।।।श्री स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परपाटी ।।।
।।। अथ श्री द्वितीयोअध्याय ।।।
दोहा - 1
जगत पिता शिवशंकर शिवा जगत की मात ।
तिनके तनय गणेश के वन्दौ पद जल जात ।।
कमला जिनके वछिसि वदन वसैं वागीस ।
सो प्रभु ह्रदि संविद सदा भजौं नृसिंह अधीस ।।
प्रथमै सूत सुमिरि शिव नंदन । बोलेसि करि नृसिंह पद वंदन ।।
पारवती परमेश्वर चारौ । वंदि के वाणी अरथ सिधारौ ।।
सुनहु शौनकादि गुण जानैं । भल शिव शक्ति पाद पहिचानैं ।।
कहैं सुगम शिव शुभ संवादा । हरण दोष दुख शोक विषादा ।।
एक समय नारद मुनि योगी । गुण गण गावत ब्रह्म वियोगी ।।
विचरत धरणि करण उपदेशा । देखेउ अगनित लिंगं महेशा ।।
तव नारद विधि लोक सिधाये । करि विनती निज हेतु सुनाये ।।
सुनहु पितामह अस्तुति मोरी । पूछहि परमारथ कर जोरी ।।
दोहा
तव प्रसाद विधि विष्णु के सुने अमित आख्यान ।
तप तीरथ ब्रत नेम श्रुति भक्ति ज्ञान जप दान ।।
अब हर पूजन भेद बतावौ । तत्व सहित शिव कथा सुनावौ ।।
विविध चरित सो करै निवेदा । परम इष्ट गुन ज्ञान विभेदा ।।
वरणौ सुगम महातम शिवकर । परम तत्व निर्गुण परमेश्वर ।।
शिव की महिमा भेद अपारा । जग विख्यात लोक उपकारा ।।
जेहि विधि होय सो शिव संतोषा । देवहि वांछित फल परितोषा ।।
उमा जनम तप तेज विवाहा । वरणौ सकल कथा अवगाहा ।।
करे उमा शिव चरित अनेका । सुने प्रथम नहि तोष विवेका ।।
तृपित होय जे सुनि शिव गाथा । लहो न तिन विशेष रस नाथा ।।
सोरठा -2 क
सो शिव कथा विशाल कहौ सु विभु जग पावनी ।
विधि बोले शिवद्याल नारद सुनौ महेश गुण ।।
दोहा - 2ख
साधुबाद पूछेउ सुगम , सवै लोक हित जानि ।
वरणौं शिव गिरिजा कथा , सुनौ परम सुखमानि ।।
शंभु कथा सुख देनि सुहावनि । पाप ताप दुख दोष नसावनि ।।
भये मगन तन पुलक शरीरा । गद गद गिरा विरंचि अधीरा ।।
शिव सुमिरे तन दशा विसारी । पुनि धीरज धरि विनै उचारी ।।
जै महेश जै जय गंगाधर । सर्व लोक हित सर्व पापहर ।।
देखि सुदशा चकित मुनिवृन्दा । नारदादि मन मगन अनंदा ।।
विहंसि विरंचि कहा सुनु नारद । यथा विष्णु के चरित विसारद ।।
तथा सुनहु शिव कथा पुनीता । हरणि सवै अघ ओघ सभीता ।।
परब्रह्म शिव अदभुत रूपा । जस दरसौ तस कहौ अनूपा ।।
दोहा - 3
जोति रूप व्यापक अलख , निर्गुण ब्रह्म अनूप ।
शिव अचिंत्य अब्यक्त नित , स्थूल न सूक्ष्म रूप ।।
ब्रह्म अनादि अनंत विरासी । आदि औ अन्त रहित अविनासी ।।
योगिन ह्रदय ध्यान मै भासत । सत्य अनन्तक ज्ञान प्रकाशत ।।
सो सब मय शिव रूप समाना । दायक सबहि ज्ञान विज्ञाना ।।
कबहु कि निज इच्छा निरमानी । नाम प्रकृति माया गुण खानी ।।
कारण मूल सहित मरजादा । तासु अष्ट भुज समन विषादा ।।
वसन विचित्र विभूषण भासै । सहस चन्द्र दुति बदन प्रकासै ।।
नाना अभरण अंग विराजत । नाना गति समेत छबि छाजत ।।
धरे कमल कर आयुध नाना । नयन नवल अंबोज समाना ।।
दोहा - 4
विदित महालक्ष्मी कहै महाकाली गुण खानि ।
