।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे द्वतीय पाद त्रतीयोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
बहूरि लोमहर्षन सुत बोले । सुनौ भार्गव वचन अमोले ।।
नारदादि मुनि ससुर सुरेशा । गमने जह कैलाश महेशा ।।
सब देवन मिलि पठये नारद । जाय शम्भु तर विनय विशारद ।।
करि प्रणाम सिर नाय सुवानी । कर पुट शिव की विनय वषानी ।।
तुम शिव शंकर दीन दयाला । हर गंगाथर परम् कृपाला ।।
चाहति पारवती तव पोषण । करे कठिन तप शिव सतोषण ।।
पूरन करौ मनोरथ ताके । तुम परिपालक लोक प्रजा के ।।
सुनि नारद कर कोमल वानी । शिव कृपाल सुर आरत जानी ।।
दोहा-1
भये प्रसीद महेश तब सवै शीघ्र वर देन ।
गबने गवरि शिषिर पर प्रेम परीक्षा लेन ।।
यती जठर वनिके शिव आये । गिरिजा सिखिर समीप सिधाये ।।
आवत उमा यती जब देखा । पुजन चली शंभु सम लेखा ।।
तव शंकर अस करेसि प्रभाउ । कहु पग धरत परत कहुँ पाऊ ।।
पलित मुणड सव तन शित केशा । जपत ब्रह्म तन कपत महेशा ।।
लट पट पग महि गिरत दिखाई । धरत लकुट जन क्षण सधि जाई ।।
जरूठ विंरूप वसन मृग छाला । वदन रदन गत हलत कपाला ।।
शिव अकेल कोउ संग न दूजा । विरधि भेष लखि देवी पूजा ।।
दय आसन पग धोय समोदा । पूछित कुशल समेत विनोदा ।।
छंद-2
अरपि आसन असन सादर अरध पदन पंकज दयेउ ।।
बैठि आसन जराजर जितनी दनय नम भरि लयेउ ।।
उचित अरचन उमा करि करजोरि शिव कौ शिर नयेउ ।।
शिवदयाल पुनि पूछति गवरि प्रभु कहाँते आवन भयेउ ।।
दोहा-2
लैकर सुन्दर मधुर फल । निरमल नीर मंगाय ।।
शिव सनमुख धरि प्रेम करि । कहा लेव मुनि खाय ।।
शिव गिरजा दिशिं पलट उधारे । आलस भरे सुनयन निहारे ।।
शिव सुन्दर वर वेष छिपाई । वोले वचन कपट चतुराई ।।
देवि सहित विधि पूजेहु मोही । कहब कपट तजि पूछै तोही ।।
नवल वैश तब मन अनुरागी । करौ कठिन तप केहि वर लागी ।।
यह तप करे सकल तप दरसी । केहि वर लहन कामना करसी ।।
हर्ष समेत कहौ निज स्वारथ । किमि सुन्दरता करी अकारथ ।।
यह तन गौरी तुम परहेता । गहति कांच कंचन मणि चेता ।।
इमि शंकर बहु वचन सुनाये । उठी उमा निज नैन लजाये ।।
सोरठा- 3 क
सखिन कहा समुझाय विलग वैठि त्रिण ओट करि ।
वेग वहिन तुम जाय कहौ यथारत रती सन ।।
दोहा -3ख
गिरिजा प्रेरित सखी तव आतुर शिव प्रति जाय ।
शिवदयाल तब सखी कह सादर शील सुभाय ।।
3-ग
सविधि गौरि सेवन करति आतम इन्द्रिम साधि ।
पति इच्छा करि तरुण तन शिवै रही आराधि ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महात्मे तृत्रीयोअध्याय ।।।
।।। अथ श्री शिव चरित्र महत्मे चतुर्र्थोअध्याय ।।।
