।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे पंचमोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
शिव गिरिजा प्रतिवाद अमोले । सुनत सौनकादि पुनि बोले ।।
व्यास शिष्य पुनि भयो वतावौ । अघ मोचन शिव कथा सुनावौ ।।
तब कह सूत सुनौ मुनि ज्ञानी । शंभु कथा शुभ अमिरत वानी ।।
पारवती शिव कर व्रत साधे । बहुत काल शंकर अवराधे ।।
तिहि सरूप शिव देखि भवानी । प्रेम गिरा सुनि मन मुसकानी ।।
उमा पुरातन समुझि सनेहा । नयन लजाय विगत संदेहा ।।
बहुरि शंभु दिशि देख लजानी । वोली मधुर मनोहर वानी ।।
मानि महेश मोहि निज दासी । करौ कृपा तुम शिव सुखरासी ।।
दोहा -1
मै अनजाने तुमहि शिव कहे बहुत दुरवाद ।
शरण देउ सो दोष छमि नाथ विहाय विषाद ।।
तब शिव कह सखि लै जगदम्वा । चलव भवन जनि करौ विलंवा ।।
शंभु वचन सुनि सखी सयानी । वोली विनय समेत सुवानी ।।
यदि प्रसीद शिव दीन दयाला । करव कृपा करुणाय कृपाला ।।
आयसु देव सुनेम हर जाई । वेद विधान बिबाहउ आई ।।
यह कारज तब योग विशोका । मात पितहि जस मंगल मो का ।।
पावन करव पिता कुल गेहा । सफल सकल परिवार सनेहा ।।
जानहि जनिक जनितमे कन्या । जग जस गावै हिमगिरि धन्या ।।
गिरपति जानै जन्म कृतारथ । सुता भये सवकर परमारथ ।।
दोहा - 2
यतिक वर दै शिव हरौ मात पिता संदेह ।
आनि बिबाहउ वेद विधि मानि हमार सनेह ।।
उमा वचन सुनि बोले शंकर । यदि इच्छा सो करब निरंतर ।।
अस कहि के शिव अंतर ध्याना । गमने काशी पुरी सुथाना ।।
विरह वियोग मगन तह शंकर । सुमिरेउ सप्त रिषिन तेहि अंतर ।।
इहा उमा अस ह्रदय विचारा । आज सुफल भा जनम हमारा ।।
अब गृह जाय मिलौ पितु मातै । पोषय उर सुनाय मृदु बातै ।।
अस विचारि उर धीरज नाही । आतुर उठी ध्यान शिव पाही ।।
तप तजि गिरिजा सखी समेता । गई तुरत पितु धाम निकेता ।।
पितौ विरह कातर मग हेरी । गवरि गृह आवै कव फेरी ।।
दोहा-3
गौरि सोच सागर मगन, हिमगिरि सहित समाज ।
उमा आगमन सुनत सद, पायसि मनहु जहाज ।।
उमा भवन जब आवत जानी । मात पिता सुख से गृह आनी ।।
सवन सुनी गिरजा गृह आई । उठि धाये निज काज विहाई ।।
विरध बाल नर नारि समेता । आए मिलन सकल करि हेता ।।
पुरजन परिजन सुजन सयाने । पिवत रूप जस तद न अघाने ।।
वरषै सुमन सप्रेम सुधारै । जै गिरि नन्दनि वचन उचारै ।।
सब मिलि कहै उमा कुल पावन । शिव साधन तप करे सुहावन ।।
पूजि सवनि गृह करे प्रवेशा । राजहि सुख जनु मिले महेशा ।।
मूधर सकल धाम धन जाना । सुता जनमि जीवन धनि माना ।।
दोहा-4
धन्य मातु पितु धन्य धन, धन्य देश कुल ग्राम ।।
सन्त रूप सुत कै सुता, जनमै धन्य सो धाम ।।
सुत कुपुत्र से सुता पुनीता । जिमि पावन गिरिजा अरू सीता ।।
पुनि नारद के वचन प्रशंशा । परम साधु मुनि धर्म वतंशा ।।
अव सो सुनौ मधुर संवादा । करे शम्भु जो समन विशादा ।।
