Sunday, 17 April 2011

चतुर्थो अध्याय



।।। स्थाणोर्चरित्रम ।।।

।।। शिवदयाल कृत शिव पुराण परिपाटी ।।।

।। अथ श्री स्थाणोर्चरितृम चतुर्थो अध्याय ।।


पांच मंत्र हरि जपे निरंतर । लिंग ते पुनि प्रधटे शिव शंकर ।।

भये प्रसीद अगम दरसाये । स्वास रूप शिव निगम सुनाये ।।

मंत्र जंत्र बहु तंत्र विवेका । कर्म भेद लगि कहे अनेका ।।

मंत्र तंत्र कारजन विभेदा । कहे विपुल साधकन अषेदा ।।

अगम सकल विद्यानिधि शंकर । चारि पांच षट त्रषट त्रयंतर ।।

सब विधन ईशान विशेषा । नारद सनातनी श्रुति रेषा ।।

शिव सब विद्या हरि सन भाषी । प्रभु सव हमै दई शिव साषी ।।

शिव श्वासन मैं निगम वषाने । ज्ञान रहस्य अखिल हरिजाने ।।

दोहा - 1

सो सब हरि हमकौ दये , निगमागम अध्याय ।

पुनि पूंछे प्रभु शंभु सन , शिव संतोष उपाय ।

शिव कस तोषै हम किमि धेवैं । कहा ध्यान धरि किमि शिव सेवैं ।।

शिव सो आगम जतन बतावौ । दया सिंधु करि कृपा सुनावौ ।।

सुलभ कौन विधि शिव संयोगा । पाप हरण शिव दायक भोगा ।।

जतन सहित शिव कहिवे लायक । सुनत पाप हारक फल दायक ।।

सुनि प्रसन्न मन कह यह बाता । लिंग रूप पूजै जो ताता ।

पूजत लिंग दुसह दुख जोई । पावै मम धाम न संसंय कोई ।।

विधि करि मम भक्ति अनंतर । सृष्टि काज सब करहि निरंतर ।।

परम भक्ति हरि करहु हमारी । तुम विशेष कर हुइ संसारी ।।

सब पूजा विधि दै अब शेषा । शिव पूजे फल देहुं विशेषा ।।

तुरीआतीत रूप यह जानी । निष्कल ब्रह्म रूप पहिचानी ।।

ऋग्य यस्याम रूप त्रे तर्ता । पुनि कर्ता पालन संधर्ता ।।

शंकर अगुण त्रिगुण लवलीना । हुइ संतोष वरद वर दीना ।।

सोरठा-2

शम्भु वचन सुनि कान , हरि लागे अस्तुति करन ।

जै जै शम्भु सुजान , शिव शंकर संकट हरण ।।

एकादश तब प्रणव प्रणमामी । आदि अकार अंक सु नमामी ।।

अंत शरीर रजो गुण रूपं । विद्या रूप मकार मनूपं ।।

ब्रह्मदादि नारद मुनि जोगी । जपत निरंतर शिव शिव योगी ।।

गंगाधर सर्पादि विभूषणम् । शरीर भस्म जटाधरम् ।।

भस्म अंग गले मुंण्डन माला । गगन व्यापिने शिव शशि भाला ।।

शिव शंकर पशुपति जगदीशा । तेजस तामस भर्ता ईशा ।।

लिंगेश्वर सर्वज्ञ निरंतर । विश्व गर्भ योगेश्वर शंकर ।।

विधिन व्रह्म वर्चसा कारी । चिता भूमि बासी अविकारी ।।

आत्म रूप विधि हरि हर स्वामी । शिव सर्वज्ञ तुमहि प्रणमामी ।।

नौमि शम्भु शंकर अभिरामम् । विधि हरि अस्तुति करि विररामम् ।।

यह अस्तुति वर दायक चीता । नासय पाप पुन्य बरधीता ।।

दोहा-3

यह अस्तुति शिव की पठै , सुनै सुनावै कोय ।

ब्रह्म लोक सो जायहै , पावै जो मन होय ।।

बढे शुकुल शशि सम कल्याना । भयउ विष्णु ताप अवसाना ।।

अब यह कहेउ सूत संवादा । सुनत सवन के मिटइ विषादा ।।

तव शिव कहेउ सुनौ विधाता । उभय होउ मम गिरा अधाता ।।

मम इच्छा तुम सुनहु खरारी । प्रकृति याति दोनौ बल भारी ।।

त्रिधा मिलन सोई रूप अनूपा । निर्गुण ब्रह्म सगुण अनुरूपा ।।

भगवान पारसु मैं धाता । विष्णु वाय पारसु सुर त्राता ।।

हरि मम उर अन्तर शंकर । मांगउ पुनि निज निज इच्छा वर ।।

यह कहि करि पद धरि शीसा । होउ सकल समरथ जगदीशा ।।

विष्णु मनहि मन वहु आनंदेउ । पुनि पुनि शिव शंकर पद वन्देउ ।।

बोले हरि यदि हम पर नेहू । अविरल भक्ति अपनि अव देहू ।।

तव शिव प्रसन्न मुख वचन उचारी । सुनहु सकल ऋषिगण भयहारी ।।

जो पूजै मम लिंग अपारा । सो पावै इच्छा वर धारा ।।

हरि निन्दक मम सेवक कहिए । रौरव नरक कल्प सत परिये ।।

शिव निन्दक हरि भक्त कहावै । कुंभी पाक नर्क सम पावै ।।

मेरे ह्रदय विष्णु करुणाकर । विष्णु हिरदय शिव रहै निरंतर ।।

सेवत मोहि विष्णु को पावै । विष्णु भक्त मम लोक सिधावै ।।

शिव औ विष्णु की कछु कहिमा नाही । उभय बीच कछु अन्तर नाही ।

सोम मकर कंकण अति प्रिया । तिहि कारण विध यह करणीया ।।

सर्व भूत मय मम सम देखी । पालहु सकल पितामह लेखी ।।

दोहा-4

यही प्रकृति के अंस ते , प्रधटै लछ्मी आय ।

ब्रह्मानी तिहि अंस ते , तिहि ते काली माय ।।

होय त्रिशक्ति प्रकृति गति एका । कारज अरथ सु होय अनेका ।।

केशव कमला संग उपासन । विधि बृह्मानी हर काली तन ।।

वरण चारि अरु आश्रम चारी । सकल जीव सब भांति उघारी ।।

विविध काम सब जीव सचेता । रचव ज्ञान विज्ञान के हेता ।।

मुक्ति छेत्र हरि सदा लोक मम् । तब दर्शन फल मो दर्शन सम् ।।

मोर ह्रदय हरि हम हरि अंगा । अस कहि अंतर हित शिव लिंगा ।।

तब से विदित लिंग शिव पूजा । लिंग देव महदेव न दूजा ।।

लिंग समीप करैं शुभ काजा । तिहि फल संख्या अमित विराजा ।।

दोहा-5

शिव समीप षट मास यह , पढै लिंग सम्वाद ।

शिवधाल लहै सुख अंत गति , नासै दोष विषाद ।।

।।।। इति श्री शिव चरित महात्मे चतुर्थोअध्याय ।।।।

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