।।। शिव दयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।
।।। स्थाणोर्चरित्रम् ।।।
पुनि कह सूत सुनौ मुनि ब्रंदा । शंभु चरित नासक भव फंदा ।।
गिरिजा प्रेरित सखी सयानी । बोली मधुर मनोहर वानी ।।
सुनौ सु जटिल उमा अभिलाषा । शंकर मिलन मनोरथ राखा ।।
पुनि परमारथ हित अनुरागी । करै परम तप परहित लागी ।।
अखिल देव मुनि जन संसारी । भये अनाथ रहित अधिकारी ।।
विकल सकल ऐश्वरज विहीना । प्रथमै तिनके हित लवलीना ।।
आन मनोरथ स्वारथ साधन । चहै पिनाक पाणि पति राधन ।।
सो सब कारज शिव आधीना । तपत विहानी वैस नवीना ।।
सो-
शिव पारथी वनाय सेवित श्रावण चैत प्रति ।
करै शम्भु चित लाय धूम पान वारह वरष ।।
दोहा- 1
शनि प्रदोष और चतुर्दशि आठैं वुध शशिवार ।
सोम अमावसि सप्तमी दशमी चौथि अंगार ।।
व्रत सब जे पर्वनि असनाना । करै उमा शिव हित नित दाना ।।
सखी तासु मैं सहित सनेहा । प्रथमै विटप अरोपे एहा ।।
भये सफल ते तरु लगि आमा । तद न मनोरथ अंकुर जामा ।।
उमा रूप निज शिव हित कारी । कबहुक दया करै मदनारी ।।
नारद कर अनुशासन मानी । उमा करै तप निशचै जाने ।।
जदि तुम पूंछे वचन विचारी । सो हम करै सकल निरधारी ।।
सुनत जती अस गिरा अकाशा । सत्य कहां सखि अकि परिहासा ।।
अन्तर कपट उमा कछु राखा । तिहि ते निज मुख गिरा न भाषा ।।
सोरठा -2क
तथा गौरि मुख भाष सुनौ यती कारन अगम ।
जो हमार अभिलाष कहा यथारथ सखी सब ।।
दोहा - 2ख
सखी करी कछु तरकना हम न करैं उपहास ।
करम वचन मन सत्य ब्रत शंभु मिलन की आस ।।
जो सखि कहे वचन सव सांचे । जटिल महेश मोर मन रांचे ।।
जदपि कठिन दुरलभ मत एहा । तदपि अचल शिव चरण सनेहा ।।
मिलहि मोंहि किमि जती महेशा । अगम न भावी वस उपदेशा ।।
कहे जथारथ वचन भवानी । चले धामशिव सुनि सत वानी ।।
तब कह पारवती कित जैहौ । जती फेरि कब दरष दिखैहौ ।।
गौरि वचन सुनि शिव गुण गाढ़े । लकुट लगाय चवुक भरि ठाढ़े ।।
सुचि सनेह गुणि प्रेम निहारे । तद शंकर अस वचन उचारे ।।
गिरिजा तोर न जतन यह ठीका । प्रथम न करौ पूजन मम नीका ।।
सो0- 3क
अब विपरीत दिखात सुखतजि सेवौ लाभ दुख ।
तिहि कारण हम जात कांच विशाहत कणक दय ।।
दोहा 3 ख
करदम लेपो अंग मह चंदन धोय छुटाय ।
बृष वाहन चाहौ चढ़न वाहन अश्व विहाय ।।
गंग उदक तजि खोजति कूपा । चह खद्धोत छाड़ि रवि धूपा ।।
वसन विहाइ धरो मृगछाला । तजे भवन वन वसो विहाला ।।
सेवौ खल वक मानि मराला । तजि पिक पालौ काग कराला ।।
मधुर कन्द तजि संग्रह सोरा । भा विपरीत कुटिल मन तोरा ।।
यह अजोग तुहि सोह न देवी । विधि हरि सुर तजि शंकर सेवी ।।
