Sunday, 17 April 2011

द्वतीय अध्याय

।।।श्री स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परपाटी ।।।
।।। अथ श्री द्वितीयोअध्याय ।।।
दोहा - 1

जगत पिता शिवशंकर शिवा जगत की मात ।

तिनके तनय गणेश के वन्दौ पद जल जात ।।

कमला जिनके वछिसि वदन वसैं वागीस ।

सो प्रभु ह्रदि संविद सदा भजौं नृसिंह अधीस ।।


प्रथमै सूत सुमिरि शिव नंदन । बोलेसि करि नृसिंह पद वंदन ।।

पारवती परमेश्वर चारौ । वंदि के वाणी अरथ सिधारौ ।।

सुनहु शौनकादि गुण जानैं । भल शिव शक्ति पाद पहिचानैं ।।

कहैं सुगम शिव शुभ संवादा । हरण दोष दुख शोक विषादा ।।

एक समय नारद मुनि योगी । गुण गण गावत ब्रह्म वियोगी ।।

विचरत धरणि करण उपदेशा । देखेउ अगनित लिंगं महेशा ।।

तव नारद विधि लोक सिधाये । करि विनती निज हेतु सुनाये ।।

सुनहु पितामह अस्तुति मोरी । पूछहि परमारथ कर जोरी ।।


दोहा

तव प्रसाद विधि विष्णु के सुने अमित आख्यान ।

तप तीरथ ब्रत नेम श्रुति भक्ति ज्ञान जप दान ।।

अब हर पूजन भेद बतावौ । तत्व सहित शिव कथा सुनावौ ।।

विविध चरित सो करै निवेदा । परम इष्ट गुन ज्ञान विभेदा ।।

वरणौ सुगम महातम शिवकर । परम तत्व निर्गुण परमेश्वर ।।

शिव की महिमा भेद अपारा । जग विख्यात लोक उपकारा ।।

जेहि विधि होय सो शिव संतोषा । देवहि वांछित फल परितोषा ।।

उमा जनम तप तेज विवाहा । वरणौ सकल कथा अवगाहा ।।

करे उमा शिव चरित अनेका । सुने प्रथम नहि तोष विवेका ।।

तृपित होय जे सुनि शिव गाथा । लहो न तिन विशेष रस नाथा ।।

सोरठा -2 क

सो शिव कथा विशाल कहौ सु विभु जग पावनी ।

विधि बोले शिवद्याल नारद सुनौ महेश गुण ।।
दोहा - 2ख
साधुबाद पूछेउ सुगम , सवै लोक हित जानि ।

