैं जाय ।।

शिव कह जाउ जो विना बुलाये । सादर सुख सनमान घटाये ।।

रहै न जस कीरत कुल षानी । सुख सनेह सद जीवन हानी ।।

हठ करि कहा सती हम जावैं । शिव सद कहा करौ मन भावै ।।

बहुत भांति शिव करो निषेदा । सती व माने वचन विभेदा ।।

मन अनखाय दये शिव शापा । तन मन भंग अंग परतापा ।।

सती चली सब आस विसारी । तब शिव संग दये गण चारी ।।

नारि स्वभाव विगत सन्देहा । मातु पिता कुल संग सनेहा ।।

सती दछ ग्रह पहुंची जाई । प्रेम से मिली मातु उर लाई ।।

दोहा-8 क

हंसत मिली भगिनी सकल उर अपमान उछाह ।

करै परस्पर तरकना सती ह्रदय अति दाह ।।

दोहा-8ख

दछ विमुख धर नगर लगि लई न केउ सनमानि ।

पूछत कुसल न छेम कोउ मन भूपति भय मानि ।।

सोचत सती द्वार पुनि आई । मान भंग अपकीरत पाई ।।

पुनि गवनी मखशाला माही । शंम्भु भाग देखेसि कहुं नाही ।।

सती अनादर वैर विलोकी । सकै न काहू विधि रिसि रोकी ।।

फरकत अधर अंग रिस व्यापी । तब निज रसन दसन से चापी ।।

तन थरहरत अरुण दोउ नैना । कर कंपत कठोर मुख वैना ।।

वोलेसि बचन दछ मख माही । सुनौ सकल मिलि संसय नाही ।।

जनक जग्य जितने सब आये । सुनि शिव को विरोध मनभाये ।।

तिहिको फल पावहु सब कोई । शंकर विमुख उचित जस होई ।।

दोहा-9

जद्धपि जग दारुण दुखः होत अनेक विधान ।

शिवदयाल सबसे कठिन दुसह होत अपिमान ।।

सो अपिमान कीन्ह पितु मोरा । मख मुख भंग होय खल तोरा ।।

तात कुमति उपजी उर तोरे । शंकर विमुख सुजन तव कोरे ।।

पिता सुक्रत सम्भव यह देहा । तजै जतन सत विगत सनेहा ।।

अस कहि तजि पितु मायापूरी । पच्छिम दिशा जान कछु दूरी ।।

करि जलपानि दुकूल सुधारी । वैठसि पद्मासन मन मारी ।।

तजि संसय सनेह सुख संगा । शिव पद सुमिरि ध्यान मन रंगा ।।

करि सत प्राणायाम संजीवन । करखत प्राण नैन उन्मीलन ।।

सती अंग योगानल जारा । उठी ज्वाल भयो हा हाकारा ।।

दोहा-10

ज्योति प्रकाश सती सिर कश्मीर गिरि धाम ।

तवते ज्वालामुखी शुभ लोक विदित अस नाम ।।

रही ज्योति पर्वत पर छाई । तवते ज्वलामुखी कहाई ।।

जो सुत आसय करि तहां जावै । दर्शन करै पुत्र फल पावै ।।

दरसहि पूजहि पाठ सुनावै । सो जन सकल मनोरथ पावै ।।

सती अंश हिमगिरि ग्रह जाई । जनमी पारवती तन पाई ।।

जदि शिव संग दये गण चारी । सती जरत तिन सभा विदारी ।।

मख विध्वंस करन गण लागे । भृगु मुनि ताड़े शिवगण भागे ।।

नारद जाय शम्भु यह कहेउ । यथा चरित मखशाला भयेउ ।।

सती मरण अनहित अपमाना । गण त्रासन मखमाष बखाना ।।

दोहा-11 क

सती मरण सुनि शंकर कहा स्ववैर विचार ।