सेवन योग न तोहि महेशा । तजि लोकप दिगपाल सुरेशा ।।
शिव चाहौ सुर सकल विहाई । नहि तव योग विरोध लषाई ।।
तुमहि शंभु सन अन्तर कैसे । शुभ्र श्याम धन दामिन जैसे ।।
दोहा-4
कह तब कोमल कमल तन सुन्दर गौर विशाल ।
कह शिव कठि कठोर उर मुन्डन माल कराल ।।
कह शुभ पंकज नैन तिहारे । कह शिव त्रैलोचन अरुनारे ।।
कंह तब चंद्र वदन पटुवादा । कंह शिव पंचवक्र घन नादा ।।
कंह तब सुन्दर वसन विशाला । शिव तन वाघंवर मृगछाला ।।
कह तव रूप कन्दर्य सुहावा । बरणै शक्ति कहन को पावा ।।
कह शिव जटाजूट शिर धारे । लपटे अंग भुजंग सुकारे ।।
कह तब अंग विलेपन चंदन । चिता भसम शंकर उर वन्दन ।।
कह सब देव वरा तुम वाला । संग रुद्र गण भूत कराला ।।
तुम नवीन तन वैस किशोरी । विरध अंग शिव योग न जोरी ।।
दोहा - 5
तव मृदंग धुनि मधुर सुर शिव के श्रंगी वाद ।
नूपुर किंकिन सवद तब शंकर डमरू नाद ।।
कोकुल सुक सारिक तब नादा । शिव कर ववकत वम् वम् वादा ।।
कह तब ङंका शिव गल वाजा । नहि तुम लायक शंभु समाजा ।।
विरुपाछ वपु जन्म न जाना । कोपित मातु जाति को वाना ।।
आन कहां लौ वरणौ धन घर । भंग खाय तद रहै दिगम्बर ।।
वर गुण एक न लषत शिव पाहीं । ब्रष वाहन त्रिसूल कर माहीं ।।
पराधीन परग्रही भिखारी । काहे न दाहय मदन अनारी ।।
विषधर कंठ सहाय पिशाचा । फिरै अनादर सम जग जाचा ।।
जाति न विधा ज्ञान सुभागी । एकांगी शिव नित्य विरागी ।।
दोहा - 6
कवहुक वास मसान मै कवहूं गिरि कैलाश ।
संध्या भरमत भूत लै काशी गिरि वन वास ।।
शिवे लगन मन तोहि न योगा । जनि वन वसौ छांड़ि ग्रह शोभा ।।
तब तन रतन हार मणि माला । कह शंकर उर माल कपाला ।।
तोर ह्रदय आभरण श्रंगारा । शंकर अंग भुजंग अधारा ।।
तब उर भूषन हेम पटंवर । शिव के वारण चर्म दिगंवर ।।
तुम विशेष सब सुन्दर रूपा । तव अनुरूप न शंभु अनूपा ।।
निज रोचक हम कहा वषानी । तब इच्छा रुचि करहु भवानी ।।
समया विदित देव अविनासी । सदा समीप मसान प्रवासी ।।
अशुभ अमंगल जो जग माहीं । सो सब लखत संग शिव पाहीं ।।
दोहा - 7
जिंहकी त्रिय काली प्रथम विमुख विरूप विगान ।
हाथ खड्ग खप्पर असन मास रुधिर मद पान ।।
शिवै न इच्छा सुत वनिता की । सदा स्वतंत्र फिरत एकाकी ।।
सुनत यती मुख कूट प्रबोधा । वोली वचन गवरि करि क्रोधा ।।
यह कोउ कपट रूप मैं जाना । आयेउ छलन यती अनुमाना ।।
कहे यती तुम वचन अलीका । अब हम कहैं सुनौ क्रम नीका ।।
यदपि विरोध शंभु उर जोहा । यती भेष तुम कहत न सोहा ।।
तुम न लखे शंकर व्रत धारी । हउ कोउ धूर्त बने ब्रह्मचारी ।।