सप्त रिषिन अस ह्रदय विचारा । हमकौ शिव सुख दये अपारा ।।
कौन विटप सम पर उपकारी । ताड़त लकुटी देत फल डारी ।।
छाया सुखद सदा सब काहु । आतप वरषा बात निवाहू ।।
करत विचार गये सब काशी । शिव समीप अस विनय विरासी ।।
दोहा-5
जै शंकर सर्वज्ञ शिव, अस कहि करे प्रणाम ।।
मानि कृतारथ देह निज, औ परिपूरण काम ।।
कहय कि सत्य कि स्वप्न कि माया । भरि लोचन शिव दर्शन पाया ।।
कह मम द्रष्टि कहां शिव दर्शन । कहं जड़ लोह कि पारस परसन ।।
विसमैं बस बिलोकि शिव धामा । रिषि बोले करि विनय प्रणामा ।।
नौमि कपर्दिन तेज निरंजन । व्यापक रूप सकल अध भंजन ।।
नीलकंठ बहु तेज परावर । कणक वाहु रूपण से शंकर ।।
हम जो प्रथम विविधि तप कीन्हा । उत्तम वेद पठन मन कीन्हा ।।
विविधि जग्य नित नैमित होमा । नेम धर्म जप तप व्रत सोमा ।।
दोहा-6
योग जग्य जप तप करम, सत्य धर्म उपदेश ।।
शिवदयाल बहु जन्म लगि, दर्शन देत महेश ।।
संजम दान तीर्थ हम साधे । मन वच कर्म देव अवराधे ।।
आज भये सब शुभ फल सांचे । जो शिव दरस भये मन रांचे ।।
सब सत कर्म करै करि नेमा । होय सकल शिव तव पद प्रेमा ।।
भजन प्रताप शम्भु पहि आये । जनम अंध जनु लोचन पाये ।।
मन वच काम करो शिव सेवा । लहे तासु फल आजु अभेवा ।।
होय मूक वालक वाचाला । पंगु चढ़ै गिरि वर्धत वाला ।।
जासु कृपा सो उमा महेशा । सर्व काल सर्वज्ञ सर्वेशा ।।
शिव ते अछै जीव तन ग्रेहा । शक्ति से वल बुधि निज देहा ।।
दोहा - 7
अर्थ धर्म अरु काम पुनि मोक्ष् पदारथ चारि ।
शिवदयाल शिव दरस ते सुलभ सकल संसार ।।
पारस पाय रंक सुख मांही । तथा शंभु दरसे दुख नांही ।।
आज सफल हम जीवन जाने । जो शिव सुमिर सकल सनमाने ।।
करि अनुग्रह शिव अधिकाई । वोलि हमैं सब दयेसि वड़ाई ।।
रिषिन गिरा सुनि बोले शंकर । सुर कारज जग हेत निरंतर ।।
तारक असुरै विधि वर दयेउ । प्रेरित दनुज देव दुख भयउ ।।
सब सुनि देव लागि उपकारा । मम सुत होय असुर संधारा ।।
आन चरित रिषि सुनहु सनेहा । जनमी उमा हिमंचल गेहा ।।
दोहा - 8
सती दझ मख मह जरी ज्वाला परवत जाय ।
तासु अंश हिमगिरि भवन गिरिजा जनमी आय ।।
तहा गवरि दारुण तप कारी । मम हित जन्म कर्म तन धारी ।।
ताकौ हम अमोघ वर दीन्हा । तद चाहै परिपूरण कीन्हा ।।
पितरन सुता मानसी मैना । हिमगिरि पट महिषी सुखनैना ।।
तिनकी सुता उमा अस नामा । परम सुन्दरी लच्क्षण धामा ।।
जगदम्बिका सकल गुण खानी । तेहि सुबिबाह मनोरथ आनी ।।।
सप्तरिषय हिमगिर गृह जाऊ । जिहि स्वकाज सो करब उपाऊ ।।
पारवती हिमगिर कर कन्या । सब गुण संयुत त्रिभुवन धन्या ।।
हिमगिर जाचौ मम हित लागी । देंय सुता सो मम हित लागी ।।
दोहा-9
मुनि मैना पह जाय करि । अस मागौ मन लाय ।।
सुता देय शिव शंकरै । रहे भुवन जस छाय ।।
श्रुति मारग नृप नीति विसोधी । हिमगिर मैनै कहव प्रबोधी ।।