दछ ह्रदय मद अंकुरा सो अब लेव उखारि ।।

दोहा-11 ख

अस विचार उर कोप करि कारक श्रष्टि संघार ।

आतुर शिव पटकी जटा प्रधटो नीलकुमार ।।

अरुण नयन शिर कुंचित केशा । कर त्रिशूल अ लोहित वेशा ।।

कहै करजोरि शंम्भु यह सोई । अब हम करैं जो आयसु होई ।।

तद वोले महेश मन मरषी । सुनौ पुत्र मम गिरा अधरषी ।।

वीरण बिषद भद्र अधिकारा । वीरभद्र तब नाम उदारा ।।

अब तुम सेनपति सो कहावौ । हरद्वार कनखल चलि जावो ।।

दछहि दलौ करौ मखभंगा । कृतुकारण विदीरण अंगा ।।

भृंगी आदि सकल गण टेरे । आये पमन सम शिव के प्रेरे ।।

चलेउ शम्भु गण अनो अपारा । गरजै तरजै करहि चिघारा ।।

दोहा-12

चलत चमू टूटे बिटप, फूटहि गिर पाषान ।।

सिन्धु थर हरे बन हलै, डोलति भूमि निदान ।।

शंकति शेष बिरद आकुलाने । उठी रेनु तम तरणि छिपाने ।।

घोर सबद सुनि मुनि मखशाला । कहै परस्पर सकल विहाला ।।

ना जग प्रलय न समर सुवरणी । नतु नव खण्ड अराजक धरणी ।।

जनु लूटत जग चोर समूहा । निडर कुटिल खल बल करि हूहा ।।

भृगु मुनि कहा कि सुनौ प्रजेशा । उत्तर दिशि आचरज विशेशा ।।

धूरि पूरि दश दिशि अंधियारा । प्रलय मेघ सम घोर अपारा ।।

कोउ कहै सती मरण भल नाही । शंकर विमुख न सुख जग माही ।।

कोउ कहै दक्ष उचित नहि कीन्हा । जगदम्विकहि अनादर दीना ।।

दोहा-13

बोलि उठे तह अपर सब कुशल न शम्भु बिरोध ।।

सजग होउ सुर मुनि मनुज दक्ष कहत करि क्रोध ।।

संभृम संकल भये उठि ठाडे़ । रक्षक दक्ष सुभट करि गाढे़ ।।

तब लगि सवै रद्र गण आये । मख रच्छक सब मार गिराये ।।

जेहि पावै तेहि मार गिरावै । सनमुख लरै सुभट जो आवै ।।

भैरव नचहि जोगिनी गावै । भूत प्रेत सब ताल वजावै ।।

चहुं दिशि घायल वीर विराजै । नाचहि शम्भुगणज गहि वाजै ।।

मोहित वीर विमोहित गाजै । समर मोहिनी वाजने वाजै ।।

वीरभद्र धुनि करि गति नाचा । जहं तहां धावहि विकट पिशाचा ।।

दोहा-14

भृगु मुनि मख रक्षा करत भुज करि बचन उचारि ।

तासु केश गण चिवुकमय लैअ समश्रु उखार ।।

पूषन हंसत गहेसि चंडी सी । तोरे वदन ते रद नख वत्तीसी ।।

भगा करे तव नयन तरेरे । नयन काढ़ि होय तिन केरे ।।

दच्छहि वीर भद्र गहि लयेउ । शीश तोर पूरण हुति दयउ ।।

काहु के कर पद भुज अंगा । काहुय करउ सकल तन भंगा ।।

येहिविधि सकल विकल करिडारे । सुरमुनि सब शिवशरण पुकारे ।।

भये विकल सव देव मुनिन्दा । मन सोचहि ब्रंदारक ब्रंदा ।।

गये अखिल सुर मुनि कैलाशा । शिवहि देखि वट छौह निवासा ।।

तरक मुदया हरि चर्माशन । जटा जूट शशि भाल प्रकाशन ।।

दोहा-15