सुनु शिव रूप कहौ निरधारा । निर्गुण शंभु सगुण अवतारा ।।
जासु न मरण जन्म जग त्राता । तिहिके कवन जाति पितु माता ।।
दोहा - 8
सब विध्यन पति शंकर कहा करौ मन खेद ।
दये विष्णु को प्रथम जिन स्वांस रूप युग वेद ।।
शिव निज स्वांस वेद निरमाये । प्रथम विष्णु उर माझ पढ़ाये ।।
सकल निधिन बिधापति देवा । लहे वेद विधि करि शिव सेवा ।।
तिनके का घर धन सुख काजा । पूरण परमातम वैराजा ।।
प्रकृति परे पुरुष अवतारण । तिनके कहा शक्ति कर कारण ।।
प्रकृति से तीन शक्ति गुण ज्ञाता । तिनहि सकल सेवत विख्याता ।।
अखिल भूत जेतिक जग मांही । विनि शिव शक्ति कहूं कछु नाहीं ।।
जोतहि मृत्यु जाहि जप मानव । तासु नाम मृत्युंजय जानव ।।
रोग हरय सेवित शिव योगी । दुरमति ताहि वतावति रोगी ।।
दोहा - 9
वचन वान खल साल तन दगा दये को दाग ।
कपट कंट विस्वास मह विसरत न त्रै भाग ।।
लगि त्रिपुण्ड वुधु होत अनूपा । तुम कह शिवै अमंगल रूपा ।।
जासु भजन छूटत भव रोगा । तासु ह्रदय किमि होत वियोगा ।।
धर्मराज पापिन दुख दायी । शिव के दरश हेत जब जाई ।
तव शिव के गण भूत पिशाचा । तिनके कोप करत को वाचा ।।
ते जम के शिर मुकुट विदारे । खंड खंड करि करि महि डारे ।।
एैसो भूत प्रेत दल जाको । तिनको औरु पच्छ कंहु काको ।।
अछय रूप सुख नाम प्रतापा । सेवत शिवहि छुटहिं संतापा ।।
कवहुं करै पूरण मन आसै । निज इच्छा करि मम दुख नासै ।।
दोहा - 10
शिवदयाल जन रंक जदि सात जनम को होय ।
शिव सेवत अनपायनी लक्ष्मी पावहि सोय ।।
और वचन कटु कहे घनेरे । भूषन वसन सुनहु शिव केरे ।।
मणिपति फणि सुफणिन पति शेशा । तासु वलय कर धरम महेशा ।।
भेड़ नाभि कय साल दुशाला । तासु शत्रु कँ शत्रु कराला ।।
ताके शुभग रुचिर हरि छाला । विदित शम्भु के वसन विशाला ।।
सकल रतन ग्रह गिरि कैलाशा । तिहि पर शिव कै सदा निवासा ।।
तिन हरि रतन अरु भूषन काहा । शंकर विमुख सकल अवगाहा ।।
हर वेमुख प्रभु का धन धामा । होव कठिन फिरि भये निकामा ।।
प्रतिदिन आठ सिद्धि शिव आगे । नाचहि नवहु निद्धि अनुरागे ।।
दोहा -11
जपै सदा सुर मुनि मनुज शिव शिव मंगल नाम ।
जेहि के सुमिरण दरश ते सब परिपूरण काम ।।
शिव अनुकूल सदा शिव पाहीं । जिनकौ जग कछु दुरलभ नाहीं ।।
होय विधटन संकट दुख जाके । शिव सेवत सुख मंगल ताके ।।
गुरु पितु मातु वंधु सुत नारी । कोउ न शिव समान हितकारी ।।
चिता भसम तुम कही अपावन । सो सिर धरि सुर नाचत भावन ।।
शिव जगदादि जगत पति शंकर । बिसद काल के काल भयंकर ।।
जे सब जग कारक संहारा । होय तासु छय कौन प्रकारा ।।