वरणौं शिव गिरिजा कथा , सुनौ परम सुखमानि ।।

शंभु कथा सुख देनि सुहावनि । पाप ताप दुख दोष नसावनि ।।

भये मगन तन पुलक शरीरा । गद गद गिरा विरंचि अधीरा ।।

शिव सुमिरे तन दशा विसारी । पुनि धीरज धरि विनै उचारी ।।

जै महेश जै जय गंगाधर । सर्व लोक हित सर्व पापहर ।।

देखि सुदशा चकित मुनिवृन्दा । नारदादि मन मगन अनंदा ।।

विहंसि विरंचि कहा सुनु नारद । यथा विष्णु के चरित विसारद ।।

तथा सुनहु शिव कथा पुनीता । हरणि सवै अघ ओघ सभीता ।।

परब्रह्म शिव अदभुत रूपा । जस दरसौ तस कहौ अनूपा ।।
दोहा - 3

जोति रूप व्यापक अलख , निर्गुण ब्रह्म अनूप ।

शिव अचिंत्य अब्यक्त नित , स्थूल न सूक्ष्म रूप ।।

ब्रह्म अनादि अनंत विरासी । आदि औ अन्त रहित अविनासी ।।

योगिन ह्रदय ध्यान मै भासत । सत्य अनन्तक ज्ञान प्रकाशत ।।

सो सब मय शिव रूप समाना । दायक सबहि ज्ञान विज्ञाना ।।

कबहु कि निज इच्छा निरमानी । नाम प्रकृति माया गुण खानी ।।

कारण मूल सहित मरजादा । तासु अष्ट भुज समन विषादा ।।

वसन विचित्र विभूषण भासै । सहस चन्द्र दुति बदन प्रकासै ।।

नाना अभरण अंग विराजत । नाना गति समेत छबि छाजत ।।

धरे कमल कर आयुध नाना । नयन नवल अंबोज समाना ।।

दोहा - 4

विदित महालक्ष्मी कहै महाकाली गुण खानि ।

प्रघटै जिन के अंस बहु रमा गवरि बृह्मानि ।।

तेज अंचिल उदित सब योनी । एकाकिनी वहुत मिलि होनी ।।

यथा प्रकृति देवी तस पुरुषा । करै विचार उभौ मिलि हरषा ।।

युगल होत का करण प्रयोगा । करै परस्पर ध्यान संजोगा ।।

भये तिहि समय गुणादिक वानी । संसय हरण करौ तप जानी ।।

ते सुनि दारुण तप कारायण । कबहु ध्यान पथ ब्रह्म परायण ।।

प्रकृति पुरुष उर भयो प्रबोधा । जब अति ध्यान की मारग सोधा ।।

तिनके अंग प्रकट जल धारा । ब्रह्म रूप जल सकल अपारा ।।

सो अनंत परसत अघ नासै । मंजन पान से ज्ञान प्रकासै ।।

सोरठा - 5क

सोये जल बिसराम , परम प्रीति करि काल बहु ।

पुरुष नारायण नाम , प्रकृति नाम नारायणी ।।

सोरठा-5ख

अपर कहूं ना कोय , प्रकृति पुरुष दोनौं बिना ।

यह अंतर लगि दोय , ब्रह्म तत्व विकसित महा ।।

दोहा - 5ग

महा तत्व भये प्रकृति से , महा से तृगुण प्रधान ।

अहंकार भयो त्रिगुण से , तेहि मात्रिका परान ।।

तहि ते पंच भूत अविराशा । सहित ज्ञान विज्ञान प्रकाशा ।।

कहेसि तत्व संख्या ऋिषि सत्तम । प्रकृति पुरुष विनि सवै जढ़ातम ।।

तत्वन संख्या उभौ प्रधाना । एकीकरि चौबीस प्रमाना ।।

तद संग्रेह उभौ जल सोये । ब्रह्म रूप वहु काल विगोये ।।

सोवत नारायण कर नाभी । प्रघटो उत्तम कमल कलाभी ।।

सहित करर्णिका पत्र अनन्ता । योजन अमित ऊंच नहि अन्ता ।।

अगनित योजन छांह पसारा । हेम गर्भ हम कमल कुमारा ।।

तेहि माया मोहत हम नारद । वेदन कंज विना श्रुति सारद ।।

दोहा - 6

को हम आये कहां ते , काज हमारो कौन ।

केहि के सुत जनमे कहां , मोहि रचो को तौन ।।

इमि संसय करि अंत प्रबोधा । हम किमि माया मोहित सोधा ।।

कमल मूल थल मेरो करता । हुयहैं तहां स्व खोजै भरता ।।

करि अस बोध कन्ज फुलनी ते । उतरत नाल वर्ष सत बीते ।।

तदपि न कमल मूल मै पावा । पुनि संसय करि फिरा सुभावा ।।

कमल नाल मारग अवरोहा । गये वर्ष सत भ्रमत विमोहा ।।

तेहि छण मात्र करै विसरामा । करत ईश्वरै विनय प़़णामा ।।

तव अस भई मनोहर वाणी । करहु परम तप निज हित मानी ।।

सो सुनि गुणि हम द्वादस वर्षा । करे कठिन तप मोह न मरषा ।।

दोहा - 7

चतुर वाहु प्रघटे तवै , तहां विष्णु भगवान ।

मो पर दया करन हित , तन घनश्याम सुजान ।।

शंख चक्र अरु गदा पदम कर । क्रीट मुकुट मणि पीताम्बर धर ।।