सुर मुनि विनवत वेद विधि होव प्रशीद महेश ।

सब कर तन पूरण करौ माथो दच्छ प्रजेष ।।

तब शिव कहा दझ मख आये । शंकर विमुख उचित फल पाये ।।

शम्भु अनादर मख निरमावै । होय विधन फल पूर न पावै ।।

तुम सब विनय करी जेहि लागे । लहो भाग मख हमसे आगे ।।

पुरवा अदंत खाय पर पेखो । भोजहि भगा परायो देखो ।।

भृग अस मश्रु अरो है फेरी । पूरहि देह अपर सव केरी ।।

अब जो रहो दच्छ तन रुण्डा । जरो लागि पूरण हुति मुण्डा ।।

जग्य योग जदि बलि पशु आये । छाग तनय शिर काटि भगाये ।।

अजसुता लागि अजासुत शीशा । धरिक वंध पुनि करे अधीशा ।।

दोहा-16 क

वीरभद्र जो प्रथम तह करो दछ शिर भंग ।

अज मुख धरि संजीवनी करि परिपूरण अंग ।।

दोहा-16 ख

दच्छ प्रजापति उठे तव मगन मेख मुख पाय ।

वक वकाय वकुरे ववकि वं वं विनय वनाय ।।

दोला छंद

वं वं व्रषवध्वज विश्व विभो । व्रष वाहन वेद विनोदप्रभो ।।

वरभाल विशालसुवाल विदो । वाघंवरधर वरदानप्रदो ।।

वहुव्याल विभूषणपाति वने । विषधारणकंठ विभूतिसने ।।

वरवारणचर्म विछावनको । विनवौ वुधिवास वसावनको ।।

विदु विश्व विमोहितकांतिरते । विधनेश विनायकभूतपते ।।

विनवौविभुवानि विलाशप्रभो । विश्वाधर वेदविकाशविभो ।।

विनवै वसु विष्णु विरंचिदिवो । वंदित व्रंदारक व्रंदशिवो ।।

विलोल विलोचनकंजअरुणा । विदुवन्हि विभावसुत्रैतरुणा ।।

दोहा-17क

यह अष्टक मंगल करण भाषो दछ प्रजेष ।

शिवदयाल वाचैं सुनै नासै विघन कलेष ।।

दोहा-17 ख

वं वं विगत विनाश है अवम् कहावत नाश ।

शिवदयाल वं वं वदत उभै लोक परकाश ।।

दछ्छ विनय करि वुकर वदनवर । हंसे सकल सुनि विहंसे शंकर ।।

कह शिव हम प्रसीद वर मांगौ । दच्छ कहा शिव यह अनुरागौ ।।

हम तब करे दोष वहुतेरे । बरबस वैर विषाद घनेरे ।।

दये शाप मख भाग न पावौ । छमहु शंभु सो दोष नसावौ ।।

जग्य जोग देवन संग भावौ । मख उच्छिष्ट भाग अब पावौ ।।

तवते सब जन गाल वजावै । वं वं वं वं कहि शिवहि रिझावै ।।

अब सो चरित सुनहु अति पावन । पारवती कर जनम सुहावन ।।

पितरण सुता मानसी मैना । शैल राज पतनी सुख एैना ।।

दोहा-18

तासु गरभ आगम उमा सती अंश अनुसार ।

गवरि नाम जनमी सुता पारवती अवतार ।।

गिरिजा नाम हिमाचल कन्या । सती शिरोमणि परम लवन्या ।।

तब अवराधि शंभु पति पाये । लोकन विदित वेद जस गाये ।।

जेहि सेवत फल मिलैं अनेका । सुख सम्पति सुत नेक विवेका ।।

शिव गिरिजा सेवन अनुभावै । सो शुभ सकल मनोरथ पावै ।।

जेहि जानत शिव लोक सिधावै । शंभु सपथ सेवक सुख पावै ।।

अति उदार सुनि वैन अमोले । सहस अठासी रिषि हंसि वोले ।।