परमा तम शिव ब्रह्म अनंता । कोमल चित्त कृपाल भगवंता ।।
तुमसे सठ शिव तत्व न पावै । शंकर विमुख विरोध वड़ावै ।।
दोहा - 12
तामस शिव अंग लगि सहस कला भये शेष ।
सहसवदन फग एक पर धरणि धरे रज लेष ।।
दुराचार खल सठ वस खेदा । शिव गुण रूप न जानहि भेदा ।।
यदि खल शिव कै निंदा करई । कुंभीपाक नरक नर परई ।।
संचित पुन्य जनम वहु गुन्जा । नासहि यथा पावक तृण पुंजा ।।
इहां करसि निंदा शिव द्रोही । भा मोहि पाप पूजि दयो तेही ।।
शिव निंदक दरसन अध जाना । करै सजल तुरत अस्नाना ।।
हरि हर निंदन सुनै जो कोई । गौ द्विज वध सम पातक होई ।।
तुअ मति मंद महेश न जाने । निज मुख दोष अनेक वखाने ।।
सर्वोपरि परमेश महेशा । निराकार शिव जग अखिलेशा ।।
सोरठा - 13 क
श्रोता सुपच समान शिव निंदक पशु मार ।
उभै कुटिल अज्ञान तेज घटहि पावहि नरक ।।
दोहा 13ख
वार वार विनवत शिवै शंभु सनातन जोय ।
रहे यथावत पुन्य मम सकल अछै फल होय ।।
गवरि गिरा सुनि जती उदारा । शिव अष्टक शिव रुद्र उचारा ।।
दये वचन शिव होय यथावत । उभै विमन सखिन समुझावत ।।
गिरिजा कही सुनौ सखि कारण । करौ जतन करि यती निवारण ।।
यह दुरबादी कुमति विचरिहै । तद वहोरि शिव निन्दा करिहै ।।
शिव निंदक सन बाद वढ़ावै । श्रवन सुने अरु आन करावै ।।
करे युगल खल नरक निवासा । श्रवण जीभ रोगिल तन त्रासा ।।
केवल शिव निंदक नहि पापी । श्रोता सहित उभै अध तापी ।।
शिव निंदा सुनि वेमन धरिहौ । यह पुनि करै सखी सुनि गरिहौ ।।
दोहा - 14
हरि हर सुर निंदा करह वाद विषाद वढ़ाय ।
काटिय जीव्ह रिसाय नतु कान मूदि उठि जाय ।।
तिहि ते यह सुथान तजि दीजै । यती गमन आन वन कीजै ।।
अस कहि उमा चलन मन लायेउ । तव सुरूप शिव दरष दिखायेउ ।।
ध्यान धरे जस रूप भवानी । तिहि तन दरसे हर वरदानी ।।
फटिक प्रकाश अंग शशि भाला । तरुण रूप त्रै नयन विशाला ।।
जटा मुकुट शुभ अंग भूतिधर । व्याल विभूषन तन वाघंवर ।।
लखि लजाय गिरिजा मुख मोरी । विमन देखि शिव कहा वहोरी ।।
गमनौ गवरि कहां तजि मोही । छण भर हम न विसारै तोही ।।
मांगौ मन वाँछित जदि तोरे । कछु वरदान अदेय न मोरे ।।
छंद
माँगु भामिनी देव तुहि तप नेम परि पूरण भयो ।।
प्रीति हम कह प्रेम तुम संग लाज तजि लखु यस लयो ।।
लखि रूप सुन्दर गौर तन मन प्रेम हम छल तजि दयो ।।
शिवदयाल शिव सुमिरौ उमा घर आव सब संसय गयो ।।
दोहा - 15
गिरिजा शिव के वचन सुनि , विजहि पुरातन त्रास ।
शिवदयाल तप करण श्रम , फल पाये दुख नास ।।
।।। इति श्री शिव चरित्र महत्मे त्रतीयो अध्याय ।।।
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