तरुण अरुण पंकज सम लोचन । नव अम्बुज मुख दुति भय मोचन ।।

सुभग कोटि कन्दर्प समाना । प्रकृति जनित सो श्री भगवाना ।।

रूप परम सुन्दर अस देखा । हम विसमय वस भये विशेषा ।।

काल आत्मा कणक प्रभाकर । शुक्ल कृष्ण सो निर्गुण सुन्दर ।।

सोपि असत सत मैं सर्वोतम । सर्व भूत मय नारयण सम ।।

महाबाहू विभु परम सुहावन । कहन लागि सो मो मन भावन ।।

प्रभु कौ लखि हम हर्ष समेता । तिहि निकेत मैं अस चित चेता ।।

सोरठा - 8क

को तुम कहौ सुभाग , पूछत मोहिं सनातन ।

जानि प्रेम अनुराग , लगे उठावन हांथ गहि ।।

दोहा - 8 ख

माया मोहित मर्षि हम , तिन संग कहा बुझाय ।

कहौ कौन तुम हाँथ गहि , हमकौ रहे उठाय ।।

क्रोध गिरा सुनि हरि भगवाना । कहसि कि सनौ विरंचि सुजाना ।।

परम विष्णु हम तत्व प्रधाना । सदा तुमहि कारक निरमाना ।।

अब ते वत्स सु निज सुभ जानौ । सत्य हमार वचन विधि मानौ ।।

नारद हम सो सुनि मुसकाने । माया मोहित मरषि रिसाने ।।

पुनि मैं कहा कि हरि किहि काजा । वत्स वत्स किमि कहत न लाजा ।।

गुरू शिष्य पितु सतै भिलासत । तैसे महा अल्प मुहि भाषत ।।

मुनि सो सब संसार को पालक । सकल विश्व करता खल शालक ।।

प्रकृति प़़वर्तन विष्णु सनातन । अजय विरंचि विश्व संजातन ।।

दोहा - 9

कमल नयन जगदातमा , विधातार धातार ।

तिहि से मै कहा मोह बस , भाषत कौन प्रकार ।।

मोह विवश लधु भाषत मोही । कौन अर्थ कहु पूछौ तोही ।।

सो कह मोहि भये तुम करता । पालनीय हम प्रघटे भरता ।।

हर मम अब्यय अंश उदारा । लगि तव अंग रुद्र अवतारा ।।

बुद्धि मोरि प्रभु पुरुष परायण । जगन्नाथ जगधर नारायण ।।

परमातम आतमा प़़धाना । जगत प्रभू अच्युत ईशाना ।।

विश्व प्रभव उदभवा अधीशा । विष्णु अनामय विभु जगदीशा ।।

विधि न तुम्हार कछू अपराधा । यह सब मय माया कर वाधा ।।

सुनहु परे ब्रह्मन सद ज्ञाता । सत्य के परे सकल मम जाता ।।

दोहा - 10

निरमी चौबीस तत्व मय , प्रकृति करी एक ठाम ।

तासो प्रधटो कमल यह , तासु पुत्र विधि नाम ।


यह सनि विधि वोले करि क्रोधा । को तुम हौ मम करौ प्रबोधा ।।

कहौ वेगि तुम किहि के करता । अस कहि मनि मै कोपा बरता ।।

माया मोहित प्रभु के संगा । करयो युद्ध दारुण रण रंगा ।।

तौ न विवाद समन सामरथा । दोनौ ह्रदय प्रबोधन अरथा ।।

सहस प्रघट तहाँ ज्वाला माला । काल अनल उष्मा विकराला ।।

सो छय वृद्धि से रहित अनंता । वरजित आदि मध्य अरु अन्ता ।।

अन उपमा अन द्रष्टि अनूपा । सकल विश्व सम्भव अनुरूपा ।।

लखि सो ज्वाला सहस प्रमाना । भये विमोहित हरि भगवाना ।।

दोहा - 11 क

विष्णु कहा किहि अर्थ लगि , हम तुम करै विषाद ।

इहँ तिसरे को आगमन , आतुर तजौ विवाद ।।

सोरठा - 11 ख

कहां से यह संजात , लिंग अगिनि संभव महा ।

करब परीछा तात , वायु वेग धरि हंस तन ।।

हंस रूप धरि उपरि उड़ाई । लिंग शिखा विधि खोजहु जाई ।।

धरि हम रूप श्वेत बाराहा । अधर प्रवेसे जल अवगाहा ।।

जब असि बचन कहे जगदीशा । हंस रूप हम धरेउ मुनीशा ।।

तब ते हंस राज मुहि भाषा । हंस विराट नाम गुनि राखा ।।

हस- हस कहि जदि अस ध्यावै । होय सो हंस परम पद पावै ।।

श्वेत पवन सम पंकज पच्झा । पीत चरण मुख सुन्दर दक्झा ।।

वेग पवन मन ऊपर धाये । श्वेत बाराह विष्णु बनि आये ।।

मेरु श्रंग तीझ्ण नख दंता । प्रलय भानु सम तेज अनंता ।।

सोरठा - 12 क

सत योजन आकार , दस योजन विस्तार तन ।

घोर घुरघुरा कार । अंग विचित्र सुपाद लघु ।।

दोहा - 12 ख

धरि के विष्णु वाराहतन , अध गत नीर निवाह ।

शिव दयाल तव से विदित , कल्प श्वेत वाराह ।।


।। इति श्री शिवचरित्र महात्मे द्धितीयोध्याय ।।

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