धन्य सूत शुभ चरित उचारा । शंभु कथा अमिरत रस धारा ।।

तव मुख चुअत पिवत पुट काना । होन त्रपित करत हम पाना ।।

दोहा-19

शिव संतोषत कौन विधि हुय प्रसीद कह देत ।

जप तप सेवन क्रम कहौ पूजन मंत्र समेत ।।

शिव आराधन कर्म बतावौ । सेवन पूजन फल दरसावौ ।।

केहि विधि गिरिजा जन्म उछाहू । नाम कर्म तप लागि विवाहू ।।

सब मंगल षटमुख अवतारा । तारक वधन त्रिपुर संहारा ।।

जोति लिंग संख्या अधिकारा । उतपति विधि समेत विस्तारा ।।

अपर जो महालिंग शुभ चारी । परम लिंग उपलिंगन धारी ।।

प्रधट प्रभाव दरश फल भावौ । सबके सब संवाद सुनावौ ।।

दुजवर छत्रिय वैश्य सूद्र त्रिय । को किहि विधि पूजै शिव संप्रिय ।।

यथा व्यास मुनि मुख सुनिपाई । श्रुति समेत सब कहौ वुझाई ।।

दोहा- 20

शिवै सुमिर करि सूत कह सुनौ सकल मुनि बृंद ।।

सुनी यथारथ व्यास मुख कहैं सहित आनन्द ।।

शौनक पूछेसि कथा सुनीकी । भगतन सुखद अभक्तन फीकी ।।

शिव हरि कौ यह कथा सुनाई । हरि के मुख विरंचि सुनि पाई ।।

उपमनि कह व्यासै समुझाई । सत्यवती सुत हम सन गाई ।।

श्रोता वकता षट सम्वादी । शिव अनादि शिवकथा अनादी ।।

शिव पूजन यह वेदन गावा । लोक सुखद परलोक बनावा ।।

सो हम तुम सन कहैं वखानी । शिव पूजा विधान शुभ जानी ।।

शम्भु कथा शत वरष अधारा । कहि न सकहि संजुत विस्तारा ।।

दोहा-21

सो संछेप कहब हम यथा सुमति अनुसार ।

श्रुति सम्मति पौराण गति भाषा बिसद अपार ।।

भूतक देहक दैविक तापा । नासहि सकल करत शिव जापा ।।

नव कठोर शिव शिव अनुसरई । नाम नाव करि नर भवतरई ।।

मंत्र पंचअछर अति पावन । कष्ट शोक दुःख दोष नसावन ।।

कलिमल सहित सकल संतापा । हर हर करत हरत सब पापा ।।

परमभक्ति करि पूजै शंकर । रिद्धि सिद्धि सब लहैं अनंतर ।।

दुःख दारिद कुरोग अरि लम्पट । शिव सुमिरे नासहि षट संकट ।।

संतति संपति लगि शिव सेबै । अरथ कामना सब शिव देवै ।।

करहि मनोरथ जो जग मांहीं । शिव सेवत कछु दुरलभ नाही ।।

दोहा- 22

येहि विधि नित पूजन करै शिव सेवै करि प्रेम ।

चारि बरण कै विलग विधि शिवदयाल नित नेम ।।

ब्रह्म मुहूरत उठै प्रभाता । सुमिरै हर गुरु पद जलजाता ।।

तीरथ छेत्र धाम गिरि कानन । सुमिर पुनीत वेद अनुशासन ।।

श्रीपति जगहु करण जगमंगल । असकहि धेवै हरि नख शिख तल ।।

मेध श्याम युगभुजा विशाला । उर कौस्तुभ मणि उर वन माला ।।

भाल विशाल तिलक अतिरोचन । तरुण अरुण पंकज सम लोचन ।।

गोल कपोल अधर विम्वाफल । क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डल ।।