तनया देय शिवय गुण गावै । लोकन सुजस अछय पद पावै ।।
शंभु गिरा सुनि रिषि अभिलाशै । हिमगिरि गेह चसे शिव आसै ।।
आनन्द मगन अनुग्रह मानी । अहो भाग कहि मन क्रम बानी ।।
आजु भये हम सकल कृतारथ । जेहि वंदत विधि हरि लगि स्वारथ ।।
शिव जगदीश उमा जगदम्बा । यह सम्बन्ध स्वजोग कदंबा ।।
सो शिव आयसु हमै बखानी । सुजस दये निज सेवक जानी ।।
यह कहि सप्त रिषय सुख पाये । चलत शंभु कह सिरिस नवाये ।।
दोहा-10
करि प्रणाम रिषि शंकरहि चले सराहत भाग ।।
ह्रदय मंत्र शिव-शिव जपत उर अनुराग विराग ।।
चलत समय आनन्द मन माही । मारग जात कछुक श्रृम नाही ।।
गद् गद् गिरा न आवहि धीरा । हरिषित रोमा पुलक शरीरा ।।
रिषि चितमन करत मगजाई । भये कवन अव पुऩ्य सहाई ।।
शिव को खेद सुमरि तजि धीरा । विरह विषाद नैन बह नीरा ।।
शिव स्वारथ लगि मोहि पठावा । नेति नेति जेहि वेदन गावा ।।
भजनानन्द मगन मुनि ज्ञाता । प्रेम कक्ष ना पुलकित गाता ।।
अस विचारी मारग सुख पाये । तब लग देव प्राग नियराये ।।
हिमगिरि पुर लखि विसमै नाना । कहत परस्पर ज्ञान निधाना ।।
दोहा-11
अलकापुरी कि भोगवति, अमरावती कि स्वर्ग ।।
दर्शनीय यह ग्राम शुभ जहां सकल सुख वर्ग ।।
छंद
सर कूप वापी वाटिका वन वाग उपवन तरु फरे ।।
रमनीक गोपुर फेर सवही भवन सब मंगल भरे ।।
फल ऊष लाजा सुमन द्वारन कनक धट कलश धरे ।।
ध्वज पताक सुविविध तोरण कदलि खम्भन दल हरे ।।
छंद – दोला
बहु शाल सुचित्र वितित्र वने । मणि माणिक कंचन खम्भ घने ।।
जंह सूरज भांति मणी दमकै । शशि कांति समान कणी चमकै ।।
पट सैल विचित्र वितान तने । गज मुक्तन जाल प्रवाल घने ।।
जंह मारुत मंद सुगन्ध बहे । लगि शीतल अंग अनन्द लहे ।।
सुक सारिक कोकिल नाद करै । कल कण्ठ मयूर मलार भरे ।।
सुर सुन्दरि सी सब नारि जहां । नर देव समान सुरूप तहां ।।
मन मोद मनोज उरोज रसै । नव योवन रूप सवै विलसै ।।
प्रति द्वारन विप्र पुराण कहै । मख करि महीसुर मोद लहै ।।
अब को वरणै गिरिराज पुरी । सब संपति से वहु भांति जुरी ।।
हितस्वर्ग व्यथा मख दान करै । हिमिनगर न देवन मान हरै ।।
शिवदयाल उमा का जन्म जंहां । प्रभु कहि कौनु सिराय तंहा ।।
शुभ सुन्दर यह संवाद सुनै । शुख ज्ञान लहै जब ध्यान वनै ।।
दोहा -12
यह सम्पदा लखत रिषि पहुंचे हिमगिरि द्वार ।
विसमै करत हमंचल लखि आचर्ज अपार ।।
त्रिय सन बोले वचन सुहाये । कह रवि सात स्वर्ग से आये ।।
ग्रह मेधिनन कर कारज येहा । पूजिहि गौ द्वज अतिभि सनेहा ।।
हम धन वनिता सुता समेता । गृही धर्म परहित चित चेता ।।
येहि अन्तर अति भयो प्रकाशा । सप्त रिषिन आ किरणि अकाशा ।।
सन्मुख देखि तिनहि गिरि राऊ । मानि पुजि रिषि अमित प्रभाऊ ।।
करि दण्डवत नाय पद माथा । कर गहि रिषिन चले लै साथा ।।
कहै धन्य गृह भोर सुहावन । करौ आय सो तुम रिषि पावन ।।