प्रघटै जिन के अंस बहु रमा गवरि बृह्मानि ।।
तेज अंचिल उदित सब योनी । एकाकिनी वहुत मिलि होनी ।।
यथा प्रकृति देवी तस पुरुषा । करै विचार उभौ मिलि हरषा ।।
युगल होत का करण प्रयोगा । करै परस्पर ध्यान संजोगा ।।
भये तिहि समय गुणादिक वानी । संसय हरण करौ तप जानी ।।
ते सुनि दारुण तप कारायण । कबहु ध्यान पथ ब्रह्म परायण ।।
प्रकृति पुरुष उर भयो प्रबोधा । जब अति ध्यान की मारग सोधा ।।
तिनके अंग प्रकट जल धारा । ब्रह्म रूप जल सकल अपारा ।।
सो अनंत परसत अघ नासै । मंजन पान से ज्ञान प्रकासै ।।
सोरठा - 5क
सोये जल बिसराम , परम प्रीति करि काल बहु ।
पुरुष नारायण नाम , प्रकृति नाम नारायणी ।।
सोरठा-5ख
अपर कहूं ना कोय , प्रकृति पुरुष दोनौं बिना ।
यह अंतर लगि दोय , ब्रह्म तत्व विकसित महा ।।
दोहा - 5ग
महा तत्व भये प्रकृति से , महा से तृगुण प्रधान ।
अहंकार भयो त्रिगुण से , तेहि मात्रिका परान ।।
तहि ते पंच भूत अविराशा । सहित ज्ञान विज्ञान प्रकाशा ।।
कहेसि तत्व संख्या ऋिषि सत्तम । प्रकृति पुरुष विनि सवै जढ़ातम ।।
तत्वन संख्या उभौ प्रधाना । एकीकरि चौबीस प्रमाना ।।
तद संग्रेह उभौ जल सोये । ब्रह्म रूप वहु काल विगोये ।।
सोवत नारायण कर नाभी । प्रघटो उत्तम कमल कलाभी ।।
सहित करर्णिका पत्र अनन्ता । योजन अमित ऊंच नहि अन्ता ।।
अगनित योजन छांह पसारा । हेम गर्भ हम कमल कुमारा ।।
तेहि माया मोहत हम नारद । वेदन कंज विना श्रुति सारद ।।
दोहा - 6
को हम आये कहां ते , काज हमारो कौन ।
केहि के सुत जनमे कहां , मोहि रचो को तौन ।।
इमि संसय करि अंत प्रबोधा । हम किमि माया मोहित सोधा ।।
कमल मूल थल मेरो करता । हुयहैं तहां स्व खोजै भरता ।।
करि अस बोध कन्ज फुलनी ते । उतरत नाल वर्ष सत बीते ।।
तदपि न कमल मूल मै पावा । पुनि संसय करि फिरा सुभावा ।।
कमल नाल मारग अवरोहा । गये वर्ष सत भ्रमत विमोहा ।।
तेहि छण मात्र करै विसरामा । करत ईश्वरै विनय प़़णामा ।।
तव अस भई मनोहर वाणी । करहु परम तप निज हित मानी ।।
सो सुनि गुणि हम द्वादस वर्षा । करे कठिन तप मोह न मरषा ।।
दोहा - 7
चतुर वाहु प्रघटे तवै , तहां विष्णु भगवान ।
मो पर दया करन हित , तन घनश्याम सुजान ।।
शंख चक्र अरु गदा पदम कर । क्रीट मुकुट मणि पीताम्बर धर ।।
तरुण अरुण पंकज सम लोचन । नव अम्बुज मुख दुति भय मोचन ।।
सुभग कोटि कन्दर्प समाना । प्रकृति जनित सो श्री भगवाना ।।
रूप परम सुन्दर अस देखा । हम विसमय वस भये विशेषा ।।
काल आत्मा कणक प्रभाकर । शुक्ल कृष्ण सो निर्गुण सुन्दर ।।
सोपि असत सत मैं सर्वोतम । सर्व भूत मय नारयण सम ।।
महाबाहू विभु परम सुहावन । कहन लागि सो मो मन भावन ।।
प्रभु कौ लखि हम हर्ष समेता । तिहि निकेत मैं अस चित चेता ।।
सोरठा - 8क
को तुम कहौ सुभाग , पूछत मोहिं सनातन ।
जानि प्रेम अनुराग , लगे उठावन हांथ गहि ।।
दोहा - 8 ख
माया मोहित मर्षि हम , तिन संग कहा बुझाय ।
कहौ कौन तुम हाँथ गहि , हमकौ रहे उठाय ।।