चिवुक चारु सुन्दर वर ग्रीवा । कम्बु कण्ठके हरि वल शीवा ।।

शुक चुंचकि सम शोभित नासा । रदन पांति तारका प्रकाशा ।।

दोहा-23क

अरुण कमल सम कर चरण त्रिवली उदर विशाल ।

अखिल कोटि सत मदन सम शुभग सुमिरि शिवधाल ।।

दोहा-23ख

दहिना वरती शंख शुभ चक्र सुदर्शन नाम ।

विसद गदा कौमोद की पदम सहस दल दाम ।।

सोरठा-23ग

धरे चारु कर चारि शंख चक्र पंकज गदा ।

या विधि ध्यान सुधारि शिवद्याल सुमिरै सदा ।।

सोरठा-23ख

दच्छिन दिशि को जाय मल मोचन क्रम आचरै ।

पावन मृदा मंगाय पंच वार मंजन करै ।।

छत्रिय चार वैश्य त्रै वारा । सूद्र वार दुय मंजन सारा ।।

येहि विधि से कर चरण प्रछालै । सूद्र समान त्रियन क्रय चालै ।।

रदन धोवनो अंगुल द्वादश । धोवहि द्विज भूभुज एकादश ।।

वैश्यन कौ दश त्रिय सूद्र नबांगुल । येहि प्रकार धोवै मुख से मल ।।

मंजन करि तीरथ अनुमाना ।। देश काल विधि करि अस्नाना ।।

कहि पुण्डरीकाच्छ आचमना । मंत्रि धौति धारण करि वसना ।।

एकांतर अस्थल मन धारी । संध्या वंदन विधि अनुसारी ।।

मन थिर पूजा सदन प्रवेशा । धरि सब सामा निकट महेशा ।।

दोहा-24

प्रथम पूजिये कलश धरि मूरति गवरि गणेश ।

द्वारपाल दिगपाल हरि कीरति सगण दिनेश ।।

पुनि तह पीठ कलपना कारी । अथवा कमल अष्ट दल धारी ।।

तापर शिव मूरति कर थापन । त्रै आचमन करै हरि जापन ।।

प्राणायाम करै त्रै वारा । ध्यान त्र्ययंवक येहि आकारा ।।

पंचवक्र दशभुज शशिभाला । व्याघचर्म अम्बर गजछाला ।।

जटाजूट उर फटिक प्रकाशा । अहि आभरण विभूत अवराशा ।।

सैव रूप थापै परमेश्वर । पूजि मनोरथ पावै सब नर ।।

प्रथम आचमन कर धट थापी । विलग दर्भ युत धट अस नापी ।।

प्रणव मंत्र जपि कुश कर लीजै । सकल वस्तु परिमार्जन कीजै ।।

दोहा-25

मूल मंत्र से न्यास करि पावन करि सब देह ।

करै न्यास षटअंग पुनि प्रणव सहित शिव नेह ।।

चंदन लय कर नीर उरीशा । शंभु चरण पर अरपै धीरा ।।

पुनि कपूर जल मूल तमाला । जाती तज कंकोल विशाला ।।

सब कर चूरण करै सुधारी । कलश आचमन धट मैं डारी ।।

पंचगव्य शुभ रचहि विचारी । सुरभी मुद्रा करि कर धारी ।।

निज तन लेपहि सम अस्नाना । करहि आचमन रंचक पाना ।।

पुनि पंचामृत सुरुचि बनावै । सो शिव को अस्नान करावै ।।

गोपय धाय अछीन चढ़ावै । शिव शिव जपहि कि मंत्र सुनावै ।।

जपहि षडाछर सेवहि शंकर । दह्य पाप सारूप्य होय नर ।।

दोहा-26 क

कुरुक्षेत्र गंगा गया पुष्कर प्राग प्रभास ।

मंजन पूजन तर्पने शिवदयाल यह वास ।।

दोहा-26 ख

चंदन डारै घटन प्रति धेनु मुद्र कर धारि ।

शिवद्याल तेहि नीर से पूजै शिव त्रिपुरारि ।।


।।।इति श्री शिव पुराण परिपाटी सप्तमोअध्याय ।।।
शिव चरित्र महात्म
स्थाणोर्चरितृम
राम

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