लै निर्मल जल पाय पखारे । दय पुनीत आसन वैठारे ।।
दोहा - 13
भूधर तव मेली सुता मैना सहित वुलाय ।
कुशल छेम पूंछी मुनिन प्रेम मगन हुलसाय ।।
दै नैवेध अर्ध आचमना । सविधि पूजि पूंछे कित गमना ।।
कर संपुट मन मांहि हुलाशा । शैलराज अस वचन प्रकाशा ।।
हम सब धन्य धरणि धन धामा । सुख संपति गुण परिजन वामा ।।
धन्य सुता मम उमा अपरणा । जासु तेज गुण जाय न बरणा ।।
सब तीरथ सम परम विशाला । सवके दरसनीय सब काला ।।
विप्र मान सार जग माही । पुन्य पुन्ज कोउ दूसर नाही ।।
अतिथि रूप आगमन तुम्हारा । पूरण परमानन्द उदारा ।।
कह करनीय कहौ रिषि राया । हम अति कृपण रूप निदराया ।।
दोहा - 14
केहि विधि पूजै सप्त रिषि सब परिपूरण काम ।
दीपक निज आरो कहा विकसत सूरज धाम ।।
सब सुखदायक तब आगमना । भयेउ परम पावन यह भवना ।।
शिव सेवक रिषि कहौ निवाहा । मोहि करण हित कारज काहा ।।
जो कछु कहब करब हम सोई । तब अनुशासन वृथा न होई ।।
सुनत हिमालय वचन अमोले । हरष समेत सात रिषि बोले ।।
जग तुम धन्य हिमाचल राजा भये कृतारथ सहित समाजा ।।
करो चहै शिव पर उपकारा । संकट हारक जगत आधारा ।।
जगजननी गिरिजा तव कन्या । मोरे मुख मागत शिव धन्या ।।
गिरि निज सुता शकरहि देहू । सिद्धि सहित जग मैं जस लेहू ।।
दोहा - 15
धन्य सुता तब धन्य तुम धन्य हमार सुभाग ।
जासु वदन शिव याचत उमा योग अनुराग ।।
शिव समरथ सर्वेश महेशा । उमा देउ लगि मम उपदेशा ।।
तुमहि सुभग जग सुता सुभागी । अजर अमर शिव आसै लागी ।।
सुनि सो वचन कहा गिरिराऊ । सहज सरल यह सुभग उपाऊ ।।
पितरण सुता मैनका नामा । मम अरधंगी चलौ तिहि धामा ।।
जिहिके कर सिधि संपति मोरी । तिहि सन जाचहु सुता वहोरी ।।
सुता बिबाह मातु आधीना । जिन दुख सहे देह करि छीना ।।
गिरि अस कहि रिषि संग सिधाये । रंग भवन मैना पहि आये ।।
शैलराज कह सुनु प्रिय मैना । ऋषि जाचन आयसि तब अयना ।।
दोहा -16
तुम सम दाता सात ऋषि जाचन आयसि द्वार ।
भिच्छा गिरिजा शंभु हित दय जस लेउ अपार ।।
पति अग्या करि अंगीकारा । वोली मैना वचन उदारा ।।
नाथ पतिवृता कर यह धरमा । पति आयसु करौ सुकरमा ।।
सुन मैना के वचन अमोले । सात रिषिन से हिमगिरि वोले ।।
ऋषि अग्या तब अंगीकारा । ब्रम्हण वचन सकै को टारा ।।
वहुरि उमा तप शिखिर दिखाई । तह रिषि सात गये सुख पाई ।।
दुर्वल तन पर कर शिव धामा । ऋिषिन उमै लखि करै प्रणामा ।।
गिरिजौ पूजि दये शुभ आसन । सकल पूज्य दुज तेज प्रकाशन ।।
रिषिन कहा तव सुनौ अपरणा । करै कठिन तप किहि के शरणा ।।
दोहा - 17
सुनौ सप्तरिषि उमा कह शिव सर्वेस महेश ।
सो अवराधे वहुत दिन हम नारद उपदेश ।।
पुनि मृदु गूढ़ वचन रिषि वोले । तव मन अचल शंभु हित डोले ।।
जवसे शिवहि दच्छ दये शापा । तजेसि सती शिव करि संतापा ।।