क्रोध गिरा सुनि हरि भगवाना । कहसि कि सनौ विरंचि सुजाना ।।
परम विष्णु हम तत्व प्रधाना । सदा तुमहि कारक निरमाना ।।
अब ते वत्स सु निज सुभ जानौ । सत्य हमार वचन विधि मानौ ।।
नारद हम सो सुनि मुसकाने । माया मोहित मरषि रिसाने ।।
पुनि मैं कहा कि हरि किहि काजा । वत्स वत्स किमि कहत न लाजा ।।
गुरू शिष्य पितु सतै भिलासत । तैसे महा अल्प मुहि भाषत ।।
मुनि सो सब संसार को पालक । सकल विश्व करता खल शालक ।।
प्रकृति प़़वर्तन विष्णु सनातन । अजय विरंचि विश्व संजातन ।।
दोहा - 9
कमल नयन जगदातमा , विधातार धातार ।
तिहि से मै कहा मोह बस , भाषत कौन प्रकार ।।
मोह विवश लधु भाषत मोही । कौन अर्थ कहु पूछौ तोही ।।
सो कह मोहि भये तुम करता । पालनीय हम प्रघटे भरता ।।
हर मम अब्यय अंश उदारा । लगि तव अंग रुद्र अवतारा ।।
बुद्धि मोरि प्रभु पुरुष परायण । जगन्नाथ जगधर नारायण ।।
परमातम आतमा प़़धाना । जगत प्रभू अच्युत ईशाना ।।
विश्व प्रभव उदभवा अधीशा । विष्णु अनामय विभु जगदीशा ।।
विधि न तुम्हार कछू अपराधा । यह सब मय माया कर वाधा ।।
सुनहु परे ब्रह्मन सद ज्ञाता । सत्य के परे सकल मम जाता ।।
दोहा - 10
निरमी चौबीस तत्व मय , प्रकृति करी एक ठाम ।
तासो प्रधटो कमल यह , तासु पुत्र विधि नाम ।
यह सनि विधि वोले करि क्रोधा । को तुम हौ मम करौ प्रबोधा ।।
कहौ वेगि तुम किहि के करता । अस कहि मनि मै कोपा बरता ।।
माया मोहित प्रभु के संगा । करयो युद्ध दारुण रण रंगा ।।
तौ न विवाद समन सामरथा । दोनौ ह्रदय प्रबोधन अरथा ।।
सहस प्रघट तहाँ ज्वाला माला । काल अनल उष्मा विकराला ।।
सो छय वृद्धि से रहित अनंता । वरजित आदि मध्य अरु अन्ता ।।
अन उपमा अन द्रष्टि अनूपा । सकल विश्व सम्भव अनुरूपा ।।
लखि सो ज्वाला सहस प्रमाना । भये विमोहित हरि भगवाना ।।
दोहा - 11 क
विष्णु कहा किहि अर्थ लगि , हम तुम करै विषाद ।
इहँ तिसरे को आगमन , आतुर तजौ विवाद ।।
सोरठा - 11 ख
कहां से यह संजात , लिंग अगिनि संभव महा ।
करब परीछा तात , वायु वेग धरि हंस तन ।।
हंस रूप धरि उपरि उड़ाई । लिंग शिखा विधि खोजहु जाई ।।
धरि हम रूप श्वेत बाराहा । अधर प्रवेसे जल अवगाहा ।।
जब असि बचन कहे जगदीशा । हंस रूप हम धरेउ मुनीशा ।।
तब ते हंस राज मुहि भाषा । हंस विराट नाम गुनि राखा ।।
हस- हस कहि जदि अस ध्यावै । होय सो हंस परम पद पावै ।।
श्वेत पवन सम पंकज पच्झा । पीत चरण मुख सुन्दर दक्झा ।।
वेग पवन मन ऊपर धाये । श्वेत बाराह विष्णु बनि आये ।।
मेरु श्रंग तीझ्ण नख दंता । प्रलय भानु सम तेज अनंता ।।
सोरठा - 12 क
सत योजन आकार , दस योजन विस्तार तन ।
घोर घुरघुरा कार । अंग विचित्र सुपाद लघु ।।
दोहा - 12 ख
धरि के विष्णु वाराहतन , अध गत नीर निवाह ।
शिव दयाल तव से विदित , कल्प श्वेत वाराह ।।
।। इति श्री शिवचरित्र महात्मे द्धितीयोध्याय ।।
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