दच्छ सुता पितु मख तन जारा । मदन जराय करे शिव छारा ।।
निज इच्छा करि अचल समाधी । शिव स्वत्रंत वैठे निरुपाधी ।।
गिरिजा सेवौ हरि सुर नायक । शिव निर्गुण अजान नहि लायक ।।
तव कह पारवती म़दु वानी । सकल विश्व सं भ्र व शिव ज्ञानी ।।
तुम्हरी जानि मदन शिव जारा । सूचित मोहि जगत निर धारा ।।
शंभु अजान विष्णु सब जानत । जो जिहि इष्ट सु तिहि कौ मानत ।।
दोहा - 18
पाय परीझा देखि द्रढ़ सप्त रिषिन सिर नाय ।
आशिष दै कह उमा तब वर्धै प्रीति शिवाय ।।
कर सरोज धरि गिरिजा शीशा । देत अचल आशिष सुरिषी सा ।।
तब कल्यान होय कल्यानी । भव संयोग सुयोग भवानी ।।
शिव पद प्रीति वढ़ै निशिवासर । शुक्ल पक्छ शशि के सम सादर ।।
शिवै मिलै शिव लहौ निरंतर । अस आशिष दै सप्त रिषीसुर ।।
परवत राज मधुर फल लये । प्रेम सहित ऋषि सात जिमाये ।।
अरुंधती मैना प्रति जाई । कहे शंभु गुण लई लुभाई ।।
येहि विधि गये तीन दिन वीती । मंगल गावैं त्रिय कुल रीती ।।
चौथे दिन शुभ लगुन लिखाई । सप्त रिषिन कर दई सुहाई ।।
दोहा- 19 ---------------शिव बिवाह ------------
प्रथमै मंगल काज करि कनक कलश घट थापि ।
पूजि गौप्या वरुण हरि मंगल गीत अलापि ।।
हरषि हिमालै रिषिन प्रवेशा । कुम कुंम लेप चिवुक सुकेशा ।।
शिव हित दै मंगल फल फूला । हरदी अक्षत दूव निर्मूला ।।
पुनि कुंकुम दै कहा समुझाई । शिव सिर करब रोचना जाई ।।
सो रिषि जपत चले शिव काशी । मिले जाय जंह शिव अविनाशी ।।
कलश पुजाय कलेश वचाये । प्रथम मोद मंगल करवाये ।।
कनक थार पर लगुन धराई । शिव के कर दय वाचि सुनाई ।।
तब सिद्धन शिव आयसु पाये । इच्छा भोजन सवहि कराये ।।
पुनि शिव कहा सवै अंचवाई । सवै निमंत्रण दये हरषाई ।।
दोहा -20
पिअरे चांवर नारियर दये सवन के हाथ ।
आयेउ शंभु विवाह के दय पुंगीफल साथ ।।
आनद मंगल मगन रिषीशा । गमने शिव आयसु धरे शीशा ।।
आतुर शिव कैलाश सिधाये । सुमिरे शिव नारद तह आये ।।
माथ नाय करि शिवै प्रणामा । आनद मगन लहे विसरामा ।।
शंकर कहा सुनौ मुनि नारद । उमा करे तप तेज विशारद ।।
हम तिन कौ मंगल वर दीन्हा । तिहि चाहत परिपूरण कीन्हा ।।
कह नारद शिव सरल सुभाऊ । जन रंजन ई श्वरण पभाऊ ।।
अव गिरिजा मन पूरण कीजै । हमहि योग कारज कहि दीजै ।।
तब शिव कहे वचन सुखदायक । तुम नारद वहुविधि सब लायक ।।
दोहा -21 क
सकल देवतन वेगही देउ निमंत्रण जाय ।
भूषन वाहन सेवकन जुत आवै समुदाय ।।
दोहा 21ख
विधि हरि इन्द्र कुवेर यम वरुण लोक दिकपाल ।
शिवदयाल सूर्यादि ग्रह अग्नि वायु बसु ब्याल ।।
सोरठा -21ग
जक्ष पितर गंधर्व ऋषि मानुष अपसरा ।
सिद्धि साध्यगण सर्व गुहय किंपुरुष निउति सब ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे पंचमो अध्याय ।।।
।।। अथ श्री शिव चरित्र महात्मे द्वतीयपाद पंचमोअध्याय ।।।
No comments:
Post a Comment